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संविधान, न्याय और राष्ट्रसेवा का उज्ज्वल प्रतीक: न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह का जीवन, दर्शन और अमर विरासत

संविधान, न्याय और राष्ट्रसेवा का उज्ज्वल प्रतीक: न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह का जीवन, दर्शन और अमर विरासत

भूमिका

       भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल अपने पदों के कारण नहीं, बल्कि अपने चरित्र, दृष्टि और मूल्यों के कारण युगों तक स्मरण किए जाते हैं। Mohammed Hidayatullah ऐसे ही एक दुर्लभ, बहुआयामी और असाधारण व्यक्तित्व थे।

        वे भारत के ऐसे महानतम व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने न्यायपालिका, कार्यपालिका और सार्वजनिक जीवन—तीनों क्षेत्रों में सर्वोच्च गरिमा के साथ कार्य किया। सबसे युवा एडवोकेट जनरल से लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश, उपराष्ट्रपति और दो बार कार्यवाहक राष्ट्रपति तक की उनकी यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की जीवंत यात्रा का प्रतीक है। उनकी 120वीं जयंती पर उनका स्मरण करना हमारे लिए प्रेरणा, आत्ममंथन और संवैधानिक मूल्यों को पुनः दृढ़ करने का अवसर है।


प्रारंभिक जीवन: प्रतिभा, अनुशासन और संस्कार

       न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह का जन्म 17 दिसंबर 1905 को हुआ। उनका बचपन ही असाधारण बौद्धिक क्षमता और अनुशासन का परिचायक था। वे प्रारंभ से ही अध्ययनशील, जिज्ञासु और विचारशील थे।

        उनकी प्रारंभिक शिक्षा भारत में हुई, जहाँ उन्होंने इतिहास, साहित्य और दर्शन में गहरी रुचि दिखाई। बाद में उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से विधि की पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने न केवल विधि में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण, संवैधानिक चिंतन और मानवाधिकारों की अवधारणा को भी गहराई से आत्मसात किया।


वकालत से न्यायपालिका तक: असाधारण प्रगति

       भारत लौटने के बाद हिदायतुल्लाह ने वकालत प्रारंभ की। बहुत कम समय में उनकी पहचान एक ईमानदार, तार्किक और विद्वान अधिवक्ता के रूप में स्थापित हो गई।

उनकी उपलब्धियाँ अभूतपूर्व रहीं—

  • वे सबसे कम उम्र में एडवोकेट जनरल बने
  • इसके बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त हुए
  • और आगे चलकर मुख्य न्यायाधीश बने

यह प्रगति केवल योग्यता की नहीं, बल्कि उस विश्वास की भी प्रतीक थी, जो समाज और राज्य को उनके चरित्र पर था।


भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में भूमिका

न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने Supreme Court of India में न्यायाधीश तथा बाद में मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य करते हुए न्यायपालिका को नई ऊँचाइयाँ दीं।

 उनकी न्यायिक सोच की विशेषताएँ

  • संविधान की उदार और प्रगतिशील व्याख्या
  • न्यायिक स्वतंत्रता की दृढ़ रक्षा
  • नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति संवेदनशीलता
  • शक्ति-संतुलन (Separation of Powers) का सम्मान

उनका मानना था कि न्यायालय को केवल कानून का प्रहरी नहीं, बल्कि न्याय और मानव गरिमा का संरक्षक होना चाहिए।


संविधान के प्रति अटूट निष्ठा

       न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह संविधान को एक स्थिर दस्तावेज नहीं, बल्कि जीवंत और गतिशील ग्रंथ मानते थे। वे कहते थे कि—

संविधान की आत्मा को समझे बिना उसकी धाराओं को समझना संभव नहीं है।

        उनके निर्णयों में अनुच्छेद 14, 19 और 21 की व्यापक और मानवीय व्याख्या दिखाई देती है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कानून का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन की गरिमा की रक्षा करना है।


उपराष्ट्रपति और कार्यवाहक राष्ट्रपति: संवैधानिक संतुलन का उदाहरण

        न्यायपालिका से सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ। वे भारत के उपराष्ट्रपति बने और दो बार कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में देश का नेतृत्व किया।

इस भूमिका में भी उन्होंने—

  • पूर्ण राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखी
  • संविधान की सीमाओं का सम्मान किया
  • पद की गरिमा को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखा

उनका यह आचरण आज के समय में संवैधानिक नैतिकता का आदर्श उदाहरण है।


शिक्षाविद्, लेखक और विधिक दार्शनिक

       न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह केवल निर्णय देने वाले न्यायाधीश नहीं थे, बल्कि एक गंभीर विचारक और लेखक भी थे। उन्होंने विधि, संविधान, न्यायिक दर्शन और इस्लामी कानून पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे।

उनकी रचनाएँ आज भी—

  • विधि छात्रों
  • शोधकर्ताओं
  • न्यायाधीशों
  • अधिवक्ताओं

के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत हैं।


व्यक्तित्व और जीवन मूल्य

         उनका जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण, अनुशासित और नैतिक था। सत्ता के सर्वोच्च पदों पर रहते हुए भी उन्होंने कभी वैभव या दिखावे को महत्व नहीं दिया।

उनका व्यक्तित्व यह सिखाता है कि—

महानता पद से नहीं, चरित्र से आती है।

वे विनम्रता, सहिष्णुता और बौद्धिक ईमानदारी के प्रतीक थे।


120वीं जयंती: आज के भारत के लिए संदेश

आज जब—

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बहस
  • संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका
  • लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा

जैसे विषय चर्चा में हैं, तब न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि संविधान केवल कानून नहीं, बल्कि नैतिक संहिता भी है


निष्कर्ष: एक अमर विरासत

      न्यायमूर्ति मोहम्मद हिदायतुल्लाह उन विरले व्यक्तियों में थे, जिन्होंने जिस पद को संभाला, उसे सम्मान, गरिमा और नैतिक बल प्रदान किया।

वे—

  • न्याय के प्रतीक थे
  • संविधान के सजग संरक्षक थे
  • और राष्ट्रसेवा के सच्चे उदाहरण थे

उनकी स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके आदर्शों—
न्याय, निष्पक्षता, संवैधानिक निष्ठा और मानव गरिमा
को अपने व्यक्तिगत, पेशेवर और सार्वजनिक जीवन में आत्मसात करें।

न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता क्षणिक होती है, लेकिन मूल्य शाश्वत।