सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – POSH Act, 2013 के तहत महिला कर्मचारियों की सुरक्षा को नई मजबूती Dr. Sohail Malik बनाम Union of India & Another
प्रस्तावना
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment at Workplace) केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा, समानता और सुरक्षित कार्य वातावरण से जुड़ा गंभीर सामाजिक-कानूनी मुद्दा है। इसी उद्देश्य से भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, जिसे सामान्यतः POSH Act, 2013 कहा जाता है, लागू किया गया।
हालाँकि, इस कानून के लागू होने के बावजूद कई व्यावहारिक समस्याएँ सामने आती रहीं—विशेषकर तब, जब पीड़िता और आरोपी अलग-अलग विभाग, कार्यालय या वर्कप्लेस से संबंधित हों। इसी जटिल प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने Dr. Sohail Malik बनाम Union of India & Another मामले में 10 दिसम्बर 2025 को एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला दिया।
यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, शिकायत प्रक्रिया को सरल बनाने और POSH Act की उद्देश्यपरक व्याख्या की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में मुख्य विवाद यह था कि—
- एक महिला कर्मचारी ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत की
- आरोपी व्यक्ति किसी अन्य विभाग / ऑफिस / वर्कप्लेस में कार्यरत था
- यह तर्क दिया गया कि
शिकायत महिला के कार्यस्थल की Internal Complaints Committee (ICC) में नहीं, बल्कि आरोपी के कार्यस्थल की ICC में ही की जा सकती है
इस तर्क के कारण कई मामलों में—
- शिकायत दर्ज करने में देरी
- महिलाओं को अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर
- मानसिक, सामाजिक और प्रशासनिक दबाव
जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही थीं।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य विधिक प्रश्न
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था—
क्या POSH Act, 2013 के तहत महिला कर्मचारी केवल आरोपी के कार्यस्थल की ICC में ही शिकायत कर सकती है, या वह अपने ही कार्यस्थल की ICC में भी शिकायत दर्ज कर सकती है, भले ही आरोपी किसी अन्य कार्यालय में कार्यरत हो?
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट और सशक्त निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह महिला-पक्षीय और उद्देश्यपरक दृष्टिकोण अपनाते हुए दिया।
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा—
यदि किसी महिला कर्मचारी के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न होता है, तो वह अपने ही कार्यस्थल की Internal Complaints Committee (ICC) में शिकायत दर्ज कर सकती है, भले ही आरोपी किसी अन्य विभाग, कार्यालय या वर्कप्लेस में कार्यरत हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि—
- यह तर्क स्वीकार्य नहीं होगा कि
शिकायत केवल आरोपी के ऑफिस की ICC में ही की जा सकती है
POSH Act, 2013 की उद्देश्यपरक व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने POSH Act की व्याख्या करते हुए कहा कि—
- यह कानून केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है
- इसका मुख्य उद्देश्य है—
- महिलाओं को सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करना
- शिकायत की प्रक्रिया को आसान, सुरक्षित और प्रभावी बनाना
यदि महिला को—
- अलग-अलग कार्यालयों में जाने के लिए मजबूर किया जाए
- आरोपी के कार्यस्थल की ICC के समक्ष पेश होने को कहा जाए
तो यह—
- कानून के उद्देश्य के विपरीत
- और पीड़िता के लिए भयावह एवं अव्यावहारिक होगा।
महिला के कार्यस्थल की ICC की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—
- महिला के वर्कप्लेस की ICC
- शिकायत प्राप्त कर सकती है
- प्रारंभिक जाँच (Preliminary Inquiry) कर सकती है
और उसके बाद—
- आवश्यक तथ्यों
- साक्ष्यों
- और निष्कर्षों के आधार पर
उचित प्राधिकारी या संबंधित कार्यालय को रिपोर्ट भेज सकती है, ताकि आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
शिकायत प्रक्रिया को सरल बनाने की दिशा में बड़ा कदम
अदालत ने अपने निर्णय में विशेष रूप से कहा कि—
“कानून का उद्देश्य महिलाओं को न्याय के लिए भटकाना नहीं, बल्कि उन्हें त्वरित और प्रभावी संरक्षण देना है।”
इस निर्णय से—
- महिलाओं को एक ही स्थान पर शिकायत का अधिकार मिलेगा
- प्रशासनिक जटिलताएँ कम होंगी
- और शिकायत दर्ज करने में संकोच या डर कम होगा
POSH Act और संविधानिक मूल्य
सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को भारतीय संविधान के मूल्यों से जोड़ते हुए कहा कि—
- अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता
- अनुच्छेद 15 – लैंगिक भेदभाव का निषेध
- अनुच्छेद 21 – जीवन और गरिमा का अधिकार
POSH Act इन्हीं संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में लाने का एक साधन है।
Vishaka Guidelines की भावना का विस्तार
कोर्ट ने अपने निर्णय में Vishaka बनाम State of Rajasthan (1997) के ऐतिहासिक फैसले की भावना को भी रेखांकित किया।
Vishaka केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि—
- महिलाओं को कार्यस्थल पर गरिमा और सुरक्षा का अधिकार है
- और राज्य व नियोक्ता की जिम्मेदारी है कि वह इस अधिकार की रक्षा करें
वर्तमान निर्णय उसी भावना का विस्तारित और आधुनिक रूप है।
नियोक्ताओं और संस्थानों की जिम्मेदारी
इस फैसले के बाद—
- प्रत्येक कार्यालय / संस्थान की ICC को
- अधिक संवेदनशील
- और सक्रिय भूमिका निभानी होगी
नियोक्ताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि—
- ICC केवल औपचारिक संस्था न रहे
- बल्कि वास्तविक शिकायत निवारण तंत्र बने
महिलाओं के लिए व्यावहारिक लाभ
इस निर्णय से महिलाओं को कई प्रत्यक्ष लाभ मिलेंगे—
- शिकायत दर्ज करने में सुविधा
- मानसिक दबाव में कमी
- कार्यस्थल पर विश्वास का माहौल
- न्याय तक त्वरित पहुँच
विशेषकर उन मामलों में—
- जहाँ आरोपी वरिष्ठ अधिकारी हो
- या अलग कार्यालय में पदस्थ हो
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ आलोचकों का तर्क हो सकता है कि—
- इससे अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- यह भ्रम कानून के उद्देश्य के सामने तुच्छ है
- और प्रशासनिक समन्वय के माध्यम से इसे आसानी से सुलझाया जा सकता है
भविष्य के मामलों पर प्रभाव
यह निर्णय—
- भविष्य के सभी POSH मामलों में मार्गदर्शक सिद्धांत बनेगा
- निचली अदालतों
- और ICCs को स्पष्ट दिशा देगा
अब कोई भी संस्था यह बहाना नहीं बना सकेगी कि—
“आरोपी हमारे ऑफिस का नहीं है, इसलिए हम शिकायत नहीं सुन सकते।”
महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि—
- महिला सशक्तिकरण
- कार्यस्थल की गरिमा
- और समान अवसर
की दिशा में एक सशक्त सामाजिक संदेश है।
निष्कर्ष
Dr. Sohail Malik बनाम Union of India & Another (2025) में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला POSH Act, 2013 की आत्मा को सशक्त बनाता है।
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि—
- कानून महिलाओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए है
- न कि उन्हें प्रक्रियात्मक जटिलताओं में उलझाने के लिए
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि—
कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा से कोई समझौता नहीं होगा, और न्याय तक पहुँच सरल, सुरक्षित और प्रभावी होगी।