“लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर बिना न्यायालयीय प्रतिबंध के पासपोर्ट नवीनीकरण से इंकार नहीं किया जा सकता”
— सुप्रीम कोर्ट का नागरिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने वाला ऐतिहासिक निर्णय
मामले का नाम:
महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ
Civil Appeal No. 015096/2025
न्यायालय:
भारत का सर्वोच्च न्यायालय (SUPREME COURT OF INDIA)
पीठ:
माननीय न्यायमूर्ति जस्टिस नाथ
प्रस्तावना
पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और वैश्विक पहचान का प्रतीक है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल देश की सीमाओं के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आवागमन की स्वतंत्रता से भी जुड़ा हुआ है।
इसी मौलिक सिद्धांत को केंद्र में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी निर्णय में स्पष्ट किया है कि—
“केवल इस आशंका के आधार पर कि कोई व्यक्ति पासपोर्ट का दुरुपयोग कर सकता है, जबकि उस पर कोई न्यायालयीय प्रतिबंध नहीं है, पासपोर्ट के नवीनीकरण से इंकार नहीं किया जा सकता।”
यह निर्णय Mahesh Kumar Agarwal v. Union of India मामले में दिया गया, जिसने पासपोर्ट प्राधिकरणों की सीमाओं, न्यायिक विवेक और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता महेश कुमार अग्रवाल एक भारतीय नागरिक हैं, जिनके विरुद्ध कुछ आपराधिक मामले लंबित थे। ये मामले अभी विचाराधीन (sub judice) थे और—
- किसी भी न्यायालय ने
- उन्हें देश छोड़ने से नहीं रोका था
- न ही पासपोर्ट रखने या नवीनीकरण पर कोई प्रतिबंध लगाया था
इसके बावजूद, जब अपीलकर्ता ने अपने पासपोर्ट के नवीनीकरण (renewal) के लिए आवेदन किया, तो संबंधित पासपोर्ट प्राधिकरण ने यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया कि—
- लंबित आपराधिक मामलों के कारण
- यह आशंका है कि
- अपीलकर्ता विदेश जाकर कानून से बच सकता है
इस निर्णय को चुनौती देते हुए मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मूलतः यह कानूनी प्रश्न था—
क्या पासपोर्ट प्राधिकरण केवल लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर, बिना किसी न्यायालयीय आदेश या प्रतिबंध के, पासपोर्ट के नवीनीकरण से इंकार कर सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का सशक्त और स्पष्ट दृष्टिकोण
माननीय जस्टिस नाथ, जिन्होंने यह निर्णय लिखा, ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा—
“केवल इस अनुमान या आशंका के आधार पर कि अपीलकर्ता पासपोर्ट का दुरुपयोग कर सकता है, नवीनीकरण से इंकार करना वस्तुतः आपराधिक न्यायालयों के जोखिम मूल्यांकन (assessment of risk) को दरकिनार करना है।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि—
“ऐसा करना पासपोर्ट प्राधिकरण को एक ऐसा पर्यवेक्षी (supervisory) अधिकार प्रदान करना होगा, जिसकी कल्पना स्वयं क़ानून ने नहीं की है।”
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और उसकी सीमाएँ
न्यायालय ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा—
- अधिनियम में पासपोर्ट जारी करने, निलंबन और निरस्तीकरण के स्पष्ट आधार दिए गए हैं
- लेकिन—
- लंबित आपराधिक मामला मात्र
- स्वतः पासपोर्ट न देने या नवीनीकरण से इंकार करने का आधार नहीं है
महत्वपूर्ण बिंदु:
- यदि कोई व्यक्ति—
- जमानत पर है
- और न्यायालय ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है
- तो कार्यपालिका (Executive) को
- न्यायालय के निर्णय पर संदेह करने का अधिकार नहीं है
“Speculative Apprehension” पर कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने पासपोर्ट प्राधिकरण के तर्कों को “speculative apprehension” (अटकलबाज़ी पर आधारित आशंका) बताते हुए कहा—
“ऐसी अटकलों के आधार पर नागरिक अधिकारों को सीमित करना कानून के शासन (Rule of Law) के विपरीत है।”
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- आपराधिक न्यायालय
- जमानत देते समय
- जोखिम का मूल्यांकन करते हैं
- यदि न्यायालय को लगता कि
- अभियुक्त के विदेश जाने से न्याय में बाधा आएगी
- तो वह स्वयं प्रतिबंध लगा सकता है
न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका की सीमाएँ
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक संतुलन पर भी ज़ोर दिया—
- न्यायपालिका का कार्य है—
- अपराध और अभियुक्त के बीच संतुलन बनाना
- कार्यपालिका (पासपोर्ट प्राधिकरण)—
- न्यायालय के निर्णयों को
- चुनौती देने या उनसे आगे बढ़ने का अधिकार नहीं रखती
“जब न्यायालय ने कोई रोक नहीं लगाई, तो कार्यपालिका द्वारा स्वयं रोक लगाना संवैधानिक अनुशासन के विरुद्ध है।”
अनुच्छेद 21 और अंतरराष्ट्रीय यात्रा का अधिकार
न्यायालय ने पुनः दोहराया कि—
- पासपोर्ट से वंचित करना
- व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है
- और यह स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 21 के संरक्षण में आती है
“विदेश यात्रा का अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है, लेकिन इसे केवल विधि द्वारा और न्यायसंगत प्रक्रिया के माध्यम से ही सीमित किया जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने—
- अपील स्वीकार की
- पासपोर्ट प्राधिकरण के निर्णय को निरस्त किया
- और निर्देश दिया कि—
- अपीलकर्ता का पासपोर्ट नवीनीकरण किया जाए,
- जब तक कि
- किसी सक्षम न्यायालय द्वारा
- कोई स्पष्ट प्रतिबंध न लगाया गया हो
निर्णय का व्यापक प्रभाव
इस फैसले के दूरगामी प्रभाव होंगे—
1. आम नागरिकों के लिए राहत
- जिनके विरुद्ध मामूली या लंबित मामले हैं
- लेकिन कोई कोर्ट प्रतिबंध नहीं है
2. पासपोर्ट प्राधिकरणों के लिए स्पष्ट दिशा
- अब वे—
- “आशंका” या “संभावना” के आधार पर
- निर्णय नहीं ले सकेंगे
3. न्यायिक सर्वोच्चता की पुनः पुष्टि
- न्यायालय का आदेश
- कार्यपालिका पर सर्वोपरि रहेगा
“सत्यमेव जयते” — संविधान की आत्मा का सम्मान
यह निर्णय केवल एक पासपोर्ट विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि—
- यह संवैधानिक मूल्यों,
- नागरिक गरिमा,
- और न्यायिक अनुशासन
का सशक्त उद्घोष है।
“सत्यमेव जयते”
— सत्य और कानून की जीत,
जहाँ नागरिक अधिकारों को
अटकलों की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।
निष्कर्ष
महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ का यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया एक मील का पत्थर है, जो स्पष्ट करता है कि—
“न्यायालय की अनुमति के बिना, केवल लंबित मामलों के आधार पर किसी नागरिक की अंतरराष्ट्रीय पहचान और स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता।”
यह फैसला न केवल कानून का सही अर्थ स्पष्ट करता है, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक और राज्य के बीच संतुलन को भी मजबूती प्रदान करता है।