सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़: बॉम्बे हाई कोर्ट की ड्रग्स विभाग को कड़ी चेतावनी — ‘दवाओं की जांच में देरी, मौत को दावत’
प्रस्तावना: दवा नहीं, जीवन का भरोसा बिकता है
जब कोई मरीज डॉक्टर के पर्चे पर लिखी दवा खरीदता है, तो वह सिर्फ एक टैबलेट, कैप्सूल या इंजेक्शन नहीं ले रहा होता — वह जीवन, राहत और विश्वास खरीद रहा होता है। वह यह मानकर दवा निगलता है कि राज्य की व्यवस्था ने उसकी गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता की जांच कर ली है। लेकिन यदि वही व्यवस्था सुस्त, संसाधन-विहीन या लापरवाह हो जाए, तो दवा इलाज नहीं बल्कि खतरा बन जाती है।
इसी गंभीर पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के औषधि प्रशासन (Drugs Department) को दवाओं के नमूनों की जांच में हो रही भारी देरी पर कड़ी फटकार लगाई। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जांच में देरी का सीधा मतलब है—खराब दवाओं को बाजार में खुला घूमने देना, और यह स्थिति नागरिकों के जीवन के अधिकार (Article 21) पर सीधा प्रहार है।
कानूनी ढांचा: दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का सिस्टम
भारत में दवाओं के निर्माण, बिक्री और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए मुख्य कानून है:
औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (Drugs and Cosmetics Act, 1940)
इस अधिनियम के तहत:
- दवाओं के नमूने (Samples) ड्रग इंस्पेक्टर द्वारा लिए जाते हैं
- उन्हें सरकारी प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है
- विश्लेषक (Government Analyst) रिपोर्ट देता है
- यदि दवा Sub-standard, Spurious या Misbranded पाई जाती है तो कार्रवाई होती है
कानून का उद्देश्य स्पष्ट है:
अमानक दवाएं मरीज तक न पहुँचें
दोषी निर्माता/विक्रेता पर त्वरित कार्रवाई हो
लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष आए तथ्यों से पता चला कि कानून किताबों में तेज है, पर जमीन पर धीमा।
न्यायालय की मुख्य आपत्तियाँ: सिस्टम कहाँ टूट रहा है?
1. अनिवार्य समय सीमा का उल्लंघन
न्यायालय ने पाया कि:
- दवाओं के नमूनों की जांच रिपोर्ट महीनों तक लंबित रहती है
- कई मामलों में रिपोर्ट इतनी देर से आती है कि दवा का पूरा स्टॉक बाजार में बिक चुका होता है
यह देरी सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि घातक है। जब तक रिपोर्ट आती है, हजारों मरीज वह दवा खा चुके होते हैं।
2. देरी = अमानक दवाओं को ‘फ्री पास’
यदि किसी दवा का बैच संदिग्ध है, लेकिन उसकी जांच 5–6 महीने तक लंबित है, तो उस दौरान:
- वह दवा अस्पतालों में दी जा रही है
- मेडिकल स्टोर्स पर बिक रही है
- गंभीर रोगियों तक पहुँच रही है
कोर्ट ने इस स्थिति को “Public Health Disaster Waiting to Happen” जैसा माना।
3. प्रयोगशालाओं की दयनीय स्थिति
न्यायालय ने यह भी नोट किया कि:
- सरकारी लैब्स में स्टाफ की कमी
- पुरानी मशीनें
- अत्यधिक पेंडेंसी
इन कारणों से रिपोर्ट समय पर नहीं आ पा रही। लेकिन कोर्ट ने साफ कहा —
“संसाधनों की कमी जनता के जीवन से खिलवाड़ का बहाना नहीं हो सकती।”
संवैधानिक दृष्टिकोण: अनुच्छेद 21 और स्वास्थ्य का अधिकार
अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि:
“जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमा और स्वास्थ्य सहित जीवन जीने का अधिकार है।”
अमानक दवाओं का बाजार में बने रहना:
- मरीज को जोखिम में डालता है
- इलाज को असफल बना सकता है
- मौत तक का कारण बन सकता है
इसलिए कोर्ट ने दवा सुरक्षा को सीधे Article 21 से जोड़ा।
राज्य की सकारात्मक जिम्मेदारी
राज्य सिर्फ “निष्क्रिय दर्शक” नहीं हो सकता। उसकी जिम्मेदारी है:
- बाजार में बिकने वाली दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना
- परीक्षण व्यवस्था मजबूत रखना
- दोषियों पर शीघ्र कार्रवाई करना
कोर्ट का संदेश साफ था:
“यह प्रशासनिक सुविधा का मामला नहीं, संवैधानिक दायित्व का मामला है।”
न्यायालय की चेतावनी: व्यक्तिगत जवाबदेही
यह आदेश सिर्फ सामान्य निर्देश नहीं था। कोर्ट ने संकेत दिया कि:
- यदि समय सीमा का पालन नहीं हुआ
- तो जिम्मेदार अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है
- उन पर जुर्माना या अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है
यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर विभागीय लापरवाही “सिस्टम फेलियर” के नाम पर छिप जाती है।
सुधार के लिए कोर्ट का ‘ब्लूप्रिंट’
1. डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम
कोर्ट ने सुझाव दिया कि:
- हर सैंपल का एक यूनिक ट्रैकिंग नंबर हो
- उसकी स्थिति ऑनलाइन मॉनिटर हो
- पेंडेंसी छिप न सके
इससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों बढ़ेंगी।
2. लैब्स का आधुनिकीकरण
राज्य सरकार को निर्देश:
- नई मशीनें
- प्रशिक्षित स्टाफ
- रिक्त पदों की शीघ्र भर्ती
3. देरी पर कार्रवाई
जांच में अनावश्यक देरी करने वाले अधिकारियों पर:
- विभागीय जांच
- अनुशासनात्मक कार्यवाही
प्रशासनिक कानून (Administrative Law) का महत्वपूर्ण उदाहरण
यह मामला दिखाता है:
- राज्य की लापरवाही पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
- प्रशासनिक निष्क्रियता को अदालत कैसे नियंत्रित करती है
- “Welfare State” की अवधारणा का व्यावहारिक रूप
यह छात्रों और वकीलों के लिए प्रशासनिक जवाबदेही का बेहतरीन केस स्टडी है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव
दवाओं की गुणवत्ता में कमी का प्रभाव:
| क्षेत्र | असर |
|---|---|
| मरीज | इलाज असफल, दुष्प्रभाव, मृत्यु तक |
| डॉक्टर | उपचार की विश्वसनीयता पर प्रश्न |
| स्वास्थ्य प्रणाली | जनता का भरोसा कम |
| अर्थव्यवस्था | बीमारी का बोझ बढ़ता |
खराब दवाएँ सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकती हैं।
न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका
यह आदेश दिखाता है कि:
- अदालतें अब स्वास्थ्य प्रशासन पर भी सख्त नजर रख रही हैं
- “Policy Matter” कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता
- जब जीवन का सवाल हो, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करेगी
व्यावसायिक और नैतिक सीख: गुणवत्ता से समझौता = कानूनी जोखिम
स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी उत्पाद (दवा, खाद्य पदार्थ, सप्लीमेंट) के लिए यह फैसला एक बड़ा संदेश है:
गुणवत्ता नियंत्रण सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं
यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है
यदि जांच में देरी से मौत हो सकती है, तो मिलावट या लापरवाही भी उतनी ही गंभीर है।
निष्कर्ष: सुस्ती नहीं, सतर्कता चाहिए
बॉम्बे हाई कोर्ट का यह रुख एक चेतावनी है कि:
- स्वास्थ्य प्रशासन में देरी = जीवन के साथ जुआ
- संसाधनों की कमी का बहाना अब स्वीकार्य नहीं
- जवाबदेही व्यक्तिगत स्तर तक तय हो सकती है
यह फैसला केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए संकेत है कि दवाओं की सुरक्षा कोई औपचारिकता नहीं, जीवन रक्षा का मूल स्तंभ है।
न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है:
“दवा की जांच में देरी सिर्फ फाइलों की समस्या नहीं — यह इंसानों की जान का सवाल है।”