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मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 (Payment of Wages Act, 1936) – विस्तृत विवरण

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 (Payment of Wages Act, 1936) – विस्तृत विवरण


प्रस्तावना

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 भारत में श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए महत्वपूर्ण श्रम कानूनों में से एक है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मजदूरों को उनका वेतन समय पर और पूर्ण रूप से मिले तथा नियोक्ता द्वारा अनुचित कटौतियाँ न की जाएँ। यह अधिनियम प्रारंभ में केवल कारखानों और कुछ विशेष प्रतिष्ठानों में कार्यरत श्रमिकों पर लागू होता था, लेकिन समय-समय पर संशोधनों के माध्यम से इसका दायरा बढ़ाया गया।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • ब्रिटिश शासन काल में मजदूरों का शोषण आम बात थी। उन्हें समय पर वेतन नहीं मिलता था और कई बार अवैध कटौतियाँ भी की जाती थीं।
  • मजदूर आंदोलन और ट्रेड यूनियनों के दबाव के चलते, 1936 में यह अधिनियम पारित किया गया।
  • यह अधिनियम 28 अप्रैल 1937 से लागू हुआ।

अधिनियम का उद्देश्य

  1. मजदूरी का समय पर भुगतान सुनिश्चित करना।
  2. वेतन में अवैध कटौतियों को रोकना।
  3. श्रमिकों के हितों की रक्षा करना।
  4. नियोक्ता और कर्मचारी के बीच वेतन भुगतान को लेकर विवाद कम करना।

अधिनियम का क्षेत्राधिकार और लागू होने की सीमा

  • प्रारंभ में यह अधिनियम केवल उन श्रमिकों पर लागू होता था जिनकी मासिक मजदूरी ₹200 से अधिक नहीं थी, लेकिन बाद में यह सीमा कई संशोधनों द्वारा बढ़ाई गई।
  • वर्तमान में यह अधिनियम सभी प्रकार के श्रमिकों पर लागू होता है, चाहे वे स्थायी हों, अस्थायी, संविदा (Contract) पर हों या प्रशिक्षु (Apprentice)।
  • यह अधिनियम कारखानों, रेलवे, खदानों, परिवहन, और अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत श्रमिकों पर लागू होता है।

महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

  1. मजदूरी (Wages)
    • किसी कर्मचारी को उसके रोजगार के लिए देय सभी प्रकार का पारिश्रमिक (वेतन, भत्ते, बोनस, प्रोत्साहन राशि आदि)।
    • इसमें शामिल नहीं – यात्रा भत्ता, पेंशन, भविष्य निधि योगदान, और सेवा समाप्ति पर मिलने वाली ग्रेच्युटी।
  2. कर्मचारी (Employee)
    • कोई भी व्यक्ति जो नियोक्ता के अधीन कार्य कर रहा हो, चाहे वह कुशल, अकुशल, लिपिकीय, तकनीकी या अन्य कार्य करता हो।
  3. नियोक्ता (Employer)
    • कोई व्यक्ति या संस्था जो श्रमिकों को नियोजित करता है और मजदूरी का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार है।

मजदूरी का भुगतान

1. भुगतान का समय

  • 1,000 से कम कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान में – अगले महीने की 7 तारीख तक।
  • 1,000 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान में – अगले महीने की 10 तारीख तक।

2. भुगतान का माध्यम

  • नकद, बैंक ट्रांसफर, या चेक के माध्यम से।
  • कुछ मामलों में डिजिटल भुगतान भी किया जा सकता है।

3. मजदूरी की अवधि

  • अधिकतम एक माह।

मजदूरी से अनुमत कटौतियाँ (Permissible Deductions)

अधिनियम केवल कुछ विशेष प्रकार की कटौतियों की अनुमति देता है, जैसे –

  1. सरकारी कर – आयकर, प्रोफेशनल टैक्स।
  2. भविष्य निधि योगदान (PF)
  3. बीमा प्रीमियम
  4. ऋण या अग्रिम की वसूली
  5. कंपनी के आवास का किराया
  6. यूनियन शुल्क (यदि सहमति हो)।
  7. अनुशासनहीनता या नुकसान की भरपाई

अवैध कटौतियाँ (Illegal Deductions)

  • व्यक्तिगत कारणों से बिना प्रमाणित कारण के वेतन में कटौती।
  • कर्मचारी की अनुमति के बिना कोई भी अनधिकृत कटौती।

अधिनियम के तहत अधिकारियों की नियुक्ति

  1. निरीक्षक (Inspector)
    • अधिनियम के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने के लिए।
  2. प्राधिकृत अधिकारी (Authority)
    • मजदूरी संबंधी शिकायतों का निपटारा करने के लिए।
    • यह श्रम आयुक्त, न्यायिक मजिस्ट्रेट, या अन्य अधिकृत व्यक्ति हो सकता है।

शिकायत और दावा प्रक्रिया

  • यदि मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ या अवैध कटौती की गई है, तो कर्मचारी 12 महीनों के भीतर प्राधिकृत अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कर सकता है।
  • अधिकारी जांच के बाद आदेश देता है और अवैध कटौती की राशि के साथ-साथ 10 गुना तक मुआवजा दिला सकता है।

दंड और दायित्व

  1. समय पर मजदूरी का भुगतान न करने पर – जुर्माना ₹7,500 तक।
  2. अवैध कटौती करने पर – जुर्माना ₹7,500 तक।
  3. बार-बार उल्लंघन करने पर – अधिक जुर्माना और/या कारावास।

संशोधन

  • 2005 संशोधन – अधिनियम का दायरा बढ़ाया गया।
  • 2017 संशोधन – डिजिटल भुगतान और बैंक ट्रांसफर को शामिल किया गया।
  • वेतन संहिता, 2019 – इस अधिनियम को वेतन संहिता में विलय कर दिया गया है (लेकिन पूरी तरह लागू होने पर ही पुराने प्रावधान खत्म होंगे)।

महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

  1. Bhurangya Coal Co. v. Sahebjan (1959) – मजदूरी में बोनस को शामिल करने पर स्पष्टीकरण।
  2. Ambica Mills Ltd. v. S.B. Bhatt (1961) – कटौती की वैधता पर निर्णय।

अधिनियम के लाभ

  1. समय पर मजदूरी प्राप्त करने की गारंटी।
  2. अवैध कटौती से सुरक्षा।
  3. शिकायत निवारण का कानूनी मंच।
  4. श्रमिक-नियोक्ता संबंधों में पारदर्शिता।

सीमाएँ और चुनौतियाँ

  1. शिकायत प्रक्रिया में देरी।
  2. छोटे प्रतिष्ठानों में श्रमिकों को अधिनियम की जानकारी न होना।
  3. निरीक्षण व्यवस्था में भ्रष्टाचार और कमजोर क्रियान्वयन।

निष्कर्ष

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 ने भारत में श्रमिकों के आर्थिक अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसने समय पर वेतन भुगतान और अवैध कटौतियों को रोकने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा प्रदान किया। हालांकि, आज के डिजिटल और संविदा-आधारित रोजगार के दौर में इसे और अधिक आधुनिक, सरल और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है। नए श्रम कोड में इस अधिनियम के प्रावधान शामिल करके इसे एकीकृत और सुदृढ़ किया गया है, जिससे भविष्य में श्रमिकों को और अधिक लाभ मिलने की संभावना है।