यदि दोषसिद्ध निदेशकों को स्वतः जमा से छूट दी जाए तो धारा 148 का विधायी उद्देश्य विफल हो जाएगा—सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का ऐतिहासिक निर्णय
प्रस्तावना
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 148 भारतीय आपराधिक-वाणिज्यिक न्यायशास्त्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह प्रावधान विशेष रूप से चेक अनादरण (Cheque Dishonour) से संबंधित मामलों में अपीलीय स्तर पर न्यायिक प्रक्रिया को संतुलित, प्रभावी और उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए अधिनियम में जोड़ा गया था।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि दोषसिद्ध (convicted) निदेशकों को केवल इस आधार पर कि वे कंपनी के निदेशक हैं, धारा 148 के तहत जमा राशि से स्वतः छूट दे दी जाए, तो इस प्रावधान का विधायी उद्देश्य (Legislative Purpose) ही विफल हो जाएगा।
यह निर्णय न केवल चेक अनादरण कानून की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि कॉरपोरेट अपराधों में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (personal liability) के सिद्धांत को भी सुदृढ़ करता है।
1. धारा 148 का विधायी इतिहास और उद्देश्य
(क) धारा 148 का समावेश
परक्राम्य लिखत अधिनियम में संशोधन अधिनियम, 2018 के माध्यम से धारा 148 को जोड़ा गया। इसका उद्देश्य था—
- चेक अनादरण मामलों में लंबित अपीलों की संख्या कम करना
- दोषसिद्ध अभियुक्तों द्वारा अपील को देरी का हथियार बनाए जाने से रोकना
- शिकायतकर्ता/पीड़ित को तत्काल आर्थिक राहत प्रदान करना
धारा 148 के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को धारा 138 के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया है और वह अपील दायर करता है, तो अपीलीय न्यायालय उसे न्यूनतम 20% प्रतिकर/जुर्माने की राशि जमा करने का निर्देश दे सकता है।
(ख) विधायी मंशा (Legislative Intent)
संसद की मंशा स्पष्ट थी कि—
- दोषसिद्ध अभियुक्त अपील के नाम पर अनावश्यक विलंब न करें
- पीड़ित पक्ष को न्याय की प्रक्रिया के दौरान अत्यधिक नुकसान न उठाना पड़े
- चेक की विश्वसनीयता (credibility of cheque) बनी रहे
2. विवाद का मूल प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि—
क्या किसी कंपनी के दोषसिद्ध निदेशक को, केवल इस आधार पर कि वह व्यक्तिगत रूप से चेक का ड्रॉअर नहीं है, धारा 148 के तहत जमा राशि से स्वतः छूट दी जा सकती है?
अर्थात, यदि कंपनी के साथ-साथ उसके निदेशक को भी दोषसिद्ध किया गया है, तो क्या निदेशक यह कह सकता है कि—
- वह केवल “प्रतिनिधि” है
- वास्तविक दायित्व कंपनी का है
- इसलिए उससे जमा राशि नहीं ली जानी चाहिए
3. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सख्ती से अस्वीकार करते हुए कहा:
“यदि दोषसिद्ध निदेशकों को स्वतः धारा 148 के तहत जमा से छूट दे दी जाए, तो इस प्रावधान का विधायी उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा।”
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- एक बार जब निदेशक को दोषसिद्ध कर दिया गया, तो वह केवल नाममात्र का प्रतिनिधि नहीं रह जाता
- दोषसिद्धि के पश्चात उसकी स्थिति अभियुक्त (convict) की होती है, न कि केवल एक कंपनी अधिकारी की
4. कंपनी और निदेशक : दायित्व का सिद्धांत
(क) धारा 141 NI Act का संदर्भ
धारा 141 के अनुसार, यदि कोई अपराध कंपनी द्वारा किया गया है, तो—
- कंपनी
- और वह प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध के समय कंपनी के कार्यों के लिए उत्तरदायी था
दोनों को दोषी ठहराया जा सकता है।
इसका अर्थ यह है कि निदेशक की जिम्मेदारी व्यक्तिगत और वैधानिक दोनों हो सकती है।
(ख) दोषसिद्धि के बाद स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- दोषसिद्धि के बाद यह तर्क देना कि “मैं केवल निदेशक हूँ” स्वीकार्य नहीं
- अपील दायर करने का अधिकार तो है, परंतु शर्तों के साथ
धारा 148 इसी संतुलन को स्थापित करती है।
5. धारा 148 : अनिवार्य या विवेकाधीन?
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि—
- धारा 148 में “may order” शब्द का प्रयोग हुआ है
- अर्थात, यह न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है
किन्तु—
- यह विवेक मनमाना नहीं हो सकता
- सामान्यतः, दोषसिद्ध अभियुक्त को जमा का आदेश दिया जाना चाहिए
- अपवाद केवल विशेष और असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है
6. दोषसिद्ध निदेशकों को छूट देने के दुष्परिणाम
सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक दृष्टि से कहा कि यदि स्वतः छूट दी जाए, तो—
- कंपनियाँ जानबूझकर निदेशकों के नाम पर अपीलें दायर करेंगी
- पीड़ित पक्ष को वर्षों तक कोई राहत नहीं मिलेगी
- धारा 138 का निरोधात्मक प्रभाव (deterrent effect) समाप्त हो जाएगा
- चेक का व्यावसायिक महत्व कमजोर पड़ जाएगा
7. पीड़ित/शिकायतकर्ता के अधिकारों की रक्षा
न्यायालय ने दोहराया कि—
- चेक अनादरण केवल निजी विवाद नहीं
- यह व्यापारिक विश्वास से जुड़ा विषय है
धारा 148 का उद्देश्य—
- दोषसिद्धि के बाद भी पीड़ित को न्यूनतम सुरक्षा देना
- ताकि अपील के लंबे समय में उसे पूर्णतः असहाय न छोड़ा जाए
8. आपराधिक न्याय में संतुलन की अवधारणा
सुप्रीम कोर्ट ने संतुलन स्थापित करते हुए कहा—
- अभियुक्त का अपील का अधिकार बना रहेगा
- परंतु यह अधिकार शर्तों के अधीन होगा
धारा 148 इस संतुलन का संवैधानिक और विधिक साधन है।
9. पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों से सामंजस्य
यह निर्णय पूर्व के कई फैसलों की निरंतरता में है, जिनमें कहा गया था कि—
- धारा 148 का प्रयोग सामान्य नियम है
- छूट अपवाद है
- दोषसिद्ध अभियुक्त को केवल अपील दायर करने से स्वतः संरक्षण नहीं मिलता
10. भविष्य पर प्रभाव (Prospective Impact)
इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव होंगे—
(क) कॉरपोरेट गवर्नेंस पर असर
निदेशक अब यह नहीं मान सकेंगे कि कंपनी की आड़ में वे दायित्व से बच सकते हैं।
(ख) अपीलीय रणनीति में बदलाव
अब अपील केवल देरी का साधन नहीं रह पाएगी।
(ग) पीड़ितों का विश्वास बढ़ेगा
व्यापारिक लेन-देन में चेक की विश्वसनीयता मजबूत होगी।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि—
धारा 148 NI Act केवल एक प्रक्रियात्मक प्रावधान नहीं, बल्कि एक सशक्त विधायी उपकरण है।
यदि दोषसिद्ध निदेशकों को स्वतः जमा से छूट दे दी जाए, तो—
- कानून का उद्देश्य विफल होगा
- न्याय की प्रक्रिया कमजोर पड़ेगी
- और पीड़ित को वास्तविक न्याय नहीं मिल पाएगा
अतः न्यायालय ने सही रूप में यह स्थापित किया कि दोषसिद्धि के बाद निदेशक भी धारा 148 के अधीन जमा राशि के लिए उत्तरदायी हैं, और केवल पद के आधार पर छूट नहीं दी जा सकती।
यह निर्णय भारतीय आपराधिक-वाणिज्यिक कानून में उत्तरदायित्व, न्याय और संतुलन का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है।