राजस्थान का सबसे चर्चित एनकाउंटर — आनंदपाल केस में सीबीआई कोर्ट का आदेश रद्द, पुलिस अधिकारियों को मिली बड़ी राहत: जोधपुर सत्र न्यायालय ने कहा ‘ड्यूटी के दौरान आत्मरक्षा में चली गोली’
राजस्थान के इतिहास में अपराध और कानून प्रवर्तन की दुनिया में “आनंदपाल सिंह एनकाउंटर केस” एक ऐसा नाम बन गया है जिसने वर्षों तक सुर्खियाँ बटोरीं। यह मामला केवल एक अपराधी के एनकाउंटर का नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई की वैधता, न्यायिक प्रक्रिया और जनभावनाओं के बीच के संघर्ष का प्रतीक बन गया था। अब जोधपुर जिला एवं सत्र न्यायालय के हालिया निर्णय ने इस केस को एक नई दिशा दे दी है। अदालत ने एनकाउंटर में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि आनंदपाल को लगी गोली आत्मरक्षा में चली थी और यह पुलिसकर्मियों द्वारा ड्यूटी निभाते समय की गई वैध कार्रवाई थी।
पृष्ठभूमि: आनंदपाल सिंह कौन था?
आनंदपाल सिंह राजस्थान के नागौर जिले का रहने वाला एक कुख्यात अपराधी था, जो 2000 के दशक में राज्यभर में अपराधों की दुनिया में तेजी से उभरा। उसके खिलाफ हत्या, लूट, धमकी, रंगदारी और हथियारों की तस्करी जैसे कई गंभीर आरोप दर्ज थे। राजस्थान पुलिस ने उस पर कई बार दबिश डाली, लेकिन वह बार-बार पुलिस गिरफ्त से बच निकलता था।
आनंदपाल ने अपने प्रभाव और नेटवर्क के बल पर खुद को एक “गैंग लीडर” के रूप में स्थापित कर लिया था। कहा जाता है कि उसके गैंग में राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश तक के लोग शामिल थे। धीरे-धीरे वह राज्य का सबसे वांछित अपराधी बन गया। सरकार ने उस पर ₹5 लाख का इनाम भी घोषित किया था।
एनकाउंटर की रात: जून 2017 की घटना
24 जून 2017 की रात चूरू जिले के मालासर गांव में राजस्थान पुलिस की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) और आनंदपाल के बीच मुठभेड़ हुई। पुलिस के अनुसार, आनंदपाल ने सरेंडर करने से इनकार किया और गोलीबारी शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने भी फायरिंग की, जिसमें आनंदपाल मारा गया।
हालांकि, एनकाउंटर के तुरंत बाद ही सवाल उठने लगे। परिजनों और समर्थकों ने आरोप लगाया कि यह “फेक एनकाउंटर” था और आनंदपाल को जानबूझकर मारा गया। राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हुए और पूरे राजस्थान में सामाजिक तनाव फैल गया। सरकार ने स्थिति को देखते हुए एनकाउंटर की जांच सीबीआई को सौंप दी।
सीबीआई जांच और आरोपपत्र
सीबीआई ने जांच के बाद एनकाउंटर में शामिल सात पुलिस अधिकारियों के खिलाफ धारा 302 (हत्या) और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। एसीजेएम सीबीआई कोर्ट, जोधपुर ने इन अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन का प्रसंज्ञान लेते हुए ट्रायल की प्रक्रिया शुरू की।
पुलिस अधिकारियों ने इस आदेश को चुनौती दी और कहा कि उन्होंने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया था और आनंदपाल ने पहले फायरिंग की थी, जिससे आत्मरक्षा में गोली चलाई गई। उन्होंने रिवीजन याचिका जिला एवं सत्र न्यायालय में दायर की।
जोधपुर सत्र न्यायालय का निर्णय
जोधपुर जिला एवं सत्र न्यायालय के न्यायाधीश अजय कुमार शर्मा ने शुक्रवार को इस बहुचर्चित मामले में अपना फैसला सुनाया। अदालत ने सीबीआई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें पुलिस अधिकारियों के खिलाफ धारा 302 के तहत प्रसंज्ञान लिया गया था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि —
“पुलिस अधिकारी अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे और उन्हें आनंदपाल की ओर से जान का खतरा था। आत्मरक्षा के अधिकार के तहत गोली चलाना भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता।”
इस निर्णय से एनकाउंटर में शामिल सभी सात पुलिस अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ड्यूटी के दौरान आत्मरक्षा में की गई फायरिंग को अपराध नहीं कहा जा सकता।
फैसले का कानूनी विश्लेषण
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 96 से 106 तक आत्मरक्षा के अधिकार को मान्यता देती है। यदि कोई व्यक्ति अपनी या दूसरों की जान बचाने के लिए उचित सीमा में बल प्रयोग करता है, तो उसे अपराध नहीं माना जाता।
अदालत ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी जब ड्यूटी पर होते हैं, तो उन्हें अपने और दूसरों के जीवन की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है। यदि किसी स्थिति में अपराधी गोली चलाता है, तो जवाबी कार्रवाई में गोली चलाना आत्मरक्षा के अंतर्गत आता है, न कि हत्या के अंतर्गत।
इस फैसले से न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्यरत पुलिसकर्मियों को उनके वैध कार्यों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बशर्ते कि उन्होंने अपनी शक्ति का दुरुपयोग न किया हो।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
फैसले के बाद पुलिस महकमे में राहत और संतोष का माहौल देखा गया। कई अधिकारियों ने कहा कि यह निर्णय कानून की जीत है और उन पुलिसकर्मियों के सम्मान की बहाली है जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर राज्य की सुरक्षा की।
वहीं, आनंदपाल के परिजनों ने इस फैसले पर नाराजगी जताई और कहा कि वे उच्च न्यायालय में अपील करेंगे। उनका कहना है कि जांच में कई बिंदुओं की अनदेखी की गई है।
सामाजिक रूप से यह फैसला एक बार फिर उस बहस को जन्म देता है कि क्या पुलिस एनकाउंटर कानून की सीमाओं में रहकर किए जाते हैं या वे न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना हैं।
महत्वपूर्ण कानूनी प्रभाव
इस फैसले का प्रभाव केवल आनंदपाल केस तक सीमित नहीं रहेगा। यह आने वाले समय में अन्य एनकाउंटर मामलों में एक उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सकता है। अदालत ने साफ किया है कि पुलिस की कार्रवाई को “हत्या” नहीं कहा जा सकता यदि वह ड्यूटी के दौरान आत्मरक्षा के तहत की गई हो।
यह निर्णय न्यायिक दृष्टि से पुलिस अधिकारियों के मनोबल को भी मजबूत करेगा और साथ ही यह संकेत देगा कि न्यायालय पुलिस की वैध कार्रवाई को संरक्षण प्रदान करता है।
निष्कर्ष
आनंदपाल एनकाउंटर केस में जोधपुर जिला एवं सत्र न्यायालय का यह फैसला राजस्थान की न्यायिक और पुलिस व्यवस्था दोनों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। अदालत ने न केवल पुलिस अधिकारियों को राहत दी है, बल्कि आत्मरक्षा के अधिकार की न्यायिक व्याख्या को भी स्पष्ट किया है।
यह निर्णय एक तरफ पुलिस के आत्मविश्वास को बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी संदेश देता है कि यदि कोई कार्रवाई कर्तव्यनिष्ठा और कानून की सीमाओं में रहकर की जाती है, तो उसे अपराध नहीं कहा जा सकता।
आनंदपाल केस ने जहां वर्षों तक विवाद और राजनीति को जन्म दिया, वहीं अब इस फैसले के बाद कानून के दायरे में “न्याय” की नई व्याख्या सामने आई है।
सारांश:
- अदालत: “आत्मरक्षा में चली गोली अपराध नहीं।”
- सीबीआई कोर्ट का आदेश रद्द।
- सात पुलिस अधिकारियों को राहत।
- परिजनों ने फैसले को चुनौती देने की बात कही।
- राजस्थान के सबसे चर्चित एनकाउंटर केस ने ली नई करवट।