📖 साक्ष्य अधिनियमः प्रमुख धाराएँ और सिद्धांत
प्रस्तावना
न्यायालय का मूल उद्देश्य है – सत्य की खोज करना और न्याय करना। किसी भी मुकदमे में न्यायालय केवल अनुमान या भावनाओं पर नहीं चल सकता, बल्कि उसे ठोस और प्रासंगिक साक्ष्यों पर आधारित निर्णय देना होता है। इसी उद्देश्य से भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Indian Evidence Act, 1872) बनाया गया। यह अधिनियम न्यायिक कार्यवाही में साक्ष्य की स्वीकार्यता, प्रासंगिकता और मूल्यांकन के नियम तय करता है।
इसे ब्रिटिश काल में सर जेम्स फिट्ज जेम्स स्टीफन द्वारा तैयार किया गया था। 1 सितम्बर 1872 को यह लागू हुआ और तब से लेकर अब तक न्यायपालिका के कामकाज का एक अभिन्न हिस्सा है।
साक्ष्य अधिनियम का महत्व
- यह अधिनियम न्यायालय में प्रासंगिक और अप्रासंगिक तथ्यों में अंतर करता है।
- न्यायालय को यह बताता है कि किस प्रकार गवाहों और दस्तावेजों को परखा जाए।
- न्यायिक निर्णयों को निष्पक्ष, तर्कसंगत और न्यायोचित बनाता है।
- यह न केवल आपराधिक (Criminal) मामलों पर लागू होता है बल्कि दीवानी (Civil) मामलों में भी समान रूप से लागू है।
साक्ष्य की परिभाषा (धारा 3)
धारा 3 के अनुसार “साक्ष्य” का अर्थ है –
- मौखिक साक्ष्य (Oral Evidence): गवाहों द्वारा अदालत में दिया गया कथन।
- दस्तावेजी साक्ष्य (Documentary Evidence): लिखित, मुद्रित या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड।
🔹 उदाहरण:
- यदि किसी व्यक्ति ने हत्या होते देखी है और वह अदालत में बयान देता है → यह मौखिक साक्ष्य है।
- यदि हत्या की घटना CCTV में कैद हो गई है → यह दस्तावेजी/इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य है।
साक्ष्य के प्रकार
- प्रत्यक्ष साक्ष्य (Direct Evidence): प्रत्यक्षदर्शी गवाही, मूल दस्तावेज।
- अप्रत्यक्ष साक्ष्य (Circumstantial Evidence): परिस्थितियों से निकाले गए निष्कर्ष।
- प्राथमिक साक्ष्य (Primary Evidence): मूल दस्तावेज या वस्तु।
- द्वितीयक साक्ष्य (Secondary Evidence): प्रतिलिपि, प्रमाणित कॉपी आदि।
- मौखिक साक्ष्य (Oral Evidence): गवाह का कथन।
- दस्तावेजी साक्ष्य (Documentary Evidence): लिखित व इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख।
प्रमुख धाराएँ और उनका महत्व
🔹 धारा 5 – प्रासंगिक तथ्य
न्यायालय केवल उन्हीं तथ्यों पर विचार करेगा जो विवादित मामले से संबंधित हों।
👉 अप्रासंगिक तथ्यों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
🔹 धारा 6 – समान तथ्य का सिद्धांत (Res Gestae)
किसी घटना के तुरंत बाद या दौरान हुए तथ्य भी साक्ष्य माने जाएंगे।
👉 उदाहरण: हत्या होते ही कोई व्यक्ति “उसने गोली चलाई” चिल्लाता है – यह कथन साक्ष्य है।
🔹 धारा 24-27 – अभियुक्त के कथन की स्वीकार्यता
- धारा 24: यदि कथन दबाव, प्रलोभन या धमकी से लिया गया है तो वह अस्वीकार्य होगा।
- धारा 25: पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया स्वीकारोक्ति बयान मान्य नहीं।
- धारा 27: यदि आरोपी के बयान से कोई नया तथ्य खोजा जाता है, तो वह हिस्सा मान्य होगा।
👉 केस: Pulukuri Kotayya v. State of Andhra Pradesh (1955) – केवल वही कथन मान्य होगा जो तथ्य की खोज तक ले जाए।
🔹 धारा 32 – मृत्यु पूर्व कथन (Dying Declaration)
यदि कोई व्यक्ति मरने से पहले अपराध के संबंध में बयान देता है, तो वह अदालत में मान्य है।
👉 केस: Khushal Rao v. State of Bombay (1958) – मृत्यु पूर्व कथन विश्वसनीय होने पर दोषसिद्धि का आधार बन सकता है।
🔹 धारा 45 – विशेषज्ञ मत
विशेषज्ञ जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, हैंडराइटिंग एक्सपर्ट, फॉरेंसिक विशेषज्ञ की राय अदालत में मान्य है।
👉 केस: State of HP v. Jai Lal (1999) – विशेषज्ञ की राय सहायक मात्र है, अंतिम निर्णय न्यायालय का होगा।
🔹 धारा 60 – मौखिक साक्ष्य
मौखिक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाहिए। सुनी-सुनाई बात (Hearsay Evidence) सामान्यतः अस्वीकार्य है।
🔹 धारा 61-65 – दस्तावेजी साक्ष्य
- धारा 61: दस्तावेज की सामग्री सिद्ध करनी होगी।
- धारा 62: मूल दस्तावेज प्राथमिक साक्ष्य है।
- धारा 63-65: प्रतिलिपि कब मान्य होगी।
👉 इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य धारा 65B के अंतर्गत आता है।
🔹 धारा 114 – अनुमान
न्यायालय सामान्य अनुभव के आधार पर अनुमान लगा सकता है।
👉 केस: Tomaso Bruno v. State of UP (2015) – यदि CCTV जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए तो अदालत प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है।
🔹 धारा 118 – गवाह की क्षमता
हर व्यक्ति गवाही दे सकता है, चाहे वह बच्चा हो या बूढ़ा, यदि वह समझ रखता है।
🔹 धारा 134 – गवाहों की संख्या
न्यायालय के लिए गवाहों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गवाही की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।
👉 केस: State of UP v. Krishna Gopal (1988) – एक गवाह की सच्ची गवाही पर्याप्त हो सकती है।
🔹 धारा 137-138 – गवाहों की परीक्षा
- मुख्य परीक्षा
- प्रतिपरीक्षा (Cross Examination)
- पुनः परीक्षा
👉 केस: State of Rajasthan v. Ani (1997) – गवाह की सच्चाई की जांच का सबसे मजबूत साधन प्रतिपरीक्षा है।
साक्ष्य अधिनियम के प्रमुख सिद्धांत
- प्रासंगिकता का सिद्धांत (Relevancy): केवल प्रासंगिक तथ्य ही साक्ष्य होंगे।
- सर्वोत्तम साक्ष्य का सिद्धांत (Best Evidence Rule): मूल दस्तावेज प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
- प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रधान (Direct Evidence): प्रत्यक्ष गवाही सबसे मजबूत साक्ष्य है।
- अनुमान का सिद्धांत (Presumption): न्यायालय सामान्य अनुभवों से अनुमान लगा सकता है।
- जिरह का सिद्धांत (Cross Examination): गवाह की सच्चाई की परीक्षा।
- निष्पक्षता का सिद्धांत (Impartiality): प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए।
आधुनिक संदर्भ में साक्ष्य अधिनियम
आज के दौर में तकनीक का महत्व बढ़ गया है।
- धारा 65B: इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जैसे ईमेल, सीडी, हार्ड डिस्क, व्हाट्सऐप चैट आदि साक्ष्य माने जाएंगे।
👉 केस: Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014) – इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य तभी मान्य होगा जब 65B प्रमाणपत्र के साथ प्रस्तुत किया जाए।
निष्कर्ष
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 न्यायालय को सत्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। यह तय करता है कि कौन-सा तथ्य साक्ष्य होगा और कौन नहीं।
👉 इसकी प्रमुख धाराएँ (धारा 3, 5, 6, 24-27, 32, 45, 60, 61-65, 114, 118, 134, 137-138) भारतीय न्याय प्रणाली की रीढ़ हैं।
👉 केस लॉ (Pulukuri Kotayya, Khushal Rao, Anvar P.V., Krishna Gopal आदि) इसके व्यावहारिक उपयोग को स्पष्ट करते हैं।
संक्षेप में, साक्ष्य अधिनियम न्यायपालिका का दीपस्तंभ है, जो न्यायालय को सत्य की खोज में मार्गदर्शन देता है और न्याय सुनिश्चित करता है।
प्रश्न 1: भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में “प्रासंगिक तथ्य” (Relevant Facts) की अवधारणा को समझाइए।
उत्तर:
भारतीय साक्ष्य अधिनियम का मूल उद्देश्य न्यायालय को यह बताना है कि किन तथ्यों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है और किन्हें नहीं। धारा 5 के अनुसार न्यायालय केवल उन्हीं तथ्यों पर विचार करेगा जो विवादित मामले से संबंधित (Relevant) हों।
1. परिभाषा:
प्रासंगिक तथ्य वे तथ्य हैं जो किसी विवादित तथ्य को सिद्ध या असिद्ध करने में सहायक हों।
2. उदाहरण:
यदि किसी व्यक्ति पर हत्या का आरोप है, तो –
- हत्या से ठीक पहले अभियुक्त को मृतक के साथ देखा गया → प्रासंगिक तथ्य।
- अभियुक्त का स्वभाव गुस्सैल है → अप्रासंगिक, जब तक उसका सीधा संबंध घटना से न हो।
3. प्रमुख धाराएँ:
- धारा 6 (Res Gestae): उसी घटना से संबंधित तथ्य प्रासंगिक हैं।
- धारा 7: कारण, प्रभाव और परिस्थितियाँ प्रासंगिक हैं।
- धारा 8: अभियुक्त का इरादा, उद्देश्य और आचरण प्रासंगिक है।
- धारा 9: पहचान और स्थान संबंधी तथ्य प्रासंगिक।
4. केस लॉ:
- Ratten v. R. (1971) – टेलीफोन कॉल “मेरे पति मुझे गोली मार देंगे” घटना के तुरंत बाद का तथ्य माना गया और धारा 6 के अंतर्गत प्रासंगिक माना गया।
- पलकुड़ी नरायणस्वामी बनाम एम. राजा गोपाल (1970 AIR 494) – Res Gestae की व्याख्या की गई।
5. निष्कर्ष:
प्रासंगिक तथ्यों की अवधारणा न्यायालय को सही दिशा देती है कि किन तथ्यों पर विचार करना है। यह न्यायिक प्रक्रिया को तर्कसंगत और निष्पक्ष बनाती है।
प्रश्न 2: भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 में मृत्यु पूर्व कथन (Dying Declaration) का महत्व समझाइए।
उत्तर:
धारा 32(1) के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु से पूर्व अपराध से संबंधित कोई बयान देता है, तो उसे न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाएगा। इसे Dying Declaration कहा जाता है।
1. सिद्धांत:
कानून का मानना है कि मृत्यु की स्थिति में व्यक्ति झूठ नहीं बोलता। इसीलिए उसका अंतिम बयान सत्य माना जाता है।
2. आवश्यक शर्तें:
- बयान देने वाला व्यक्ति मृत्यु के करीब हो।
- बयान स्वेच्छा से दिया गया हो।
- बयान स्पष्ट और विश्वसनीय हो।
- बयान न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, डॉक्टर या किसी भी विश्वसनीय व्यक्ति के समक्ष हो सकता है।
3. केस लॉ:
- Khushal Rao v. State of Bombay (AIR 1958 SC 22): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृत्यु पूर्व कथन विश्वसनीय हो तो दोषसिद्धि का आधार बन सकता है।
- P.V. Radhakrishna v. State of Karnataka (2003): यदि बयान असंगत है तो उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
- Laxman v. State of Maharashtra (2002): बयान लेने के समय डॉक्टर का प्रमाण जरूरी नहीं, जब तक बयान विश्वसनीय हो।
4. निष्कर्ष:
मृत्यु पूर्व कथन न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बार यह ही एकमात्र साक्ष्य होता है। परंतु न्यायालय को इसकी प्रामाणिकता की जांच सावधानी से करनी चाहिए।
प्रश्न 3: गवाहों की संख्या और गुणवत्ता के सिद्धांत (धारा 134) की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
धारा 134 में स्पष्ट किया गया है कि न्यायालय के लिए गवाहों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उनकी गवाही की गुणवत्ता (Quality) ही महत्वपूर्ण है।
1. सिद्धांत:
भारतीय साक्ष्य अधिनियम “गुणवत्ता प्रधान” (Quality Oriented) है, न कि “संख्या प्रधान” (Quantity Oriented)।
👉 अर्थात, एक विश्वसनीय गवाह की गवाही सैकड़ों गवाहों से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
2. केस लॉ:
- State of U.P. v. Krishna Gopal (AIR 1988 SC 2154): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ईमानदार और विश्वसनीय गवाह की गवाही पर्याप्त है।
- Vadivelu Thevar v. State of Madras (AIR 1957 SC 614): न्यायालय ने गवाहों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया –
- पूर्णतया विश्वसनीय
- पूर्णतया अविश्वसनीय
- आंशिक रूप से विश्वसनीय → ऐसे मामलों में सहायक साक्ष्य आवश्यक है।
3. उदाहरण:
- यदि हत्या का एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह है और उसकी गवाही स्पष्ट, संगत और विश्वसनीय है, तो दोषसिद्धि हो सकती है।
- यदि कई गवाह हैं लेकिन उनकी गवाही विरोधाभासी है, तो उनका कोई महत्व नहीं।
4. निष्कर्ष:
न्यायालय गवाहों की संख्या पर नहीं बल्कि गवाही की सच्चाई, स्थिरता और विश्वसनीयता पर भरोसा करता है। यही सिद्धांत न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और न्यायोचित बनाता है।