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‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ बनाम डिजिटल अभिलेख: कंटेंट हटाने के आदेश के खिलाफ इंडियन कानूनी वेबसाइट की दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती

‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ बनाम डिजिटल अभिलेख: कंटेंट हटाने के आदेश के खिलाफ इंडियन कानूनी वेबसाइट की दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती

         डिजिटल युग में न्याय, निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर एक अहम कानूनी बहस फिर से केंद्र में आ गई है। ऑनलाइन कानूनी जानकारी मंच Indian Kanoon ने एक ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें “राइट टू बी फॉरगॉटन” (Right to be Forgotten) के आधार पर एक व्यक्ति से जुड़े पुराने समाचार लेखों और यूआरएल (URLs) को हटाने का निर्देश दिया गया था।

         यह व्यक्ति पहले Moser Baer से जुड़े PMLA (धन शोधन निवारण अधिनियम) मामले में आरोपी था, लेकिन बाद में उसे मेरिट पर बरी (discharged on merits) कर दिया गया। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने माना कि पुराने समाचारों की स्थायी ऑनलाइन उपलब्धता उसकी गरिमा और निजता को नुकसान पहुंचा रही है, इसलिए अंतरिम निषेधाज्ञा (interim injunction) जारी की गई।


मामले की पृष्ठभूमि

        यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब एक व्यक्ति, जिसे पहले एक हाई-प्रोफाइल आर्थिक अपराध मामले में आरोपी बनाया गया था, बाद में अदालत द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया।
उस व्यक्ति का तर्क था कि—

  • वह अब कानूनी रूप से निर्दोष है
  • लेकिन इंटरनेट पर उपलब्ध पुराने समाचार और रिपोर्ट्स उसे आज भी अपराधी के रूप में प्रस्तुत करती हैं
  • इससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, पेशेवर जीवन और मानसिक गरिमा प्रभावित हो रही है

       इसी आधार पर उसने ट्रायल कोर्ट का रुख किया और “राइट टू बी फॉरगॉटन” के सिद्धांत के तहत मीडिया संस्थानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट हटाने का निर्देश देने की मांग की।


ट्रायल कोर्ट का आदेश

        ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि—

  • जब कोई व्यक्ति आरोपों से बरी हो चुका हो, तो
  • पुराने आरोपों से जुड़े समाचारों की स्थायी डिजिटल मौजूदगी
  • उसकी गरिमा (Dignity) और निजता (Privacy) के अधिकार का उल्लंघन कर सकती है

      अदालत ने इस आधार पर Indian Kanoon सहित कई मीडिया संस्थानों को निर्देश दिया कि वे संबंधित लेखों और URLs को हटाएं या डी-इंडेक्स करें। इसे एक अंतरिम राहत के रूप में लागू किया गया।


Indian Kanoon की आपत्ति

       इस आदेश से असहमति जताते हुए Indian Kanoon ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपील में प्रमुख तर्क इस प्रकार हैं—

  1. कानूनी रिकॉर्ड का महत्व
    Indian Kanoon ने कहा कि वह पत्रकारिता नहीं, बल्कि न्यायिक और कानूनी रिकॉर्ड को सार्वजनिक रूप से सुलभ कराने का मंच है। अदालतों के आदेश, केस लॉ और उससे जुड़ी जानकारी को हटाना इतिहास और कानून की पारदर्शिता के खिलाफ है।
  2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
    यह तर्क दिया गया कि ऐसे आदेश अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति और सूचना की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।
  3. खतरनाक मिसाल
    यदि हर बरी व्यक्ति पुराने मामलों से जुड़ी जानकारी हटवाने लगे, तो न्यायिक पारदर्शिता और सार्वजनिक स्मृति (Public Memory) पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
  4. ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर सवाल
    Indian Kanoon का कहना है कि “राइट टू बी फॉरगॉटन” जैसे संवैधानिक और नीतिगत प्रश्नों पर ट्रायल कोर्ट को इतने व्यापक आदेश नहीं देने चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट की प्रारंभिक प्रतिक्रिया

       दिल्ली हाईकोर्ट ने Indian Kanoon की अपील पर नोटिस जारी कर दिया है, लेकिन फिलहाल ट्रायल कोर्ट के आदेश पर कोई स्थगन (Stay) देने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने अपने मौखिक अवलोकन में कहा कि—

  • इसी तरह के प्रश्न पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित हैं
  • दिल्ली हाईकोर्ट में भी ऐसे कई मामलों पर विचार चल रहा है
  • ऐसे में इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा

Indian Express के मामले का संदर्भ

         हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि इसी ट्रायल कोर्ट आदेश के खिलाफ Indian Express द्वारा दायर एक समान अपील पहले ही खारिज की जा चुकी है।
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने Indian Kanoon को भी फिलहाल राहत देने से परहेज किया।


‘राइट टू बी फॉरगॉटन’: एक उभरता कानूनी सिद्धांत

भारत में “राइट टू बी फॉरगॉटन” कोई स्पष्ट रूप से संहिताबद्ध अधिकार नहीं है, लेकिन इसे—

  • निजता के अधिकार
  • गरिमा के अधिकार
  • और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार

से जोड़ा जाता रहा है।

हालांकि, इसके विरोध में यह तर्क भी मजबूत है कि—

  • सार्वजनिक रिकॉर्ड और न्यायिक फैसले इतिहास का हिस्सा होते हैं
  • उन्हें मिटाना या छिपाना समाज के लिए खतरनाक हो सकता है

निजता बनाम पारदर्शिता की टकराहट

यह मामला एक बड़े संवैधानिक प्रश्न को जन्म देता है—

  • क्या दोषमुक्ति के बाद व्यक्ति को अपने अतीत से पूरी तरह “मिट जाने” का अधिकार है?
  • या फिर सार्वजनिक हित में ऐसी जानकारी उपलब्ध रहनी चाहिए?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस संतुलन को तय करना आसान नहीं है। मीडिया ट्रायल और डिजिटल आर्काइव्स की स्थायित्व ने इस बहस को और जटिल बना दिया है।


डिजिटल युग में न्यायिक स्मृति

आज इंटरनेट कभी नहीं भूलता। एक बार प्रकाशित जानकारी वर्षों तक खोज इंजनों और डेटाबेस में बनी रहती है।
Indian Kanoon जैसे प्लेटफॉर्म्स का तर्क है कि—

  • वे किसी को दोषी या निर्दोष घोषित नहीं करते
  • वे केवल अदालतों और मामलों की जानकारी उपलब्ध कराते हैं
  • निर्णय पढ़ने वाले पाठक स्वयं निष्कर्ष निकाल सकते हैं

आगे की राह

दिल्ली हाईकोर्ट में यह मामला अभी प्रारंभिक चरण में है। अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि—

  • अदालत निजता और गरिमा को कितनी प्राथमिकता देती है
  • और सार्वजनिक रिकॉर्ड व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैसे संतुलित करती है

संभव है कि इस मुद्दे पर अंततः सुप्रीम कोर्ट का मार्गदर्शन निर्णायक साबित हो।


निष्कर्ष

       Indian Kanoon बनाम कंटेंट हटाने का यह विवाद केवल एक वेबसाइट या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह डिजिटल भारत में न्याय, निजता और सूचना के अधिकार की सीमाओं को परिभाषित करने वाला मामला बन सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट का अंतिम फैसला यह तय करेगा कि—

  • “राइट टू बी फॉरगॉटन” भारत में किस हद तक लागू हो सकता है
  • और क्या डिजिटल न्यायिक अभिलेखों को मिटाना न्याय की पारदर्शिता के साथ संगत है या नहीं

यह मामला भविष्य में मीडिया, कानूनी प्लेटफॉर्म्स और आम नागरिक—सभी के लिए गहरे प्रभाव छोड़ने वाला साबित हो सकता है।