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“रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि का सुधार समीक्षा नहीं है” — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का विस्तृत और मार्गदर्शक निर्णय

“रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि का सुधार समीक्षा नहीं है” — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का विस्तृत और मार्गदर्शक निर्णय

        भारतीय न्यायिक व्यवस्था में न्यायिक आदेशों की अंतिमता (Finality of Judgments) और रिकॉर्ड की शुद्धता (Accuracy of Record)—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। इसी संतुलन को स्पष्ट करते हुए Punjab and Haryana High Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह साफ किया है कि—

यदि रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष त्रुटि (Error Apparent on the Face of Record) हो, और निचली अदालत उसे स्वयं (Suo Motu) संज्ञान लेकर ठीक कर दे, तो इसे अपने ही आदेश की ‘समीक्षा’ नहीं माना जा सकता।

       यह निर्णय केवल तकनीकी कानूनी बिंदु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निचली अदालतों की शक्तियों, समीक्षा अधिकार की सीमाओं, और न्यायिक अनुशासन को गहराई से समझने के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।


निर्णय की पृष्ठभूमि

इस मामले में विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब—

  • एक निचली अदालत ने अपने ही पूर्व आदेश में
  • रिकॉर्ड के आधार पर मौजूद एक स्पष्ट त्रुटि को
  • स्वतः संज्ञान लेते हुए सुधार दिया

इसके विरुद्ध यह तर्क उठाया गया कि—

  • निचली अदालत ने अपने ही आदेश की समीक्षा कर दी
  • जबकि कानून के अनुसार समीक्षा केवल सीमित परिस्थितियों में और विधिवत याचिका पर ही की जा सकती है
  • बिना समीक्षा याचिका के आदेश में परिवर्तन अधिकार क्षेत्र से बाहर है

याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।


हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न

हाईकोर्ट के सामने मूल प्रश्न यह था—

क्या रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि को सुधारना ‘Review of Order’ के समान है, या यह न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) के अंतर्गत आता है?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि—

  • यदि हर सुधार को समीक्षा माना जाए
  • तो अदालतें छोटी-छोटी तकनीकी गलतियों को भी ठीक नहीं कर पाएंगी
  • और पक्षकारों को अनावश्यक अपीलों व मुकदमेबाजी का सामना करना पड़ेगा

“रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि” की अवधारणा

हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि—

 रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि क्या होती है?

ऐसी गलती—

  • जो रिकॉर्ड को देखने मात्र से स्पष्ट हो जाए
  • जिसके लिए
    • लंबी बहस
    • जटिल तर्क
    • या कानून की गहरी व्याख्या

की आवश्यकता न हो।

उदाहरण—

  • आदेश में गलत धारा का उल्लेख
  • गलत तारीख या वर्ष
  • गणना में स्पष्ट गलती
  • किसी स्वीकृत तथ्य को गलती से छोड़ देना

अदालत ने कहा कि—

ऐसी त्रुटियों को ठीक करना न्यायिक प्रक्रिया को शुद्ध करने का कार्य है, न कि आदेश पर पुनर्विचार।


समीक्षा (Review) और सुधार (Correction) के बीच स्पष्ट अंतर

हाईकोर्ट ने बहुत सटीक शब्दों में दोनों अवधारणाओं को अलग-अलग किया—

 सुधार (Correction)

  • केवल रिकॉर्ड की स्पष्ट गलती को ठीक करना
  • आदेश के मूल निष्कर्ष को नहीं बदलना
  • किसी नए तथ्य या साक्ष्य पर विचार नहीं करना
  • न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति के अंतर्गत

 समीक्षा (Review)

  • आदेश की वैधता या सही-गलत पर पुनर्विचार
  • नए तर्क या साक्ष्य पर विचार
  • निष्कर्ष में परिवर्तन
  • केवल वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत सीमित परिस्थितियों में

अदालत ने स्पष्ट कहा—

“हर सुधार समीक्षा नहीं है। सुधार और समीक्षा को एक समान मानना कानून की गलत समझ होगी।”


निचली अदालत की स्वतः संज्ञान (Suo Motu) शक्ति

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने निचली अदालतों की Suo Motu Power को भी स्पष्ट रूप से मान्यता दी।

हाईकोर्ट ने कहा—

  • यदि अदालत को स्वयं यह प्रतीत हो कि
    • उसके आदेश में
    • रिकॉर्ड के आधार पर
    • कोई स्पष्ट त्रुटि है

तो—

  • वह बिना किसी पक्षकार के आवेदन के भी
  • स्वतः संज्ञान लेकर
  • उस गलती को सुधार सकती है

यह शक्ति—

  • न्याय के हित में
  • न्यायिक समय की बचत के लिए
  • और अनावश्यक अपीलों से बचने के लिए

अत्यंत आवश्यक है।


क्यों इसे समीक्षा नहीं माना जा सकता?

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी रेखांकित किया कि—

  • समीक्षा का अर्थ है
    • आदेश की आत्मा (Substance) पर पुनर्विचार

जबकि इस मामले में—

  • आदेश की आत्मा जस की तस रही
  • केवल तकनीकी या रिकॉर्ड आधारित गलती सुधारी गई
  • कोई नया निष्कर्ष नहीं निकाला गया

इसलिए—

निचली अदालत द्वारा किया गया सुधार, अपने ही आदेश की समीक्षा नहीं कहा जा सकता।


आपराधिक और दीवानी मामलों में प्रभाव

यह निर्णय—

  • सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC)
  • दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)

दोनों के अंतर्गत आने वाले मामलों पर समान रूप से लागू होगा।

विशेष रूप से—

  • जहां टाइपिंग एरर
  • गणना की गलती
  • या रिकॉर्ड से विपरीत उल्लेख

हो गया हो, वहां अदालतें—

  • सुधार कर सकती हैं
  • बिना यह डर किए कि उन पर समीक्षा का आरोप लगेगा

अधिवक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश

हाईकोर्ट का यह फैसला अधिवक्ताओं के लिए भी एक स्पष्ट संदेश देता है—

  • हर सुधार को समीक्षा बताकर चुनौती देना उचित नहीं
  • यदि गलती रिकॉर्ड पर स्पष्ट है, तो
    • अदालत का सुधार वैध है

यह निर्णय—

  • अनावश्यक याचिकाओं
  • और तकनीकी आपत्तियों

पर रोक लगाने में सहायक होगा।


निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शन

यह फैसला निचली अदालतों के लिए भी मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है—

  • वे स्पष्ट त्रुटियों को सुधार सकती हैं
  • लेकिन उन्हें सावधानी रखनी होगी कि—
    • सुधार के नाम पर आदेश की मूल भावना न बदली जाए

यदि—

  • सुधार आदेश की आत्मा बदल देता है
  • या निष्कर्ष को पलट देता है

तो—

  • वह वास्तव में समीक्षा या पुनर्विचार होगा, जो बिना वैधानिक अनुमति के संभव नहीं।

न्यायिक अनुशासन और संतुलन

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में संतुलन बनाते हुए कहा कि—

  • अदालतें
    • सुधार और समीक्षा की सीमाओं का सम्मान करें
  • सुधार केवल
    • स्पष्ट
    • तकनीकी
    • और रिकॉर्ड आधारित

त्रुटियों तक सीमित रहे।


आम नागरिक के लिए इसका महत्व

इस निर्णय का लाभ आम नागरिकों को भी मिलता है—

  • छोटी गलतियों के कारण
    • लंबी अपील प्रक्रिया से बचाव
  • न्याय में अनावश्यक देरी कम
  • खर्च और मानसिक तनाव में कमी

इससे—

  • न्याय अधिक सुलभ, तेज और प्रभावी बनता है।

निष्कर्ष

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्पष्टता प्रदान करता है।

इस फैसले का सार यह है कि—

“रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि को सुधारना, अपने ही आदेश की समीक्षा नहीं है। निचली अदालत द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुए अपनी गलती सुधारना न्यायिक अनुशासन और न्याय के हित में है।”

यह निर्णय—

  • न्यायालयों की कार्यक्षमता बढ़ाता है
  • तकनीकी बाधाओं को कम करता है
  • और न्यायिक प्रणाली में जनता के विश्वास को सुदृढ़ करता है

निस्संदेह, आने वाले समय में यह फैसला रिकॉर्ड आधारित त्रुटियों, समीक्षा अधिकार, और निचली अदालतों की शक्तियों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल (Judicial Precedent) के रूप में उद्धृत किया जाएगा।