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“शादी का मतलब पूर्ण सहमति नहीं”: वैवाहिक गरिमा, सहमति और निजता पर गुजरात हाईकोर्ट का ऐतिहासिक दृष्टिकोण

“शादी का मतलब पूर्ण सहमति नहीं”: वैवाहिक गरिमा, सहमति और निजता पर गुजरात हाईकोर्ट का ऐतिहासिक दृष्टिकोण


प्रस्तावना

       भारतीय समाज में विवाह को केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार माना जाता है। विवाह के साथ ही पति-पत्नी के बीच विश्वास, प्रेम, सम्मान और समानता का रिश्ता स्थापित होना चाहिए। किंतु वास्तविकता यह है कि परंपरागत सोच ने लंबे समय तक विवाह को “अधिकार” और “कर्तव्य” के असंतुलित समीकरण में बाँध दिया, जहाँ पति को अधिकार और पत्नी को केवल कर्तव्य सौंपे गए।

       इसी मानसिकता के कारण वर्षों तक यह मान लिया गया कि विवाह के बाद पत्नी की सहमति स्वतः स्थायी हो जाती है। इस सोच को चुनौती देते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जिसने वैवाहिक संबंधों में सहमति, गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता को नए सिरे से परिभाषित किया।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“शादी किसी पुरुष को अपनी पत्नी की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाने का लाइसेंस नहीं देती।”

यह टिप्पणी केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के स्तर पर भी एक ऐतिहासिक मोड़ मानी जा सकती है।


मामले की पृष्ठभूमि

गुजरात हाईकोर्ट के समक्ष आए एक मामले में पत्नी ने अपने पति पर शारीरिक और मानसिक क्रूरता के साथ-साथ अप्राकृतिक यौन संबंधों के आरोप लगाए थे। पत्नी का कहना था कि पति उसकी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाता था और इसे अपना “वैवाहिक अधिकार” मानता था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने केवल तथ्यों तक सीमित न रहते हुए, वैवाहिक सहमति, महिला की गरिमा और उसके संवैधानिक अधिकारों पर गहन टिप्पणी की। कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि भारत में वैवाहिक बलात्कार पर कानून अभी तक स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि महिला की सहमति का कोई मूल्य नहीं है।


अदालत के प्रमुख तर्क

1. सहमति की निरंतरता

कोर्ट ने कहा कि सहमति कोई स्थायी अनुबंध नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है। हर बार, हर परिस्थिति में, सहमति आवश्यक है।

अदालत के शब्दों में—
“एक बार विवाह होने का अर्थ यह नहीं कि महिला ने जीवन भर के लिए अपने शरीर पर से अधिकार खो दिया।”

यह विचार भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण में एक बड़ा परिवर्तन दर्शाता है।


2. अनुच्छेद 21 और गरिमापूर्ण जीवन

संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। अदालत ने कहा कि यह अधिकार वैवाहिक जीवन के भीतर भी उतना ही प्रभावी है जितना सार्वजनिक जीवन में।

महिला का शरीर, उसकी इच्छा और उसकी गरिमा किसी भी परिस्थिति में समाप्त नहीं होती।


3. शारीरिक अखंडता और निजता

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह पति ही क्यों न हो, दूसरे के शरीर पर बिना सहमति अधिकार नहीं है। यह निजता के अधिकार और शारीरिक अखंडता का मूल सिद्धांत है।


4. शक्ति का असंतुलन

अदालत ने स्वीकार किया कि वैवाहिक संबंधों में अक्सर सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक शक्ति का असंतुलन होता है। इस असंतुलन का प्रयोग यदि पत्नी पर दबाव बनाने के लिए किया जाए, तो उसे “वैवाहिक अधिकार” नहीं कहा जा सकता।


धारा 375 और उसका विवादास्पद अपवाद

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (अब भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धारा) बलात्कार की परिभाषा देती है, लेकिन उसमें अपवाद 2 यह कहता है कि यदि पत्नी की उम्र 18 वर्ष से अधिक है, तो पति द्वारा बनाए गए शारीरिक संबंध बलात्कार नहीं माने जाएंगे, भले ही वे उसकी इच्छा के विरुद्ध हों।

इस अपवाद पर मुख्य आपत्तियाँ

  1. यह महिला को समान नागरिक नहीं मानता।
  2. यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
  3. यह अनुच्छेद 21 के अंतर्गत महिला की गरिमा के विपरीत है।
  4. यह वैवाहिक जीवन में हिंसा को वैधता देता है।

इसी कारण लंबे समय से सामाजिक कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञ इस अपवाद को हटाने की माँग कर रहे हैं।


“शादी अनुबंध नहीं, विश्वास है”

गुजरात हाईकोर्ट ने अपने दृष्टिकोण में यह भी जोड़ा कि विवाह को केवल एक यौन अनुबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। विवाह विश्वास, सम्मान और साझेदारी का संबंध है।

अदालत की ऐतिहासिक टिप्पणी—
“एक पत्नी का ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ ही होता है, चाहे वह अजनबी के लिए हो या उसके पति के लिए।”

यह वाक्य भारतीय समाज में वैवाहिक संबंधों की परिभाषा को बदलने की क्षमता रखता है।


वैवाहिक बलात्कार: केवल कानूनी नहीं, मानवीय मुद्दा

वैवाहिक बलात्कार को केवल अपराध की श्रेणी में देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक गंभीर मानवीय और मानसिक समस्या भी है।

1. मानसिक आघात

जब शोषण किसी अपने द्वारा होता है, तो उसका मानसिक प्रभाव कहीं अधिक गहरा होता है। पीड़िता स्वयं को असहाय, अपमानित और टूटता हुआ महसूस करती है।


2. आत्मसम्मान की क्षति

ऐसी महिलाएँ धीरे-धीरे अपने आत्मसम्मान को खोने लगती हैं और अपने अस्तित्व को ही दोष देने लगती हैं।


3. बच्चों पर प्रभाव

जिस परिवार में सहमति और सम्मान नहीं होता, वहाँ पलने वाले बच्चों की मानसिकता भी प्रभावित होती है। वे रिश्तों को शक्ति और नियंत्रण की दृष्टि से देखने लगते हैं।


4. आत्मनिर्भरता की ओर कदम

जब महिलाएँ यह समझने लगती हैं कि उनका शरीर उनका अपना है, तो उनमें आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता दोनों बढ़ते हैं।


विरोधी तर्क और उनकी समीक्षा

कुछ वर्ग वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने का विरोध करते हैं।

तर्क 1: परिवार टूट जाएंगे

उत्तर:
परिवार सम्मान और विश्वास से जुड़ता है, डर और दबाव से नहीं।


तर्क 2: झूठे मामले बढ़ेंगे

उत्तर:
कानून के दुरुपयोग की आशंका हर कानून में होती है, लेकिन इस डर से न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।


तर्क 3: साबित करना कठिन होगा

उत्तर:
अपराध कठिन हो या आसान, न्याय का उद्देश्य सत्य तक पहुँचना होता है, न कि अपराध को नकारना।


अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

कई देशों में वैवाहिक बलात्कार को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित किया जा चुका है, जैसे—

  • ब्रिटेन
  • अमेरिका
  • कनाडा
  • ऑस्ट्रेलिया
  • फ्रांस

इन देशों का अनुभव बताता है कि कानून ने परिवार नहीं तोड़े, बल्कि रिश्तों में सम्मान को बढ़ाया।


भारत में न्यायिक परिवर्तन की दिशा

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक वैवाहिक बलात्कार पर अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन उच्च न्यायालयों की टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि भारतीय न्याय व्यवस्था धीरे-धीरे इस विषय पर संवेदनशील और प्रगतिशील दृष्टिकोण अपना रही है।

गुजरात हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य के कानून निर्माण के लिए मजबूत आधार बन सकती है।


वैवाहिक अधिकार बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता

पहले “वैवाहिक अधिकार” को पति का विशेषाधिकार माना जाता था। लेकिन अब न्यायशास्त्र यह स्पष्ट कर रहा है कि वैवाहिक अधिकार का अर्थ केवल साथ रहने का अधिकार है, न कि बलपूर्वक शारीरिक संबंध बनाने का।


समाज के लिए संदेश

यह निर्णय केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है—
रिश्ते अधिकार से नहीं, सम्मान से चलते हैं।
शादी का मतलब समर्पण नहीं, बल्कि साझेदारी है।


निष्कर्ष

गुजरात हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय समाज को यह याद दिलाती है कि विवाह में भी महिला एक स्वतंत्र नागरिक है, जिसकी इच्छा, गरिमा और निजता सर्वोपरि है।

भले ही कानून में अभी अंतिम संशोधन बाकी हो, लेकिन न्यायिक सोच में आया यह बदलाव अपने-आप में एक क्रांति है।

न्याय का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा दिखाना भी है। और यह फैसला उसी दिशा में एक मजबूत कदम है।


अंतिम शब्द

शादी का अर्थ है साथ चलना, न कि किसी को पीछे घसीटना।
शादी का अर्थ है सम्मान, न कि नियंत्रण।
और सबसे महत्वपूर्ण—
शादी का अर्थ है सहमति, हर बार, हर परिस्थिति में।