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“मुस्लिम क़ानून में उत्तराधिकार का मूल सिद्धांत: जीवित रहते संपत्ति में कोई अधिकार नहीं” — Abdul Hameed v. Hasim @ Manusab, कर्नाटक हाईकोर्ट

“मुस्लिम क़ानून में उत्तराधिकार का मूल सिद्धांत: जीवित रहते संपत्ति में कोई अधिकार नहीं” — Abdul Hameed v. Hasim @ Manusab, कर्नाटक हाईकोर्ट (18 दिसंबर 2025)


 प्रस्तावना

      भारतीय विधि-व्यवस्था में Personal Laws का विशेष महत्व है, क्योंकि ये कानून किसी समुदाय की धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक मान्यताओं से गहराई से जुड़े होते हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ (Mohammedan Law) भी ऐसा ही एक विशिष्ट विधिक ढाँचा है, जिसकी जड़ें सीधे क़ुरान, हदीस, इज्मा और क़ियास में निहित हैं।
उत्तराधिकार (Succession) और संपत्ति के विभाजन (Partition) से जुड़े मामलों में अक्सर यह भ्रम उत्पन्न होता है कि क्या किसी व्यक्ति के जीवित रहते उसके वारिसों को संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त हो सकता है।

      दिनांक 18 दिसंबर 2025 को Karnataka High Court ने RSA No. 200570/2025Abdul Hameed बनाम Hasim @ Manusab में इसी प्रश्न पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सिद्धांतगत निर्णय दिया। यह फैसला मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की बुनियादी अवधारणाओं को स्पष्ट करता है और निचली अदालतों के लिए एक ठोस मार्गदर्शक के रूप में उभरता है।


 प्रकरण की पृष्ठभूमि

      इस मामले में विवाद का केंद्र बिंदु एक मुस्लिम परिवार की संपत्ति थी। एक पक्ष ने यह दावा किया कि परिवार के सदस्यों/संभावित वारिसों को पूर्वज की संपत्ति में हिस्सेदारी का अधिकार है और उस आधार पर विभाजन किया जा सकता है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी ने यह तर्क दिया कि मुस्लिम विधि के अंतर्गत जब तक संपत्ति का स्वामी जीवित है, तब तक किसी भी वारिस को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता, और इसलिए न तो उत्तराधिकार खुलता है और न ही विभाजन संभव है।

      निचली अदालतों के निर्णयों से असंतुष्ट होकर मामला Regular Second Appeal (RSA) के रूप में कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष आया।


 न्यायालय के समक्ष प्रमुख विधिक प्रश्न

  1. क्या मुस्लिम विधि में किसी व्यक्ति के जीवित रहते उसके वारिसों को संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त होता है?
  2. उत्तराधिकार (Succession) कब और किस क्षण खुलता है?
  3. क्या मुस्लिम विधि में विभाजन (Partition) अथवा आंशिक विभाजन (Doctrine of Partial Partition) की अवधारणा लागू होती है?
  4. मुस्लिम उत्तराधिकार में वारिसों की स्थिति Joint Tenants की है या Tenants-in-Common की?
  5. क्या प्रत्येक वारिस को संपत्ति के किसी विशिष्ट भाग पर अधिकार मिलता है या पूरे एस्टेट में अनुपातिक हिस्सा?

 न्यायालय का विधिक विश्लेषण

1.  जीवित रहते संपत्ति में पूर्व-विद्यमान अधिकार का अभाव

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मुस्लिम विधि के स्थापित सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि:

“Under Mohammedan Law, heirs possess no pre-existing right to the property of an ancestor during his lifetime.”

      अर्थात, किसी भी मुस्लिम व्यक्ति की संपत्ति पर उसके जीवनकाल में किसी वारिस का कोई vested या contingent अधिकार नहीं होता।
वारिस की स्थिति केवल एक heir-apparent की होती है, जिसका अधिकार अनिश्चित (inchoate) होता है और जो केवल पूर्वज की मृत्यु पर ही कानूनी रूप लेता है।


2.  उत्तराधिकार का खुलना केवल मृत्यु पर

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार का सिद्धांत अत्यंत सख़्त और स्पष्ट है:

  • उत्तराधिकार मृत्यु से पहले नहीं खुल सकता।
  • संपत्ति का स्वामी जब तक जीवित है, वह संपत्ति पर पूर्ण स्वामित्व (absolute ownership) रखता है।
  • वह चाहे तो संपत्ति का दान (Hiba), विक्रय या अन्य वैध हस्तांतरण कर सकता है।

इस प्रकार, succession opens only upon the demise of the owner


3.  जीवित रहते विभाजन का प्रश्न ही नहीं

चूँकि:

  • उत्तराधिकार जीवित रहते खुलता ही नहीं, और
  • वारिसों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता,

इसलिए न्यायालय ने कहा कि विभाजन (Partition) की अवधारणा स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाती है।

 कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

  • मुस्लिम विधि में जीवित रहते संपत्ति के विभाजन का कोई प्रश्न नहीं उठता।
  • इसी कारण Doctrine of Partial Partition भी मुस्लिम विधि में लागू नहीं होती।

4.  आंशिक विभाजन (Doctrine of Partial Partition) की अनुपयुक्तता

हिंदू विधि में जहाँ आंशिक विभाजन संभव है, वहीं मुस्लिम विधि में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम विधि में:

  • संपत्ति को टुकड़ों में बाँटकर
  • केवल कुछ हिस्सों का विभाजन करना
    कानूनन मान्य नहीं है।

यह अंतर मुस्लिम और हिंदू उत्तराधिकार कानूनों के बीच एक मौलिक भिन्नता को दर्शाता है।


5.  वारिसों की स्थिति: Tenant-in-Common

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम विधि में वारिस:

  • Joint Tenants नहीं होते,
  • बल्कि Tenants-in-Common होते हैं।

इसका विधिक अर्थ यह है कि:

  • प्रत्येक वारिस को पूरी संपत्ति के प्रत्येक अंश में एक निश्चित हिस्सा प्राप्त होता है।
  • कोई भी वारिस यह दावा नहीं कर सकता कि संपत्ति का कोई विशेष भाग केवल उसी का है।

6. पूरे एस्टेट में अनुपातिक अधिकार

कोर्ट ने आगे कहा कि:

  • मुस्लिम उत्तराधिकार में प्रत्येक वारिस को पूरे एस्टेट में एक निश्चित अनुपात (definite fraction) मिलता है।
  • यह अधिकार संपत्ति के किसी खास टुकड़े तक सीमित नहीं होता।

उदाहरण के लिए:

  • यदि किसी एस्टेट में भूमि, मकान और अन्य संपत्तियाँ हैं,
  • तो प्रत्येक वारिस को इन सभी में अपने हिस्से के अनुपात में अधिकार प्राप्त होगा।

7. क़ुरानिक आधार: सूरह-अन-निसा (Surah Al-Nisa)

न्यायालय ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के धार्मिक आधार की भी चर्चा की।
मुस्लिम विधि का मुख्य स्रोत Holy Quran का Chapter IV — Surah Al-Nisa है, जिसमें उत्तराधिकार के नियम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं।

इसके अनुसार:

  • सामान्यतः पुरुष वारिस का हिस्सा महिला वारिस के हिस्से का दुगुना (2:1) होता है।
  • यह नियम धार्मिक आदेश (Divine Command) होने के कारण विधिक रूप से भी बाध्यकारी है।

कोर्ट ने माना कि भारतीय न्यायालय मुस्लिम पर्सनल लॉ की व्याख्या करते समय इन क़ुरानिक सिद्धांतों का सम्मान और पालन करते हैं।


 इस निर्णय का व्यावहारिक और विधिक महत्व

 पारिवारिक संपत्ति विवादों में स्पष्टता

यह फैसला उन मामलों में अत्यंत उपयोगी है जहाँ:

  • संतान या रिश्तेदार
  • जीवित माता-पिता की संपत्ति में अधिकार जताते हैं।

अनावश्यक मुक़दमों पर रोक

कोर्ट का यह स्पष्ट संदेश है कि:

  • जीवित रहते संपत्ति के बंटवारे से जुड़े दावे
  • कानूनन टिकाऊ नहीं होंगे।

 मुस्लिम पर्सनल लॉ की पुनः पुष्टि

यह निर्णय मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के मूल सिद्धांतों को पुनः स्थापित करता है और निचली अदालतों को स्पष्ट दिशा देता है।


 निष्कर्ष

Abdul Hameed v. Hasim @ Manusab (2025) में कर्नाटक हाईकोर्ट का यह निर्णय मुस्लिम उत्तराधिकार कानून का एक मील का पत्थर है।
यह स्पष्ट करता है कि:

“जब तक संपत्ति का स्वामी जीवित है, तब तक न उत्तराधिकार खुलता है, न किसी वारिस का अधिकार बनता है और न ही विभाजन का प्रश्न उठता है।”

यह फैसला न केवल विधिक दृष्टि से, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पारिवारिक संपत्ति विवादों में कानून की स्पष्ट और ठोस सीमा रेखा खींचता है।