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रिम्स के लिए अधिग्रहित भूमि पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण: प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और जनहित पर झारखंड उच्च न्यायालय का सख्त रुख

रिम्स के लिए अधिग्रहित भूमि पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण: प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और जनहित पर झारखंड उच्च न्यायालय का सख्त रुख


भूमिका

       भूमि अधिग्रहण का उद्देश्य प्रायः जनहित से जुड़ा होता है—विशेषकर जब वह अधिग्रहण किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान के लिए किया गया हो। झारखंड राज्य में स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (RIMS) राज्य का प्रमुख चिकित्सा संस्थान है, जो न केवल झारखंड बल्कि आसपास के राज्यों की जनता को भी स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता है। ऐसे में इस संस्थान के लिए अधिग्रहित भूमि पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य और सार्वजनिक हित पर भी सीधा आघात है।

      इसी गंभीर पृष्ठभूमि में झारखंड उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कठोर आदेश पारित करते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को निर्देश दिया है कि वह उन गलत अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करे और विस्तृत जांच करे, जिन्होंने रिम्स के लिए अधिग्रहित भूमि पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण की अनुमति दी।

     यह निर्णय प्रशासनिक जवाबदेही, भ्रष्टाचार के विरुद्ध न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका और सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा के सिद्धांत को मजबूती प्रदान करता है।


मामले की पृष्ठभूमि

       राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (RIMS), रांची के विस्तार और विकास के उद्देश्य से वर्षों पूर्व बड़ी मात्रा में भूमि का अधिग्रहण किया गया था। इस भूमि का उद्देश्य अस्पताल भवनों, मेडिकल कॉलेज, छात्रावास, शोध संस्थानों और अन्य स्वास्थ्य अवसंरचना के निर्माण के लिए था।

हालाँकि, समय के साथ यह सामने आया कि अधिग्रहित भूमि के एक बड़े हिस्से पर—

  • अवैध निर्माण कर लिए गए,
  • निजी व्यक्तियों द्वारा अतिक्रमण किया गया,
  • और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों ने या तो आँखें मूँद लीं या सक्रिय रूप से इसकी अनुमति दे दी।

इस स्थिति ने न केवल रिम्स के विकास को बाधित किया, बल्कि यह भी दर्शाया कि किस प्रकार सार्वजनिक भूमि पर निजी स्वार्थों को संरक्षण दिया गया।


याचिका और न्यायालय का संज्ञान

इस गंभीर अनियमितता के विरुद्ध उच्च न्यायालय के समक्ष जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई। याचिका में यह आरोप लगाया गया कि—

  1. रिम्स के लिए अधिग्रहित भूमि पर जानबूझकर अवैध निर्माण होने दिया गया।
  2. संबंधित राजस्व, नगर विकास और प्रशासनिक अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का उल्लंघन किया।
  3. इस पूरे प्रकरण में भ्रष्टाचार और मिलीभगत की प्रबल आशंका है।

न्यायालय ने इस याचिका को अत्यंत गंभीरता से लिया और राज्य सरकार से विस्तृत जवाब माँगा।


न्यायालय का विश्लेषण

झारखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विस्तार से विचार किया—

1. अधिग्रहित भूमि का सार्वजनिक चरित्र

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब कोई भूमि किसी सार्वजनिक संस्थान, विशेषकर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संस्थान के लिए अधिग्रहित की जाती है, तो उसका उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। उस भूमि पर किसी भी प्रकार का निजी निर्माण या अतिक्रमण कानूनन अस्वीकार्य है।

2. अधिकारियों की संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी

न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी केवल पदधारी नहीं होते, बल्कि वे—

  • संविधान के प्रति उत्तरदायी होते हैं,
  • जनता के विश्वास के संरक्षक होते हैं,
  • और सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है।

यदि अधिकारी जानबूझकर अवैध गतिविधियों को अनुमति देते हैं, तो यह कर्तव्य की अवहेलना और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

3. मौन स्वीकृति भी अपराध

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि—

यदि अधिकारी अवैध निर्माण के विरुद्ध कार्रवाई नहीं करते, तो उनकी निष्क्रियता भी सक्रिय सहयोग के समान मानी जाएगी।

अर्थात् केवल आदेश देकर अनुमति देना ही नहीं, बल्कि अवैध निर्माण को रोकने में विफल रहना भी दंडनीय है।


भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को निर्देश

इस प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए झारखंड उच्च न्यायालय ने—

  • भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को निर्देश दिया कि वह
    • संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करे,
    • पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करे,
    • और यह पता लगाए कि
      • किस अधिकारी ने अनुमति दी,
      • किसने आँख मूँदी,
      • और किसे इस अवैधता से लाभ पहुँचा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जांच केवल औपचारिकता न हो, बल्कि वास्तविक दोषियों तक पहुँचना सुनिश्चित किया जाए।


संवैधानिक और विधिक आधार

यह निर्णय कई संवैधानिक और विधिक सिद्धांतों पर आधारित है—

1. अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार

यदि आम नागरिक अवैध निर्माण करे तो उस पर कार्रवाई होती है, तो अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों को छूट देना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

2. अनुच्छेद 21 – जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार

रिम्स जैसी संस्था का विकास बाधित होना सीधे तौर पर नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार को प्रभावित करता है।

3. लोक सेवक आचरण और भ्रष्टाचार निवारण कानून

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोक सेवकों द्वारा पद का दुरुपयोग एक गंभीर अपराध है।


पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत

न्यायालय का यह रुख पूर्व के कई महत्वपूर्ण निर्णयों के अनुरूप है, जिनमें कहा गया है कि—

  • सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है।
  • सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना न्यायपालिका का कर्तव्य है।

सुप्रीम कोर्ट भी अनेक मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि जनहित से जुड़ी परियोजनाओं में भ्रष्टाचार राष्ट्रहित के विरुद्ध अपराध के समान है।


व्यावहारिक और सामाजिक प्रभाव

इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव हैं—

1. प्रशासनिक अधिकारियों में संदेश

अब अधिकारी यह नहीं कह सकेंगे कि “ऊपर से आदेश थे” या “हमें जानकारी नहीं थी”। जवाबदेही तय होगी।

2. सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा

यह फैसला सरकारी भूमि पर हो रहे अतिक्रमण के विरुद्ध एक मजबूत कानूनी हथियार बनेगा।

3. स्वास्थ्य अवसंरचना का संरक्षण

रिम्स जैसे संस्थानों का निर्बाध विकास सुनिश्चित होगा, जिससे आम जनता को लाभ मिलेगा।

4. भ्रष्टाचार के विरुद्ध विश्वास

न्यायपालिका के इस सक्रिय रुख से जनता का न्याय प्रणाली में विश्वास और मजबूत होगा।


आलोचनात्मक दृष्टिकोण

हालाँकि यह आदेश अत्यंत स्वागतयोग्य है, परंतु—

  • जांच की गति और निष्पक्षता
  • दोषियों के विरुद्ध वास्तविक दंड
  • और अवैध निर्माण को हटाने की ठोस कार्रवाई

इन सभी पहलुओं पर निरंतर निगरानी आवश्यक होगी, ताकि यह आदेश केवल कागज़ी न रह जाए।


निष्कर्ष

      झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा रिम्स के लिए अधिग्रहित भूमि पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण की अनुमति देने वाले गलत अधिकारियों के विरुद्ध ACB जांच का आदेश, भारतीय प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था में एक सशक्त और साहसिक हस्तक्षेप है।

यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि—

सार्वजनिक हित, जनस्वास्थ्य और कानून के शासन के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है।

       न्यायालय ने यह सिद्ध कर दिया है कि भ्रष्टाचार चाहे किसी भी स्तर पर हो, उसे उजागर करना और दंडित करना न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व है। यह फैसला न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के लिए एक नजीर के रूप में देखा जाएगा, जो प्रशासनिक जवाबदेही और जनहित की रक्षा के सिद्धांत को और अधिक मजबूत करता है।