विशिष्ट निष्पादन में मूल्य वृद्धि और राहत का पुनर्गठन (Moulding of Relief): Sunder Lal & Ors. बनाम Cholar Ram — पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय (2025)
भूमिका
विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) का सिद्धांत भारतीय संविदा कानून का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसका उद्देश्य केवल क्षतिपूर्ति प्रदान करना नहीं, बल्कि पक्षकारों को उनके संविदात्मक दायित्वों के वास्तविक पालन के लिए बाध्य करना है। किंतु न्यायालयों ने सदैव यह माना है कि विशिष्ट निष्पादन कोई यांत्रिक या स्वचालित अधिकार नहीं, बल्कि एक न्यायिक विवेकाधिकार (Discretionary Relief) है।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का निर्णय Sunder Lal & Ors. v. Cholar Ram (2025) इसी सिद्धांत को नए दृष्टिकोण से स्पष्ट करता है, जहाँ लंबे समय के अंतराल और संपत्ति के मूल्य में अत्यधिक वृद्धि के कारण न्यायालय ने राहत को “मोल्ड” (mould) करते हुए न्यायसंगत समाधान अपनाया।
मामले की पृष्ठभूमि (Facts of the Case)
विवाद एक अचल संपत्ति के विक्रय समझौते से संबंधित था। वादी (Purchaser) और प्रतिवादी (Vendor) के मध्य एक विधिवत बिक्री अनुबंध संपन्न हुआ, जिसके अंतर्गत प्रतिवादी ने निर्धारित मूल्य पर संपत्ति बेचने की सहमति दी थी।
समझौते के पश्चात विभिन्न कारणों से बिक्री विलेख का निष्पादन नहीं हो सका और वादी ने विशिष्ट निष्पादन हेतु दीवानी वाद दायर किया। निचली अदालतों द्वारा वादी के पक्ष में डिक्री पारित की गई, किंतु इस दौरान लगभग तीन दशकों का समय बीत चुका था और संपत्ति के बाजार मूल्य में असाधारण वृद्धि हो चुकी थी।
मुख्य विधिक प्रश्न (Key Legal Issue)
इस मामले में उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था—
क्या लंबे समय के पश्चात और संपत्ति के मूल्य में अत्यधिक वृद्धि होने की स्थिति में, न्यायालय विशिष्ट निष्पादन की डिक्री को यथावत लागू करे, या फिर न्यायसंगत संतुलन बनाए रखने हेतु राहत को संशोधित (mould) कर सकता है?
विशिष्ट निष्पादन का विवेकाधीन स्वरूप
न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि—
- विशिष्ट निष्पादन न तो स्वचालित अधिकार है,
- न ही केवल इस आधार पर दिया जा सकता है कि अनुबंध सिद्ध हो गया है।
विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 20 (संशोधन-पूर्व स्थिति के संदर्भ में) न्यायालय को यह अधिकार देती है कि वह परिस्थितियों को देखते हुए राहत प्रदान करे या अस्वीकार करे।
मूल्य वृद्धि और न्यायिक संतुलन
उच्च न्यायालय ने माना कि—
- यदि अत्यधिक विलंब के कारण संपत्ति का मूल्य कई गुना बढ़ गया हो,
- और यदि पुरानी कीमत पर अनुबंध को लागू किया जाए,
तो यह विक्रेता के लिए अत्यधिक कठोर (Harsh) और क्रेता के लिए अनुचित लाभ (Unfair Bonanza) का कारण बन सकता है।
न्यायालय ने कहा कि कानून का उद्देश्य किसी एक पक्ष को असामान्य लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि सारभूत न्याय (Substantive Justice) सुनिश्चित करना है।
राहत का पुनर्गठन (Moulding of Relief)
इस प्रकरण में न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया—
जहाँ न्याय की माँग हो, वहाँ न्यायालय को राहत को यथार्थ परिस्थितियों के अनुरूप ढालने का अधिकार है।
अतः न्यायालय ने—
- विशिष्ट निष्पादन की डिक्री को बरकरार रखा,
- किंतु साथ ही क्रेता को निर्देश दिया कि वह
समय के अंतराल और मूल्य वृद्धि को ध्यान में रखते हुए एक बढ़ी हुई राशि (Enhanced Consideration) का भुगतान करे।
धारा 20, विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 का उद्देश्य
न्यायालय ने धारा 20 की व्याख्या करते हुए कहा कि—
- यह प्रावधान न्यायालय को लचीलापन (Flexibility) प्रदान करता है,
- ताकि कठोर तकनीकी अनुपालन से उत्पन्न अन्याय को रोका जा सके।
धारा 20 का मूल उद्देश्य यही है कि न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार उचित और न्यायसंगत समाधान दे सके।
पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत (Judicial Precedents)
उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि—
- केवल मूल्य वृद्धि के आधार पर विशिष्ट निष्पादन से इनकार नहीं किया जा सकता,
- किंतु अत्यधिक विलंब और असाधारण मूल्य वृद्धि की स्थिति में
राहत को संशोधित किया जा सकता है।
यह दृष्टिकोण न्यायपालिका की संतुलित और व्यावहारिक सोच को दर्शाता है।
विक्रेता और क्रेता—दोनों के हितों का संरक्षण
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि—
- विक्रेता को अनुबंध से मुकरने की खुली छूट नहीं दी जा सकती,
- और न ही क्रेता को अनुचित लाभ उठाने दिया जा सकता है।
इस प्रकार, न्यायालय ने दोनों पक्षों के हितों के मध्य संतुलन स्थापित किया।
न्यायिक विवेक और नैतिक न्याय
यह निर्णय इस बात पर बल देता है कि—
न्याय केवल कानून की शब्दावली का अनुपालन नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित नैतिक उद्देश्य की पूर्ति है।
यदि कानून का यांत्रिक प्रयोग किसी पक्ष को अत्यधिक नुकसान या लाभ पहुँचा रहा हो, तो न्यायालय का कर्तव्य है कि वह हस्तक्षेप करे।
समकालीन संदर्भ में निर्णय का महत्व
वर्तमान समय में—
- दीवानी वादों में अत्यधिक विलंब,
- रियल एस्टेट मूल्यों में तीव्र वृद्धि,
- और पुराने समझौतों के प्रवर्तन की बढ़ती प्रवृत्ति
को देखते हुए यह निर्णय अत्यंत प्रासंगिक है।
यह फैसला निचली अदालतों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
Sunder Lal & Ors. v. Cholar Ram (2025) का निर्णय विशिष्ट निष्पादन के क्षेत्र में एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह स्पष्ट करता है कि—
- विशिष्ट निष्पादन कोई कठोर अधिकार नहीं,
- बल्कि न्यायालय का विवेकाधीन उपाय है,
- जिसका प्रयोग परिस्थितियों के अनुरूप किया जाना चाहिए।
मूल्य वृद्धि और लंबे समय के अंतराल की स्थिति में राहत को “मोल्ड” करना न्यायालय की उस संवेदनशील भूमिका को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य केवल संविदा को लागू करना नहीं, बल्कि न्याय को जीवंत और सार्थक बनाना है।
यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि कानून का उद्देश्य सौदेबाजी का लाभ नहीं, बल्कि न्याय का संतुलन है।