मनुस्मृति से सुप्रीम कोर्ट तक: परिवार के भरण-पोषण का धर्म, दायित्व और संवैधानिक दृष्टि
भूमिका
भारतीय सभ्यता में परिवार केवल सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि नैतिक, धार्मिक और कानूनी उत्तरदायित्वों का केंद्र रहा है। प्राचीन धर्मशास्त्रों से लेकर आधुनिक संविधान तक, परिवार के कमजोर सदस्यों—विशेषकर माता, पत्नी और बच्चों—के संरक्षण को सर्वोच्च महत्व दिया गया है।
मनुस्मृति के अध्याय 8, श्लोक 389 में कहा गया है—
“न तो माता, न पिता, न पत्नी, न पुत्र को त्यागा जाना उचित है। जो व्यक्ति इन्हें त्यागता है, उसे राजा द्वारा छह सौ दंड दिया जाएगा।”
यह श्लोक केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि उस समय के सामाजिक कानून का स्वरूप भी दर्शाता है। आधुनिक भारत में यही भावना सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में प्रतिध्वनित होती दिखाई देती है।
यह लेख मनुस्मृति के इस श्लोक की सामाजिक-कानूनी व्याख्या, भारतीय विधि व्यवस्था में उसके प्रभाव और सुप्रीम कोर्ट के समकालीन दृष्टिकोण का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
मनुस्मृति: केवल धर्मग्रंथ नहीं, सामाजिक विधि संहिता
मनुस्मृति को प्रायः केवल धार्मिक ग्रंथ समझ लिया जाता है, जबकि वस्तुतः यह प्राचीन भारतीय समाज की कानूनी, नैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का भी दर्पण थी। इसमें—
- परिवार के दायित्व
- स्त्री संरक्षण
- उत्तराधिकार
- दंड व्यवस्था
- सामाजिक कर्तव्य
सभी विषयों पर स्पष्ट निर्देश मिलते हैं।
अध्याय 8 मुख्यतः न्याय और दंड विधान से संबंधित है। श्लोक 389 परिवार के प्रति कर्तव्य को कानून का रूप देता है।
श्लोक 389 का भावार्थ और अर्थ
इस श्लोक का मूल संदेश यह है कि—
- माता
- पिता
- पत्नी
- पुत्र
इनमें से किसी को भी त्यागना अधर्म है।
यदि कोई व्यक्ति अपने इन पारिवारिक सदस्यों को त्याग देता है, तो वह केवल नैतिक अपराधी नहीं, बल्कि राजकीय दंड का पात्र भी बनता है।
यह दर्शाता है कि प्राचीन भारत में भी परिवार के भरण-पोषण को राज्य संरक्षित कर्तव्य माना जाता था।
भरण-पोषण का धार्मिक दायित्व
हिंदू धर्म में भरण-पोषण को केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि—
- कर्तव्य
- पुण्य
- सामाजिक उत्तरदायित्व
- और धार्मिक आचरण
के रूप में देखा गया है।
मनुस्मृति स्पष्ट करती है कि परिवार का मुखिया अपने आश्रितों की उपेक्षा नहीं कर सकता। स्त्री और बच्चों की सुरक्षा पुरुष की जिम्मेदारी मानी गई।
आधुनिक कानून में वही भावना
आज भारत में भरण-पोषण से संबंधित कई कानून हैं—
- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
- हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
- घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005
इन सभी का मूल उद्देश्य वही है जो मनुस्मृति श्लोक 389 में निहित है—
कोई भी स्त्री, माता या बच्चा परित्यक्त नहीं छोड़ा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने अनेक मामलों में कहा है कि—
- भरण-पोषण दया नहीं, अधिकार है
- पति का यह कर्तव्य कानूनी और नैतिक दोनों है
- पत्नी को जीवन स्तर उसी स्तर पर मिलना चाहिए जिस स्तर पर वह वैवाहिक जीवन में थी
एक महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—
“पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि सभ्य समाज की पहचान है।”
यह कथन मनुस्मृति की उसी भावना को आधुनिक भाषा में दोहराता है।
त्याग की अवधारणा और उसका दंड
मनुस्मृति में त्याग को अपराध माना गया।
आधुनिक कानून में—
- पत्नी को छोड़ देना
- बच्चों की उपेक्षा
- माता-पिता को बेसहारा छोड़ देना
इन सबको कानूनी अपराध और सामाजिक अमानवीयता माना गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्णयों में कहा है कि—
“कोई भी पुरुष यह तर्क नहीं दे सकता कि उसके पास साधन नहीं हैं, यदि वह सक्षम है।”
स्त्री अधिकार और मनुस्मृति
आधुनिक विमर्श में मनुस्मृति पर स्त्री-विरोधी होने के आरोप लगते हैं, परंतु यह श्लोक स्पष्ट करता है कि—
- पत्नी को त्यागना अपराध है
- उसका भरण-पोषण अनिवार्य है
- उसे समाज में सम्मानजनक स्थान दिया गया है
यह सिद्ध करता है कि स्त्री संरक्षण की अवधारणा भारतीय परंपरा में नई नहीं है।
संविधान और मनुस्मृति का समन्वय
भारतीय संविधान के अनुच्छेद—
- 15 (समानता)
- 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार)
- 39 (सामाजिक न्याय)
इन सभी में वही मूल्य दिखाई देते हैं जो मनुस्मृति में नैतिक रूप से स्थापित थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि—
“भरण-पोषण का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।”
आधुनिक समाज में प्रासंगिकता
आज के समय में—
- बढ़ते तलाक
- एकल माताएँ
- वृद्ध माता-पिता
- परित्यक्त महिलाएँ
इन सभी के लिए यह सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।
मनुस्मृति का श्लोक आज भी सामाजिक चेतना को जागृत करता है कि परिवार को छोड़ना अधर्म है।
आलोचना और संतुलन
यह स्वीकार करना होगा कि मनुस्मृति के सभी प्रावधान आज के संविधान से मेल नहीं खाते, परंतु—
परिवार संरक्षण से संबंधित यह श्लोक आज भी नैतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से प्रेरणादायक है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी यही दृष्टिकोण अपनाया है कि—
परंपरा से वही लिया जाए जो न्याय, समानता और मानव गरिमा के अनुकूल हो।
न्यायपालिका और सामाजिक सुधार
भारतीय न्यायपालिका ने—
- पत्नी को सम्मानजनक जीवन
- बच्चों को सुरक्षित भविष्य
- माता-पिता को सम्मान
ये सभी अधिकार सुनिश्चित किए हैं।
यह उसी भारतीय दर्शन का आधुनिक रूप है जो मनुस्मृति में अंकित था।
निष्कर्ष
मनुस्मृति का अध्याय 8, श्लोक 389 यह सिद्ध करता है कि—
भारतीय संस्कृति में परिवार का त्याग कभी स्वीकार्य नहीं रहा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय इस प्राचीन सिद्धांत को आधुनिक संवैधानिक भाषा में जीवित रखते हैं।
जहाँ मनुस्मृति ने इसे धर्म और दंड का विषय बनाया, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का प्रश्न बना दिया।
अंतिम शब्द
परिवार के प्रति उत्तरदायित्व केवल कानून की मजबूरी नहीं, बल्कि सभ्यता की पहचान है।
मनुस्मृति से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, एक ही संदेश गूंजता है—
माता, पिता, पत्नी और पुत्र को छोड़ना अधर्म भी है और अपराध भी।
यही भारतीय दर्शन की आत्मा है, यही संविधान की भावना है, और यही न्याय का वास्तविक स्वरूप है।