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श्रम कानून (Labour Laws) 1 to 100 question answer

श्रम कानून (Labour Laws) : 100 महत्वपूर्ण प्रश्न

A. सामान्य एवं सैद्धांतिक प्रश्न

  1. श्रम कानून (Labour Law) से आप क्या समझते हैं?
  2. श्रम कानून का मुख्य उद्देश्य क्या है?
  3. श्रम कानून और औद्योगिक कानून में क्या अंतर है?
  4. भारत में श्रम कानूनों का ऐतिहासिक विकास कैसे हुआ?
  5. श्रम कानूनों का संवैधानिक आधार क्या है?
  6. श्रम कानूनों का सामाजिक न्याय से क्या संबंध है?
  7. श्रमिकों के मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं?
  8. राज्य के नीति निदेशक तत्वों में श्रम से संबंधित कौन-से प्रावधान हैं?
  9. श्रम कानूनों में “कल्याणकारी राज्य” की अवधारणा कैसे परिलक्षित होती है?
  10. असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की समस्याएँ क्या हैं?

B. औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947

  1. औद्योगिक विवाद की परिभाषा क्या है?
  2. “उद्योग” (Industry) की परिभाषा क्या है?
  3. “कार्यकर्ता/कामगार” (Workman) की परिभाषा क्या है?
  4. औद्योगिक विवाद अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  5. औद्योगिक विवाद के प्रकार कौन-कौन से हैं?
  6. हड़ताल (Strike) की परिभाषा क्या है?
  7. तालाबंदी (Lock-out) क्या है?
  8. हड़ताल और तालाबंदी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  9. अवैध हड़ताल क्या होती है?
  10. Lay-off से आप क्या समझते हैं?
  11. Retrenchment की अवधारणा क्या है?
  12. Closure से क्या तात्पर्य है?
  13. औद्योगिक विवादों के निपटारे के उपाय कौन-कौन से हैं?
  14. श्रम न्यायालय (Labour Court) के कार्य क्या हैं?
  15. औद्योगिक न्यायाधिकरण (Industrial Tribunal) की भूमिका क्या है?

C. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948

  1. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  2. न्यूनतम मजदूरी किसके द्वारा निर्धारित की जाती है?
  3. न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के सिद्धांत क्या हैं?
  4. समय दर और टुकड़ा दर मजदूरी में अंतर बताइए।
  5. मजदूरी भुगतान में कटौती किन परिस्थितियों में की जा सकती है?

D. मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936

  1. मजदूरी भुगतान अधिनियम का मुख्य उद्देश्य क्या है?
  2. मजदूरी का भुगतान किस अवधि में किया जाना चाहिए?
  3. मजदूरी से की जाने वाली वैध कटौतियाँ कौन-सी हैं?
  4. अवैध कटौती के विरुद्ध श्रमिक को क्या उपाय प्राप्त हैं?

E. कारखाना अधिनियम, 1948

  1. कारखाना अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  2. कारखाने की परिभाषा क्या है?
  3. श्रमिकों के स्वास्थ्य संबंधी प्रावधान कौन-से हैं?
  4. सुरक्षा संबंधी प्रावधान क्या हैं?
  5. कल्याण संबंधी प्रावधान कौन-कौन से हैं?
  6. कार्य के घंटे एवं साप्ताहिक अवकाश के नियम क्या हैं?
  7. महिलाओं के रोजगार से संबंधित प्रावधान क्या हैं?
  8. बाल श्रम के संबंध में कारखाना अधिनियम क्या कहता है?

F. कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923

  1. कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  2. “नियोजक” और “कर्मचारी” की परिभाषा क्या है?
  3. दुर्घटना से उत्पन्न प्रतिकर की गणना कैसे की जाती है?
  4. कौन-सी परिस्थितियों में प्रतिकर देय नहीं होता?

G. मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961

  1. मातृत्व लाभ अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  2. मातृत्व लाभ की अवधि कितनी होती है?
  3. मातृत्व लाभ के लिए पात्रता की शर्तें क्या हैं?
  4. नियोक्ता के कर्तव्य क्या हैं?

H. बोनस भुगतान अधिनियम, 1965

  1. बोनस भुगतान अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  2. बोनस की न्यूनतम और अधिकतम सीमा क्या है?
  3. बोनस के लिए पात्रता की शर्तें क्या हैं?
  4. बोनस की गणना कैसे की जाती है?

I. ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972

  1. ग्रेच्युटी क्या है?
  2. ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  3. ग्रेच्युटी प्राप्त करने की पात्रता क्या है?
  4. ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा क्या है?
  5. किन परिस्थितियों में ग्रेच्युटी जब्त की जा सकती है?

J. कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952

  1. कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम का उद्देश्य क्या है?
  2. भविष्य निधि योजना क्या है?
  3. नियोक्ता और कर्मचारी का योगदान कितना होता है?
  4. भविष्य निधि से संबंधित अपवाद क्या हैं?

K. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926

  1. ट्रेड यूनियन की परिभाषा क्या है?
  2. ट्रेड यूनियन का पंजीकरण क्यों आवश्यक है?
  3. पंजीकृत ट्रेड यूनियन के अधिकार क्या हैं?
  4. ट्रेड यूनियन की देयताएँ क्या हैं?
  5. पंजीकरण रद्द करने के आधार क्या हैं?

L. बाल श्रम एवं अन्य विशेष कानून

  1. बाल श्रम निषेध एवं विनियमन कानून का उद्देश्य क्या है?
  2. बाल श्रम की परिभाषा क्या है?
  3. खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम क्यों प्रतिबंधित है?

M. औद्योगिक सुरक्षा एवं समकालीन विषय

  1. असंगठित श्रमिक कौन होते हैं?
  2. असंगठित श्रमिकों के लिए क्या कानूनी सुरक्षा है?
  3. गिग वर्कर से आप क्या समझते हैं?
  4. प्लेटफॉर्म वर्कर कौन होते हैं?
  5. समान वेतन का सिद्धांत क्या है?
  6. लैंगिक समानता और श्रम कानूनों का संबंध क्या है?
  7. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित कानून का उद्देश्य क्या है?
  8. ठेका श्रम (Contract Labour) से आप क्या समझते हैं?
  9. ठेका श्रम के उन्मूलन का आधार क्या है?

N. नवीन श्रम संहिताएँ (Labour Codes)

  1. श्रम संहिता (Labour Codes) क्या हैं?
  2. मजदूरी संहिता, 2019 का उद्देश्य क्या है?
  3. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 क्या है?
  4. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 का उद्देश्य क्या है?
  5. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020 क्या है?

O. विविध एवं विश्लेषणात्मक प्रश्न

  1. “काम का अधिकार” और श्रम कानूनों का संबंध स्पष्ट कीजिए।
  2. वैश्वीकरण का श्रम कानूनों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
  3. निजीकरण और श्रमिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है?
  4. हड़ताल को मौलिक अधिकार क्यों नहीं माना गया है?
  5. न्यायपालिका की भूमिका श्रम कानूनों में क्या रही है?
  6. सामाजिक सुरक्षा का श्रमिकों के जीवन में क्या महत्व है?
  7. न्यूनतम मजदूरी और जीवन निर्वाह मजदूरी में अंतर बताइए।
  8. औद्योगिक शांति से आप क्या समझते हैं?
  9. श्रम कानूनों में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
  10. तकनीकी विकास से श्रमिकों की स्थिति कैसे प्रभावित हुई है?
  11. अस्थायी और स्थायी श्रमिकों में अंतर बताइए।
  12. श्रमिकों के अधिकार और कर्तव्य क्या हैं?
  13. नियोक्ता की सामाजिक जिम्मेदारी क्या है?
  14. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की भूमिका क्या है?
  15. भारत में श्रम कानूनों का भविष्य क्या है?

प्रश्न 1: श्रम कानून (Labour Law) से आप क्या समझते हैं?

श्रम कानून (Labour Law) विधि की वह शाखा है जो नियोक्ता (Employer) और श्रमिक/कामगार (Employee/Workman) के बीच संबंधों को विनियमित करती है। इसका मुख्य उद्देश्य कार्यस्थल पर श्रमिकों को न्यायसंगत व्यवहार, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ, उचित पारिश्रमिक, तथा सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है, साथ ही उद्योगों में औद्योगिक शांति बनाए रखना भी है। श्रम कानून केवल व्यक्तिगत रोजगार संबंधों तक सीमित नहीं है; यह सामूहिक श्रम संबंधों—जैसे ट्रेड यूनियन, सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल और तालाबंदी—को भी नियंत्रित करता है।

श्रम कानूनों का विकास औद्योगिक क्रांति के पश्चात हुआ, जब कारखानों में लंबे कार्य-घंटे, बाल एवं महिला श्रम का शोषण, असुरक्षित कार्य-स्थितियाँ और अत्यल्प मजदूरी जैसी समस्याएँ व्यापक थीं। इन परिस्थितियों ने राज्य को हस्तक्षेप के लिए प्रेरित किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर International Labour Organization (ILO) ने श्रमिकों के अधिकारों और मानकों के संरक्षण हेतु महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका प्रभाव भारतीय श्रम विधायन पर भी पड़ा।

भारतीय संदर्भ में श्रम कानूनों का उद्देश्य कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार करना है। ये कानून न केवल रोजगार की शर्तों को विनियमित करते हैं, बल्कि श्रमिकों को स्वास्थ्य, सुरक्षा, कल्याण, सामाजिक सुरक्षा (भविष्य निधि, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ), और विवाद निपटान की संस्थागत व्यवस्था भी प्रदान करते हैं। इस प्रकार, श्रम कानून आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करता है।

सैद्धांतिक रूप से, श्रम कानून दो प्रमुख स्तरों पर कार्य करता है—(i) व्यक्तिगत श्रम कानून, जो रोजगार अनुबंध, मजदूरी, कार्य-घंटे, अवकाश, सेवा-शर्तें आदि से संबंधित है; और (ii) सामूहिक श्रम कानून, जो ट्रेड यूनियन, सामूहिक सौदेबाजी, औद्योगिक विवाद, हड़ताल-तालाबंदी जैसे विषयों को नियंत्रित करता है। इन दोनों स्तरों पर कानून का उद्देश्य शक्ति-असमानता को कम करना है, क्योंकि नियोक्ता सामान्यतः आर्थिक और संगठनात्मक रूप से अधिक शक्तिशाली होता है।

आधुनिक समय में श्रम कानून का दायरा गिग-वर्क, प्लेटफॉर्म-वर्क, ठेका श्रम और असंगठित क्षेत्र तक विस्तृत हो चुका है। तकनीकी परिवर्तन, वैश्वीकरण और निजीकरण के कारण रोजगार संबंधों में लचीलापन बढ़ा है; ऐसे में श्रम कानून का उद्देश्य श्रमिक-संरक्षण और उद्योग-प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाए रखना है। संक्षेप में, श्रम कानून मानव गरिमा, समानता और सामाजिक सुरक्षा का विधिक साधन है।


प्रश्न 2: श्रम कानून का मुख्य उद्देश्य क्या है?

श्रम कानून का मुख्य उद्देश्य कार्यस्थल पर न्याय, समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। चूँकि नियोक्ता-श्रमिक संबंधों में शक्ति-असंतुलन स्वाभाविक होता है, इसलिए श्रम कानून हस्तक्षेप कर श्रमिकों के शोषण को रोकता है और उन्हें न्यूनतम मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन-स्तर प्रदान करता है। यह उद्देश्य कई उप-लक्ष्यों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।

प्रथम, श्रम कानून का उद्देश्य उचित मजदूरी सुनिश्चित करना है। न्यूनतम मजदूरी, समय पर भुगतान, अवैध कटौतियों पर रोक—ये सभी उपाय श्रमिक को आर्थिक सुरक्षा देते हैं। द्वितीय, स्वास्थ्य और सुरक्षा का संरक्षण श्रम कानून का केंद्रीय उद्देश्य है। कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों में सुरक्षित मशीनरी, स्वच्छता, कार्य-घंटों का नियमन, साप्ताहिक अवकाश आदि से श्रमिकों के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

तृतीय, श्रम कानून सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है। भविष्य निधि, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ, कर्मचारी प्रतिकर जैसे प्रावधान श्रमिकों को आकस्मिकताओं—दुर्घटना, बीमारी, वृद्धावस्था—से सुरक्षा देते हैं। यह सुरक्षा श्रमिक को केवल आजीविका ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता भी देती है।

चतुर्थ, श्रम कानून का उद्देश्य औद्योगिक शांति बनाए रखना है। औद्योगिक विवादों के निपटान के लिए संस्थागत तंत्र (सुलह, श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण) उपलब्ध कराकर कानून हड़ताल-तालाबंदी के टकराव को नियंत्रित करता है। इससे उत्पादन निरंतर रहता है और सामाजिक-आर्थिक अस्थिरता कम होती है।

पंचम, श्रम कानून समान अवसर और गैर-भेदभाव को बढ़ावा देता है। समान कार्य के लिए समान वेतन, लैंगिक समानता, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण—ये सभी उपाय श्रमिकों के अधिकारों को सुदृढ़ करते हैं।

अंततः, श्रम कानून का उद्देश्य आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करना है। उद्योगों को लचीलापन देते हुए श्रमिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करना ही श्रम कानून की मूल आत्मा है।


प्रश्न 3: श्रम कानून और औद्योगिक कानून में क्या अंतर है?

श्रम कानून और औद्योगिक कानून परस्पर संबंधित होते हुए भी अपने दायरे, विषय-वस्तु और उद्देश्य में भिन्न हैं। श्रम कानून व्यापक अवधारणा है, जबकि औद्योगिक कानून उसका एक विशिष्ट उप-क्षेत्र माना जा सकता है।

दायरा: श्रम कानून का दायरा व्यापक है। इसमें व्यक्तिगत रोजगार संबंध (मजदूरी, कार्य-घंटे, अवकाश), सामाजिक सुरक्षा (पीएफ, ग्रेच्युटी), कल्याण, स्वास्थ्य-सुरक्षा, और असंगठित क्षेत्र से जुड़े विषय सम्मिलित हैं। इसके विपरीत, औद्योगिक कानून मुख्यतः उद्योगों में उत्पन्न सामूहिक विवादों—हड़ताल, तालाबंदी, ले-ऑफ, रिट्रेंचमेंट, क्लोज़र—और उनके निपटान पर केंद्रित है।

उद्देश्य: श्रम कानून का उद्देश्य श्रमिकों का समग्र संरक्षण और कल्याण है। औद्योगिक कानून का प्राथमिक उद्देश्य औद्योगिक शांति बनाए रखना और उत्पादन-व्यवस्था को बाधित होने से बचाना है।

प्रकृति: श्रम कानून प्रायः कल्याणकारी प्रकृति का होता है। औद्योगिक कानून अपेक्षाकृत नियामक और संतुलनकारी होता है, जिसमें नियोक्ता-श्रमिक दोनों के हितों को समायोजित किया जाता है।

कानूनी उपाय: श्रम कानून में अधिकारों के प्रवर्तन हेतु निरीक्षण, दंड, और प्रशासनिक उपाय प्रमुख हैं। औद्योगिक कानून में विवाद निपटान की न्यायिक/अर्ध-न्यायिक प्रक्रियाएँ (सुलह, श्रम न्यायालय, न्यायाधिकरण) प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

इस प्रकार, श्रम कानून व्यापक छतरी है, जिसके अंतर्गत औद्योगिक कानून एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में कार्य करता है।


प्रश्न 4: भारत में श्रम कानूनों का ऐतिहासिक विकास कैसे हुआ?

भारत में श्रम कानूनों का विकास औपनिवेशिक काल से प्रारंभ होकर स्वतंत्रता के बाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ सुदृढ़ हुआ। प्रारंभिक औद्योगीकरण के दौरान श्रमिकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी—लंबे कार्य-घंटे, बाल-महिला श्रम, न्यून मजदूरी और असुरक्षित परिस्थितियाँ आम थीं। ब्रिटिश शासन ने सीमित सुधारों के रूप में प्रारंभिक कारखाना कानून बनाए, जिनका उद्देश्य उत्पादन-हितों की रक्षा अधिक और श्रमिक-कल्याण कम था।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में श्रमिक आंदोलनों और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों के कारण सुधारों की गति बढ़ी। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने सामाजिक-आर्थिक न्याय को केंद्रीय लक्ष्य बनाया। नीति निदेशक तत्वों और मौलिक अधिकारों ने श्रमिक-संरक्षण को वैधानिक आधार दिया। इसी पृष्ठभूमि में न्यूनतम मजदूरी, कारखाना, औद्योगिक विवाद, सामाजिक सुरक्षा जैसे कानून विकसित हुए।

1970–90 के दशक में औद्योगिक विस्तार के साथ श्रम कानूनों का विस्तार हुआ। 1991 के बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण ने श्रम कानूनों में लचीलापन और सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया। हाल के वर्षों में श्रम संहिताओं के माध्यम से कानूनों का संहिताकरण किया गया, ताकि अनुपालन सरल हो और संरक्षण प्रभावी।


प्रश्न 5: श्रम कानूनों का संवैधानिक आधार क्या है?

श्रम कानूनों का संवैधानिक आधार भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व, और संघ-राज्य विधायी शक्तियों से प्राप्त होता है। संविधान सामाजिक-आर्थिक न्याय को राज्य का कर्तव्य मानता है।

मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19 (संघ बनाने की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा) श्रमिक-अधिकारों का आधार हैं। नीति निदेशक तत्वों में उचित मजदूरी, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ, बाल-महिला संरक्षण, और सामाजिक सुरक्षा के निर्देश दिए गए हैं। सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में श्रम विषयों को शामिल कर संघ और राज्यों दोनों को विधायन की शक्ति दी गई है।

इस प्रकार, श्रम कानूनों का संवैधानिक आधार सामाजिक न्याय, समानता और मानव गरिमा की रक्षा करता है, जिससे ये कानून केवल नियामक नहीं बल्कि न्यायोन्मुख बनते हैं।


नीचे प्रश्न 6 से 10 के उत्तर 500–600 शब्दों में, परीक्षा-उपयोगी, विश्लेषणात्मक तथा विधिक भाषा में प्रस्तुत किए जा रहे हैं—


प्रश्न 6: श्रम कानूनों का सामाजिक न्याय से क्या संबंध है?

श्रम कानूनों और सामाजिक न्याय के बीच अत्यंत घनिष्ठ एवं अविभाज्य संबंध है। सामाजिक न्याय का मूल उद्देश्य समाज में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक और शक्ति-आधारित असमानताओं को कम करना है, और श्रम कानून इसी उद्देश्य का व्यावहारिक एवं विधिक उपकरण है। औद्योगिक और आर्थिक संरचना में नियोक्ता और श्रमिक के बीच स्वाभाविक रूप से असमान शक्ति-संतुलन पाया जाता है—जहाँ नियोक्ता पूंजी, संगठन और निर्णय-क्षमता से सशक्त होता है, वहीं श्रमिक अपनी आजीविका के लिए उस पर निर्भर रहता है। श्रम कानून इसी असमानता को संतुलित करने का प्रयास करता है।

सामाजिक न्याय की अवधारणा यह मानती है कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन, उचित अवसर, और न्यूनतम मानवीय गरिमा प्राप्त होनी चाहिए। श्रम कानून इस सिद्धांत को कार्यस्थल पर लागू करता है। न्यूनतम मजदूरी, कार्य-घंटों की सीमा, साप्ताहिक अवकाश, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा उपाय—ये सभी प्रावधान सामाजिक न्याय के प्रत्यक्ष रूप हैं, क्योंकि ये श्रमिक को शोषण से बचाते हैं और उसे मानवीय परिस्थितियों में कार्य करने का अधिकार देते हैं।

श्रम कानून सामाजिक न्याय को सामूहिक स्तर पर भी आगे बढ़ाता है। ट्रेड यूनियन, सामूहिक सौदेबाजी और औद्योगिक विवाद निपटान की व्यवस्था श्रमिकों को संगठित आवाज़ प्रदान करती है। यह व्यवस्था केवल व्यक्तिगत राहत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कार्यस्थल की संरचना को अधिक लोकतांत्रिक बनाती है। हड़ताल और तालाबंदी को नियंत्रित कर कानून यह सुनिश्चित करता है कि संघर्ष हिंसक या अराजक न हो, बल्कि संस्थागत ढांचे के भीतर सुलझे।

इसके अतिरिक्त, सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक सुरक्षा है। भविष्य निधि, ग्रेच्युटी, कर्मचारी प्रतिकर, मातृत्व लाभ जैसे प्रावधान यह स्वीकार करते हैं कि श्रमिक केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक नागरिक है, जिसे दुर्घटना, बीमारी, मातृत्व और वृद्धावस्था में संरक्षण मिलना चाहिए। यह संरक्षण सामाजिक न्याय के बिना संभव नहीं।

अंततः, श्रम कानून सामाजिक न्याय को केवल नैतिक आदर्श नहीं रहने देता, बल्कि उसे कानूनी अधिकार में परिवर्तित करता है। इस प्रकार, श्रम कानून सामाजिक न्याय की अवधारणा का व्यावहारिक, संस्थागत और प्रवर्तनीय रूप है।


प्रश्न 7: श्रमिकों के मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं?

श्रमिकों के मौलिक अधिकार भारतीय संविधान में निहित उन अधिकारों से उत्पन्न होते हैं, जो प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा प्रदान करते हैं। यद्यपि संविधान “श्रमिक” शब्द का पृथक उल्लेख नहीं करता, फिर भी कई मौलिक अधिकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से श्रमिकों की रक्षा करते हैं।

समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) श्रमिकों को कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि मजदूरी, सेवा-शर्तों या लाभों में मनमाना भेदभाव नहीं किया जा सकता। इससे “समान कार्य के लिए समान वेतन” जैसे सिद्धांत को संवैधानिक आधार मिलता है।

स्वतंत्रता से संबंधित अधिकार (अनुच्छेद 19) के अंतर्गत श्रमिकों को संघ या ट्रेड यूनियन बनाने की स्वतंत्रता प्राप्त है। यह अधिकार श्रमिकों को संगठित होकर अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम बनाता है। यद्यपि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के आधार पर सीमित किया जा सकता है, फिर भी इसका महत्व अत्यंत व्यापक है।

जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21) श्रमिक अधिकारों का सबसे व्यापक आधार है। न्यायालयों ने “जीवन” की व्याख्या में गरिमापूर्ण जीवन, स्वास्थ्य, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ और मानवीय कार्य-घंटे को सम्मिलित किया है। असुरक्षित या अमानवीय परिस्थितियों में काम कराना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जा सकता है।

शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23) बेगार, जबरन श्रम और मानव तस्करी पर रोक लगाता है। यह प्रावधान श्रमिकों को जबरन या बिना पारिश्रमिक कार्य कराने से संरक्षण देता है। इसी प्रकार, अनुच्छेद 24 खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाता है।

इन मौलिक अधिकारों के अतिरिक्त, नीति निदेशक तत्व श्रमिकों के लिए उचित मजदूरी, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं। इस प्रकार, श्रमिकों के मौलिक अधिकार उन्हें केवल कानूनी सुरक्षा ही नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा भी प्रदान करते हैं।


प्रश्न 8: राज्य के नीति निदेशक तत्वों में श्रम से संबंधित कौन-से प्रावधान हैं?

राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) भारतीय संविधान की वह आत्मा हैं, जो राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय की दिशा में मार्गदर्शन देती हैं। यद्यपि ये तत्व न्यायालयों द्वारा प्रत्यक्षतः प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी ये श्रम कानूनों के निर्माण और व्याख्या में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

नीति निदेशक तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान अनुच्छेद 38 है, जो राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को बढ़ावा देने का निर्देश देता है। श्रम कानून इसी अनुच्छेद की व्यावहारिक अभिव्यक्ति हैं। अनुच्छेद 39 राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि नागरिकों—विशेषकर श्रमिकों—को पर्याप्त आजीविका, समान वेतन और शोषण से संरक्षण मिले।

अनुच्छेद 41 राज्य को बेरोज़गारी, वृद्धावस्था, बीमारी और अक्षमता की स्थिति में सहायता प्रदान करने का निर्देश देता है। इसी आधार पर सामाजिक सुरक्षा कानून विकसित हुए। अनुच्छेद 42 श्रमिकों के लिए मानवीय कार्य-परिस्थितियाँ और मातृत्व राहत सुनिश्चित करने पर बल देता है।

अनुच्छेद 43 राज्य को श्रमिकों के लिए जीवन निर्वाह मजदूरी, उचित अवकाश और सांस्कृतिक अवसर सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। यह प्रावधान न्यूनतम मजदूरी से आगे बढ़कर “सम्मानजनक जीवन” की अवधारणा प्रस्तुत करता है। अनुच्छेद 43A औद्योगिक प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करता है, जिससे कार्यस्थल पर लोकतांत्रिक संस्कृति विकसित होती है।

इस प्रकार, नीति निदेशक तत्व श्रम कानूनों के लिए नैतिक, वैचारिक और संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं और राज्य को श्रमिक-कल्याण की दिशा में निरंतर प्रयास के लिए प्रेरित करते हैं।


प्रश्न 9: श्रम कानूनों में “कल्याणकारी राज्य” की अवधारणा कैसे परिलक्षित होती है?

कल्याणकारी राज्य की अवधारणा यह मानती है कि राज्य का कर्तव्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों—विशेषकर कमजोर वर्गों—के सामाजिक और आर्थिक कल्याण को सुनिश्चित करना भी है। श्रम कानून इस अवधारणा का सबसे सशक्त उदाहरण हैं।

श्रम कानूनों के माध्यम से राज्य कार्यस्थल में न्यूनतम मानक निर्धारित करता है—जैसे मजदूरी, कार्य-घंटे, सुरक्षा और स्वास्थ्य। यह हस्तक्षेप कल्याणकारी राज्य की पहचान है, क्योंकि मुक्त बाजार की परिस्थितियों में श्रमिक अक्सर शोषण का शिकार होते हैं। राज्य का यह दायित्व है कि वह ऐसे शोषण को रोके।

सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ—भविष्य निधि, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ, कर्मचारी प्रतिकर—कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार करती हैं। ये योजनाएँ यह स्वीकार करती हैं कि श्रमिक का जीवन केवल कार्य-अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि दुर्घटना, बीमारी और वृद्धावस्था में भी उसे संरक्षण मिलना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, औद्योगिक विवाद निपटान की संस्थागत व्यवस्था यह दर्शाती है कि राज्य केवल निष्क्रिय दर्शक नहीं, बल्कि मध्यस्थ और संतुलनकर्ता की भूमिका निभाता है। इस प्रकार, श्रम कानूनों में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा नीतिगत, विधिक और प्रशासनिक—तीनों स्तरों पर परिलक्षित होती है।


प्रश्न 10: असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की समस्याएँ क्या हैं?

असंगठित क्षेत्र के श्रमिक भारतीय अर्थव्यवस्था का विशाल और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, किंतु वे सबसे अधिक असुरक्षित और उपेक्षित भी हैं। उनकी प्रमुख समस्या कानूनी संरक्षण का अभाव है। अधिकांश श्रम कानून संगठित क्षेत्र पर केंद्रित रहे हैं, जिससे असंगठित श्रमिक न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और विवाद निपटान से वंचित रह जाते हैं।

दूसरी प्रमुख समस्या आर्थिक अस्थिरता है। असंगठित श्रमिकों को नियमित रोजगार, स्थायी आय और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती। बीमारी, दुर्घटना या मौसमी बेरोज़गारी की स्थिति में उनका जीवन-यापन गंभीर संकट में पड़ जाता है।

स्वास्थ्य और सुरक्षा भी बड़ी चुनौती है। निर्माण, घरेलू कार्य, कृषि और गिग-वर्क जैसे क्षेत्रों में कार्य-परिस्थितियाँ अक्सर असुरक्षित होती हैं, परंतु निरीक्षण और प्रवर्तन की व्यवस्था कमजोर रहती है। इसके अतिरिक्त, श्रमिकों में जागरूकता का अभाव और संगठित प्रतिनिधित्व की कमी उनकी समस्याओं को और जटिल बना देती है।

अंततः, असंगठित श्रमिकों की समस्याएँ केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी हैं। इनका समाधान तभी संभव है जब श्रम कानूनों का प्रभावी विस्तार, सामाजिक सुरक्षा और प्रवर्तन तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।


प्रश्न 11: औद्योगिक विवाद की परिभाषा क्या है?

औद्योगिक विवाद (Industrial Dispute) से आशय उस विवाद से है जो नियोक्ता और कामगार, नियोक्ता और नियोक्ताओं, अथवा कामगार और कामगारों के बीच उत्पन्न होता है और जिसका संबंध नियोजन, अनियोजन, रोजगार की शर्तों, अथवा श्रम की परिस्थितियों से होता है। यह परिभाषा औद्योगिक संबंधों की प्रकृति को प्रतिबिंबित करती है, जहाँ उत्पादन प्रक्रिया में शामिल विभिन्न हितधारकों के बीच टकराव स्वाभाविक होता है।

औद्योगिक विवाद का मूल कारण प्रायः हितों का संघर्ष होता है। नियोक्ता उत्पादन-लागत कम रखने और लाभ अधिकतम करने की दिशा में कार्य करता है, जबकि कामगार बेहतर मजदूरी, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ और रोजगार-सुरक्षा की अपेक्षा रखते हैं। इन परस्पर विरोधी अपेक्षाओं के कारण विवाद उत्पन्न होते हैं। औद्योगिक विवाद केवल व्यक्तिगत शिकायत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि तब विधिक रूप ग्रहण करता है जब उसका प्रभाव किसी वर्ग या समूह पर पड़ता है।

औद्योगिक विवाद की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह सामूहिक स्वरूप का होता है। व्यक्तिगत विवाद तब तक औद्योगिक विवाद नहीं माना जाता, जब तक कि वह व्यापक श्रमिक वर्ग के हितों को प्रभावित न करे या किसी संघ द्वारा उसे अपनाया न जाए। इस सिद्धांत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि औद्योगिक विवाद निपटान की संस्थागत व्यवस्था का दुरुपयोग व्यक्तिगत grievances के लिए न हो।

औद्योगिक विवादों का वर्गीकरण भी किया जा सकता है—जैसे हितों के विवाद (wage revision, service conditions), अधिकारों के विवाद (कानूनी अधिकारों की व्याख्या), और अनुशासनात्मक विवाद (निलंबन, बर्खास्तगी)। इन सभी का समाधान औद्योगिक शांति बनाए रखने के उद्देश्य से किया जाता है।

इस प्रकार, औद्योगिक विवाद की परिभाषा केवल विधिक तकनीकीता नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक समाज में संतुलन और स्थिरता बनाए रखने का साधन है।


प्रश्न 12: “उद्योग” (Industry) की परिभाषा क्या है?

“उद्योग” की परिभाषा श्रम कानून में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि औद्योगिक कानूनों की प्रयोज्यता इसी पर निर्भर करती है। सामान्यतः उद्योग से आशय ऐसे संगठित क्रियाकलाप से है, जिसमें नियोक्ता और कामगार के सहयोग से वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण किया जाता है, और जिसका उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है।

उद्योग की अवधारणा केवल पारंपरिक कारखानों तक सीमित नहीं है। आधुनिक व्याख्या के अनुसार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बैंकिंग, और यहाँ तक कि कुछ सार्वजनिक सेवाएँ भी उद्योग की श्रेणी में आ सकती हैं, बशर्ते उनमें संगठित गतिविधि, नियोक्ता-कर्मचारी संबंध और सेवा या उत्पादन का तत्व विद्यमान हो।

उद्योग की परिभाषा के विकास में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समय-समय पर न्यायालयों ने संकीर्ण व्याख्या को त्याग कर व्यापक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया, ताकि श्रमिकों को विधिक संरक्षण से वंचित न किया जाए। हालांकि, कुछ गतिविधियों—जैसे शुद्ध रूप से संप्रभु कार्य—को उद्योग की परिधि से बाहर रखा गया है।

उद्योग की परिभाषा का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि कौन-सी गतिविधियाँ औद्योगिक विवाद निपटान तंत्र के अंतर्गत आएँगी। यदि किसी गतिविधि को उद्योग माना जाता है, तो वहाँ कार्यरत श्रमिकों को औद्योगिक कानूनों के अंतर्गत सुरक्षा और अधिकार प्राप्त होते हैं।

इस प्रकार, “उद्योग” की परिभाषा श्रम कानून की रीढ़ है, क्योंकि इसके बिना न तो औद्योगिक विवाद की पहचान संभव है और न ही श्रमिक-संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था।


प्रश्न 13: “कार्यकर्ता/कामगार” (Workman) की परिभाषा क्या है?

“कार्यकर्ता” या “कामगार” वह व्यक्ति है जो किसी उद्योग में मजदूरी या पारिश्रमिक के बदले कार्य करता है और जिसकी सेवाएँ किसी नियोक्ता के अधीन होती हैं। इस परिभाषा में शारीरिक, तकनीकी, लिपिकीय और परिचालन संबंधी कार्य करने वाले व्यक्ति सम्मिलित होते हैं।

कामगार की परिभाषा का महत्व इसलिए है, क्योंकि औद्योगिक कानूनों के अंतर्गत अधिकार और संरक्षण केवल उन्हीं व्यक्तियों को प्राप्त होते हैं जो इस परिभाषा में आते हैं। सामान्यतः उच्च प्रबंधकीय या प्रशासनिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों को कामगार की श्रेणी से बाहर रखा जाता है, क्योंकि उनकी भूमिका नीतिगत निर्णयों और नियंत्रण से जुड़ी होती है।

कामगार की पहचान का एक प्रमुख तत्व नियंत्रण और पर्यवेक्षण है। यदि नियोक्ता कार्य की प्रकृति, समय और पद्धति पर नियंत्रण रखता है, तो कार्य करने वाला व्यक्ति प्रायः कामगार माना जाता है। इसके अतिरिक्त, कार्य का वास्तविक स्वरूप—न कि पदनाम—निर्णायक होता है।

आधुनिक समय में गिग-वर्क और प्लेटफॉर्म-वर्क के प्रसार ने कामगार की परिभाषा को और जटिल बना दिया है। यह प्रश्न उभर रहा है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाले व्यक्ति पारंपरिक अर्थों में कामगार हैं। यह विकासशील क्षेत्र श्रम कानून के भविष्य को आकार दे रहा है।

संक्षेप में, “कामगार” की परिभाषा श्रम कानूनों के प्रवर्तन की कुंजी है और इसका उद्देश्य वास्तविक श्रमिकों को संरक्षण प्रदान करना है, न कि तकनीकी आधार पर उन्हें बाहर करना।


प्रश्न 14: औद्योगिक विवाद अधिनियम का उद्देश्य क्या है?

औद्योगिक विवाद अधिनियम का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक शांति और सामंजस्य बनाए रखना है। यह अधिनियम इस धारणा पर आधारित है कि अनियंत्रित औद्योगिक संघर्ष न केवल उद्योग को, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचाता है।

अधिनियम का प्रथम उद्देश्य विवादों की रोकथाम है। इसके लिए सुलह अधिकारी और सुलह बोर्ड जैसी संस्थाएँ स्थापित की गई हैं, ताकि विवाद प्रारंभिक चरण में ही सुलझ जाए। द्वितीय उद्देश्य विवादों का शांतिपूर्ण निपटान है, जिसके लिए श्रम न्यायालय और औद्योगिक न्यायाधिकरण की व्यवस्था की गई है।

तृतीय उद्देश्य कामगारों को मनमानी बर्खास्तगी, अवैध तालाबंदी और अनुचित श्रम व्यवहार से संरक्षण प्रदान करना है। अधिनियम नियोक्ता की शक्तियों पर युक्तिसंगत नियंत्रण लगाता है, ताकि शक्ति-असंतुलन का दुरुपयोग न हो।

अंततः, अधिनियम का उद्देश्य उत्पादन की निरंतरता और श्रमिकों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना है। यह संतुलन ही औद्योगिक शांति की आधारशिला है।


प्रश्न 15: औद्योगिक विवाद के प्रकार कौन-कौन से हैं?

औद्योगिक विवादों को उनकी प्रकृति और उद्देश्य के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। यह वर्गीकरण विवाद-निपटान की रणनीति निर्धारित करने में सहायक होता है।

पहला, हितों के विवाद (Interest Disputes) वे होते हैं जो मजदूरी, भत्ते, कार्य-घंटे या सेवा-शर्तों में परिवर्तन से संबंधित होते हैं। ये विवाद भविष्य की शर्तों पर केंद्रित होते हैं और सामूहिक सौदेबाजी के माध्यम से सुलझाए जाते हैं।

दूसरा, अधिकारों के विवाद (Rights Disputes) वे होते हैं जो मौजूदा कानूनी या संविदात्मक अधिकारों की व्याख्या या प्रवर्तन से जुड़े होते हैं, जैसे अवैध बर्खास्तगी या वेतन-भुगतान का विवाद।

तीसरा, अनुशासनात्मक विवाद कर्मचारियों के दंड, निलंबन या सेवा-समाप्ति से संबंधित होते हैं। चौथा, सामूहिक विवाद, जो व्यापक श्रमिक वर्ग को प्रभावित करते हैं, और व्यक्तिगत विवाद, जो बाद में सामूहिक स्वरूप ग्रहण कर सकते हैं।

इस प्रकार, औद्योगिक विवादों का वर्गीकरण औद्योगिक संबंधों की जटिलता को समझने और उनके प्रभावी समाधान में सहायक है।


प्रश्न 16: हड़ताल (Strike) की परिभाषा क्या है?

हड़ताल (Strike) श्रमिकों द्वारा सामूहिक रूप से किया गया वह कार्य है, जिसके अंतर्गत वे अपने नियोक्ता पर दबाव बनाने के उद्देश्य से कार्य करना अस्थायी रूप से बंद कर देते हैं। यह औद्योगिक संबंधों में श्रमिकों का एक पारंपरिक हथियार माना जाता है, जिसके माध्यम से वे अपनी मांगों—जैसे मजदूरी वृद्धि, सेवा-शर्तों में सुधार, या अनुचित व्यवहार के विरोध—को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

हड़ताल का मूल तत्व सामूहिकता है। यदि कोई श्रमिक अकेले कार्य छोड़ देता है, तो वह हड़ताल नहीं कहलाएगा। हड़ताल तभी मानी जाएगी जब श्रमिकों का एक वर्ग या समूह संगठित रूप से कार्य-विराम करे। इसके अतिरिक्त, हड़ताल का उद्देश्य केवल कार्य छोड़ना नहीं, बल्कि नियोक्ता को किसी मांग को स्वीकार करने के लिए बाध्य करना होता है।

हड़ताल के विभिन्न रूप हो सकते हैं—जैसे सामान्य हड़ताल, टूल-डाउन हड़ताल, भूख-हड़ताल, या प्रतीकात्मक हड़ताल। इनका स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, किंतु सभी का लक्ष्य नियोक्ता पर दबाव बनाना ही होता है। औद्योगिक दृष्टि से हड़ताल एक आर्थिक संघर्ष का साधन है, परंतु इसके सामाजिक और विधिक प्रभाव भी व्यापक होते हैं।

यद्यपि हड़ताल को श्रमिकों का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है, फिर भी इसे मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त नहीं है। इसे विधि द्वारा नियंत्रित किया गया है, ताकि सार्वजनिक व्यवस्था, उत्पादन और समाज पर प्रतिकूल प्रभाव को सीमित किया जा सके। इस प्रकार, हड़ताल एक मान्यता-प्राप्त औद्योगिक हथियार होते हुए भी पूर्णतः निरंकुश नहीं है।


प्रश्न 17: तालाबंदी (Lock-out) क्या है?

तालाबंदी (Lock-out) नियोक्ता द्वारा अपनाया गया वह उपाय है, जिसके अंतर्गत वह अपने प्रतिष्ठान को अस्थायी रूप से बंद कर देता है या श्रमिकों को कार्य करने से रोक देता है, ताकि श्रमिकों पर दबाव डालकर अपनी शर्तें मनवाई जा सकें। यह हड़ताल के विपरीत नियोक्ता का प्रतिरोधात्मक हथियार माना जाता है।

तालाबंदी का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों की सामूहिक शक्ति को संतुलित करना है। जब श्रमिक हड़ताल के माध्यम से उत्पादन रोकते हैं, तब नियोक्ता तालाबंदी द्वारा यह संकेत देता है कि वह भी आर्थिक दबाव झेलने को तैयार है। इस प्रकार, तालाबंदी औद्योगिक संघर्ष का दूसरा पक्ष है।

तालाबंदी के लिए आवश्यक है कि नियोक्ता का उद्देश्य श्रमिकों को कार्य से बाहर रखना हो। यदि प्रतिष्ठान का बंद होना किसी अन्य कारण—जैसे कच्चे माल की कमी या प्राकृतिक आपदा—से है, तो उसे तालाबंदी नहीं माना जाएगा। यहाँ नियोक्ता की मंशा निर्णायक तत्व होती है।

विधिक दृष्टि से तालाबंदी को भी नियंत्रित किया गया है। अवैध या अनुचित तालाबंदी पर नियोक्ता को दंडात्मक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि तालाबंदी को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं दी गई है, बल्कि औद्योगिक शांति के हित में इसे सीमित किया गया है।


प्रश्न 18: हड़ताल और तालाबंदी में अंतर स्पष्ट कीजिए।

हड़ताल और तालाबंदी दोनों ही औद्योगिक संघर्ष के साधन हैं, किंतु इनके बीच मौलिक अंतर है। हड़ताल श्रमिकों का हथियार है, जबकि तालाबंदी नियोक्ता का।

हड़ताल में श्रमिक सामूहिक रूप से कार्य करना बंद कर देते हैं, जबकि तालाबंदी में नियोक्ता श्रमिकों को कार्य से बाहर कर देता है। हड़ताल का उद्देश्य श्रमिकों की मांगों को मनवाना होता है, जबकि तालाबंदी का उद्देश्य श्रमिकों पर आर्थिक दबाव डालकर उन्हें समझौते के लिए बाध्य करना होता है।

प्रभाव की दृष्टि से, हड़ताल उत्पादन को रोकती है, जिससे नियोक्ता को आर्थिक हानि होती है। तालाबंदी में भी उत्पादन रुकता है, किंतु इसका प्रत्यक्ष प्रभाव श्रमिकों की आय पर पड़ता है। इस प्रकार, दोनों के प्रभाव-क्षेत्र भिन्न होते हैं।

विधिक नियंत्रण दोनों पर लागू होता है। अवैध हड़ताल और अवैध तालाबंदी—दोनों पर दंडात्मक परिणाम हो सकते हैं। इसलिए, दोनों को संतुलन और अनुशासन के अधीन रखा गया है, ताकि औद्योगिक संघर्ष सामाजिक अव्यवस्था में न बदले।


प्रश्न 19: अवैध हड़ताल क्या होती है?

अवैध हड़ताल वह हड़ताल है जो विधि द्वारा निर्धारित शर्तों का उल्लंघन करके की जाती है। सभी हड़तालें स्वतः वैध नहीं होतीं; उनकी वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि वे कानून के अनुरूप आयोजित की गई हैं या नहीं।

सामान्यतः, यदि श्रमिक आवश्यक नोटिस दिए बिना, सुलह प्रक्रिया के दौरान, या किसी वैधानिक निषेध की अवधि में हड़ताल करते हैं, तो वह अवैध मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, यदि हड़ताल का उद्देश्य अवैध या सार्वजनिक हित के प्रतिकूल हो, तो उसे भी अवैध ठहराया जा सकता है।

अवैध हड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि श्रमिकों को कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं होता। ऐसे मामलों में नियोक्ता को अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार मिल सकता है, और श्रमिक मजदूरी के अधिकार से भी वंचित हो सकते हैं।

अवैध हड़ताल की अवधारणा का उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों को समाप्त करना नहीं, बल्कि औद्योगिक अनुशासन और शांति बनाए रखना है। यह सुनिश्चित करता है कि संघर्ष नियंत्रित और विधिक ढांचे के भीतर रहे।


प्रश्न 20: Lay-off से आप क्या समझते हैं?

Lay-off वह स्थिति है जिसमें नियोक्ता अस्थायी रूप से श्रमिकों को कार्य देने में असमर्थ होता है, जबकि श्रमिक कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं। यह स्थिति प्रायः कच्चे माल की कमी, मशीनरी खराबी, बिजली संकट या अन्य अनियंत्रित परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती है।

Lay-off और तालाबंदी में अंतर यह है कि Lay-off में नियोक्ता की मंशा श्रमिकों को दंडित करने की नहीं होती, बल्कि वह परिस्थितिजन्य मजबूरी के कारण कार्य नहीं दे पाता। Lay-off सामान्यतः अस्थायी होता है और परिस्थितियाँ सामान्य होने पर श्रमिकों को पुनः कार्य पर बुला लिया जाता है।

विधि Lay-off की स्थिति में श्रमिकों को आंशिक पारिश्रमिक या मुआवज़ा प्रदान करने की व्यवस्था करती है, ताकि वे पूर्णतः आय-विहीन न हों। यह प्रावधान श्रमिक-कल्याण और औद्योगिक यथार्थ के बीच संतुलन स्थापित करता है।

इस प्रकार, Lay-off औद्योगिक व्यवस्था का एक आवश्यक, किंतु संवेदनशील पहलू है, जिसे कानून ने मानवीय दृष्टिकोण से विनियमित किया है।


नीचे प्रश्न 21 से 25 के उत्तर 500–600 शब्दों में, परीक्षा-उपयोगी, विधिक भाषा एवं विश्लेषणात्मक शैली में प्रस्तुत किए जा रहे हैं—


प्रश्न 21: Retrenchment (छँटनी) की अवधारणा क्या है?

Retrenchment (छँटनी) श्रम कानून की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका तात्पर्य नियोक्ता द्वारा अतिरिक्त या अनावश्यक श्रमिकों की सेवाओं की समाप्ति से है। यह सेवा-समाप्ति किसी दंडात्मक कारण, जैसे कदाचार या अनुशासनहीनता, के कारण नहीं होती, बल्कि आर्थिक, प्रशासनिक या संरचनात्मक कारणों से की जाती है। छँटनी का उद्देश्य सामान्यतः उत्पादन-लागत कम करना, कार्यक्षमता बढ़ाना या संगठन को आर्थिक संकट से उबारना होता है।

Retrenchment की अवधारणा इस सिद्धांत पर आधारित है कि उद्योग के अस्तित्व और निरंतरता के लिए कभी-कभी श्रमिक-संख्या में कटौती आवश्यक हो जाती है। किंतु चूँकि इसका सीधा प्रभाव श्रमिकों की आजीविका पर पड़ता है, इसलिए कानून ने इसे कठोर शर्तों और सुरक्षा उपायों के अधीन रखा है।

छँटनी और बर्खास्तगी (Dismissal) में मूलभूत अंतर है। बर्खास्तगी श्रमिक के दोष या अनुशासनहीनता का परिणाम होती है, जबकि छँटनी किसी दोष के बिना होती है। इसीलिए छँटनी को नो-फॉल्ट टर्मिनेशन कहा जाता है।

श्रम कानून के अंतर्गत छँटनी के लिए कुछ आवश्यक शर्तें निर्धारित की गई हैं—जैसे पूर्व सूचना देना, वैधानिक मुआवज़ा प्रदान करना और “Last Come, First Go” के सिद्धांत का पालन करना। इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नियोक्ता मनमाने ढंग से श्रमिकों को हटाकर शक्ति-दुरुपयोग न करे।

Retrenchment की अवधारणा औद्योगिक यथार्थ और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन का प्रयास है। यह उद्योग को लचीलापन प्रदान करती है, किंतु साथ-साथ श्रमिकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा भी करती है।


प्रश्न 22: Closure (उद्योग-समापन) से क्या तात्पर्य है?

Closure (उद्योग-समापन) से आशय नियोक्ता द्वारा किसी उद्योग, प्रतिष्ठान या उसके किसी भाग को स्थायी रूप से बंद कर देने से है। इसमें न केवल उत्पादन रुक जाता है, बल्कि नियोक्ता-श्रमिक संबंध भी समाप्त हो जाते हैं। Closure को Lay-off या Retrenchment से इस आधार पर अलग किया जाता है कि यह स्थायी प्रकृति का होता है।

उद्योग-समापन के कारण विविध हो सकते हैं—लगातार घाटा, कच्चे माल की अनुपलब्धता, तकनीकी अप्रचलन, सरकारी नीतियाँ, या बाजार की बदलती परिस्थितियाँ। Closure का निर्णय सामान्यतः नियोक्ता का व्यावसायिक निर्णय माना जाता है, किंतु चूँकि इसका सामाजिक प्रभाव व्यापक होता है, इसलिए कानून ने इसे भी विनियमित किया है।

Closure और तालाबंदी में भी अंतर है। तालाबंदी अस्थायी होती है और उद्देश्य श्रमिकों पर दबाव बनाना होता है, जबकि Closure में उद्योग को पूरी तरह समाप्त करने का इरादा होता है। तालाबंदी के बाद उद्योग पुनः शुरू हो सकता है, परंतु Closure में ऐसा नहीं होता।

विधिक दृष्टि से Closure की स्थिति में श्रमिकों को मुआवज़ा प्रदान करने का प्रावधान है, ताकि वे अचानक बेरोज़गारी के शिकार न हों। यह मुआवज़ा सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण उपकरण है।

इस प्रकार, Closure औद्योगिक स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन का उदाहरण है, जहाँ नियोक्ता को व्यवसायिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता है, किंतु श्रमिकों को पूर्णतः असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता।


प्रश्न 23: औद्योगिक विवादों के निपटारे के उपाय कौन-कौन से हैं?

औद्योगिक विवादों के निपटारे के उपायों का उद्देश्य औद्योगिक शांति बनाए रखना और संघर्ष को हिंसक या अराजक रूप लेने से रोकना है। इन उपायों को मुख्यतः स्वैच्छिक और वैधानिक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

स्वैच्छिक उपायों में सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) सबसे महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से नियोक्ता और श्रमिक आपसी वार्ता द्वारा विवाद का समाधान करते हैं। यह उपाय लोकतांत्रिक और सहयोगात्मक माना जाता है।

वैधानिक उपायों में सुलह (Conciliation) प्रमुख है, जिसमें एक तटस्थ अधिकारी विवादित पक्षों को समझौते की ओर प्रेरित करता है। यदि सुलह असफल रहती है, तो विवाद को श्रम न्यायालय या औद्योगिक न्यायाधिकरण के समक्ष भेजा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, मध्यस्थता (Arbitration) भी एक प्रभावी उपाय है, जहाँ पक्षकार किसी स्वतंत्र व्यक्ति के निर्णय को स्वीकार करने पर सहमत होते हैं। यह प्रक्रिया समय और लागत की दृष्टि से लाभकारी होती है।

इन सभी उपायों का मूल उद्देश्य यह है कि औद्योगिक विवादों का समाधान संस्थागत ढांचे के भीतर हो, ताकि उद्योग और समाज दोनों सुरक्षित रहें।


प्रश्न 24: श्रम न्यायालय (Labour Court) के कार्य क्या हैं?

श्रम न्यायालय औद्योगिक विवाद निपटान की एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिसका उद्देश्य श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच उत्पन्न विवादों का न्यायिक समाधान करना है। यह संस्था विशेष रूप से व्यक्तिगत और अधिकार-आधारित विवादों पर विचार करती है।

श्रम न्यायालय का प्रमुख कार्य बर्खास्तगी, निलंबन, पदावनति, अवैध कटौती और सेवा-समाप्ति से जुड़े विवादों का निपटान करना है। यह न्यायालय यह जाँच करता है कि नियोक्ता द्वारा की गई कार्रवाई न्यायसंगत, वैध और उचित प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं।

इसके अतिरिक्त, श्रम न्यायालय औद्योगिक अनुशासन बनाए रखने में भी सहायक होता है। यह नियोक्ता की मनमानी पर अंकुश लगाता है और श्रमिकों को यह विश्वास देता है कि उनके अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र मंच उपलब्ध है।

श्रम न्यायालय की भूमिका केवल विवाद-निपटान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक संबंधों में विश्वास और स्थिरता को भी बढ़ावा देता है।


प्रश्न 25: औद्योगिक न्यायाधिकरण (Industrial Tribunal) की भूमिका क्या है?

औद्योगिक न्यायाधिकरण औद्योगिक विवादों के निपटारे की एक उच्च स्तरीय संस्था है, जिसका क्षेत्राधिकार श्रम न्यायालय की तुलना में अधिक व्यापक होता है। यह विशेष रूप से नीतिगत और सामूहिक विवादों—जैसे मजदूरी निर्धारण, सेवा-शर्तों में परिवर्तन, और औद्योगिक संरचना—पर निर्णय देता है।

औद्योगिक न्यायाधिकरण का मुख्य कार्य नियोक्ता और श्रमिकों के बीच संतुलन स्थापित करना है। इसके निर्णय केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होते हैं।

यह न्यायाधिकरण औद्योगिक शांति बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता है, क्योंकि इसके निर्णय व्यापक श्रमिक वर्ग और उद्योग को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार, औद्योगिक न्यायाधिकरण औद्योगिक न्याय का एक सशक्त स्तंभ है।


नीचे प्रश्न 26 से 30 के उत्तर 500–600 शब्दों में, परीक्षा-उपयोगी, विश्लेषणात्मक तथा विधिक भाषा में प्रस्तुत किए जा रहे हैं—


प्रश्न 26: न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 का उद्देश्य क्या है?

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 का प्रमुख उद्देश्य श्रमिकों को शोषण से बचाना तथा उन्हें ऐसा न्यूनतम पारिश्रमिक सुनिश्चित करना है, जिससे वे सम्मानजनक जीवन यापन कर सकें। यह अधिनियम इस बुनियादी धारणा पर आधारित है कि श्रम केवल बाज़ार-शक्ति का विषय नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है। जब श्रम बाज़ार में बेरोज़गारी, गरीबी या असंगठित संरचना के कारण श्रमिकों की सौदेबाजी शक्ति कमज़ोर होती है, तब राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

इस अधिनियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी श्रमिक को इतनी कम मजदूरी न दी जाए कि वह अपने और अपने परिवार की बुनियादी आवश्यकताओं—भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य—को पूरा न कर सके। “न्यूनतम मजदूरी” की अवधारणा केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय जीवन-स्तर बनाए रखने से जुड़ी है।

अधिनियम का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य मजदूरी प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करना है। यदि न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान न हो, तो नियोक्ता लागत घटाने के लिए मजदूरी लगातार कम कर सकते हैं, जिससे श्रमिकों के जीवन-स्तर में गिरावट आती है और “रेस टू द बॉटम” की स्थिति पैदा होती है। अधिनियम इस प्रवृत्ति पर रोक लगाता है।

तीसरा उद्देश्य औद्योगिक शांति बनाए रखना है। उचित और सुनिश्चित मजदूरी से असंतोष, हड़ताल और औद्योगिक संघर्ष की संभावना कम होती है। इससे उत्पादन की निरंतरता और आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।

इसके अतिरिक्त, अधिनियम का उद्देश्य राज्य की सामाजिक जिम्मेदारी को साकार करना भी है। यह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहाँ राज्य श्रमिक और नियोक्ता के बीच शक्ति-संतुलन स्थापित करता है। इस प्रकार, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और मानवीय गरिमा का विधिक उपकरण है।


प्रश्न 27: न्यूनतम मजदूरी किसके द्वारा निर्धारित की जाती है?

न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण उपयुक्त सरकार द्वारा किया जाता है। भारत में यह शक्ति संघ और राज्य सरकारों के बीच विभाजित है, ताकि क्षेत्रीय, आर्थिक और औद्योगिक परिस्थितियों के अनुसार मजदूरी निर्धारित की जा सके। केंद्र सरकार उन रोजगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करती है जो उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों के अधीन रोजगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय करती हैं।

न्यूनतम मजदूरी निर्धारण की प्रक्रिया पूर्णतः मनमानी नहीं होती। अधिनियम के अंतर्गत सरकार को विशेष समितियों, उप-समितियों या सलाहकार बोर्डों की सहायता लेनी होती है, जिनमें नियोक्ता, श्रमिक और स्वतंत्र विशेषज्ञों का प्रतिनिधित्व होता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि मजदूरी निर्धारण एकतरफा न होकर संतुलित और यथार्थपरक हो।

सरकार न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करते समय कई कारकों पर विचार करती है—जैसे जीवन-यापन की लागत, महँगाई, कार्य की प्रकृति, उद्योग की क्षमता, और क्षेत्रीय परिस्थितियाँ। इसके अतिरिक्त, समय-समय पर मजदूरी का पुनरीक्षण भी किया जाता है, ताकि मुद्रास्फीति के प्रभाव से श्रमिकों की वास्तविक आय कम न हो।

न्यूनतम मजदूरी निर्धारण का उद्देश्य केवल एक आंकड़ा तय करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि मजदूरी न्यायसंगत, युक्तिसंगत और प्रवर्तनीय हो। इस प्रकार, न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण एक प्रशासनिक निर्णय होते हुए भी सामाजिक और आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण अंग है।


प्रश्न 28: न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के सिद्धांत क्या हैं?

न्यूनतम मजदूरी निर्धारण कुछ सुव्यवस्थित सिद्धांतों पर आधारित होता है, जिनका उद्देश्य मजदूरी को यथार्थपरक और न्यायसंगत बनाना है। पहला सिद्धांत है जीवन-निर्वाह की आवश्यकता। मजदूरी इतनी होनी चाहिए कि श्रमिक और उसका परिवार बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर सके।

दूसरा सिद्धांत कार्य की प्रकृति और कठिनाई से संबंधित है। खतरनाक, तकनीकी या शारीरिक रूप से कठिन कार्य के लिए मजदूरी अपेक्षाकृत अधिक होनी चाहिए। इससे कार्य के जोखिम और श्रम की तीव्रता का उचित मूल्यांकन होता है।

तीसरा सिद्धांत महँगाई और जीवन-यापन लागत है। मजदूरी निर्धारण में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाता है, ताकि मजदूरी की वास्तविक क्रय-शक्ति बनी रहे। चौथा सिद्धांत उद्योग की भुगतान-क्षमता से जुड़ा है। मजदूरी इतनी हो कि उद्योग पर असहनीय बोझ न पड़े, किंतु श्रमिकों के अधिकारों से भी समझौता न हो।

पाँचवाँ सिद्धांत क्षेत्रीय और स्थानीय परिस्थितियाँ हैं। एक ही प्रकार के कार्य के लिए विभिन्न क्षेत्रों में मजदूरी भिन्न हो सकती है, क्योंकि जीवन-यापन की लागत अलग-अलग होती है।

इन सिद्धांतों का सामूहिक उद्देश्य यह है कि न्यूनतम मजदूरी न तो केवल काग़ज़ी घोषणा बनकर रह जाए और न ही उद्योग-विरोधी उपाय बने, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संतुलन का साधन बने।


प्रश्न 29: समय दर और टुकड़ा दर मजदूरी में अंतर बताइए।

समय दर मजदूरी और टुकड़ा दर मजदूरी दो भिन्न पारिश्रमिक प्रणालियाँ हैं, जिनका उद्देश्य श्रमिकों को उनके कार्य के लिए भुगतान करना है, किंतु इनका आधार अलग-अलग होता है।

समय दर मजदूरी में श्रमिक को उसके कार्य-समय के आधार पर भुगतान किया जाता है—जैसे प्रति घंटा, प्रति दिन या प्रति माह। इस प्रणाली में उत्पादन की मात्रा की बजाय कार्य-समय निर्णायक होता है। यह व्यवस्था उन कार्यों के लिए उपयुक्त है, जहाँ कार्य की गुणवत्ता, निरंतरता और सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण होती है।

इसके विपरीत, टुकड़ा दर मजदूरी में भुगतान कार्य की मात्रा या इकाई के आधार पर किया जाता है। जितना अधिक उत्पादन, उतनी अधिक मजदूरी। यह प्रणाली उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देती है, किंतु इसमें श्रमिकों पर अत्यधिक कार्य-दबाव पड़ने की संभावना रहती है।

कानूनी दृष्टि से, दोनों प्रणालियों में यह सुनिश्चित किया जाता है कि श्रमिक को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान न मिले। यदि टुकड़ा दर के अनुसार गणना करने पर मजदूरी न्यूनतम स्तर से कम पड़ती है, तो नियोक्ता को अंतर की भरपाई करनी होती है।

इस प्रकार, समय दर मजदूरी स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करती है, जबकि टुकड़ा दर मजदूरी उत्पादकता और प्रोत्साहन पर आधारित होती है। दोनों का चयन कार्य की प्रकृति और औद्योगिक आवश्यकता पर निर्भर करता है।


प्रश्न 30: मजदूरी भुगतान में कटौती किन परिस्थितियों में की जा सकती है?

मजदूरी भुगतान में कटौती सामान्यतः निषिद्ध है, किंतु कानून कुछ विशिष्ट और सीमित परिस्थितियों में कटौती की अनुमति देता है। इसका उद्देश्य यह है कि नियोक्ता मनमाने ढंग से श्रमिक की मजदूरी न घटा सके, परंतु अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कटौतियाँ संभव हों।

वैध कटौतियों में प्रमुख हैं—अनुपस्थिति की कटौती, जहाँ श्रमिक बिना अनुमति कार्य से अनुपस्थित रहता है; दंडात्मक कटौती, जो अनुशासनहीनता या नियम-उल्लंघन पर की जाती है; और आवास, सुविधा या सेवा के बदले की कटौती, बशर्ते वह स्वीकृत सीमा के भीतर हो।

इसके अतिरिक्त, अग्रिम या ऋण की वसूली, कर या वैधानिक देयताओं की कटौती, तथा भविष्य निधि या सामाजिक सुरक्षा योगदान भी वैध कटौतियों में शामिल हैं। सभी कटौतियाँ विधि द्वारा निर्धारित सीमा और प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।

अवैध या अत्यधिक कटौती न केवल श्रमिक के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि औद्योगिक असंतोष को भी जन्म देती है। इसलिए, मजदूरी में कटौती की अनुमति अपवादस्वरूप दी गई है, न कि सामान्य नियम के रूप में।


प्रश्न 31: मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 का मुख्य उद्देश्य क्या है?

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों को उनकी अर्जित मजदूरी का समय पर, पूर्ण तथा विधिसम्मत भुगतान सुनिश्चित करना है। इस अधिनियम का निर्माण उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हुआ, जब भारत में औद्योगीकरण के प्रारंभिक चरण में नियोक्ताओं द्वारा मजदूरी भुगतान में देरी, मनमानी कटौतियाँ, वस्तुओं में भुगतान तथा शोषणकारी प्रथाएँ व्यापक थीं। परिणामस्वरूप श्रमिक आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक असुरक्षा से ग्रस्त थे।
इस अधिनियम का पहला और प्रमुख उद्देश्य मजदूरी भुगतान की नियमितता सुनिश्चित करना है। मजदूरी श्रमिक के जीवन का मुख्य आधार होती है। यदि उसका भुगतान समय पर न हो, तो श्रमिक भोजन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता। अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि मजदूरी निश्चित अवधि में दी जाए और नियोक्ता भुगतान को अनिश्चित काल तक टाल न सके।
दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य नियोक्ता की मनमानी शक्ति पर नियंत्रण लगाना है। अधिनियम यह स्पष्ट करता है कि मजदूरी से केवल वही कटौतियाँ की जा सकती हैं, जो कानून द्वारा अनुमत हों। इससे नियोक्ता द्वारा दंड, जुर्माना या अन्य बहानों से मजदूरी घटाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है।
तीसरा उद्देश्य औद्योगिक शांति बनाए रखना है। मजदूरी से संबंधित विवाद औद्योगिक असंतोष का प्रमुख कारण होते हैं। जब मजदूरी समय पर और सही मात्रा में मिलती है, तो हड़ताल, तालाबंदी और श्रम विवादों की संभावना कम हो जाती है।
अंततः, यह अधिनियम कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार करता है। यह श्रमिक को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का अधिकारी मानता है। इस प्रकार, मजदूरी भुगतान अधिनियम श्रम कानूनों की आधारशिला है।
प्रश्न 32: मजदूरी का भुगतान किस अवधि में किया जाना चाहिए?

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 मजदूरी के भुगतान की समय-सीमा को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है, जिससे श्रमिकों को आर्थिक अनिश्चितता और शोषण से बचाया जा सके। यह अधिनियम मजदूरी भुगतान को नियोक्ता की इच्छा पर नहीं छोड़ता, बल्कि उसे वैधानिक दायित्व बनाता है।
यदि किसी प्रतिष्ठान में 1000 से कम श्रमिक कार्यरत हैं, तो मजदूरी मजदूरी अवधि की समाप्ति के सात दिनों के भीतर भुगतान की जानी चाहिए। यदि प्रतिष्ठान में 1000 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हैं, तो यह अवधि दस दिनों तक बढ़ा दी जाती है। यह अंतर प्रशासनिक सुविधा और भुगतान व्यवस्था की व्यावहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।
सेवा-समाप्ति, बर्खास्तगी, छँटनी या त्यागपत्र की स्थिति में मजदूरी का भुगतान दो कार्य-दिवसों के भीतर किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य यह है कि रोजगार समाप्त होने पर श्रमिक तुरंत आर्थिक संकट में न पड़े।
अधिनियम यह भी स्पष्ट करता है कि मजदूरी का भुगतान सामान्यतः नकद, बैंक हस्तांतरण या चेक के माध्यम से किया जाना चाहिए। वस्तु के रूप में भुगतान केवल विशेष सरकारी अनुमति से ही किया जा सकता है।
इस प्रकार, मजदूरी भुगतान की समय-सीमा श्रमिकों के आर्थिक अधिकारों की रक्षा का एक सशक्त साधन है और नियोक्ता पर स्पष्ट विधिक दायित्व आरोपित करती है।
प्रश्न 33: मजदूरी से की जाने वाली वैध कटौतियाँ कौन-सी हैं?

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 मजदूरी से कटौती को अपवाद मानता है, न कि सामान्य नियम। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि श्रमिक की मजदूरी सुरक्षित रहे और केवल विधि द्वारा स्वीकृत परिस्थितियों में ही कटौती की जाए।
वैध कटौतियों में सबसे पहले अनुपस्थिति की कटौती आती है। यदि श्रमिक बिना अनुमति कार्य से अनुपस्थित रहता है, तो उस अवधि की मजदूरी काटी जा सकती है। दूसरी, दंडात्मक कटौती, जो अनुशासनहीनता या नियमों के उल्लंघन पर की जाती है, परंतु यह सीमित मात्रा में और उचित प्रक्रिया के बाद ही की जा सकती है।
तीसरी, आवास, बिजली, पानी या अन्य सुविधाओं के बदले की कटौती, बशर्ते श्रमिक ने उन्हें स्वेच्छा से स्वीकार किया हो। चौथी, ऋण या अग्रिम की वसूली, जो चरणबद्ध और निर्धारित सीमा के भीतर होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, आयकर, भविष्य निधि, बीमा प्रीमियम, न्यायालय द्वारा आदेशित कटौती, तथा सहकारी समितियों की देनदारी भी वैध कटौतियों में शामिल हैं।
कानून यह भी निर्धारित करता है कि कुल कटौती मजदूरी के एक निश्चित प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती, ताकि श्रमिक को न्यूनतम जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध रहे।
प्रश्न 34: अवैध कटौती के विरुद्ध श्रमिक को क्या उपाय प्राप्त हैं?

यदि नियोक्ता मजदूरी से अवैध कटौती करता है या भुगतान में अनुचित विलंब करता है, तो मजदूरी भुगतान अधिनियम श्रमिक को प्रभावी विधिक उपचार प्रदान करता है।
श्रमिक या उसका प्रतिनिधि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दावा याचिका दायर कर सकता है। प्राधिकारी मामले की सुनवाई कर यह जाँच करता है कि कटौती वैध है या नहीं। यदि कटौती अवैध पाई जाती है, तो नियोक्ता को कटौती की राशि लौटाने और अतिरिक्त मुआवज़ा देने का आदेश दिया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त, अधिनियम में दंडात्मक प्रावधान भी हैं। नियोक्ता पर जुर्माना लगाया जा सकता है या उसे अन्य विधिक दंड भुगतने पड़ सकते हैं। यह प्रावधान भविष्य में उल्लंघन रोकने के लिए निवारक भूमिका निभाते हैं।
इस प्रकार, अधिनियम केवल अधिकारों की घोषणा नहीं करता, बल्कि उनके प्रभावी प्रवर्तन की भी व्यवस्था करता है।
प्रश्न 35: कारखाना अधिनियम, 1948 का उद्देश्य क्या है?

कारखाना अधिनियम, 1948 का उद्देश्य कारखानों में कार्यरत श्रमिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण को सुनिश्चित करना है। यह अधिनियम औद्योगिक उत्पादन और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन स्थापित करता है।
स्वास्थ्य संबंधी उद्देश्यों में स्वच्छता, वायु-संचार, तापमान नियंत्रण, स्वच्छ जल और अपशिष्ट निपटान शामिल हैं। सुरक्षा के अंतर्गत मशीनों की सुरक्षा, खतरनाक प्रक्रियाओं का नियंत्रण और दुर्घटना-निवारण आते हैं। कल्याण संबंधी प्रावधानों में कैंटीन, विश्राम कक्ष, चिकित्सा सुविधा और शिशु-गृह शामिल हैं।
यह अधिनियम यह मान्यता देता है कि आर्थिक विकास तभी टिकाऊ हो सकता है, जब श्रमिक स्वस्थ, सुरक्षित और संतुष्ट हों।

प्रश्न 36: कारखाने (Factory) की परिभाषा क्या है?

 

कारखाने की परिभाषा श्रम कानून के अंतर्गत अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कारखाना अधिनियम, 1948 की संपूर्ण प्रयोज्यता इसी पर निर्भर करती है। किसी प्रतिष्ठान को “कारखाना” घोषित किया जाना केवल तकनीकी प्रश्न नहीं है, बल्कि इससे श्रमिकों को स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण संबंधी वैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

सामान्यतः, कारखाना वह स्थान है जहाँ निर्धारित संख्या में श्रमिक किसी निर्माण, उत्पादन, प्रसंस्करण, मरम्मत, पैकिंग या वस्तु रूपांतरण से संबंधित कार्य करते हैं और जहाँ शक्ति (Power) का प्रयोग होता है या नहीं होता। यदि शक्ति का प्रयोग होता है, तो कम श्रमिकों की उपस्थिति में भी वह प्रतिष्ठान कारखाना माना जा सकता है; यदि शक्ति का प्रयोग नहीं होता, तो श्रमिकों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होनी चाहिए।

कारखाने की परिभाषा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल बड़े उद्योग ही नहीं, बल्कि वे सभी प्रतिष्ठान जहाँ संगठित श्रम और औद्योगिक गतिविधि हो रही है, कानून के दायरे में आएँ। यह परिभाषा श्रमिक-संरक्षण की दृष्टि से व्यापक और उद्देश्यपरक है, न कि संकीर्ण।

न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि कारखाने की पहचान केवल भवन या नाम से नहीं, बल्कि वहाँ वास्तव में की जा रही गतिविधियों से होगी। यदि किसी स्थान पर उत्पादन या प्रसंस्करण की निरंतर गतिविधि हो रही है और श्रमिकों की सेवाएँ ली जा रही हैं, तो उसे कारखाना माना जा सकता है।

इस प्रकार, “कारखाना” की परिभाषा श्रमिकों को विधिक संरक्षण प्रदान करने का प्रवेश-द्वार (Gateway of Protection) है। इसका मूल उद्देश्य यह है कि औद्योगिक उत्पादन के साथ-साथ श्रमिकों का जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा सुरक्षित रहे।


प्रश्न 37: कारखाना अधिनियम के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी प्रावधान कौन-कौन से हैं?

कारखाना अधिनियम, 1948 का एक प्रमुख स्तंभ श्रमिकों के स्वास्थ्य की रक्षा है। अधिनियम यह स्वीकार करता है कि अस्वस्थ वातावरण में किया गया कार्य न केवल श्रमिक के लिए हानिकारक है, बल्कि उत्पादन और औद्योगिक विकास के लिए भी घातक है।

स्वास्थ्य संबंधी प्रावधानों में सबसे पहला स्थान स्वच्छता (Cleanliness) को दिया गया है। प्रत्येक कारखाने को स्वच्छ रखा जाना अनिवार्य है। फर्श, दीवारें, छत और कार्य-स्थल को नियमित रूप से साफ किया जाना चाहिए ताकि रोग-जनक तत्व उत्पन्न न हों।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रावधान वायु-संचार और तापमान नियंत्रण से संबंधित है। कारखाने में पर्याप्त ताज़ी हवा और उचित तापमान बनाए रखना नियोक्ता का दायित्व है, जिससे श्रमिकों को अत्यधिक गर्मी, ठंड या दमघोंटू वातावरण से बचाया जा सके।

तीसरा, धूल और धुएँ का नियंत्रण। जहाँ उत्पादन प्रक्रिया से धूल, धुआँ या विषैली गैसें उत्पन्न होती हैं, वहाँ उनके निष्कासन की प्रभावी व्यवस्था की जानी चाहिए। इसका उद्देश्य फेफड़ों और श्वसन-तंत्र से संबंधित रोगों की रोकथाम है।

चौथा, स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था। प्रत्येक कारखाने में श्रमिकों के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यह मूलभूत स्वास्थ्य अधिकार से जुड़ा हुआ है।

पाँचवाँ, शौचालय और मूत्रालय की पर्याप्त एवं पृथक व्यवस्था, विशेष रूप से महिला श्रमिकों के लिए। यह न केवल स्वास्थ्य, बल्कि गरिमा का भी प्रश्न है।

इस प्रकार, स्वास्थ्य संबंधी प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि श्रमिक केवल जीवित न रहें, बल्कि स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकें।


प्रश्न 38: कारखाना अधिनियम के अंतर्गत सुरक्षा संबंधी प्रावधान क्या हैं?

कारखाना अधिनियम का दूसरा प्रमुख उद्देश्य औद्योगिक दुर्घटनाओं की रोकथाम और श्रमिकों की शारीरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। औद्योगिक मशीनरी और खतरनाक प्रक्रियाएँ श्रमिकों के जीवन के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न कर सकती हैं, इसलिए सुरक्षा प्रावधानों को विशेष महत्व दिया गया है।

सबसे पहले, मशीनों की सुरक्षा। चलती हुई मशीनों के खतरनाक भागों को सुरक्षित ढंग से ढकना अनिवार्य है, ताकि श्रमिकों के हाथ, कपड़े या शरीर के अन्य अंग मशीन में फँस न जाएँ।

दूसरा, खतरनाक प्रक्रियाओं का नियंत्रण। जहाँ रसायन, विस्फोटक या विषैले पदार्थों का प्रयोग होता है, वहाँ विशेष सावधानियाँ, चेतावनी संकेत और सुरक्षात्मक उपकरण उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

तीसरा, अग्नि-सुरक्षा। आग लगने की स्थिति में सुरक्षित निकास, अग्निशमन उपकरण और आपातकालीन योजना अनिवार्य है। यह प्रावधान बड़े औद्योगिक हादसों की रोकथाम के लिए अत्यंत आवश्यक है।

चौथा, सुरक्षात्मक उपकरण (Protective Gear) जैसे हेलमेट, दस्ताने, मास्क, जूते आदि की व्यवस्था। यह नियोक्ता का कर्तव्य है कि वह श्रमिकों को आवश्यक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए।

पाँचवाँ, दुर्घटना की रिपोर्टिंग। किसी भी गंभीर दुर्घटना की सूचना संबंधित प्राधिकारी को देना अनिवार्य है, ताकि भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

इन सभी प्रावधानों का उद्देश्य यह है कि उद्योग मानव जीवन की कीमत पर न चले।


प्रश्न 39: कारखाना अधिनियम के अंतर्गत कल्याण संबंधी प्रावधान कौन-कौन से हैं?

कारखाना अधिनियम केवल स्वास्थ्य और सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह श्रमिकों के सामाजिक और मानसिक कल्याण को भी सुनिश्चित करता है। कल्याण संबंधी प्रावधान अधिनियम की मानवीय और कल्याणकारी प्रकृति को दर्शाते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण कल्याण प्रावधान कैंटीन की व्यवस्था है। बड़े कारखानों में श्रमिकों को सस्ती और पौष्टिक भोजन सुविधा उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इससे श्रमिकों के स्वास्थ्य और कार्य-क्षमता में सुधार होता है।

दूसरा, विश्राम कक्ष और विश्राम-स्थल। लंबे समय तक कार्य करने वाले श्रमिकों के लिए आराम की व्यवस्था आवश्यक है, जिससे थकान और तनाव कम हो।

तीसरा, प्राथमिक चिकित्सा और चिकित्सा सुविधाएँ। दुर्घटना या अचानक बीमारी की स्थिति में त्वरित चिकित्सा सहायता जीवन-रक्षक सिद्ध हो सकती है।

चौथा, शिशु-गृह (Creche) की व्यवस्था, जहाँ महिला श्रमिक कार्य के दौरान अपने बच्चों को सुरक्षित छोड़ सकें। यह महिला श्रमिकों की गरिमा और रोजगार-समानता से जुड़ा हुआ है।

पाँचवाँ, कल्याण अधिकारी की नियुक्ति, जो श्रमिकों और प्रबंधन के बीच सेतु का कार्य करता है और श्रमिक समस्याओं के समाधान में सहायता करता है।


प्रश्न 40: कार्य के घंटे एवं साप्ताहिक अवकाश के नियम क्या हैं?

कारखाना अधिनियम श्रमिकों से असीमित कार्य लेने की अनुमति नहीं देता। यह अधिनियम इस सिद्धांत पर आधारित है कि अत्यधिक कार्य-घंटे मानव स्वास्थ्य और गरिमा के विरुद्ध हैं

अधिनियम के अनुसार, किसी वयस्क श्रमिक से प्रतिदिन और प्रति सप्ताह निर्धारित सीमा से अधिक कार्य नहीं कराया जा सकता। इसके अतिरिक्त, श्रमिक को साप्ताहिक अवकाश प्रदान करना अनिवार्य है।

कार्य-दिवस के दौरान विश्राम अंतराल का प्रावधान किया गया है, ताकि श्रमिक लगातार लंबे समय तक कार्य न करे। यदि श्रमिक से अतिरिक्त कार्य कराया जाता है, तो उसे ओवरटाइम मजदूरी देनी होगी।

इन प्रावधानों का उद्देश्य श्रमिकों को शारीरिक और मानसिक थकान से बचाना, कार्य-कुशलता बनाए रखना और मानवीय जीवन-स्तर सुनिश्चित करना है।


प्रश्न 41: कारखाना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत महिलाओं के रोजगार से संबंधित प्रावधान क्या हैं?

कारखाना अधिनियम, 1948 में महिलाओं के रोजगार से संबंधित प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य महिला श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा करना है। अधिनियम यह स्वीकार करता है कि औद्योगिक कार्य-परिस्थितियों में महिलाओं को विशिष्ट जैविक, सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, इसलिए उनके लिए विशेष संरक्षण आवश्यक है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान कार्य-घंटों से संबंधित है। अधिनियम के अनुसार महिलाओं से रात्रि के निश्चित समय में कार्य नहीं कराया जा सकता। इसका उद्देश्य महिलाओं को असुरक्षा, थकान और सामाजिक जोखिमों से बचाना है। यह प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था और महिला-सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रावधान खतरनाक कार्यों में निषेध का है। महिलाओं को कुछ विशेष खतरनाक प्रक्रियाओं या मशीनों पर कार्य करने से प्रतिबंधित किया गया है, जहाँ उनके स्वास्थ्य या जीवन पर गंभीर खतरा हो सकता है। यह प्रतिबंध लैंगिक भेदभाव नहीं, बल्कि संरक्षणात्मक भेद (Protective Discrimination) का उदाहरण है।
तीसरा, स्वास्थ्य और स्वच्छता से संबंधित विशेष प्रावधान हैं, जैसे पृथक शौचालय, स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ। यह महिला श्रमिकों की गरिमा और स्वास्थ्य दोनों से जुड़ा हुआ है।
इसके अतिरिक्त, अधिनियम शिशु-गृह (Creche) की व्यवस्था का प्रावधान करता है, ताकि कामकाजी माताएँ अपने छोटे बच्चों की देखभाल की चिंता से मुक्त होकर कार्य कर सकें। यह प्रावधान महिला-श्रम भागीदारी को बढ़ावा देता है।
इस प्रकार, महिलाओं के रोजगार से संबंधित प्रावधान कारखाना अधिनियम की कल्याणकारी और संवेदनशील प्रकृति को दर्शाते हैं।
प्रश्न 42: कारखाना अधिनियम के अंतर्गत बाल श्रम से संबंधित प्रावधान क्या हैं?

कारखाना अधिनियम, 1948 बाल श्रम के प्रति कठोर और संरक्षणात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। इसका उद्देश्य बच्चों को शोषण, अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों और शिक्षा-वंचना से बचाना है।
अधिनियम के अनुसार, एक निश्चित आयु से कम बच्चों को कारखानों में नियोजित करना पूर्णतः निषिद्ध है। यह निषेध इस मान्यता पर आधारित है कि कारखानों की औद्योगिक परिस्थितियाँ बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए हानिकारक होती हैं।
किशोर श्रमिकों के लिए भी अधिनियम विशेष सुरक्षा प्रावधान करता है। उनसे केवल सीमित कार्य-घंटों में ही काम कराया जा सकता है और रात्रिकालीन कार्य निषिद्ध है। इसके अतिरिक्त, उन्हें खतरनाक मशीनों और प्रक्रियाओं से दूर रखा जाता है।
स्वास्थ्य परीक्षण भी एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। किशोर श्रमिकों को कार्य पर रखने से पहले और समय-समय पर चिकित्सकीय परीक्षण आवश्यक होता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार्य उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।
इन प्रावधानों का उद्देश्य केवल बच्चों को कार्य से दूर रखना नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित बचपन प्रदान करना है। इस प्रकार, कारखाना अधिनियम बाल अधिकारों की रक्षा का एक महत्वपूर्ण विधिक साधन है।
प्रश्न 43: कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 का उद्देश्य क्या है?

कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 का मुख्य उद्देश्य कार्य-स्थल पर दुर्घटना या व्यवसायिक रोग के कारण घायल हुए या मृत कर्मचारी को आर्थिक मुआवज़ा प्रदान करना है। यह अधिनियम सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आधारित है।
अधिनियम यह मान्यता देता है कि औद्योगिक कार्य में जोखिम अंतर्निहित होता है और यदि कर्मचारी उस जोखिम के कारण क्षति उठाता है, तो नियोक्ता को उत्तरदायी होना चाहिए। यह उत्तरदायित्व दोष-सिद्धि पर आधारित नहीं है, बल्कि नो-फॉल्ट लायबिलिटी के सिद्धांत पर आधारित है।
इस अधिनियम का उद्देश्य कर्मचारियों को लंबी न्यायिक प्रक्रिया से बचाकर त्वरित और निश्चित राहत प्रदान करना है। दुर्घटना की स्थिति में कर्मचारी या उसके आश्रितों को तुरंत आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए, ताकि वे जीवन-यापन कर सकें।
इसके अतिरिक्त, अधिनियम नियोक्ताओं को सुरक्षा उपाय अपनाने के लिए भी प्रेरित करता है, क्योंकि दुर्घटना की स्थिति में उन्हें प्रतिकर देना पड़ता है। इस प्रकार, यह अधिनियम रोकथाम और प्रतिकर दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करता है।
प्रश्न 44: कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम के अंतर्गत ‘नियोजक’ और ‘कर्मचारी’ की परिभाषा क्या है?

कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम में ‘नियोजक’ और ‘कर्मचारी’ की परिभाषाएँ अधिनियम की प्रयोज्यता तय करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
नियोजक वह व्यक्ति या संस्था है जो कर्मचारी को कार्य पर नियुक्त करती है और जिसके नियंत्रण या निर्देशन में कार्य किया जाता है। इसमें ठेकेदार और मुख्य नियोक्ता दोनों शामिल हो सकते हैं।
कर्मचारी वह व्यक्ति है जो मजदूरी या पारिश्रमिक के बदले किसी नियोजक के लिए कार्य करता है और जिसका कार्य जोखिमपूर्ण हो सकता है। अधिनियम का उद्देश्य अधिकतम श्रमिकों को संरक्षण देना है, इसलिए परिभाषा को व्यापक रखा गया है।
इन परिभाषाओं का उद्देश्य तकनीकी आधार पर कर्मचारियों को संरक्षण से वंचित होने से बचाना है


प्रश्न 45: दुर्घटना से उत्पन्न प्रतिकर की गणना कैसे की जाती है?

कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अंतर्गत दुर्घटना से उत्पन्न प्रतिकर की गणना एक विधिक, पूर्व-निर्धारित और गणितीय ढाँचे के अनुसार की जाती है। इस अधिनियम का उद्देश्य यह है कि दुर्घटना या व्यवसायिक रोग के कारण कर्मचारी या उसके आश्रितों को त्वरित, निश्चित और न्यायसंगत आर्थिक राहत प्राप्त हो सके, बिना लंबी दीवानी कार्यवाही में पड़े।

प्रतिकर की गणना मुख्यतः तीन कारकों पर आधारित होती है—
(1) कर्मचारी की मासिक मजदूरी,
(2) कर्मचारी की आयु, और
(3) चोट या क्षति की प्रकृति

सबसे पहले, यदि दुर्घटना के कारण कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है, तो प्रतिकर की गणना कर्मचारी की मासिक मजदूरी के एक निश्चित प्रतिशत तथा आयु के आधार पर निर्धारित गुणक (relevant factor) के अनुसार की जाती है। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि मृत कर्मचारी के आश्रितों को दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा मिल सके।

दूसरी स्थिति स्थायी पूर्ण अपंगता (Permanent Total Disablement) की है। इसमें कर्मचारी कार्य करने में पूरी तरह अक्षम हो जाता है। ऐसे मामलों में प्रतिकर की राशि मृत्यु के समान या उससे निकट होती है, क्योंकि कर्मचारी की आजीविका स्थायी रूप से समाप्त हो जाती है।

तीसरी स्थिति स्थायी आंशिक अपंगता (Permanent Partial Disablement) की होती है। इसमें कर्मचारी की कार्य-क्षमता आंशिक रूप से प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में प्रतिकर की गणना उस प्रतिशत के आधार पर की जाती है, जितनी कार्य-क्षमता घटित हुई है। अधिनियम में विभिन्न चोटों के लिए एक अनुसूची दी गई है, जो यह निर्धारित करती है कि कौन-सी चोट कितने प्रतिशत अपंगता मानी जाएगी।

चौथी स्थिति अस्थायी अपंगता (Temporary Disablement) की होती है, जहाँ कर्मचारी कुछ समय के लिए कार्य करने में असमर्थ होता है। इसमें कर्मचारी को निश्चित अवधि तक आवधिक भुगतान (half-monthly payment) दिया जाता है।

इस प्रकार, प्रतिकर की गणना मनमानी नहीं, बल्कि न्याय, पूर्वानुमेयता और सामाजिक सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित होती है।


प्रश्न 46: किन परिस्थितियों में कर्मचारी प्रतिकर देय नहीं होता?

यद्यपि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 एक कल्याणकारी कानून है, फिर भी यह हर परिस्थिति में नियोक्ता को उत्तरदायी नहीं ठहराता। अधिनियम कुछ अपवादात्मक परिस्थितियाँ निर्धारित करता है, जिनमें प्रतिकर देय नहीं होता। इन अपवादों का उद्देश्य अनुशासन बनाए रखना और अधिनियम के दुरुपयोग को रोकना है।

सबसे पहला अपवाद तब लागू होता है जब दुर्घटना कर्मचारी की जानबूझकर की गई लापरवाही के कारण हुई हो। यदि कर्मचारी ने सुरक्षा नियमों की अवहेलना की हो और उसी के परिणामस्वरूप दुर्घटना हुई हो, तो नियोक्ता प्रतिकर से मुक्त हो सकता है।

दूसरा अपवाद नशे की अवस्था से संबंधित है। यदि यह सिद्ध हो जाए कि दुर्घटना के समय कर्मचारी शराब या नशीले पदार्थों के प्रभाव में था, तो प्रतिकर देय नहीं होगा। यह प्रावधान कार्यस्थल अनुशासन और सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

तीसरा अपवाद तब लागू होता है जब कर्मचारी ने सुरक्षा उपकरणों के प्रयोग से जानबूझकर इनकार किया हो। यदि नियोक्ता ने पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की थी और कर्मचारी ने स्वयं उसका पालन नहीं किया, तो नियोक्ता को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

हालाँकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन अपवादों की व्याख्या संकीर्ण रूप से की जाती है। नियोक्ता पर यह भार होता है कि वह सिद्ध करे कि दुर्घटना उपरोक्त कारणों से ही हुई है। इस प्रकार, अधिनियम संतुलन बनाए रखता है—एक ओर श्रमिक-कल्याण, दूसरी ओर अनुशासन।


प्रश्न 47: मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 का उद्देश्य क्या है?

मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 का मुख्य उद्देश्य कामकाजी महिलाओं को गर्भावस्था, प्रसव और मातृत्व के दौरान आर्थिक सुरक्षा, स्वास्थ्य संरक्षण और गरिमा प्रदान करना है। यह अधिनियम इस मान्यता पर आधारित है कि मातृत्व केवल व्यक्तिगत विषय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है।

इस अधिनियम का पहला उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिला कर्मचारी गर्भावस्था के दौरान आर्थिक असुरक्षा का सामना न करे। सवैतनिक मातृत्व अवकाश महिला को यह अवसर देता है कि वह बिना आय-हानि के अपने स्वास्थ्य और शिशु की देखभाल कर सके।

दूसरा उद्देश्य महिला और शिशु के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान कार्य करने से महिला के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। अधिनियम इस जोखिम को कम करने के लिए कार्य-निषेध और विश्राम की व्यवस्था करता है।

तीसरा उद्देश्य कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है। यदि मातृत्व के कारण महिलाओं को रोजगार से बाहर कर दिया जाए, तो यह समानता के सिद्धांत के विरुद्ध होगा। अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि मातृत्व महिला के रोजगार-अधिकारों को समाप्त न करे।

इस प्रकार, मातृत्व लाभ अधिनियम सामाजिक न्याय, महिला-सशक्तिकरण और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।


प्रश्न 48: मातृत्व लाभ की अवधि कितनी होती है?

मातृत्व लाभ की अवधि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के अंतर्गत विधि द्वारा निर्धारित की गई है और इसका उद्देश्य माँ और शिशु दोनों को पर्याप्त देखभाल का समय देना है।

सामान्यतः, मातृत्व लाभ की कुल अवधि प्रसव-पूर्व और प्रसव-पश्चात अवकाश को मिलाकर निर्धारित की जाती है। यह अवधि इस विचार पर आधारित है कि प्रसव से पहले महिला को विश्राम की आवश्यकता होती है और प्रसव के बाद शिशु की देखभाल अत्यंत आवश्यक होती है।

विशेष परिस्थितियों—जैसे गोद लेने या सरोगेसी—में भी अधिनियम मातृत्व लाभ का प्रावधान करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अधिनियम परिवर्तित सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप है।

इस प्रकार, मातृत्व लाभ की अवधि केवल अवकाश नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, गरिमा और पारिवारिक दायित्वों की विधिक मान्यता है।


प्रश्न 49: मातृत्व लाभ के लिए पात्रता की शर्तें क्या हैं?

मातृत्व लाभ प्राप्त करने के लिए अधिनियम कुछ पात्रता शर्तें निर्धारित करता है, ताकि लाभ वास्तविक और पात्र महिला कर्मचारियों तक ही सीमित रहे।

सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि महिला कर्मचारी ने प्रसव से पूर्व निर्धारित न्यूनतम अवधि तक उस प्रतिष्ठान में कार्य किया हो। यह शर्त अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक है।

दूसरी शर्त यह है कि महिला कर्मचारी विधिक रूप से उस प्रतिष्ठान की कर्मचारी हो और उसका रोजगार संबंध अस्तित्व में हो। अस्थायी या संविदात्मक महिला कर्मचारी भी, यदि शर्तें पूरी करती हैं, तो पात्र हो सकती हैं।

इस प्रकार, पात्रता शर्तें संतुलन बनाती हैं—एक ओर महिला-कल्याण, दूसरी ओर नियोक्ता के वैध हित।


प्रश्न 50: मातृत्व लाभ अधिनियम के अंतर्गत नियोक्ता के कर्तव्य क्या हैं?

मातृत्व लाभ अधिनियम नियोक्ता पर सकारात्मक और अनिवार्य दायित्व आरोपित करता है। नियोक्ता का पहला कर्तव्य है कि वह पात्र महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ का भुगतान करे।

दूसरा, नियोक्ता को गर्भावस्था के दौरान महिला को हानिकारक या कठोर कार्य से मुक्त रखना चाहिए। तीसरा, नियोक्ता महिला के रोजगार-अधिकारों की रक्षा करेगा और मातृत्व के आधार पर सेवा-समाप्ति नहीं करेगा।

इसके अतिरिक्त, नियोक्ता को कार्यस्थल पर आवश्यक सुविधाएँ और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करना होता है। इन कर्तव्यों का उल्लंघन दंडनीय है।

इस प्रकार, अधिनियम नियोक्ता को केवल भुगतानकर्ता नहीं, बल्कि महिला-कल्याण का सहभागी बनाता है।