मानसिक स्वास्थ्य एवं विकलांगता कानून: गरिमा, अधिकार और समावेशन की ओर भारत की कानूनी यात्रा
प्रस्तावना
मानसिक स्वास्थ्य और विकलांगता से जुड़े मुद्दे लंबे समय तक भारतीय समाज में उपेक्षा, भ्रांतियों और सामाजिक कलंक से घिरे रहे हैं। पारंपरिक दृष्टिकोण में इन्हें “कमज़ोरी” या “निजी समस्या” के रूप में देखा जाता था, न कि एक मानवाधिकार के प्रश्न के रूप में। किंतु पिछले कुछ दशकों में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आंदोलन, संवैधानिक मूल्यों और न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका के कारण भारत में मानसिक स्वास्थ्य एवं विकलांगता कानूनों में व्यापक परिवर्तन हुआ है। आज ये कानून केवल उपचार या देखभाल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता, समानता और सामाजिक समावेशन को केंद्र में रखते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा और कानूनी महत्व
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य केवल मानसिक रोग की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि ऐसा कल्याण की स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी क्षमताओं को पहचानता है, जीवन के तनावों से निपट सकता है और समाज में उत्पादक योगदान दे सकता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का अधिकार प्रदान करता है, जिसकी व्याख्या न्यायपालिका ने गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के रूप में की है। मानसिक स्वास्थ्य इसी गरिमापूर्ण जीवन का अभिन्न अंग है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कानूनों का उद्देश्य व्यक्ति को केवल रोगी नहीं, बल्कि अधिकार-संपन्न नागरिक के रूप में देखना है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य कानून का विकास
औपनिवेशिक काल में लागू भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 मुख्यतः हिरासत और नियंत्रण पर केंद्रित था। इसमें मानवाधिकारों की दृष्टि का अभाव था और मानसिक रोगियों को समाज से अलग रखने की प्रवृत्ति हावी थी। स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक यही दृष्टिकोण बना रहा।
1990 के दशक में मानवाधिकारों की वैश्विक बहस और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से सुधार की मांग तेज़ हुई। परिणामस्वरूप मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 अस्तित्व में आया, किंतु यह भी पर्याप्त नहीं माना गया। अंततः अंतरराष्ट्रीय मानकों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन (UNCRPD) के अनुरूप मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 लागू किया गया।
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017: प्रमुख विशेषताएँ
यह अधिनियम भारत में मानसिक स्वास्थ्य कानून का मील का पत्थर है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- मानसिक स्वास्थ्य को अधिकार के रूप में मान्यता – प्रत्येक व्यक्ति को सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार।
- स्वायत्तता और सहमति – उपचार से पूर्व रोगी की सूचित सहमति आवश्यक है।
- अग्रिम निर्देश (Advance Directive) – व्यक्ति भविष्य में अपने उपचार से संबंधित इच्छाएँ पहले से व्यक्त कर सकता है।
- नामित प्रतिनिधि (Nominated Representative) – रोगी अपनी ओर से निर्णय लेने हेतु किसी व्यक्ति को नामित कर सकता है।
- आत्महत्या का अपराधीकरण समाप्त – आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को अपराधी नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता वाले व्यक्ति के रूप में देखा गया।
- संस्थागत निगरानी – मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के पंजीकरण और निरीक्षण की व्यवस्था।
विकलांगता की अवधारणा: चिकित्सा से अधिकार-आधारित दृष्टिकोण तक
विकलांगता को पहले केवल शारीरिक या मानसिक कमी के रूप में देखा जाता था। आधुनिक दृष्टिकोण इसे सामाजिक बाधाओं और संरचनात्मक भेदभाव का परिणाम मानता है। भारत ने इस परिवर्तन को स्वीकार करते हुए विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) लागू किया, जिसने 1995 के कानून का स्थान लिया।
विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016: एक समग्र कानून
यह अधिनियम UNCRPD के अनुरूप है और विकलांग व्यक्तियों को समान अधिकार और अवसर प्रदान करने का लक्ष्य रखता है।
प्रमुख प्रावधान
- विकलांगता की विस्तृत परिभाषा – अब 21 प्रकार की विकलांगताओं को मान्यता दी गई है, जिनमें मानसिक बीमारी और बौद्धिक विकलांगता भी शामिल हैं।
- भेदभाव निषेध – शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, परिवहन और सार्वजनिक सेवाओं में भेदभाव पर रोक।
- आरक्षण और समावेशन – सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण।
- सुलभता (Accessibility) – भवन, परिवहन और सूचना प्रणाली को विकलांग-अनुकूल बनाने का दायित्व।
- कानूनी क्षमता की मान्यता – विकलांग व्यक्ति को कानून के समक्ष समान व्यक्ति माना गया है।
- दंडात्मक प्रावधान – अधिकारों के उल्लंघन पर जुर्माना और दंड।
मानसिक स्वास्थ्य और विकलांगता कानूनों का आपसी संबंध
मानसिक बीमारी और मानसिक विकलांगता के बीच अंतर अक्सर भ्रमित करता है। मानसिक स्वास्थ्य कानून उपचार और देखभाल पर केंद्रित है, जबकि विकलांगता कानून अधिकारों, समावेशन और अवसरों पर। दोनों कानून मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को न केवल उपचार मिले, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में भी समान अवसर प्राप्त हों।
न्यायपालिका की भूमिका
भारतीय न्यायपालिका ने मानसिक स्वास्थ्य और विकलांगता अधिकारों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई निर्णयों में अदालतों ने कहा है कि विकलांगता या मानसिक बीमारी के आधार पर किसी व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार या गरिमापूर्ण जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि राज्य का दायित्व है कि वह कमजोर वर्गों के लिए सकारात्मक कदम उठाए।
सामाजिक कलंक और व्यावहारिक चुनौतियाँ
कानून बनने के बावजूद सामाजिक कलंक, संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित पेशेवरों का अभाव और जागरूकता की कमी बड़ी चुनौतियाँ हैं। ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित हैं। विकलांग व्यक्तियों के लिए सुलभता के प्रावधान भी अक्सर काग़ज़ों तक सीमित रह जाते हैं।
राज्य और समाज की भूमिका
मानसिक स्वास्थ्य और विकलांगता कानूनों की सफलता केवल सरकारी प्रयासों पर निर्भर नहीं करती। परिवार, समुदाय, गैर-सरकारी संगठन और मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। स्कूलों और कार्यस्थलों पर संवेदनशीलता प्रशिक्षण, सार्वजनिक जागरूकता अभियान और समावेशी नीतियाँ आवश्यक हैं।
भविष्य की दिशा
भारत में मानसिक स्वास्थ्य एवं विकलांगता कानूनों ने एक मजबूत आधार तैयार किया है, किंतु इन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना अगली बड़ी चुनौती है। बजट आवंटन, संस्थागत ढांचे का सुदृढ़ीकरण, और डेटा-आधारित नीतियाँ भविष्य की प्राथमिकताएँ होनी चाहिए। डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएँ और टेली-काउंसलिंग जैसे नवाचार इस दिशा में सहायक हो सकते हैं।
निष्कर्ष
मानसिक स्वास्थ्य एवं विकलांगता कानून भारत में सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। ये कानून यह संदेश देते हैं कि मानसिक बीमारी या विकलांगता किसी व्यक्ति की क्षमता या गरिमा को कम नहीं करती। एक संवेदनशील, समावेशी और अधिकार-आधारित समाज का निर्माण तभी संभव है जब कानून, नीति और सामाजिक दृष्टिकोण एक साथ आगे बढ़ें। अंततः, मानसिक स्वास्थ्य और विकलांगता के प्रति करुणा और सम्मान का दृष्टिकोण ही एक सशक्त और मानवीय राष्ट्र की पहचान है।