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भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 5: सजा में लघुकरण (Commutation) की संवैधानिक शक्ति, उद्देश्य और भारतीय दंड व्यवस्था में इसका गहरा प्रभाव

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 5: सजा में लघुकरण (Commutation) की संवैधानिक शक्ति, उद्देश्य और भारतीय दंड व्यवस्था में इसका गहरा प्रभाव


प्रस्तावना

       भारतीय दंड न्याय प्रणाली केवल अपराध और सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका मूल उद्देश्य अपराधी को सुधार का अवसर देना भी है। इसी सुधारात्मक सिद्धांत को जीवंत रूप देने के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में धारा 5 को विशेष महत्व दिया गया है।

        यह धारा सरकार को यह शक्ति प्रदान करती है कि वह किसी अपराधी की सजा को कम या परिवर्तित (Commutation) कर सके, वह भी अपराधी की सहमति के बिना। यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 54 और 55 का आधुनिक और संगठित स्वरूप है, जो भारतीय आपराधिक कानून में मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक माना जाता है।

BNS की धारा 5 यह सिद्ध करती है कि भारतीय कानून केवल दंड देने वाला तंत्र नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास की संभावना को भी समान महत्व देता है।


धारा 5 का मूल स्वरूप

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 5 के अनुसार —

“उपयुक्त सरकार किसी भी अपराधी की सजा को, उसकी सहमति के बिना भी, कम या परिवर्तित कर सकती है।”

इसका अर्थ यह है कि सरकार किसी भी न्यायालय द्वारा दी गई सजा को नरम रूप में बदल सकती है, बशर्ते वह विधि के अनुरूप हो।


Commutation का कानूनी अर्थ

Commutation का अर्थ है —
सजा के प्रकार को बदले बिना दोष सिद्धि को प्रभावित किए, सजा की कठोरता को कम करना।

यह माफी (Pardon) नहीं है, बल्कि दंड में परिवर्तन है। अपराध बना रहता है, केवल सजा का स्वरूप बदलता है।


धारा 5 के अंतर्गत सजा में परिवर्तन के प्रकार

धारा 5 के अंतर्गत सरकार निम्नलिखित परिवर्तन कर सकती है:

1. मृत्युदंड से अन्य सजा में परिवर्तन

यदि किसी अपराधी को मृत्युदंड दिया गया है, तो सरकार उसे —

  • आजीवन कारावास
  • या किसी निश्चित अवधि के कारावास

में परिवर्तित कर सकती है।

यह अधिकार विशेष रूप से उन मामलों में प्रयोग किया जाता है जहाँ अपराधी की उम्र, मानसिक स्थिति, आचरण या परिस्थितियाँ दया योग्य मानी जाती हैं।


2. आजीवन कारावास से सीमित अवधि का कारावास

आजीवन कारावास का अर्थ जीवन भर की सजा होता है। लेकिन सरकार इसे —

  • 14 वर्ष
  • 20 वर्ष
  • या किसी अन्य निश्चित अवधि

में बदल सकती है।

यह परिवर्तन स्वतः नहीं होता, बल्कि सरकार द्वारा परिस्थितियों के मूल्यांकन के बाद किया जाता है।


3. कठोर कारावास से साधारण कारावास या जुर्माना

यदि अपराधी को कठोर श्रम सहित कारावास की सजा मिली है, तो सरकार उसे साधारण कारावास या केवल जुर्माने में परिवर्तित कर सकती है।


‘उपयुक्त सरकार’ की परिभाषा

धारा 5 में “उपयुक्त सरकार” शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है —

केंद्र सरकार

जब अपराध संघ की कार्यकारी शक्ति से संबंधित कानून के अंतर्गत हुआ हो, जैसे —

  • आतंकवाद
  • रक्षा
  • विदेशी मामलों से जुड़े अपराध

राज्य सरकार

जब अपराध राज्य की कार्यकारी शक्ति से संबंधित कानून के अंतर्गत हुआ हो, जैसे —

  • भारतीय दंड संहिता / BNS के सामान्य अपराध
  • राज्य कानूनों से जुड़े अपराध

धारा 5 का संवैधानिक आधार

धारा 5 का संबंध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 से भी जुड़ा है, जहाँ राष्ट्रपति और राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति दी गई है।

धारा 5 उस शक्ति का विधायी विस्तार है, जो कार्यपालिका को न्यायिक दंड व्यवस्था में संतुलन प्रदान करता है।


धारा 5 का उद्देश्य

धारा 5 का मुख्य उद्देश्य है —

  1. न्याय को मानवीय बनाना
  2. सुधारात्मक न्याय को बढ़ावा देना
  3. जेल सुधार नीति को समर्थन देना
  4. अपराधी के पुनर्वास का मार्ग खोलना
  5. कठोरता और करुणा के बीच संतुलन बनाना

यह धारा यह मानती है कि हर अपराधी जन्म से अपराधी नहीं होता, बल्कि परिस्थितियाँ उसे अपराध की ओर धकेलती हैं।


14 वर्ष वाला भ्रम

आम धारणा है कि आजीवन कारावास का अर्थ 14 वर्ष होता है। यह पूरी तरह सही नहीं है।

आजीवन कारावास का अर्थ है —
पूरे जीवन के लिए कारावास।

हाँ, सरकार 14 वर्ष पूरे होने के बाद सजा में लघुकरण पर विचार कर सकती है, लेकिन यह अपराधी का अधिकार नहीं, बल्कि सरकार का विवेकाधिकार है।


धारा 4 और धारा 5 का आपसी संबंध

धारा 4 धारा 5
सजा के प्रकार बताती है सजा में परिवर्तन की प्रक्रिया बताती है
न्यायालय की शक्ति सरकार की शक्ति
दंड का निर्धारण दंड का संशोधन
सजा का स्वरूप सजा का लघुकरण

इस प्रकार, धारा 4 न्यायिक शक्ति को दर्शाती है, जबकि धारा 5 कार्यपालिका की संतुलनकारी भूमिका को।


धारा 5 और सुधारात्मक न्याय

आधुनिक आपराधिक कानून दंड के साथ सुधार को भी महत्व देता है। धारा 5 इस सिद्धांत का मूर्त रूप है।

यदि कोई अपराधी —

  • जेल में अच्छा आचरण करता है
  • शिक्षा प्राप्त करता है
  • समाज में लौटने के योग्य बनता है
  • अपराध पर पश्चाताप करता है

तो सरकार उसे सुधार का अवसर देती है।


न्यायिक दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने अनेक मामलों में कहा है कि —

“सजा का उद्देश्य बदला नहीं, सुधार है।”

धारा 5 इसी न्यायिक सोच को विधायी रूप देती है।


सामाजिक प्रभाव

धारा 5 के कारण —

  • जेलों में भीड़ कम होती है
  • अपराधियों में सुधार की प्रेरणा मिलती है
  • समाज में पुनर्वास संभव होता है
  • कठोर न्याय की छवि नरम होती है

आलोचनात्मक दृष्टिकोण

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि धारा 5 का दुरुपयोग राजनीतिक दबाव में हो सकता है।

लेकिन न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया है कि सजा में लघुकरण मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि न्यायसंगत आधार पर ही होना चाहिए।


धारा 5 बनाम क्षमादान

धारा 5 में सजा कम होती है, अपराध समाप्त नहीं होता।
क्षमादान में अपराध और सजा दोनों समाप्त हो जाते हैं।

इस प्रकार, धारा 5 अधिक संतुलित व्यवस्था प्रदान करती है।


भारतीय दंड नीति में धारा 5 का स्थान

BNS की धारा 5 यह सिद्ध करती है कि भारतीय कानून अब केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि सुधारात्मक, पुनर्वासात्मक और मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है।


निष्कर्ष

       भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 5 भारतीय दंड व्यवस्था की आत्मा है। यह धारा यह बताती है कि कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि उसे समाज में फिर से सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर देना भी है।

धारा 5 न्याय और करुणा के बीच वह सेतु है, जो भारतीय न्याय प्रणाली को अधिक संवेदनशील, संतुलित और आधुनिक बनाता है।

यह प्रावधान यह स्पष्ट करता है कि भारतीय कानून में दंड अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि सुधार और सामाजिक संतुलन की दिशा में एक साधन है।