Supreme Court Interprets RTE Act Section 12(1)(c): Ensuring No Denial of Admission to Weaker & Disadvantaged Students
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — आरटीई अधिनियम (धारा 12(1)(c)) के तहत कमजोर व वंचित वर्ग के बच्चों को आस‑पड़ोस के स्कूलों में प्रवेश से कोई वंचित नहीं कर सकता
परिचय:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने 13 जनवरी 2026 को Right of Children to Free and Compulsory Education (RTE) Act, 2009 की धारा 12(1)(c) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि कुल्हान और वंचित वर्गों के बच्चों को उनके “आस‑पड़ोस के स्कूलों में” प्रवेश से किसी भी तरह से रोका नहीं जा सकता। न्यायालय ने यह आदेश देते हुए कहा कि राज्य सरकारें और स्थानीय प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि कमजोर एवं वंचित समूहों के बच्चे प्रवेश नकारे न जाएँ और 25% आरक्षण का वाजिब पालन हो।
धारा 12(1)(c): कानूनी ढांचा और मूल उद्देश्य
धारा 12(1)(c) का उद्देश्य:
यह प्रावधान कहता है कि प्रवेश‑स्तर (Class I या प्रवेश स्तर) में कम‑से‑कम 25% सीटें उन बच्चों के लिए आरक्षित की जानी चाहिए जो कमजोर और वंचित वर्गों से आते हैं और जो उनके आस‑पड़ोस में स्थित स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं। यह आरक्षण मुक्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के रूप में है, जैसा कि अनुच्छेद 21A के अंतर्गत प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार सुनिश्चित किया गया है।
धारा 12(1)(c) का मूल लक्ष्य दोनों‑ सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) और शैक्षणिक समानता को बढ़ावा देना है, ताकि सभी बच्चे एक समान अवसर के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या: मुख्य बिंदु
1. प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई योग्य बच्चा कमजोर/वंचित वर्ग से संबंधित है, तो उसे उसके आस‑पड़ोस के स्कूल में प्रवेश से वंचित नहीं रखा जा सकता। यह प्रवेश सिर्फ़ तभी रोका जा सकता है जब आरक्षण पूरा हो चुका हो और सीटें भरी जा चुकी हों।
2. बाध्यकारी नियम बनाना आवश्यक
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल SOP (Standard Operating Procedures) या गाइडलाइंज़ से आरटीई धारा 12(1)(c) लागू नहीं हो सकती, बल्कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को बाध्यकारी नियम बनाना अनिवार्य है ताकि 25% आरक्षण का प्रभावी और मजबूर अनुपालन सुनिश्चित हो।
3. सरकारी तथा स्थानीय प्राधिकरणों की जिम्मेदारी
न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकारें और स्थानीय शैक्षणिक अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि 25% सीटें वास्तविक रूप से नि:शुल्क शिक्षा पाने के लिए कमजोर/वंचित बच्चों को दी जाएँ। यह दायित्व केवल औपचारिक नियमों का पालन करने का नहीं, बल्कि निष्पक्ष और प्रभावी निष्पादन सुनिश्चित करने का है।
4. राष्ट्रीय मिशन के रूप में शिक्षा का अधिकार
कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार को केवल विधिक दायित्व के रूप में नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय मिशन” के रूप में प्रतिष्ठित किया। अदालत ने यह माना कि सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार समान रूप से प्राप्त होना चाहिए, चाहे वे किसी भी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि से हों।
न्यायालय का तर्क: क्यों यह निर्णय महत्वपूर्ण है
वास्तविक अनुपालन की कमी: कई राज्यों ने 25% आरक्षण का अनुपालन केवल SOP और गाइड‑लाइन्स के माध्यम से किया, जिससे जमीन पर बच्चे स्कूलों में प्रवेश पाने में विफल रहे। इसीलिए, कोर्ट ने बाध्यकारी नियमों की आवश्यकता बताई है ताकि इसे प्रभावी बनाया जा सके।
आरटीई की भावना: केवल आरक्षण को बनाने भर से लक्ष्य पूरा नहीं होगा — इसका उद्देश्य शिक्षा के समावेशी अधिकार को साकार करना है, ताकि वंचित बच्चों को समाज के मुख्य धारा में शिक्षा मिल सके और सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो।
समाज और शिक्षा व्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव
सामाजिक समावेशन (Social Inclusion)
25% आरक्षण और इसका प्रभावी अनुपालन समाज में विविधता और समावेशन को बढ़ावा देता है। इससे बच्चे अलग‑अलग पृष्ठभूमि से जुड़ते हैं, जो सामाजिक समझ और समानता की भावना को मजबूत करता है।
शिक्षा का समान अवसर (Equal Educational Opportunities)
यह प्रावधान गरीब, कमजोर और वंचित परिवारों के बच्चों को उच्च‑स्तरीय शिक्षा तक पहुँच प्रदान करता है, जिससे उनकी सामाजिक‑आर्थिक स्थिति में सुधार संभव होता है।
अनुच्छेद 21A की सशक्त व्याख्या
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बिना प्रभावी नियमों के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का मौलिक अधिकार) निष्प्रभावी रह जाएगा। इसलिए राज्य और केंद्र सरकारों को कानून के अनुरूप नियम बनाकर इसे लागू करना चाहिए।
चुनौतियाँ और आगे की राह
हालाँकि कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं, अभी भी कुछ चुनौतियाँ हैं:
✔ कुछ राज्य अभी तक 25% आरक्षण के बाध्यकारी नियम नहीं बनाए हैं।
✔ कई स्कूलों में seats खाली रह जाती हैं या कमजोर वर्ग के बच्चों को प्रवेश मिलना कठिन होता है।
✔ दस्तावेज़ी औपचारिकताओं और अभिभावकों की जागरूकता की कमी के कारण भी अनुपालन में बाधाएं आती हैं।
इन चुनौतियों को दूर करने के लिए आगे प्रभावी प्रशासनिक निगरानी, पारदर्शी प्रक्रिया और शिक्षा अधिकार के प्रति जागरूकता आवश्यक है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(c) को मजबूत और प्रभावी रूप से लागू करने की दिशा में एक मील का पत्थर है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि:
कमजोर एवं वंचित वर्गों के बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
राज्य और स्थानीय प्राधिकरणों के लिए यह कानून का बाध्यकारी दायित्व है।
SOP या गाइड‑लाइन्स पर्याप्त नहीं — राज्य नियम बनाएँ और लागू करें।
यह निर्णय शिक्षा की समानता, समावेशन और सामाजिक न्याय की भावना को बल देता है।
इस फैसले से यह सुनिश्चित होगा कि **शिक्षा केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि साकार‑किया गया अवसर बन जाए — हर बच्चे के लिए।
1. प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट ने RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) की व्याख्या में क्या स्पष्ट किया?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को उनके आस‑पड़ोस के स्कूलों में प्रवेश से किसी भी तरह से वंचित नहीं किया जा सकता। राज्य सरकारें और स्थानीय प्राधिकरण यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि 25% आरक्षण का वास्तविक अनुपालन हो।
2. प्रश्न: धारा 12(1)(c) के तहत कितनी सीटें आरक्षित की जाती हैं और किसके लिए?
उत्तर: धारा 12(1)(c) के तहत प्रवेश‑स्तर (Class I या प्री‑प्राइमरी) में कम‑से‑कम 25% सीटें कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं, जिन्हें मुक्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाती है।
3. प्रश्न: क्या SOP या गाइडलाइन्स के माध्यम से आरक्षण लागू करना पर्याप्त है?
उत्तर: नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल SOP या गाइडलाइन्स पर्याप्त नहीं हैं। राज्यों को बाध्यकारी नियम बनाना आवश्यक है ताकि 25% आरक्षण का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
4. प्रश्न: इस निर्णय का सामाजिक महत्व क्या है?
उत्तर: यह निर्णय समान शिक्षा, सामाजिक समावेशन और कमजोर वर्ग के बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। इससे बच्चे अलग‑अलग पृष्ठभूमि से जुड़ते हैं और समाज में समानता की भावना मजबूत होती है।
5. प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और स्थानीय प्राधिकरणों के लिए क्या निर्देश दिए हैं?
उत्तर: कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें और स्थानीय शैक्षणिक अधिकारी सुनिश्चित करें कि 25% आरक्षण वाले सीटें वास्तविक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को उपलब्ध हों, और किसी भी तकनीकी या औपचारिक कारण से बच्चों को प्रवेश से वंचित न किया जाए।