मैनुअल ‘पैरोकार’ व्यवस्था का अंत और डिजिटल आपराधिक न्याय प्रणाली की ओर उत्तर प्रदेश का निर्णायक कदम
इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश—जमानत मामलों में ईमेल से भेजे जाएँ पुलिस निर्देश, ICJS को तत्काल लागू करने के निर्देश
उत्तर प्रदेश की आपराधिक न्याय प्रणाली में दशकों से चली आ रही एक पुरानी, जटिल और समय-साध्य प्रक्रिया—मैनुअल ‘पैरोकार’ व्यवस्था—अब समाप्ति की ओर है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत मामलों में पुलिस निर्देश (Instructions) मंगाने की इस व्यवस्था को न केवल अप्रभावी बल्कि सरकारी धन, मानव संसाधन और न्यायिक समय की भारी बर्बादी करार दिया है।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि भविष्य में जमानत याचिकाओं से संबंधित पुलिस निर्देश ईमेल के माध्यम से भेजे जाएँगे। इसके अतिरिक्त, अदालत ने राज्य सरकार को Interoperable Criminal Justice System (ICJS) के प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन के लिए एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया है।
यह आदेश केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि न्याय की गति, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को बढ़ाने की दिशा में एक दूरगामी संवैधानिक कदम है।
1. ‘पैरोकार’ व्यवस्था: पृष्ठभूमि और वास्तविकता
उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में आपराधिक मामलों, विशेषकर जमानत याचिकाओं में, पुलिस निर्देश प्राप्त करने के लिए पैरोकार प्रणाली वर्षों से लागू थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत—
- एक सरकारी कर्मचारी या प्रतिनिधि
- संबंधित थाने से
- अभियोजन कार्यालय और
- फिर न्यायालय तक
भौतिक रूप से दस्तावेज़ों को ले जाकर प्रस्तुत करता था।
यह प्रणाली औपनिवेशिक काल की प्रशासनिक सोच का अवशेष मानी जाती है, जब तकनीकी साधन सीमित थे। लेकिन आज के डिजिटल युग में यह व्यवस्था कई गंभीर समस्याओं को जन्म दे रही थी।
2. मैनुअल प्रणाली की प्रमुख खामियाँ
हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और न्यायालय की टिप्पणियों से यह स्पष्ट हुआ कि—
- अत्यधिक विलंब: पुलिस निर्देश आने में कई-कई दिन, कभी-कभी सप्ताह लग जाते थे।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आघात: जमानत में देरी का सीधा असर अभियुक्त की स्वतंत्रता पर पड़ता था।
- भ्रष्टाचार की आशंका: मैनुअल प्रक्रियाओं में अनावश्यक हस्तक्षेप और दबाव की संभावना बनी रहती थी।
- मानव संसाधनों का दुरुपयोग: एक कर्मचारी का पूरा समय केवल फाइलें लाने-ले जाने में खर्च होता था।
- न्यायिक कार्य में बाधा: अदालतें समय पर निर्णय नहीं ले पाती थीं।
न्यायालय ने माना कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के अधिकार के विपरीत है।
3. इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“डिजिटल युग में मैनुअल पैरोकार व्यवस्था को जारी रखना न तो तर्कसंगत है और न ही स्वीकार्य।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब सरकार स्वयं डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस की बात करती है, तब ऐसी पुरानी व्यवस्थाएँ न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करती हैं।
4. ईमेल से निर्देश भेजने का आदेश: एक व्यावहारिक समाधान
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि—
- जमानत मामलों में मांगे गए पुलिस निर्देश
- अब ईमेल के माध्यम से
- सीधे संयुक्त निदेशक (अभियोजन) को भेजे जाएँ
इससे अभियोजन समय पर अदालत के समक्ष अपना पक्ष रख सकेगा।
इस व्यवस्था के लाभ:
- तेज़ और समयबद्ध प्रक्रिया
- डिजिटल रिकॉर्ड और जवाबदेही
- मानव हस्तक्षेप में कमी
- जमानत मामलों का शीघ्र निस्तारण
5. ICJS: आपराधिक न्याय प्रणाली का डिजिटल आधार
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल ईमेल व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे आपराधिक न्याय तंत्र को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से ICJS की अवधारणा लाई गई है।
ICJS का उद्देश्य:
- पुलिस, अभियोजन, न्यायालय, जेल और फॉरेंसिक विभाग को जोड़ना
- केस से संबंधित सभी जानकारियों को एक साझा डिजिटल नेटवर्क पर उपलब्ध कराना
- दोहराव, देरी और भ्रम को समाप्त करना
6. नोडल आईपीएस अधिकारी की नियुक्ति: क्यों आवश्यक?
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि—
- ICJS के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए
- एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को
- नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए
इसका उद्देश्य है—
- विभिन्न विभागों के बीच समन्वय
- तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं का समाधान
- उच्च स्तर पर जवाबदेही तय करना
7. आम नागरिक और अभियुक्तों पर प्रभाव
यह आदेश केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।
प्रमुख लाभ:
- जमानत में देरी से राहत
- अनावश्यक जेल हिरासत में कमी
- कानूनी खर्च और मानसिक पीड़ा में कमी
- न्याय प्रणाली में भरोसे की वृद्धि
विशेषकर गरीब और कमजोर वर्ग, जो लंबे समय तक जमानत न मिलने के कारण जेल में रहते थे, उन्हें इस सुधार से बड़ा लाभ मिलेगा।
8. अधिवक्ताओं और न्यायपालिका के लिए महत्व
अधिवक्ताओं के लिए:
- केस की स्थिति की त्वरित जानकारी
- बार-बार तारीख लेने की समस्या में कमी
- पेशेवर कार्यकुशलता में सुधार
न्यायपालिका के लिए:
- लंबित मामलों में कमी
- प्रशासनिक बोझ घटेगा
- न्यायिक समय का बेहतर उपयोग
9. डिजिटल इंडिया और ई-कोर्ट्स की दिशा में मजबूत कदम
यह आदेश डिजिटल इंडिया और ई-कोर्ट्स परियोजना की भावना के अनुरूप है। हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि—
“तकनीक न्याय की शत्रु नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी सहयोगी है।”
10. संभावित चुनौतियाँ और उनके समाधान
चुनौतियाँ:
- ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की उपलब्धता
- पुलिस और अभियोजन कर्मियों का तकनीकी प्रशिक्षण
- साइबर सुरक्षा की आवश्यकता
समाधान:
- चरणबद्ध प्रशिक्षण कार्यक्रम
- सुरक्षित सरकारी ईमेल और सर्वर
- नियमित तकनीकी ऑडिट
11. निष्कर्ष: न्याय की रफ्तार को नई दिशा
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश उत्तर प्रदेश की आपराधिक न्याय प्रणाली में ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकता है। मैनुअल पैरोकार व्यवस्था का अंत, ईमेल आधारित निर्देश प्रणाली और ICJS का प्रभावी क्रियान्वयन—ये सभी कदम मिलकर न्याय को तेज़, पारदर्शी और सुलभ बनाएँगे।
यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि—
“न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होना चाहिए।”
यदि इस आदेश का ईमानदारी से पालन किया गया, तो यह सुधार न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है।