लिव-इन रिलेशनशिप में 12 महिलाओं को इलाहाबाद हाई कोर्ट की ढाल
“शादी न होना मौलिक अधिकारों से वंचित होने का आधार नहीं” — व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर ऐतिहासिक न्यायिक हस्तक्षेप
प्रस्तावना
भारतीय समाज में लिव-इन रिलेशनशिप आज भी विवाद, सामाजिक अस्वीकृति और नैतिक बहस का विषय बना हुआ है। विशेष रूप से जब ऐसे रिश्तों में महिलाएँ शामिल होती हैं, तो उन्हें परिवार, समाज और कई बार स्वयं राज्य तंत्र से भी खतरे का सामना करना पड़ता है।
इसी सामाजिक यथार्थ के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिसंबर 2025 में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाते हुए लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही 12 वयस्क महिलाओं को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का आदेश दिया।
यह फैसला न केवल इन याचिकाकर्ताओं के लिए राहत लेकर आया, बल्कि इसने अनुच्छेद 21, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिला अधिकारों और राज्य के संवैधानिक दायित्वों पर एक बार फिर स्पष्ट और सशक्त दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में कुल 12 महिलाएँ इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचीं, जो अपने-अपने पुरुष साथियों के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थीं।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि:
- वे सभी वयस्क (Major) हैं
- वे स्वेच्छा से एक-दूसरे के साथ रह रही हैं
- उन्हें अपने परिवारजनों और समाज से जान का खतरा है
- पुलिस से संपर्क करने पर भी उन्हें प्रभावी सुरक्षा नहीं मिली
इन परिस्थितियों में उन्होंने हाई कोर्ट से जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।
हाई कोर्ट का स्पष्ट और सशक्त रुख
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“केवल इस आधार पर कि कोई महिला विवाह के बिना किसी पुरुष के साथ रह रही है, उसे संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि भारतीय कानून में लिव-इन रिलेशनशिप को अवैध या अपराध घोषित नहीं किया गया है, और समाज की नैतिक धारणाएँ कानून के ऊपर नहीं हो सकतीं।
मुख्य न्यायिक निष्कर्ष (Key Findings of the Court)
1. अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण
कोर्ट ने दोहराया कि—
- अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को
- जीवन का अधिकार
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता
- गरिमा के साथ जीने का अधिकार
प्रदान करता है।
लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे वयस्क भी इस अधिकार के पूर्ण रूप से हकदार हैं।
2. लिव-इन रिलेशनशिप न तो अवैध है, न अपराध
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
- शादी के बिना साथ रहना
- कानूनन अपराध नहीं है
- गैरकानूनी नहीं है
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय समाज की नैतिकता कानून की वैधता तय नहीं कर सकती।
3️⃣ राज्य का संवैधानिक दायित्व
कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए कहा कि—
“जब कोई वयस्क महिला या पुरुष जीवन के खतरे की आशंका जताता है, तो राज्य का यह कर्तव्य है कि वह बिना किसी नैतिक निर्णय के सुरक्षा प्रदान करे।”
राज्य तंत्र का काम नैतिक प्रहरी बनना नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा करना है।
4. घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 का संदर्भ
हाई कोर्ट ने Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 का भी उल्लेख किया और कहा कि—
- यह अधिनियम
- “Relationship in the nature of marriage”
को मान्यता देता है
- “Relationship in the nature of marriage”
- अर्थात, गैर-विवाह संबंध भी कानूनी संरक्षण के दायरे में आते हैं
यह स्पष्ट करता है कि विधायिका स्वयं ऐसे संबंधों को पूर्णतः नकारती नहीं है।
5. पुलिस को स्पष्ट निर्देश
कोर्ट ने संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों (SPs) को निर्देश दिया कि—
- याचिकाकर्ताओं की
- आयु की पुष्टि
- आपसी सहमति
सुनिश्चित की जाए
- इसके बाद उन्हें तत्काल और प्रभावी पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए
कोर्ट ने यह भी कहा कि सुरक्षा देने में अनावश्यक देरी या लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा।
सामाजिक नैतिकता बनाम संवैधानिक नैतिकता
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने एक बार फिर संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) को सामाजिक नैतिकता से ऊपर रखा।
भारतीय समाज में आज भी यह धारणा प्रबल है कि—
- विवाह ही एकमात्र “वैध” रिश्ता है
- विवाह से बाहर संबंध अनैतिक हैं
लेकिन न्यायपालिका का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि—
संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, न कि समाज की पसंद-नापसंद की।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों से सामंजस्य
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व निर्णयों की निरंतरता में है, जैसे—
- Lata Singh v. State of UP (2006)
- S. Khushboo v. Kanniammal (2010)
- Indra Sarma v. V.K.V. Sarma (2013)
इन सभी मामलों में अदालतों ने कहा है कि—
- वयस्कों की सहमति सर्वोपरि है
- लिव-इन रिलेशनशिप अपने-आप में अपराध नहीं है
महिलाओं के अधिकारों की दृष्टि से महत्व
यह निर्णय विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- सामाजिक हिंसा का शिकार अक्सर महिलाएँ होती हैं
- “इज़्ज़त” के नाम पर धमकियाँ दी जाती हैं
- पुलिस कई बार नैतिक आधार पर मदद से इनकार कर देती है
यह फैसला पुलिस और प्रशासन को स्पष्ट संदेश देता है कि—
महिला की सुरक्षा पर कोई नैतिक शर्त लागू नहीं की जा सकती।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय केवल 12 महिलाओं की सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि यह—
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पुनः पुष्टि
- संविधान की सर्वोच्चता
- महिला अधिकारों की रक्षा
- और राज्य की जिम्मेदारी का स्मरण
कराने वाला एक ऐतिहासिक न्यायिक कदम है।
यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि भारत में कानून का उद्देश्य समाज को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करना है।