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वैवाहिक कलह के कारण गर्भपात अपराध नहीं: दिल्ली उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय — MTP अधिनियम के तहत महिला की स्वायत्तता और मानसिक स्वास्थ्य की संवैधानिक रक्षा

वैवाहिक कलह के कारण गर्भपात अपराध नहीं: दिल्ली उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय — MTP अधिनियम के तहत महिला की स्वायत्तता और मानसिक स्वास्थ्य की संवैधानिक रक्षा

प्रस्तावना

       भारतीय समाज में गर्भपात का विषय लंबे समय तक नैतिकता, परंपरा और आपराधिक कानून के संकरे दायरे में देखा जाता रहा है। विशेषकर विवाहित महिलाओं के संदर्भ में यह धारणा रही कि गर्भपात तभी “स्वीकार्य” है जब कोई गंभीर शारीरिक जटिलता हो। किंतु समय के साथ न्यायपालिका ने यह स्वीकार किया है कि मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य। दिल्ली उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इसी संवैधानिक सोच का सशक्त उदाहरण है, जिसमें अदालत ने कहा कि वैवाहिक कलह के कारण मानसिक आघात झेल रही महिला द्वारा MTP अधिनियम के दायरे में किया गया गर्भपात अपराध नहीं है


मामले की पृष्ठभूमि

       विवाद का केंद्र वह मामला था जिसमें एक विवाहित महिला ने लगभग 14 सप्ताह की गर्भावस्था में गर्भपात कराया। कारण बताया गया—गंभीर वैवाहिक कलह, जिसने महिला के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित किया। इसके बावजूद, निचली अदालत द्वारा महिला को भारतीय दंड संहिता की धारा 312 (गर्भपात का अपराध) के तहत समन जारी कर दिया गया।

        महिला ने इस आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। याचिका का मुख्य तर्क यह था कि गर्भपात Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 (MTP Act) के अनुरूप कराया गया, और वैवाहिक कलह से उत्पन्न मानसिक आघात को कानूनन “मानसिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम” माना जाना चाहिए।


धारा 312 IPC और MTP अधिनियम: टकराव या समन्वय?

         IPC की धारा 312 सामान्य रूप से गर्भपात को अपराध मानती है, जब तक कि वह स्त्री के जीवन को बचाने के लिए आवश्यक न हो। वहीं MTP अधिनियम गर्भपात को विशिष्ट परिस्थितियों में वैध ठहराता है—जिनमें महिला का शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य शामिल है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:

  • MTP अधिनियम एक विशेष कानून (Special Law) है।
  • विशेष कानून, सामान्य कानून (IPC) पर प्राथमिकता रखता है।
  • यदि गर्भपात MTP अधिनियम के तहत किया गया है, तो IPC की धारा 312 लागू नहीं होगी

यह व्याख्या विधायी मंशा (Legislative Intent) और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप है।


मानसिक स्वास्थ्य की व्यापक व्याख्या

       अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य को संकुचित दृष्टि से देखने से इनकार किया। न्यायालय ने कहा:

“वैवाहिक कलह से जूझ रही महिला को होने वाला मानसिक आघात गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है, जो शारीरिक और मानसिक—दोनों प्रकार की हानि का कारण बन सकता है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।”

यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मानसिक स्वास्थ्य को एक जीवंत, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में देखने का आग्रह करती है—केवल चिकित्सीय रिपोर्ट तक सीमित नहीं।


MTP अधिनियम का ढांचा और 14 सप्ताह का प्रश्न

MTP अधिनियम (संशोधित) के अनुसार:

  • 20 सप्ताह तक (और कुछ परिस्थितियों में 24 सप्ताह तक) गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है।
  • यदि गर्भावस्था जारी रखना महिला के मानसिक स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करता है, तो यह वैध आधार है।

यहाँ गर्भपात 14 सप्ताह में हुआ—जो स्पष्टतः कानूनी सीमा के भीतर था। चिकित्सकीय परामर्श और वैधानिक शर्तों का पालन भी किया गया। अतः आपराधिकरण का कोई आधार नहीं बनता।


स्त्री की देह, निर्णय और स्वायत्तता

यह निर्णय स्त्री की शारीरिक स्वायत्तता (Bodily Autonomy) को केंद्र में रखता है। अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि:

  • गर्भपात का निर्णय महिला का निजी और संवैधानिक अधिकार है।
  • विवाह महिला की निर्णय-स्वतंत्रता को समाप्त नहीं करता
  • पति या परिवार की असहमति, यदि MTP अधिनियम की शर्तें पूरी हों, तो निर्णायक नहीं हो सकती।

यह दृष्टिकोण अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अनुरूप है।


पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों से सामंजस्य

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों की कड़ी में जुड़ता है, जहाँ:

  • मानसिक स्वास्थ्य को गर्भपात का वैध आधार माना गया है।
  • अविवाहित और विवाहित—दोनों महिलाओं के लिए समान मानदंड लागू किए गए हैं।
  • प्रजनन अधिकारों को निजता और गरिमा से जोड़ा गया है।

इस निर्णय से यह संदेश और मजबूत होता है कि कानून नैतिक उपदेशक नहीं, बल्कि अधिकारों का संरक्षक है


निचली अदालतों के लिए स्पष्ट संदेश

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह निचली अदालतों को सावधानी बरतने का निर्देश देता है:

  • MTP अधिनियम के तहत किए गए गर्भपात में यांत्रिक रूप से IPC लागू न करें
  • महिला के मानसिक स्वास्थ्य के दावों को संवेदनशीलता और विशेषज्ञ दृष्टि से परखें।
  • समन या अभियोजन से पहले वैधानिक ढांचे की समुचित जांच करें।

सामाजिक प्रभाव और व्यापक महत्व

यह निर्णय केवल एक कानूनी राहत नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श में बदलाव का संकेत है:

  • यह कलंक (Stigma) को कम करने में सहायक है।
  • महिलाओं को यह भरोसा देता है कि कानून उनके मानसिक दर्द को समझता है।
  • यह स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सकों को भी आश्वस्त करता है कि वैधानिक गर्भपात के लिए उन्हें आपराधिक डर में नहीं जीना होगा।

आलोचनाएँ और संतुलन

कुछ आलोचक यह तर्क दे सकते हैं कि “मानसिक स्वास्थ्य” का दायरा बहुत व्यापक हो सकता है। किंतु अदालत का उत्तर निहित है—निर्णय चिकित्सकीय राय और वैधानिक प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए। मनमानी नहीं, बल्कि कानूनी ढांचे के भीतर विवेक ही मान्य है।


निष्कर्ष

       दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय प्रजनन अधिकार न्यायशास्त्र में मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि:

  • MTP अधिनियम के तहत किया गया गर्भपात अपराध नहीं
  • वैवाहिक कलह से उत्पन्न मानसिक आघात गर्भपात का वैध आधार हो सकता है।
  • महिला की स्वायत्तता, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य सर्वोपरि हैं।

        यह फैसला न केवल कानून की सही व्याख्या है, बल्कि संवेदनशील, मानवीय और संवैधानिक न्याय का सशक्त उदाहरण भी है—जो भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों को नई मजबूती देता है।