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सजा में रिहाई (Remission) नीति पर सवाल: गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से वर्तमान नीति रिकॉर्ड पर रखने को कहा

सजा में रिहाई (Remission) नीति पर सवाल: गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से वर्तमान नीति रिकॉर्ड पर रखने को कहा — सुप्रीम कोर्ट की निगरानी, कैदियों के अधिकार और आपराधिक न्याय प्रणाली पर व्यापक विमर्श

भूमिका

     भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में सजा (Sentence) के साथ-साथ सजा में रिहाई (Remission) का सिद्धांत भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह सिद्धांत दंड के साथ सुधार, मानवीय दृष्टिकोण और पुनर्वास की अवधारणा से जुड़ा हुआ है। हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट ने इसी विषय पर एक अहम कदम उठाते हुए राज्य सरकार से उसकी वर्तमान रिमिशन नीति (Remission Policy) को अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है।

       हाईकोर्ट ने यह निर्देश ऐसे समय में दिया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले से ही रिमिशन नीतियों के क्रियान्वयन पर निगरानी कर रहा है और राज्यों से पारदर्शिता व समानता की अपेक्षा की जा रही है। यह आदेश केवल एक प्रक्रियात्मक निर्देश नहीं है, बल्कि यह कैदियों के अधिकार, राज्य की विवेकाधीन शक्तियों और संवैधानिक सीमाओं से जुड़ा एक गहरा प्रश्न उठाता है।


मामले की पृष्ठभूमि

        गुजरात हाईकोर्ट के समक्ष यह मुद्दा उस समय उठा जब एक याचिका/मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट नहीं हो सका कि—

  • राज्य सरकार की वर्तमान रिमिशन नीति क्या है,
  • क्या वह नीति सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुरूप है,
  • और किन परिस्थितियों में आजीवन कारावास या लंबी सजा काट रहे कैदियों को रिहाई दी जा सकती है।

अदालत ने यह पाया कि रिमिशन जैसे गंभीर विषय पर स्पष्टता और पारदर्शिता का अभाव न केवल कैदियों के अधिकारों को प्रभावित करता है, बल्कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को भी कठिन बना देता है।


गुजरात हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि—

  • वह अपनी वर्तमान और लागू रिमिशन नीति को
  • लिखित रूप में
  • संपूर्ण विवरण सहित
  • अदालत के रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि रिमिशन नीति कोई गोपनीय या मनमाना विषय नहीं हो सकता, क्योंकि यह—

  • कैदियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता,
  • समाज में न्याय की भावना,
  • और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21

से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।


रिमिशन (Remission) क्या है?

1. रिमिशन की अवधारणा

रिमिशन का अर्थ है—

सजा की अवधि को कम करना, बिना दोषसिद्धि को समाप्त किए।

यह कोई स्वतः अधिकार नहीं है, बल्कि—

  • एक कार्यपालिका का विवेकाधीन अधिकार है,
  • जिसे नियमों, नीतियों और संवैधानिक सीमाओं के भीतर प्रयोग किया जाना चाहिए।

2. रिमिशन और माफी (Pardon) में अंतर

पहलू रिमिशन माफी
दोषसिद्धि बनी रहती है समाप्त हो सकती है
सजा घटाई जाती है पूरी तरह समाप्त
प्रकृति सशर्त/नीतिगत विशेषाधिकार

संवैधानिक और वैधानिक आधार

1. दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)

  • धारा 432 — सजा में रिहाई की शक्ति
  • धारा 433 — सजा में परिवर्तन
  • धारा 433A — आजीवन कारावास में न्यूनतम 14 वर्ष की वास्तविक सजा

2. संविधान के प्रावधान

  • अनुच्छेद 72 — राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति
  • अनुच्छेद 161 — राज्यपाल की क्षमादान शक्ति

इन शक्तियों के प्रयोग में भी—

  • मनमानी नहीं,
  • सार्वजनिक हित,
  • और समानता के सिद्धांत का पालन आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और दिशा-निर्देश

हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में रिमिशन नीति पर सख्त रुख अपनाया है।

प्रमुख सिद्धांत

  • रिमिशन नीति अपराध की तिथि पर लागू नीति के अनुसार तय होगी।
  • राज्य सरकार मनमाने ढंग से नीति बदलकर लाभ या हानि नहीं पहुँचा सकती।
  • गंभीर अपराधों में पीड़ितों के अधिकारों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

इसी पृष्ठभूमि में गुजरात हाईकोर्ट का यह आदेश महत्वपूर्ण हो जाता है।


रिमिशन नीति में पारदर्शिता क्यों ज़रूरी है?

1. समानता का सिद्धांत (Article 14)

यदि—

  • अलग-अलग मामलों में
  • समान अपराध के लिए
  • अलग-अलग मानदंड अपनाए जाएँ

तो यह समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।


2. जीवन और स्वतंत्रता (Article 21)

लंबी अवधि तक कारावास झेल रहे कैदियों के लिए—

  • रिमिशन
  • पुनर्वास
  • और सामाजिक पुनःस्थापन

अनुच्छेद 21 के दायरे में आते हैं।


3. न्यायिक समीक्षा में सुविधा

स्पष्ट नीति होने से—

  • अदालत यह जाँच सकती है कि
  • क्या निर्णय नियमों के अनुरूप है या नहीं।

राज्य की विवेकाधीन शक्ति बनाम न्यायिक नियंत्रण

यह मामला एक बार फिर यह प्रश्न उठाता है—

क्या रिमिशन पूरी तरह राज्य सरकार की मर्जी पर छोड़ा जा सकता है?

न्यायपालिका का उत्तर रहा है—

  • विवेकाधिकार है,
  • लेकिन असीमित नहीं

गुजरात हाईकोर्ट का आदेश इसी संतुलन को मजबूत करता है।


पीड़ितों और समाज की भूमिका

रिमिशन नीति केवल अभियुक्त या कैदी तक सीमित नहीं है।

1. पीड़ित के अधिकार

  • पीड़ित या उसके परिवार को
  • समयपूर्व रिहाई से प्रभावित किया जा सकता है।

इसलिए न्यायालयों ने कहा है कि—

पीड़ितों की आवाज़ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।


2. सामाजिक प्रभाव

  • समयपूर्व रिहाई से
  • समाज में न्याय की भावना प्रभावित हो सकती है।

इसलिए नीति बनाते समय—

  • अपराध की प्रकृति
  • समाज पर प्रभाव
  • और सुधार की संभावना

सभी पर विचार आवश्यक है।


गुजरात हाईकोर्ट के आदेश का व्यापक महत्व

यह आदेश—

  • केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है,
  • बल्कि सभी राज्यों के लिए एक संकेत है कि—

 रिमिशन नीतियाँ अस्पष्ट नहीं हो सकतीं
उन्हें सार्वजनिक और न्यायिक जांच के योग्य होना चाहिए
और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप होना अनिवार्य है


संभावित परिणाम

इस आदेश के बाद—

  1. गुजरात सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी होगी
  2. भविष्य के मामलों में रिमिशन पर निर्णय अधिक पारदर्शी होंगे
  3. अन्य राज्य भी अपनी नीतियों की समीक्षा कर सकते हैं
  4. कैदियों और पीड़ितों — दोनों के अधिकारों पर संतुलित दृष्टिकोण विकसित होगा

निष्कर्ष

गुजरात हाईकोर्ट द्वारा राज्य की रिमिशन नीति रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह आदेश स्पष्ट करता है कि—

  • सजा में रिहाई कोई गुप्त या मनमाना निर्णय नहीं हो सकता,
  • बल्कि यह संविधान, कानून और न्यायिक निगरानी के अधीन होना चाहिए।

अंततः, रिमिशन का उद्देश्य—

न्याय को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे मानवीय और संतुलित बनाना है।