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यूएपीए और जमानत के सिद्धांत गुलफिशा फातिमा बनाम दिल्ली सरकार एवं दिल्ली दंगा साजिश मामला 

यूएपीए और जमानत के सिद्धांत गुलफिशा फातिमा बनाम दिल्ली सरकार एवं दिल्ली दंगा साजिश मामला 


प्रस्तावना

      भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र की आधारशिला माने जाने वाले सिद्धांत — “Bail is the rule, jail is the exception” — ने दशकों तक व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) की रक्षा की है। इस सिद्धांत का मूल उद्देश्य यह रहा है कि किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्धि से पूर्व स्वतंत्रता से वंचित करना असाधारण परिस्थिति में ही किया जाए। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करता है, और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (अब BNSS) इसी दर्शन पर आधारित रही है।

    किन्तु गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) इस परंपरागत न्यायिक दर्शन को मूल रूप से उलट देता है। UAPA के अंतर्गत जमानत की अवधारणा सामान्य आपराधिक कानून से भिन्न, कठोर और प्रतिबंधात्मक है। यहाँ स्वतंत्रता प्राथमिक सिद्धांत नहीं, बल्कि राज्य की सुरक्षा प्राथमिक मूल्य बन जाती है।

     दिल्ली दंगा साजिश मामला (FIR 59/2020), जिसमें गुलफिशा फातिमा, उमर खालिद, शरजील इमाम, देवांगना कलिता, नताशा नरवाल आदि पर UAPA के तहत आरोप लगाए गए, इस वैधानिक परिवर्तन का जीवंत उदाहरण बन चुका है। इन मामलों में न्यायालयों द्वारा अपनाई गई जमानत नीति यह स्पष्ट करती है कि UAPA के अंतर्गत जमानत न्यायिक विवेक का नहीं, वैधानिक प्रतिबंध का विषय है।


UAPA का दार्शनिक आधार (Philosophical Foundation of UAPA)

      UAPA की विधिक संरचना “निवारक न्याय” (Preventive Justice) की अवधारणा पर आधारित है। सामान्य दंड कानून अपराध घटित होने के बाद दंड देने पर केंद्रित होता है, जबकि UAPA संभावित खतरे, वैचारिक नेटवर्क, संगठित साजिश और राज्य-विरोधी संरचनाओं को प्रारंभिक अवस्था में ही कुचलने की रणनीति अपनाता है।

इसका मूल दर्शन यह मानता है कि:

“कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिनमें जोखिम सहन नहीं किया जा सकता।”

इसीलिए UAPA में:

  • साक्ष्य के मानक शिथिल हैं
  • जमानत के मानदंड कठोर हैं
  • न्यायिक समीक्षा सीमित है
  • अभियोजन को प्राथमिक सत्यता प्राप्त है

धारा 43D(5): जमानत पर वैधानिक प्रतिबंध का केंद्र

      UAPA की धारा 43D(5) इस पूरे कानून की आत्मा (soul provision) है। यह प्रावधान कहता है कि:

यदि केस डायरी या चार्जशीट के आधार पर अदालत को यह प्रतीत होता है कि आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोप prima facie सत्य प्रतीत होते हैं, तो जमानत नहीं दी जाएगी।

यह प्रावधान तीन स्तरों पर सामान्य कानून से भिन्न है:

(1) जमानत का उद्देश्य बदल जाता है

BNSS/CrPC में जमानत का उद्देश्य है:

  • उपस्थिति सुनिश्चित करना
  • न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग
  • गवाहों की सुरक्षा

UAPA में जमानत का उद्देश्य नहीं, बल्कि निरोध (detention) का उद्देश्य प्राथमिक हो जाता है।

(2) न्यायिक विवेक सीमित हो जाता है

न्यायाधीश की भूमिका मूल्यांकनकर्ता (evaluator) की नहीं, बल्कि केवल prima facie निरीक्षक (prima facie examiner) की रह जाती है।

(3) अभियोजन को संरचनात्मक बढ़त

State narrative को वैधानिक प्राथमिकता प्राप्त हो जाती है।


Watali Judgment (2019): UAPA जमानत कानून का संविधान

ज़हूर अहमद शाह वटाली बनाम NIA (2019) निर्णय ने UAPA जमानत प्रणाली को संवैधानिक स्वरूप प्रदान किया। यह निर्णय आज UAPA जमानत कानून का संविधान माना जाता है।

इस निर्णय के मुख्य सिद्धांत:

  1. अभियोजन साक्ष्य को सत्य मानने की बाध्यता
    जमानत स्तर पर पुलिस द्वारा प्रस्तुत सामग्री को “सही मानकर” देखा जाएगा।
  2. Admissibility का परीक्षण निषिद्ध
    अदालत यह नहीं देखेगी कि साक्ष्य कानूनी रूप से स्वीकार्य हैं या नहीं।
  3. Defence evidence निष्क्रिय
    बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार नहीं किया जाएगा।
  4. Mini-trial निषेध
    साक्ष्यों की गुणवत्ता, विरोधाभास, विश्वसनीयता की जांच वर्जित है।
  5. Prima facie संतुष्टि ही पर्याप्त
    केवल सतही संतुष्टि ही जमानत निषेध के लिए पर्याप्त है।

इस फैसले ने जमानत को न्यायिक अधिकार से हटाकर वैधानिक निषेधात्मक संरचना में बदल दिया।


दिल्ली दंगा साजिश मामला: कानूनी संरचना

दिल्ली पुलिस द्वारा 2020 दंगों को एक “स्पॉन्टेनियस हिंसा” नहीं बल्कि एक पूर्व-नियोजित संगठित साजिश के रूप में प्रस्तुत किया गया।

अभियोजन की कथा के अनुसार:

  • विरोध प्रदर्शन नेटवर्क
  • सोशल मीडिया समूह
  • समन्वित रणनीति
  • क्षेत्रीय ब्लॉकेज
  • प्रतीकात्मक नेतृत्व
  • भीड़ मनोविज्ञान (crowd psychology)
  • राजनीतिक दबाव निर्माण

इन सभी तत्वों को एक साजिश-श्रृंखला (Conspiracy Chain) के रूप में जोड़ा गया।


गुलफिशा फातिमा मामला: विधिक विश्लेषण

बचाव पक्ष का कानूनी आधार

  • अनुच्छेद 19 के अंतर्गत विरोध का अधिकार
  • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता
  • प्रत्यक्ष हिंसक कृत्य का अभाव
  • लंबे समय की न्यायिक हिरासत
  • ट्रायल में अत्यधिक विलंब
  • गवाहों की अनिश्चितता

अभियोजन पक्ष का वैधानिक ढांचा

  • संगठित साजिश का हिस्सा
  • गुप्त गवाह
  • नेटवर्किंग गतिविधियाँ
  • रणनीतिक नेतृत्व भूमिका
  • विरोध को अस्थिरता के उपकरण के रूप में उपयोग

न्यायालय का दृष्टिकोण

न्यायालय का विश्लेषण अधिकार आधारित नहीं बल्कि संरचनात्मक है:

“यदि चार्जशीट में साजिश का prima facie ढांचा मौजूद है → जमानत निषिद्ध”

यहां न्यायालय साक्ष्य नहीं परखता, कथा की संरचना परखता है।


Prima Facie सिद्धांत की न्यायिक व्याख्या

UAPA में “prima facie” का अर्थ सामान्य कानून से अलग है।

सामान्य अर्थ:

प्रथम दृष्टया आरोप संभाव्य प्रतीत हों

UAPA अर्थ:

अभियोजन कथा इतनी कमजोर न हो कि उसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जा सके

अर्थात — कमजोर साक्ष्य भी पर्याप्त हो सकते हैं


मानवाधिकार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा: संरचनात्मक टकराव

यह टकराव केवल वैचारिक नहीं, संवैधानिक संघर्ष है।

राज्य का वैधानिक तर्क:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च संवैधानिक मूल्य
  • सार्वजनिक व्यवस्था का संरक्षण
  • सामूहिक अधिकार > व्यक्तिगत अधिकार

नागरिक स्वतंत्रता का तर्क:

  • निर्दोषता का अनुमान (Presumption of Innocence)
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता
  • प्रक्रिया द्वारा दंड (Punishment by Process)
  • न्यायिक हिरासत = सामाजिक सजा

यह संघर्ष UAPA को कानूनी नहीं, दार्शनिक कानून बना देता है।


के.ए. नजीब सिद्धांत: संवैधानिक अपवाद

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“यदि ट्रायल में अत्यधिक विलंब हो और हिरासत असंगत हो जाए, तो अनुच्छेद 21 UAPA से ऊपर होगा।”

लेकिन दिल्ली दंगा मामलों में अदालतों का दृष्टिकोण:

  • जटिल केस
  • बहु-आरोपी
  • बहु-साक्ष्य
  • विशाल चार्जशीट
  • संरचनात्मक विलंब = असंवैधानिक विलंब नहीं

इसलिए नजीब सिद्धांत सीमित रह जाता है।


संरचनात्मक निष्कर्ष (Structural Conclusion)

गुलफिशा फातिमा एवं दिल्ली दंगा साजिश मामलों से यह सिद्ध होता है कि:

  1. UAPA में जमानत न्यायिक विवेक का विषय नहीं
  2. यह वैधानिक निषेध का क्षेत्र है
  3. अभियोजन कथा को संरचनात्मक प्राथमिकता है
  4. न्यायिक समीक्षा सीमित है
  5. स्वतंत्रता संवैधानिक नहीं, सशर्त मूल्य बन जाती है
  6. ट्रायल से पहले हिरासत ही सामाजिक दंड बन जाती है

अंतिम निष्कर्ष

वर्तमान भारतीय विधिक व्यवस्था में:

UAPA के तहत जमानत कानूनी प्रश्न नहीं, संवैधानिक संरचनात्मक समस्या है।

यह कानून:

  • अपराध को नहीं
  • व्यक्ति को नहीं
  • बल्कि जोखिम की संभावना को दंडित करता है।

यही कारण है कि UAPA में:

  • दोषसिद्धि से पहले सजा शुरू हो जाती है
  • न्यायिक प्रक्रिया ही दंड बन जाती है
  • स्वतंत्रता न्यायिक अधिकार नहीं, राज्य की कृपा बन जाती है

यदि भविष्य में कोई न्यायिक पुनर्संतुलन नहीं हुआ, तो:

“Bail is the rule” का सिद्धांत केवल पाठ्यपुस्तकों में रह जाएगा,
और
“Detention is the norm” भारतीय आतंकवाद कानून की वास्तविक पहचान बन जाएगी।