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“भारत में बाल तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण एक भयावह सच्चाई” — सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक दिशा-निर्देश

“भारत में बाल तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण एक भयावह सच्चाई” — सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक दिशा-निर्देश: नाबालिग पीड़ितों की गवाही को संवेदनशील और यथार्थवादी दृष्टि से परखने का आदेश

भारत में बाल तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण को “एक अत्यंत विचलित करने वाली और शर्मनाक सच्चाई” बताते हुए Supreme Court of India ने शुक्रवार, 19 दिसंबर को एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व वाला फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने देश भर की निचली अदालतों और न्यायिक प्राधिकरणों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि नाबालिग तस्करी पीड़ितों और वेश्यावृत्ति के शिकार बच्चों की गवाही को अत्यंत संवेदनशील, मानवीय और यथार्थवादी दृष्टिकोण से परखा जाना चाहिए।

न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी कि अदालतें पीड़ित बच्चों की गवाही को मामूली विरोधाभासों, स्मृति में अंतर, या रूढ़िवादी सामाजिक धारणाओं (stereotypical notions) के आधार पर खारिज न करें। पीठ ने कहा कि ऐसे बच्चे गंभीर मानसिक आघात (trauma) से गुजरते हैं और उनसे वयस्कों जैसी सुसंगत, क्रमबद्ध और एकरूप गवाही की अपेक्षा करना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि न्याय के साथ अन्याय भी है।


पृष्ठभूमि: मामला और न्यायालय की चिंता

यह मामला बाल तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण से जुड़े एक आपराधिक मुकदमे से उत्पन्न हुआ, जिसमें निचली अदालत द्वारा पीड़ित नाबालिग की गवाही को कुछ कथित असंगतियों के आधार पर संदेह की दृष्टि से देखा गया था। अपील के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह प्रश्न आया कि क्या ऐसे मामलों में साक्ष्य के मूल्यांकन के लिए सामान्य आपराधिक मानक (ordinary criminal standards) को यथावत लागू किया जा सकता है।

अदालत ने इस अवसर पर व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि बाल तस्करी और यौन शोषण के मामले साधारण अपराध नहीं हैं। ये अपराध न केवल कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि मानव गरिमा, बचपन की पवित्रता और समाज की नैतिक चेतना पर सीधा आघात हैं।


“गहरी मानसिक पीड़ा से गुजरते हैं ये बच्चे”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि तस्करी और यौन शोषण का शिकार हुआ बच्चा:

  • भय, शर्म और अपराधबोध से ग्रस्त होता है
  • कई बार धमकी, हिंसा और भावनात्मक शोषण का सामना करता है
  • लंबे समय तक मानसिक आघात (Post-Traumatic Stress Disorder – PTSD) में रहता है

ऐसे में उससे यह अपेक्षा करना कि वह अदालत में बिना किसी विरोधाभास के, पूरी घटना को कालक्रम से, सटीक शब्दों में बयान करे — न्यायिक संवेदनशीलता के अभाव का परिचायक है


सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख दिशा-निर्देश

शीर्ष अदालत ने पूरे देश की अदालतों के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण दिशानिर्देश निर्धारित किए:

1. गवाही में मामूली विरोधाभासों को आधार न बनाएं

अदालत ने कहा कि समय, स्थान या घटना के क्रम से जुड़े छोटे-मोटे अंतर स्वाभाविक हैं, विशेष रूप से तब जब पीड़ित बच्चा हो। ऐसे विरोधाभासों को गवाही को खारिज करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

2. रूढ़िवादी सोच से बचें

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह धारणा कि “सच्चा पीड़ित ऐसा व्यवहार करेगा” या “ऐसा बयान देगा” — पूरी तरह गलत है। हर बच्चा अलग तरह से आघात को व्यक्त करता है।

3. आघात-सूचित दृष्टिकोण (Trauma-Informed Approach)

न्यायालयों को यह समझना होगा कि आघात स्मृति को प्रभावित करता है। घटनाएं कभी-कभी बिखरे हुए रूप में याद आती हैं, जो असत्य नहीं बल्कि मानसिक स्थिति का परिणाम होती हैं।

4. बच्चे के व्यवहार से निष्कर्ष न निकालें

यदि बच्चा शांत है, भावहीन है या रो नहीं रहा — तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह झूठ बोल रहा है। आघात के कारण भावनात्मक सुन्नता (emotional numbness) आम बात है।

5. सहायक साक्ष्य पर संतुलित दृष्टि

अदालत ने कहा कि चिकित्सा, परिस्थितिजन्य और दस्तावेजी साक्ष्यों को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए, न कि केवल इस आधार पर कि वे पीड़ित की गवाही के हर शब्द से मेल खाते हैं या नहीं।


निचली अदालतों को सख्त संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि अदालतें बाल पीड़ितों की गवाही को अवास्तविक अपेक्षाओं के कारण खारिज करती हैं, तो यह न केवल अपराधियों को संरक्षण देता है, बल्कि पीड़ितों को दोबारा शोषण (secondary victimization) का शिकार बनाता है।

पीठ ने कहा:

“न्यायालयों का दायित्व है कि वे न्याय का मंदिर बनें, न कि ऐसा स्थान जहाँ पीड़ित बच्चों को फिर से कठघरे में खड़ा किया जाए।”


अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लेख

अदालत ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सिद्धांतों और बाल अधिकारों से जुड़े वैश्विक मानकों का भी उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा कि भारत, एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते, बच्चों के सर्वोत्तम हित (best interests of the child) के सिद्धांत को सर्वोपरि रखे।


विधिक ढांचे की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

  • बाल यौन शोषण और तस्करी के मामलों में विशेष कानूनों का उद्देश्य पीड़ित-केंद्रित न्याय है
  • इन कानूनों की व्याख्या करते समय तकनीकी दृष्टिकोण के बजाय संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए

अदालत ने कहा कि न्यायिक विवेक का प्रयोग करते समय यह याद रखना आवश्यक है कि अपराधी अक्सर संगठित गिरोहों का हिस्सा होते हैं, जबकि पीड़ित बच्चा पूर्णतः असहाय स्थिति में होता है।


समाज और न्यायपालिका के लिए संदेश

यह फैसला केवल न्यायालयों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक आईना है। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया कि:

  • बाल तस्करी केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता भी है
  • पीड़ितों पर संदेह करना, वास्तव में अपराधियों को मजबूत करना है

कानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

कानूनी जानकारों ने इस फैसले को “पीड़ित-केंद्रित न्याय की दिशा में मील का पत्थर” बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में न केवल निचली अदालतों, बल्कि जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष के दृष्टिकोण को भी प्रभावित करेगा।


भविष्य पर प्रभाव

इस निर्णय के बाद:

  • निचली अदालतों को अपने निर्णयों में अधिक संवेदनशील भाषा और तर्क अपनाने होंगे
  • अभियोजन पक्ष को भी पीड़ित बच्चों से पूछताछ करते समय विशेष सावधानी बरतनी होगी
  • न्यायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में trauma-informed adjudication पर जोर बढ़ेगा

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में मानवीय दृष्टिकोण को और मजबूत करता है। यह स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य केवल दोष सिद्ध करना या बरी करना नहीं है, बल्कि पीड़ित को सम्मान, सुरक्षा और न्याय दिलाना भी है।

बाल तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण जैसे अपराधों में यदि न्यायालय संवेदनशील नहीं होंगे, तो कानून अपनी आत्मा खो देगा। इस फैसले के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि न्याय की प्रक्रिया स्वयं किसी बच्चे के लिए एक और आघात न बन जाए।

यह निर्णय एक सशक्त संदेश है — बच्चों की गवाही को संदेह की नहीं, समझ और करुणा की दृष्टि से देखा जाना चाहिए, क्योंकि न्याय तभी सच्चा होगा, जब वह सबसे कमजोर के साथ खड़ा होगा।