IndianLawNotes.com

शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल: पटना उच्च न्यायालय में उजागर हुई मद्य निषेध विभाग की नीलामी अनियमितताएँ

शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल: पटना उच्च न्यायालय में उजागर हुई मद्य निषेध विभाग की नीलामी अनियमितताएँ


भूमिका

        बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2016 में लागू किया गया पूर्ण शराबबंदी कानून देश में सामाजिक सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना गया। इस कानून का उद्देश्य शराब सेवन से उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक एवं पारिवारिक समस्याओं पर अंकुश लगाना था। किंतु समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि कानून के क्रियान्वयन में अनेक व्यावहारिक और प्रशासनिक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

     हाल ही में पटना उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों ने शराबबंदी कानून के अंतर्गत वाहनों की जब्ती और नीलामी प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। विशेष रूप से यह आरोप सामने आया कि मद्य निषेध विभाग ने जब्त की गई महंगी गाड़ियों को नियमों की अनदेखी करते हुए उनकी वास्तविक कीमत से बहुत कम दामों पर नीलाम कर दिया।


बिहार में शराबबंदी कानून: एक संक्षिप्त परिचय

      बिहार में शराबबंदी को बिहार मद्य निषेध और उत्पाद अधिनियम, 2016 के माध्यम से लागू किया गया। इस अधिनियम के तहत—

  • शराब का निर्माण, भंडारण, बिक्री और सेवन पूर्णतः प्रतिबंधित है
  • शराब से संबंधित अपराधों में कठोर दंड का प्रावधान है
  • शराब के परिवहन या भंडारण में प्रयुक्त वाहनों की जब्ती (Confiscation) का अधिकार प्रशासन को दिया गया है

इस कानून के तहत लाखों मामलों में वाहन जब्त किए गए, जिनमें दोपहिया से लेकर लग्जरी कारें और ट्रक तक शामिल हैं।


वाहन जब्ती और नीलामी की कानूनी प्रक्रिया

कानून के अनुसार—

  • जब्त वाहनों की नीलामी न्यायसंगत, पारदर्शी और नियमबद्ध प्रक्रिया से होनी चाहिए
  • वाहन का उचित मूल्यांकन (Valuation) किया जाना अनिवार्य है
  • नीलामी से पूर्व वाहन स्वामी को उचित अवसर दिया जाना चाहिए
  • नीलामी से प्राप्त धनराशि का लेखा-जोखा विधिसम्मत तरीके से रखा जाना चाहिए

इन प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य को राजस्व की हानि न हो और नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन न किया जाए।


पटना उच्च न्यायालय में उठा गंभीर मुद्दा

पटना उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि—

  • मद्य निषेध विभाग द्वारा जब्त कई महंगी गाड़ियों को
  • बिना उचित मूल्यांकन के
  • बाजार मूल्य से अत्यंत कम कीमत पर नीलाम कर दिया गया

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि कुछ मामलों में करोड़ों रुपये मूल्य की गाड़ियों को महज़ कुछ लाख रुपये में बेच दिया गया।


वकीलों द्वारा उठाए गए प्रमुख तर्क

याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ता ने निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए—

  1. नीलामी नियमों का उल्लंघन
    न तो मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार की गई और न ही स्वतंत्र एजेंसी से मूल्य निर्धारण कराया गया।
  2. पारदर्शिता का अभाव
    नीलामी की प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं थी और सीमित लोगों को ही जानकारी दी गई।
  3. राज्य को राजस्व की भारी हानि
    वाहनों को कम कीमत पर बेचने से सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।
  4. संभावित मिलीभगत
    कुछ मामलों में अधिकारियों और खरीदारों के बीच सांठगांठ की आशंका व्यक्त की गई।

न्यायालय की प्रारंभिक टिप्पणी

पटना उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि—

यदि यह आरोप सही हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला भी बनता है।

न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि कानून के नाम पर मनमानी स्वीकार्य नहीं है और प्रत्येक प्रशासनिक कार्रवाई संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए।


शराबबंदी कानून और संवैधानिक अधिकार

यह मामला एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा करता है कि—

  • क्या शराबबंदी कानून के नाम पर
  • नागरिकों के संपत्ति के अधिकार (Article 300A)
  • और निष्पक्ष प्रक्रिया (Article 14 एवं 21)
    का उल्लंघन किया जा सकता है?

उच्च न्यायालय पहले भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि शराबबंदी कानून का पालन करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत

पटना उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए कई निर्णयों में कहा गया है कि—

  • जब्ती और नीलामी की प्रक्रिया दंडात्मक नहीं, बल्कि विनियामक (Regulatory) है
  • राज्य का उद्देश्य राजस्व अर्जन होना चाहिए, न कि मनमानी
  • किसी भी स्थिति में प्रशासन को निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखनी होगी

इन निर्णयों के आलोक में वर्तमान मामला और भी गंभीर हो जाता है।


प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न

इस प्रकरण ने मद्य निषेध विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं—

  • क्या विभाग के पास नीलामी हेतु स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं?
  • क्या अधिकारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया?
  • क्या नीलामी प्रक्रिया की कोई स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था है?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं, तो यह पूरे तंत्र की विफलता को दर्शाता है।


सामाजिक सुधार बनाम प्रशासनिक दुरुपयोग

शराबबंदी कानून का उद्देश्य निस्संदेह सामाजिक सुधार था, किंतु—

जब कोई कल्याणकारी कानून प्रशासनिक दुरुपयोग का माध्यम बन जाए, तो उसका उद्देश्य ही संदिग्ध हो जाता है।

कम कीमत पर वाहन नीलामी न केवल राज्य को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी कमजोर करती है।


संभावित परिणाम और आगे की राह

यदि न्यायालय को अनियमितताएँ सिद्ध होती हैं, तो—

  • नीलामी प्रक्रिया को रद्द किया जा सकता है
  • जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं आपराधिक कार्रवाई संभव है
  • भविष्य के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं

यह मामला बिहार में शराबबंदी कानून के पुनर्मूल्यांकन की भी माँग को बल देता है।


निष्कर्ष

पटना उच्च न्यायालय में उजागर हुआ यह मामला स्पष्ट करता है कि—

  • केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं,
  • उसका निष्पक्ष और पारदर्शी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है।

मद्य निषेध विभाग द्वारा वाहनों की नीलामी में कथित अनियमितताएँ न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाती हैं, बल्कि संवैधानिक शासन के मूल सिद्धांतों को भी चुनौती देती हैं।

अब यह न्यायालय पर निर्भर करता है कि वह इस प्रकरण में ऐसा निर्णय दे, जो—

  • कानून के उद्देश्य की रक्षा करे,
  • प्रशासनिक मनमानी पर अंकुश लगाए,
  • और जनता के विश्वास को पुनः स्थापित करे।

यह मामला एक चेतावनी है कि सामाजिक सुधार के नाम पर कानून का दुरुपयोग लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है।