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समय-सीमा का सम्मान अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की तीन याचिकाएँ एक साथ खारिज कीं, देरी माफ करने से किया इनकार

समय-सीमा का सम्मान अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की तीन याचिकाएँ एक साथ खारिज कीं, देरी माफ करने से किया इनकार

        भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 15 दिसंबर को एक महत्वपूर्ण और सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार से जुड़ी तीन याचिकाओं को एक साथ खारिज कर दिया। न्यायालय ने इन मामलों में देरी को माफ (condone) करने से स्पष्ट रूप से इनकार करते हुए मौखिक टिप्पणी की कि केंद्र सरकार के अधिकारी समय-सीमा के प्रति पर्याप्त रूप से सतर्क और परिश्रमी नहीं हैं। यह टिप्पणी केवल इन तीन मामलों तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे सरकारी तंत्र को दिया गया एक व्यापक और कड़ा संदेश माना जा रहा है।

          Supreme Court के इस फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि कानून की नजर में सरकार और आम नागरिक के लिए अलग-अलग मापदंड नहीं हो सकते। न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि केवल “सरकारी प्रक्रिया”, “फाइलों की आवाजाही” या “प्रशासनिक देरी” जैसे बहानों के आधार पर समय-सीमा के उल्लंघन को नियमित रूप से माफ नहीं किया जा सकता।


तीन याचिकाएँ, एक समान परिणाम

          सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ये तीनों मामले ऐसे थे, जिनमें केंद्र सरकार या उससे जुड़े विभागों द्वारा निर्धारित वैधानिक समय-सीमा के काफी बाद याचिकाएँ दायर की गई थीं। सरकार की ओर से देरी माफ करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किए गए, जिनमें यह तर्क दिया गया कि सरकारी निर्णय प्रक्रिया में अनेक स्तर होते हैं, जिसके कारण समय लगता है।

        हालांकि, न्यायालय इस तर्क से सहमत नहीं हुआ। पीठ ने तीनों मामलों को एक साथ सुनते हुए यह स्पष्ट किया कि देरी के कारण न तो असाधारण थे और न ही अपरिहार्य। परिणामस्वरूप, तीनों मामलों में देरी माफ करने से इनकार करते हुए याचिकाएँ खारिज कर दी गईं।


मौखिक टिप्पणी: “सरकारी अधिकारी पर्याप्त रूप से सतर्क नहीं”

        सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह लगातार देखा जा रहा है कि केंद्र सरकार के अधिकारी समय-सीमा को गंभीरता से नहीं लेते। अदालत ने कहा कि:

“सरकार यह मानकर चलती है कि देरी अपने आप माफ हो जाएगी। यह प्रवृत्ति स्वीकार्य नहीं है।”

        न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि बार-बार इस तरह की ढिलाई को माफ किया जाता रहा, तो इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी, बल्कि आम नागरिकों में यह संदेश जाएगा कि सरकार कानून से ऊपर है।


Limitation Law और सरकारी लापरवाही

       सीमा अधिनियम (Limitation Act) का मूल उद्देश्य यह है कि मुकदमेबाजी में निश्चितता और अनुशासन बना रहे। समय-सीमा इसलिए तय की जाती है ताकि:

  • विवादों का शीघ्र निस्तारण हो
  • पुराने और बासी दावों से न्यायालयों पर अनावश्यक बोझ न पड़े
  • पक्षकारों में कानूनी निश्चितता बनी रहे

       सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि सरकार को कोई विशेष विशेषाधिकार (special privilege) प्राप्त नहीं है। यदि कोई निजी व्यक्ति समय-सीमा के भीतर याचिका दाखिल नहीं करता, तो उसकी याचिका खारिज हो जाती है; यही सिद्धांत सरकार पर भी समान रूप से लागू होता है।


“सरकारी कामकाज” देरी का बहाना नहीं

       अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक युग में, जहां तकनीक और डिजिटल संचार के साधन उपलब्ध हैं, वहां यह तर्क देना कि “फाइल एक विभाग से दूसरे विभाग में घूमती रही” अब स्वीकार्य नहीं हो सकता।

न्यायालय का यह भी कहना रहा है कि सरकार के पास:

  • प्रशिक्षित विधि अधिकारी
  • स्थायी कानूनी विभाग
  • पर्याप्त संसाधन

उपलब्ध होते हैं। ऐसे में यदि फिर भी समय-सीमा का पालन नहीं किया जाता, तो इसे “साधारण लापरवाही” नहीं बल्कि “प्रणालीगत उदासीनता” माना जाएगा।


न्यायपालिका का सख्त रुख: बदलती प्रवृत्ति

       हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय सरकारी मामलों में देरी को लेकर अधिक सख्त हो गए हैं। पहले जहां सरकारी याचिकाओं में देरी को अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण से देखा जाता था, वहीं अब अदालतें बार-बार यह स्पष्ट कर रही हैं कि:

  • कानून सबके लिए समान है
  • सरकारी पहचान देरी माफी का स्वतः आधार नहीं हो सकती
  • जवाबदेही (accountability) आवश्यक है

यह फैसला इसी बदली हुई न्यायिक सोच का एक और उदाहरण है।


आम नागरिकों के लिए क्या संदेश?

        इस निर्णय का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इससे आम नागरिकों में न्याय प्रणाली के प्रति विश्वास मजबूत होता है। जब लोग देखते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय सरकार को भी वही मानदंड अपनाने के लिए बाध्य कर रहा है, जो आम व्यक्ति पर लागू होते हैं, तो “Rule of Law” की अवधारणा सशक्त होती है।

       यह संदेश भी जाता है कि यदि आम नागरिक की याचिका समय-सीमा के बाहर होने पर खारिज हो सकती है, तो सरकार भी उसी नियम से बंधी है।


प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता

        इस फैसले के बाद यह सवाल और प्रासंगिक हो गया है कि क्या सरकारी विभागों में मुकदमेबाजी प्रबंधन (litigation management) को लेकर गंभीर सुधारों की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • हर विभाग में स्पष्ट समय-सीमा तय हो
  • जवाबदेही तय की जाए कि देरी के लिए कौन जिम्मेदार है
  • अनावश्यक अपीलों और याचिकाओं से बचा जाए

यदि इन सुधारों को लागू नहीं किया गया, तो इस तरह की न्यायिक फटकार भविष्य में भी मिलती रहेगी।


निष्कर्ष

        15 दिसंबर को केंद्र सरकार की तीन याचिकाओं को एक साथ खारिज करते हुए देरी माफ करने से इनकार करना केवल एक प्रक्रियात्मक आदेश नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक संदेश है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून की समय-सीमा कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि न्याय का अनिवार्य हिस्सा है।

       यह फैसला सरकार को यह याद दिलाता है कि “राज्य” होने का अर्थ यह नहीं कि वह कानून से ऊपर है। बल्कि, उससे अपेक्षा की जाती है कि वह कानून का सबसे अनुशासित पालनकर्ता बने। भविष्य में यह निर्णय सरकारी मुकदमेबाजी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में उद्धृत किया जाएगा और संभवतः प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार की दिशा में भी एक प्रेरक भूमिका निभाएगा।