“Suit for Specific Performance – Increase in Prices, Delay & Escalation of Value” पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ।
“मूल्य वृद्धि और लंबी देरी होने पर विशिष्ट निर्वहन का अधिकार क्यों नहीं?—पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय और न्यायसिद्धांत”
भूमिका
विशिष्ट निर्वहन (Specific Performance) संपत्ति संबंधी अनुबंधों में न्यायालय द्वारा दिया जाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण एवं कठोर उपाय है। सामान्य सिद्धांत यह है कि जब किसी पक्ष द्वारा अनुबंध का उल्लंघन किया जाता है, तब पीड़ित पक्ष क्षतिपूर्ति (damages) या विशिष्ट निर्वहन में से किसी एक उपाय की मांग कर सकता है। किंतु विशिष्ट निर्वहन कोई वैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि विवेकाधीन राहत है। इसी सिद्धांत को हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पुनः रेखांकित किया कि अनुबंध के क्रियान्वयन में अत्यधिक विलंब, परिस्थितियों में परिवर्तन तथा संपत्ति के मूल्य में भारी वृद्धि—ये सभी कारक विशिष्ट निर्वहन को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार हैं। यह निर्णय न्यायालयों की उस सतर्क दृष्टि को स्पष्ट करता है जिसके तहत व्यक्तिगत निष्पक्षता (equity), विलंब (delay), और बाज़ार मूल्य में भारी वृद्धि (escalation in market value)—इन सबको ध्यान में रखकर न्याय किया जाता है।
विशिष्ट निर्वहन का वैधानिक ढाँचा — इक्विटी आधारित राहत
Specific Relief Act, 1963 की धारा 20 (नई धारा 20A एवं 20B संशोधन के बाद) स्पष्ट करती है कि विशिष्ट निर्वहन हमेशा न्यायालय की विवेकाधीन शक्तियों पर आधारित है। न्यायालय इस बात को देखता है कि—
- विवादी (plaintiff) ने सदैव अनुबंध को पूरा करने के लिए तत्परता व इच्छाशक्ति (readiness and willingness) दिखाई या नहीं,
- अनुबंध के क्रियान्वयन में अनुचित देरी तो नहीं की,
- अनुबंध को लागू करने से प्रतिवादी (defendant) को अनुचित कठिनाई तो नहीं उत्पन्न होगी,
- परिस्थितियाँ अनुबंध के समय की तुलना में अत्यधिक बदल चुकी हों तो विशिष्ट निर्वहन न्यायसंगत होगा या नहीं।
इन सिद्धांतों के आधार पर कोर्ट यह आकलन करती है कि क्या विशिष्ट निर्वहन देना चाहिए या नहीं।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का दृष्टिकोण — मूल्य वृद्धि और समय-विलंब का प्रभाव
उक्त हाईकोर्ट के हालिया निर्णय में न्यायालय ने महत्वपूर्ण अवलोकन किया कि:
1. अनुबंध को निष्पादित करने में लंबी देरी, विक्रेता के साथ अन्याय कर सकती है
यदि वादी (खरीदार) ने अनुबंध के क्रियान्वयन हेतु समयबद्ध प्रयास नहीं किया और वह कई वर्षों तक निष्क्रिय रहा, तो यह विक्रेता के लिए गंभीर अन्याय का कारण बन सकता है। भूमि या संपत्ति का मूल्य समय के साथ कई गुना बढ़ जाता है और दशकों बाद विशिष्ट निर्वहन देने से विक्रेता पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा।
2. संपत्ति के मूल्यों में भारी वृद्धि—equitable relief को अस्वीकार करने का आधार
न्यायालय ने कहा कि जब अनुबंध के क्रियान्वयन में 10–15 वर्ष की देरी हो जाए और इस दौरान संपत्ति के मूल्य 5 से 10 गुना बढ़ जाएँ, तो खरीदार को मूल अनुबंध मूल्य पर संपत्ति दिलवाना अनुचित समृद्धि (unjust enrichment) होगा।
3. ‘Time is not essence’ का अर्थ यह नहीं कि अनंत समय तक अनुबंध खुला रह सकता है
यद्यपि यह सत्य है कि संपत्ति संबंधी अनुबंधों में सामान्यतः समय को मूल तत्व (essence) नहीं माना जाता, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि खरीददार बिना किसी कारण के वर्षों तक अनुबंध को टालता रहे।
4. Equity मायने रखती है—justice must be balanced
न्यायालय को दोनों पक्षों के हितों का संतुलन करना होता है। यदि खरीदार की लापरवाही से विक्रेता को गंभीर हानि पहुँचने की संभावना हो, तो न्यायालय विशिष्ट निर्वहन के बदले वैकल्पिक राहत (damages in lieu of specific performance) देना अधिक उपयुक्त मान सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
जिस मामले में हाईकोर्ट ने यह सिद्धांत लागू किया, उसमें—
- पक्षकारों के बीच भूमि विक्रय अनुबंध हुआ था।
- वादी ने आंशिक भुगतान कर दिया, परंतु शेष भुगतान और रजिस्ट्री हेतु उसने अत्यधिक समय लिया।
- वादी लगभग 10 वर्ष तक निष्क्रिय रहा और उचित कारण भी पेश नहीं कर पाया।
- इस अवधि में भूमि के मूल्य कई गुना बढ़ गए।
- विक्रेता ने अनुबंध समाप्त मान लिया और तीसरे पक्ष को बेचने का प्रयास किया।
वादी ने विशिष्ट निर्वहन हेतु मुकदमा दायर किया, किंतु विलंब और परिस्थितियों में अत्यधिक बदलाव के चलते मुकदमा चुनौती का विषय बना। ऐसे मामलों में न्यायालय का संतुलित दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण: लंबे विलंब का असर
न्यायालय ने स्पष्ट कहा—
1. Delay defeats equity
इक्विटी का सिद्धांत कहता है कि “जो सहायता चाहता है, उसे स्वयं भी निष्पक्ष व तत्पर रहना चाहिए।”
वादी की निष्क्रियता और देरी उसकी अपनी अदालत से राहत पाने की पात्रता को कमजोर करती है।
2. Readiness and Willingness का अभाव
वादी को साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं कि वह अनुबंध को निष्पादित करने के लिए हमेशा तैयार और इच्छुक था।
वादी ऐसा सुस्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं कर सका।
3. मूल्य वृद्धि का प्रभाव (Escalation of Prices)
कोर्ट ने ध्यान दिया कि—
- भूमि का मूल्य अनुबंध अवधि में अत्यधिक बढ़ चुका था।
- अनुबंध को लागू करना विक्रेता के लिए अत्यंत प्रतिकूल होगा।
- लंबे समय बाद विशिष्ट निर्वहन देना अन्यायपूर्ण होगा।
महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत जो कोर्ट ने अपनाए
(i) विशिष्ट निर्वहन अनिवार्य राहत नहीं—यह विवेकाधीन है
सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि विशिष्ट निर्वहन को स्वचालित रूप से नहीं दिया जा सकता।
‘K.S. Vidyanadam v. Vairavan’ जैसे मामलों में कहा गया कि अत्यधिक विलंब equitable relief को समाप्त कर देता है।
(ii) Unjust Enrichment से बचना न्यायालय का कर्तव्य
यदि वादी अनुबंध मूल्य पर संपत्ति पाकर करोड़ों का लाभ पा ले, जबकि विक्रेता बाजार मूल्य से वंचित रह जाए, तो यह अन्यायपूर्ण होगा।
(iii) Equity favors vigilance, not lethargy
जो व्यक्ति अनुबंध के अधिकार को लंबे समय तक निष्क्रिय रखे, वह राहत का हकदार नहीं माना जाता।
कोर्ट का निर्णय
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि—
- वादी ने अनुबंध को निष्पादित करने में अनुचित देरी की,
- वह readiness और willingness सिद्ध करने में विफल रहा,
- संपत्ति के मूल्यों में काफी वृद्धि हो चुकी थी,
- अनुबंध को इस देरी के बाद लागू करना विक्रेता के लिए अनुचित होगा।
अतः विशिष्ट निर्वहन की डिग्री (decree for specific performance) अस्वीकार की जाती है।
हालाँकि, वादी द्वारा दिए गए अग्रिम धन (advance money) की वापसी और उपयुक्त ब्याज का आदेश दिया गया।
न्यायिक निष्कर्ष—Specific Performance कोई अंधाधुंध अधिकार नहीं
इस निर्णय से निम्न महत्वपूर्ण सिद्धांत उभरकर सामने आते हैं:
- विशिष्ट निर्वहन तभी दिया जाएगा जब वादी समय पर सक्रिय और अनुबंध पालन हेतु तत्पर रहा हो।
- अनुबंध के क्रियान्वयन में अत्यधिक विलंब, relief को अस्वीकार करने का पूर्ण आधार है।
- भूमि मूल्यों में भारी वृद्धि कोर्ट के equitable discretion को प्रभावित करती है।
- न्यायालय विक्रेता को अनावश्यक रूप से आर्थिक नुकसान नहीं होने देगा।
- वादियों को अनुबंध के पालन के लिए समयबद्ध कार्रवाई करनी चाहिए।
व्यवहारिक महत्व (Practical Importance)
- संपत्ति के मामलों में खरीदार अक्सर अनुबंध करने के बाद वर्षों तक ‘wait and watch’ की नीति अपनाते हैं।
- जब संपत्ति के मूल्य बढ़ जाते हैं, तभी वे विशिष्ट निर्वहन के लिए कोर्ट पहुँचते हैं।
- हाईकोर्ट का यह निर्णय ऐसे सभी speculative litigation को हतोत्साहित करता है।
- यह निर्णय बाजार की वास्तविकताओं और न्यायिक विवेक के संतुलन को दर्शाता है।
कानून विद्यार्थियों व अधिवक्ताओं हेतु सीख
- Specific Performance के मुकदमों में readiness and willingness का ठोस evidence अनिवार्य है।
- देरी को कोर्ट कभी नजरअंदाज नहीं करती, भले ही समय essence न हो।
- मूल्य वृद्धि अब एक महत्वपूर्ण legal factor के रूप में स्वीकार की जा चुकी है।
- Equitable relief के लिए equitable conduct आवश्यक है।
समापन
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह निर्णय विशिष्ट निर्वहन कानून के न्यायिक विकास में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि specific performance न्याय की मांग के अनुसार दी जाएगी, न कि मात्र अनुबंध होने भर से।
यदि वादी समय पर अनुबंध पालन हेतु कदम नहीं उठाए और बाद में संपत्ति के मूल्यों के आसमान छूने पर मुकदमा दायर करे, तो अदालतें ऐसे दावों को स्वीकार नहीं करेंगी।
न्यायालय का दायित्व न्याय के समतुल्यकरण (balancing of equities) का है, और इसी सिद्धांत के तहत उसने विशिष्ट निर्वहन से इनकार कर वैकल्पिक राहत प्रदान की।