IndianLawNotes.com

भारतीय न्याय संहिता (BNS) पर 20 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न P-1

भारतीय न्याय संहिता (BNS) पर 20 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1.भारतीय न्याय संहिता, 2023 को लागू करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके प्रमुख उद्देश्य एवं विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।

भूमिका

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रतीक है। यह संहिता भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) का स्थान लेती है, जो लगभग डेढ़ शताब्दी तक भारत में आपराधिक कानून का आधार रही। IPC अपने समय में अत्यंत प्रभावी रही, परंतु बदलते सामाजिक, तकनीकी, आर्थिक और संवैधानिक परिवेश में उसकी प्रासंगिकता धीरे-धीरे कम होती गई।

आज का भारत एक डिजिटल, लोकतांत्रिक और अधिकार-सचेत समाज है, जहाँ अपराधों की प्रकृति, अपराधियों की प्रवृत्ति और पीड़ितों की अपेक्षाएँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। ऐसे में एक ऐसे कानून की आवश्यकता थी, जो केवल दंड देने तक सीमित न होकर न्याय, सुधार और सामाजिक संतुलन की अवधारणा को अपनाए। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 को लागू किया गया।


भारतीय न्याय संहिता लागू करने की आवश्यकता

1. औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति

IPC ब्रिटिश शासन द्वारा बनाई गई थी, जिसका मूल उद्देश्य भारतीय जनता को नियंत्रित करना और औपनिवेशिक सत्ता की रक्षा करना था। उसमें नागरिकों के अधिकारों की तुलना में राज्य की सत्ता को अधिक महत्व दिया गया था। स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप एक ऐसे कानून की आवश्यकता थी, जो जनता के हितों, गरिमा और स्वतंत्रता को केंद्र में रखे।

2. अपराधों की बदलती प्रकृति

1860 में साइबर अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी, ऑनलाइन उत्पीड़न, डेटा चोरी, क्रिप्टोकरेंसी फ्रॉड, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, संगठित अपराध सिंडिकेट जैसे अपराधों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। IPC इन आधुनिक अपराधों से निपटने में अपर्याप्त सिद्ध हो रही थी।

3. पीड़ितों की उपेक्षा

IPC मुख्यतः अपराधी और राज्य के बीच संबंधों पर आधारित थी। पीड़ित के अधिकार, सम्मान और पुनर्वास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया था। आधुनिक न्याय प्रणाली में पीड़ित को भी न्याय का केंद्र माना जाता है।

4. दंड का प्रतिशोधात्मक स्वरूप

IPC में दंड का उद्देश्य मुख्यतः प्रतिशोध और भय उत्पन्न करना था, जबकि आधुनिक दंडशास्त्र सुधारात्मक और पुनर्वासात्मक न्याय पर आधारित है। अपराधी को समाज का उपयोगी सदस्य बनाने की सोच IPC में पर्याप्त नहीं थी।

5. न्यायिक प्रक्रिया में जटिलता

IPC की भाषा और संरचना जटिल, तकनीकी और आम नागरिकों के लिए कठिन थी। इससे न्याय प्रक्रिया धीमी और जटिल हो जाती थी।

6. संविधानिक मूल्यों के अनुरूप कानून की आवश्यकता

भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। IPC के कई प्रावधान इन मूल्यों से पूर्णतः सामंजस्य नहीं रखते थे। इसलिए संविधानिक दृष्टिकोण से भी एक नए कानून की आवश्यकता थी।


भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रमुख उद्देश्य

भारतीय न्याय संहिता केवल कानून का संशोधन नहीं, बल्कि न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत करती है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

1. न्याय को केंद्र में रखना

BNS का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना करना है। इसमें दंड को न्याय का साधन माना गया है, उद्देश्य नहीं।

2. पीड़ित-केंद्रित न्याय व्यवस्था

पीड़ित की गरिमा, सुरक्षा, मुआवजा और पुनर्वास को न्याय प्रक्रिया का अभिन्न अंग बनाया गया है।

3. सुधारात्मक न्याय की स्थापना

अपराधी को सुधारने, समाज में पुनः समाहित करने और पुनरावृत्ति रोकने पर बल दिया गया है।

4. आधुनिक अपराधों का समावेश

डिजिटल, आर्थिक, संगठित और अंतरराष्ट्रीय अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

5. सामाजिक सुरक्षा

महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है।

6. न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाना

स्पष्ट भाषा, सरल संरचना और तार्किक वर्गीकरण द्वारा कानून को अधिक सुलभ बनाया गया है।

7. भारतीय मूल्यों की पुनर्स्थापना

औपनिवेशिक सोच के स्थान पर भारतीय सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को आधार बनाया गया है।


भारतीय न्याय संहिता, 2023 की प्रमुख विशेषताएँ

1. सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में मान्यता

BNS में पहली बार सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में शामिल किया गया है। इससे छोटे अपराधों में अपराधी को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाया जाता है, न कि केवल कारावास द्वारा उसका भविष्य नष्ट किया जाता है।

2. भीड़ हिंसा (Mob Lynching) का स्पष्ट अपराधीकरण

भीड़ द्वारा की गई हत्या या हिंसा को पृथक अपराध माना गया है, जिससे सामूहिक अपराध प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सके।

3. संगठित अपराध पर कठोर नियंत्रण

माफिया, गिरोह, तस्करी नेटवर्क और संगठित अपराध समूहों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं।

4. आतंकवाद पर सख्त दृष्टिकोण

देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के विरुद्ध कृत्यों पर कठोर और स्पष्ट दंड का प्रावधान किया गया है।

5. महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर विशेष प्रावधान

बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, नाबालिगों से संबंधित अपराधों और तस्करी पर कठोर दंड निर्धारित किए गए हैं।

6. बच्चों की सुरक्षा

बाल अपराधों के मामलों में विशेष संवेदनशीलता और कठोरता दोनों का समन्वय किया गया है।

7. साइबर अपराधों की स्पष्ट परिभाषा

डिजिटल धोखाधड़ी, ऑनलाइन उत्पीड़न, पहचान चोरी, डेटा अपराध आदि को विधिक रूप से स्पष्ट किया गया है।

8. देशद्रोह के स्थान पर नया प्रावधान

देशद्रोह की औपनिवेशिक अवधारणा को हटाकर राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध कृत्यों को अधिक संतुलित रूप में परिभाषित किया गया है।

9. दंड में अनुपात का सिद्धांत

अपराध और दंड के बीच संतुलन स्थापित किया गया है, जिससे अत्यधिक कठोरता या अत्यधिक उदारता से बचा जा सके।

10. पीड़ित अधिकारों की मान्यता

पीड़ित को सूचना, मुआवजा और सम्मानजनक व्यवहार का अधिकार दिया गया है।

11. सरल भाषा और संरचना

संहिता की भाषा अपेक्षाकृत सरल, स्पष्ट और तार्किक है, जिससे आम नागरिक भी कानून को समझ सके।

12. नैतिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण

BNS केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को भी दर्शाती है।


भारतीय न्याय संहिता का सामाजिक प्रभाव

भारतीय न्याय संहिता समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करती है। यह नागरिकों को यह संदेश देती है कि कानून केवल दंड देने का माध्यम नहीं, बल्कि न्याय, सुरक्षा और सुधार का साधन है। इससे—

  • अपराध नियंत्रण में प्रभावशीलता बढ़ेगी
  • पीड़ितों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा
  • अपराधियों में सुधार की संभावना बढ़ेगी
  • समाज में विधि का सम्मान बढ़ेगा

आलोचनात्मक दृष्टिकोण

यद्यपि भारतीय न्याय संहिता एक प्रगतिशील कदम है, फिर भी इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे किस प्रकार लागू किया जाता है। यदि पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका इसे संवेदनशीलता और निष्पक्षता से लागू करें, तभी इसका वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। केवल कानून बदलना पर्याप्त नहीं, बल्कि न्यायिक संस्कृति में भी परिवर्तन आवश्यक है।


निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक युगांतकारी परिवर्तन है। यह औपनिवेशिक दंड व्यवस्था से मुक्त होकर न्याय, मानव गरिमा, सुधार और सामाजिक संतुलन पर आधारित है। बदलते समय, तकनीकी युग और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप यह संहिता भारत को एक आधुनिक, संवेदनशील और प्रभावी न्याय प्रणाली की ओर अग्रसर करती है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 केवल एक नया कानून नहीं, बल्कि भारत के न्यायिक इतिहास में एक नई सोच, नई दिशा और नए युग की शुरुआत है।


2.BNS और भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) के बीच प्रमुख अंतर विस्तार से बताइए।

भूमिका (Introduction)

भारतीय दंड संहिता, 1860 (Indian Penal Code – IPC) भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की आधारशिला रही है। इसे लॉर्ड मैकॉले की अध्यक्षता में गठित प्रथम विधि आयोग द्वारा तैयार किया गया था और यह लगभग 163 वर्षों तक प्रभावी रही। यद्यपि IPC ने समय-समय पर संशोधनों के माध्यम से स्वयं को अद्यतन करने का प्रयास किया, फिर भी यह संहिता औपनिवेशिक सोच, शासक-प्रजा संबंध और 19वीं सदी की सामाजिक-तकनीकी परिस्थितियों पर आधारित थी।

21वीं सदी में डिजिटल अपराध, साइबर आतंकवाद, संगठित अपराध, भीड़ हिंसा, राष्ट्रीय सुरक्षा, महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध, तथा पीड़ित-केंद्रित न्याय जैसी चुनौतियों ने एक नई दंड संहिता की आवश्यकता को जन्म दिया। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) को लागू किया गया, जिसने IPC को प्रतिस्थापित कर दिया।

BNS केवल IPC का संशोधित रूप नहीं है, बल्कि यह भारतीय संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण और आधुनिक आपराधिक न्याय दर्शन पर आधारित एक नई संहिता है।


1. वैचारिक एवं दार्शनिक अंतर (Philosophical Difference)

IPC

  • IPC का मूल उद्देश्य औपनिवेशिक शासन को सुरक्षित रखना था।
  • इसमें राज्य-केंद्रित (State-centric) दृष्टिकोण था।
  • अपराध को राज्य के विरुद्ध माना गया, पीड़ित की भूमिका सीमित रही।
  • दंड का उद्देश्य मुख्यतः प्रतिशोध (Retribution) और भय (Deterrence) था।

BNS

  • BNS का आधार न्याय (Justice) है, न कि केवल दंड।
  • यह नागरिक-केंद्रित और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाती है।
  • सुधारात्मक (Reformative) और पुनर्वासात्मक (Rehabilitative) सिद्धांतों पर बल।
  • संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के अनुरूप संहिता।

निष्कर्ष:
IPC “शासन की रक्षा” पर केंद्रित थी, जबकि BNS “न्याय की स्थापना” पर।


2. नाम और प्रतीकात्मक परिवर्तन

आधार IPC BNS
नाम Indian Penal Code Bharatiya Nyaya Sanhita
प्रतीक औपनिवेशिक पहचान भारतीय संवैधानिक पहचान
भाषा-दृष्टि Penal (दंड) Nyaya (न्याय)

महत्व:
‘Penal’ शब्द दंड को प्राथमिकता देता है, जबकि ‘Nyaya’ न्याय, संतुलन और निष्पक्षता को।


3. संरचना एवं धाराओं की संख्या

पहलू IPC BNS
कुल धाराएँ 511 358 (लगभग)
अध्याय 23 पुनर्गठित एवं तार्किक
शैली जटिल, दोहराव सरल, समेकित

BNS में:

  • कई समान प्रकृति की धाराओं को एकीकृत किया गया।
  • अनावश्यक और अप्रचलित अपराध हटाए गए।
  • भाषा को सरल और समकालीन बनाया गया।

4. औपनिवेशिक अपराधों का उन्मूलन

IPC में

  • राजद्रोह (Section 124A)
  • ब्रिटिश शासन-समर्थक अपराध
  • औपनिवेशिक सत्ता की आलोचना पर दंड

BNS में

  • राजद्रोह को समाप्त कर दिया गया।
  • उसकी जगह “भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरा” जैसे सटीक अपराध जोड़े गए।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संतुलित किया गया।

5. महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में बदलाव

IPC

  • बलात्कार की परिभाषा सीमित थी।
  • कई अपराधों में लैंगिक संवेदनशीलता का अभाव।
  • दंड संरचना बिखरी हुई।

BNS

  • बलात्कार की परिभाषा अधिक व्यापक।
  • नाबालिगों, सामूहिक बलात्कार और क्रूर अपराधों पर कठोर दंड।
  • महिलाओं की गरिमा, सहमति और सम्मान पर विशेष बल।
  • लैंगिक अपराधों में त्वरित और प्रभावी न्याय की व्यवस्था।

6. बच्चों के विरुद्ध अपराध

  • IPC में बच्चों से संबंधित अपराध सीमित थे।
  • BNS में:
    • बाल यौन अपराधों का स्पष्ट समावेश।
    • मानव तस्करी, बाल श्रम और शोषण पर कठोर दंड।
    • अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रावधान।

7. भीड़ हिंसा और संगठित अपराध

IPC

  • भीड़ हिंसा के लिए कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं।
  • संगठित अपराध के लिए अलग-अलग धाराएँ।

BNS

  • Mob Lynching को स्वतंत्र अपराध के रूप में मान्यता।
  • संगठित अपराध, माफिया गतिविधियाँ और गिरोह-आधारित अपराधों पर कठोर दृष्टिकोण।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व की स्पष्ट अवधारणा।

8. आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा

  • IPC आतंकवाद जैसे आधुनिक अपराधों से निपटने में अपर्याप्त थी।
  • BNS:
    • राष्ट्र की सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और संप्रभुता के विरुद्ध अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है।
    • डिजिटल माध्यम से किए गए राष्ट्रविरोधी कृत्यों को शामिल करती है।

9. साइबर और डिजिटल अपराध

IPC

  • डिजिटल अपराधों की कल्पना नहीं थी।
  • बाद में IT Act के माध्यम से पूरक व्यवस्था।

BNS

  • साइबर अपराधों को दंड संहिता के मुख्य ढांचे में शामिल किया गया।
  • डिजिटल साक्ष्य, ऑनलाइन धोखाधड़ी, पहचान चोरी पर स्पष्ट दंड।

10. दंड की प्रकृति में परिवर्तन

पहलू IPC BNS
दृष्टिकोण दंडात्मक न्याय-सुधारात्मक
सामुदायिक सेवा नहीं शामिल
पीड़ित प्रतिकर सीमित सुदृढ़
सुधार गौण प्राथमिक

BNS में:

  • सामुदायिक सेवा, सुधारात्मक दंड और पुनर्वास को महत्व।
  • कारावास के विकल्पों पर बल।

11. पीड़ित-केंद्रित न्याय

  • IPC में पीड़ित केवल गवाह।
  • BNS में:
    • पीड़ित को प्रक्रिया का केंद्रीय भाग।
    • मुआवजा, संरक्षण और सम्मानजनक व्यवहार की व्यवस्था।

12. भाषा और स्पष्टता

  • IPC की भाषा जटिल और 19वीं सदी की।
  • BNS:
    • सरल, स्पष्ट और व्यावहारिक भाषा।
    • व्याख्या में न्यायालयों पर कम बोझ।

13. संवैधानिक अनुरूपता

  • IPC संविधान से पूर्व की संहिता।
  • BNS:
    • सीधे-सीधे संवैधानिक मूल्यों से प्रेरित।
    • मानवाधिकार, गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान।

14. समग्र मूल्यांकन (Critical Evaluation)

IPC

✔ ऐतिहासिक महत्व
✔ कानूनी स्थिरता
✘ औपनिवेशिक सोच
✘ आधुनिक अपराधों के प्रति अपर्याप्त

BNS

✔ आधुनिक, भारतीय और संवैधानिक
✔ पीड़ित-केंद्रित
✔ तकनीकी अपराधों के अनुकूल
✘ प्रारंभिक वर्षों में व्याख्या संबंधी चुनौतियाँ संभव


निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय न्याय संहिता, 2023 केवल IPC का स्थानापन्न नहीं है, बल्कि यह भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक वैचारिक क्रांति का प्रतिनिधित्व करती है। जहाँ IPC दंड और भय पर आधारित थी, वहीं BNS न्याय, सुधार और मानवीय गरिमा पर आधारित है।

BNS का उद्देश्य अपराध को केवल दंडित करना नहीं, बल्कि:

  • समाज की रक्षा करना,
  • पीड़ित को न्याय दिलाना,
  • अपराधी का सुधार करना,
  • और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करना है।

निस्संदेह, BNS भारत की बदलती सामाजिक, तकनीकी और संवैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप एक आधुनिक और दूरदर्शी दंड संहिता है।

3.BNS में “अपराध” और “दंड” की अवधारणा को कैसे परिभाषित किया गया है? विश्लेषण कीजिए।


भूमिका (Introduction)

किसी भी आपराधिक न्याय प्रणाली की आत्मा दो मूल अवधारणाओं पर टिकी होती है—

  1. अपराध (Crime)
  2. दंड (Punishment)

भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) में अपराध और दंड की अवधारणा मुख्यतः औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं, राज्य की सर्वोच्चता, और भय के सिद्धांत (Deterrence Theory) पर आधारित थी। IPC का मूल उद्देश्य था—प्रजा को नियंत्रित करना और शासन को सुरक्षित रखना

इसके विपरीत, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) एक आधुनिक, संवैधानिक और भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित संहिता है, जिसमें अपराध और दंड की अवधारणा को न्याय, मानवीय गरिमा, सुधार और सामाजिक संतुलन के आलोक में पुनर्परिभाषित किया गया है।

BNS में अपराध केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि समाज, व्यक्ति और संविधान के विरुद्ध किया गया ऐसा आचरण है जो सामाजिक शांति और नैतिक व्यवस्था को प्रभावित करता है। इसी प्रकार, दंड केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि न्याय की पुनर्स्थापना का साधन है।


भाग–I : BNS में “अपराध” (Crime) की अवधारणा


1. अपराध की मूल परिभाषा और स्वरूप

IPC के अंतर्गत:

  • अपराध को संकीर्ण अर्थ में राज्य के विरुद्ध कृत्य माना गया।
  • पीड़ित की भूमिका गौण रही।
  • नैतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं की अनदेखी।

BNS के अंतर्गत:

BNS में अपराध की अवधारणा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—

  1. कानूनी उल्लंघन (Legal Wrong)
  2. सामाजिक क्षति (Social Harm)
  3. संवैधानिक मूल्यों का हनन

 अर्थात, कोई कृत्य तभी अपराध है जब वह:

  • कानून द्वारा निषिद्ध हो,
  • समाज या व्यक्ति को वास्तविक क्षति पहुँचाए,
  • और न्याय, समानता, गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित करे।

2. अपराध की बदलती प्रकृति (Changing Nature of Crime)

BNS यह स्वीकार करती है कि अपराध स्थिर अवधारणा नहीं, बल्कि समय, समाज और तकनीक के साथ विकसित होने वाली प्रक्रिया है।

IPC की सीमाएँ:

  • साइबर अपराधों की कल्पना नहीं
  • भीड़ हिंसा, संगठित अपराध जैसे नए खतरे शामिल नहीं

BNS की दृष्टि:

  • अपराध को डायनामिक सामाजिक परिघटना माना गया।
  • डिजिटल, आर्थिक, संगठित और सामूहिक अपराधों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया।

3. अपराध और नैतिकता का संबंध

IPC में:

  • नैतिकता और कानून का कठोर विभाजन।

BNS में:

  • नैतिक आचरण और सामाजिक उत्तरदायित्व को महत्व।
  • ऐसे कृत्य जो समाज की सामूहिक चेतना को झकझोरते हैं, उन्हें अपराध की श्रेणी में स्पष्ट किया गया।

 उदाहरण:

  • भीड़ द्वारा हिंसा
  • सामूहिक घृणा से प्रेरित अपराध
  • कमजोर वर्गों पर संरचनात्मक हिंसा

4. अपराध में पीड़ित की भूमिका (Victim-Centric Concept of Crime)

IPC मॉडल:

  • राज्य बनाम अभियुक्त
  • पीड़ित केवल एक गवाह

BNS मॉडल:

  • पीड़ित-केंद्रित अपराध सिद्धांत
  • अपराध को पीड़ित के अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा गया
  • पीड़ित की:
    • गरिमा
    • मानसिक पीड़ा
    • सामाजिक क्षति
      को अपराध निर्धारण में महत्व दिया गया

5. अपराध की मंशा (Mens Rea) और सामाजिक प्रभाव

BNS में अपराध निर्धारण केवल इरादे तक सीमित नहीं है, बल्कि:

  • कृत्य के सामाजिक परिणाम
  • पीड़ित और समाज पर उसके दीर्घकालिक प्रभाव
  • अपराध की संरचनात्मक प्रकृति
    को भी ध्यान में रखा गया है।

भाग–II : BNS में “दंड” (Punishment) की अवधारणा


1. दंड की पारंपरिक अवधारणा बनाम BNS की अवधारणा

IPC में दंड:

  • प्रतिशोध (Retribution)
  • भय उत्पन्न करना (Deterrence)
  • कठोर कारावास पर अत्यधिक निर्भरता

BNS में दंड:

BNS दंड को न्याय का साधन मानती है, न कि केवल सजा।

दंड के उद्देश्य:

  1. न्याय की पुनर्स्थापना
  2. पीड़ित की क्षतिपूर्ति
  3. अपराधी का सुधार
  4. समाज की सुरक्षा

2. दंड का सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Theory)

BNS में दंड का प्रमुख उद्देश्य है—  अपराधी को बेहतर नागरिक बनाना

  • कारावास को अंतिम उपाय माना गया
  • सुधार, पुनर्वास और सामाजिक पुनःएकीकरण पर बल
  • अपराधी को समाज से पूरी तरह अलग करने के बजाय उसे समाज के लिए उपयोगी बनाना

3. सामुदायिक सेवा (Community Service) का समावेश

BNS की एक क्रांतिकारी विशेषता:

  • पहली बार सामुदायिक सेवा को वैधानिक दंड के रूप में मान्यता
  • छोटे और मध्यम अपराधों में:
    • जेल के बजाय समाज-सेवा
    • अपराधी में उत्तरदायित्व की भावना का विकास

👉 यह दंड:

  • समाज को लाभ देता है
  • अपराधी को सुधारने का अवसर देता है

4. दंड में अनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality)

BNS में दंड:

  • अपराध की गंभीरता
  • पीड़ित को हुई क्षति
  • अपराधी की परिस्थितियाँ
    के अनुपात में निर्धारित किया गया है।

👉 उद्देश्य:

  • न तो अत्यधिक कठोर दंड
  • न ही अत्यधिक उदार दंड

5. पीड़ित प्रतिकर और पुनर्स्थापनात्मक न्याय

BNS में दंड का एक महत्वपूर्ण पहलू है—  पीड़ित-केंद्रित न्याय (Restorative Justice)

  • केवल अपराधी को सजा देना पर्याप्त नहीं
  • पीड़ित को:
    • आर्थिक मुआवजा
    • मानसिक संतोष
    • सामाजिक पुनर्स्थापना
      देना भी दंड प्रक्रिया का हिस्सा

6. दंड और मानवाधिकार

BNS दंड को:

  • मानवीय गरिमा के अनुरूप बनाती है
  • क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक दंड से दूरी
  • संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुरूप

7. मृत्युदंड और आजीवन कारावास पर दृष्टिकोण

BNS में:

  • मृत्युदंड को अत्यंत दुर्लभ मामलों तक सीमित दृष्टि
  • आजीवन कारावास की अवधारणा को अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत बनाया गया
  • दंड में न्यायालय को विवेकाधिकार, परंतु स्पष्ट दिशानिर्देश

8. दंड और समाज की सुरक्षा

BNS यह स्वीकार करती है कि:

  • कुछ अपराधों में कठोर दंड आवश्यक है
  • विशेषकर:
    • आतंकवाद
    • संगठित अपराध
    • महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध जघन्य अपराध

 यहाँ दंड का उद्देश्य:

  • समाज की सुरक्षा
  • कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना

भाग–III : अपराध और दंड का परस्पर संबंध (Interrelationship)

BNS में अपराध और दंड को:

  • अलग-अलग नहीं
  • बल्कि न्याय की एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखा गया है।
  • अपराध = सामाजिक असंतुलन
  • दंड = उस संतुलन की पुनर्स्थापना

आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Analysis)

सकारात्मक पक्ष:

✔ आधुनिक और संवैधानिक दृष्टिकोण
✔ पीड़ित-केंद्रित न्याय
✔ सुधारात्मक दंड प्रणाली
✔ सामुदायिक सेवा जैसे नवीन उपाय

चुनौतियाँ:

✘ प्रारंभिक वर्षों में व्याख्या संबंधी भ्रम
✘ न्यायिक विवेक पर अधिक निर्भरता
✘ क्रियान्वयन में संस्थागत क्षमता की आवश्यकता


निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय न्याय संहिता, 2023 में “अपराध” और “दंड” की अवधारणा एक वैचारिक परिवर्तन का प्रतीक है।

जहाँ IPC में:

  • अपराध = राज्य के विरुद्ध कृत्य
  • दंड = प्रतिशोध और भय

वहीं BNS में:

  • अपराध = व्यक्ति, समाज और संविधान के विरुद्ध आचरण
  • दंड = न्याय, सुधार और पुनर्स्थापना

BNS का मूल दर्शन यह है कि—
“दंड का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि समाज में न्याय, संतुलन और मानवीय गरिमा को पुनः स्थापित करना है।”

4.BNS में संगठित अपराध और आतंकवाद से संबंधित प्रावधानों का विस्तार से वर्णन कीजिए।


भूमिका (Introduction)

आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली के समक्ष सबसे गंभीर चुनौतियों में संगठित अपराध और आतंकवाद का विशेष स्थान है। ये अपराध न केवल व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि राज्य की संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक व्यवस्था को भी सीधा खतरा पहुँचाते हैं।

भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) मुख्यतः 19वीं सदी के अपराध-बोध पर आधारित थी। उस समय माफिया नेटवर्क, अंतर्राज्यीय संगठित गिरोह, आर्थिक अपराध सिंडिकेट, साइबर-आधारित संगठित अपराध और वैश्विक आतंकवाद जैसी जटिल चुनौतियाँ मौजूद नहीं थीं। परिणामस्वरूप, IPC में इन अपराधों से निपटने के लिए समग्र और समर्पित प्रावधानों का अभाव था।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) ने इस कमी को दूर करते हुए पहली बार संगठित अपराध और आतंकवाद को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर, उनके लिए स्वतंत्र, कठोर और समकालीन प्रावधान प्रस्तुत किए हैं। यह एक नीतिगत और वैचारिक परिवर्तन को दर्शाता है।


भाग–I : BNS में संगठित अपराध (Organised Crime)


1. संगठित अपराध की अवधारणा

(क) IPC के अंतर्गत स्थिति

IPC में:

  • संगठित अपराध की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं थी।
  • हत्या, अपहरण, धोखाधड़ी, तस्करी आदि अपराध अलग-अलग धाराओं में बिखरे हुए थे।
  • अपराध के संगठनात्मक स्वरूप, निरंतरता और गिरोह-आधारित संरचना को अलग से नहीं पहचाना गया।

(ख) BNS का दृष्टिकोण

BNS में संगठित अपराध को एक स्वतंत्र, निरंतर और संरचित आपराधिक गतिविधि के रूप में मान्यता दी गई है।

👉 संगठित अपराध का आशय है—

  • किसी गिरोह, सिंडिकेट या संगठित समूह द्वारा,
  • निरंतरता (Continuing Unlawful Activity) के साथ,
  • आर्थिक लाभ, सत्ता, प्रभाव या नियंत्रण प्राप्त करने हेतु,
  • गंभीर अपराधों को अंजाम देना।

यह परिभाषा संगठित अपराध के तीन अनिवार्य तत्वों को स्पष्ट करती है—

  1. संगठित संरचना
  2. निरंतर आपराधिक गतिविधि
  3. लाभ या प्रभुत्व की मंशा

2. संगठित अपराध के प्रकार

BNS संगठित अपराध के अंतर्गत निम्नलिखित गतिविधियों को सम्मिलित करती है—

  • माफिया और गैंग-आधारित अपराध
  • मानव तस्करी और अंग तस्करी
  • ड्रग्स और हथियारों की तस्करी
  • आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग
  • साइबर संगठित अपराध
  • भूमि, खनन और ठेकेदारी माफिया
  • जबरन वसूली और सुपारी किलिंग

👉 इस प्रकार BNS ने संगठित अपराध को बहुआयामी खतरे के रूप में स्वीकार किया है।


3. संगठित अपराध के लिए दंडात्मक प्रावधान

BNS में संगठित अपराध के लिए:

  • कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान
  • गंभीर मामलों में मृत्युदंड का भी विकल्प
  • भारी आर्थिक जुर्माना और संपत्ति की जब्ती

विशेष रूप से:

  • गिरोह का नेतृत्व करने वाले,
  • वित्तीय सहायता देने वाले,
  • अपराध में सहयोग या षड्यंत्र करने वाले
    भी समान रूप से उत्तरदायी माने गए हैं।

👉 यह सामूहिक आपराधिक उत्तरदायित्व की अवधारणा को मजबूत करता है।


4. संगठित अपराध और आर्थिक शक्ति

BNS यह स्वीकार करती है कि:

  • संगठित अपराध केवल हिंसा नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति का दुरुपयोग है।
  • इसलिए अपराध से अर्जित संपत्ति:
    • कुर्क की जा सकती है
    • जब्त की जा सकती है
    • राज्य के अधीन लाई जा सकती है

यह प्रावधान संगठित अपराध की आर्थिक रीढ़ तोड़ने का प्रयास है।


5. संगठित अपराध और समाज पर प्रभाव

BNS में संगठित अपराध को:

  • लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा
  • कानून के शासन (Rule of Law) के विरुद्ध आचरण
  • आम नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता पर आघात
    के रूप में देखा गया है।

इसलिए दंड केवल प्रतिशोधात्मक नहीं, बल्कि निवारक (Preventive) और निरोधात्मक (Deterrent) भी है।


भाग–II : BNS में आतंकवाद (Terrorism)


1. आतंकवाद की परिभाषा और स्वरूप

IPC के अंतर्गत:

  • आतंकवाद का कोई समर्पित अध्याय नहीं।
  • राज्य विरोधी अपराध बिखरी धाराओं में।

BNS के अंतर्गत:

आतंकवाद को:

  • राज्य की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के विरुद्ध
  • भय, असुरक्षा और अराजकता फैलाने के उद्देश्य से
  • किया गया संगठित और हिंसक कृत्य
    माना गया है।

👉 BNS आतंकवाद को केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं करती, बल्कि इसमें:

  • आर्थिक आतंकवाद
  • साइबर आतंकवाद
  • वैचारिक और मनोवैज्ञानिक आतंक
    भी शामिल हैं।

2. आतंकवादी कृत्यों का दायरा

BNS के अनुसार आतंकवाद में शामिल हैं—

  • नागरिकों पर हिंसक हमले
  • सार्वजनिक स्थानों, परिवहन और आधारभूत ढाँचे पर हमला
  • सरकारी संस्थानों को निशाना बनाना
  • डिजिटल माध्यम से राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ
  • आतंकवादी संगठनों को वित्तीय या भौतिक सहायता

इस प्रकार BNS आतंकवाद को समग्र खतरे के रूप में परिभाषित करती है।


3. आतंकवाद के लिए दंड

BNS आतंकवाद को अत्यंत गंभीर अपराध मानती है।

दंड में शामिल हैं—

  • मृत्युदंड
  • आजीवन कारावास
  • दीर्घकालीन कठोर कारावास
  • संपत्ति जब्ती

👉 आतंकवादी गतिविधियों में:

  • प्रत्यक्ष अपराधी
  • सहायक
  • षड्यंत्रकर्ता
  • वित्तपोषक
    सभी को समान रूप से उत्तरदायी ठहराया गया है।

4. आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा

BNS का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि:

  • आतंकवाद केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं
  • बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न है।

इसलिए:

  • दंड अत्यंत कठोर
  • न्यायालयों को सीमित विवेक
  • राज्य को व्यापक सुरक्षा शक्तियाँ

5. आतंकवाद और डिजिटल युग

BNS ने पहली बार:

  • साइबर आतंकवाद
  • ऑनलाइन कट्टरपंथ
  • डिजिटल माध्यम से भर्ती और फंडिंग
    को स्पष्ट रूप से आतंकवादी कृत्य माना है।

👉 यह प्रावधान आधुनिक वैश्विक आतंकवाद की वास्तविकताओं के अनुरूप है।


भाग–III : संगठित अपराध और आतंकवाद – तुलनात्मक विश्लेषण

आधार संगठित अपराध आतंकवाद
उद्देश्य आर्थिक लाभ, नियंत्रण भय, अस्थिरता, राज्य विरोध
स्वरूप निरंतर आपराधिक गतिविधि वैचारिक/हिंसक अभियान
खतरा सामाजिक और आर्थिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय
दंड कठोर, संपत्ति जब्ती अत्यंत कठोर, मृत्युदंड तक

आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Analysis)

सकारात्मक पक्ष:

✔ IPC की बड़ी कमी दूर
✔ आधुनिक अपराधों की स्पष्ट पहचान
✔ सामूहिक उत्तरदायित्व की अवधारणा
✔ राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता

संभावित चुनौतियाँ:

✘ व्यापक परिभाषाओं के दुरुपयोग की आशंका
✘ कठोर दंड बनाम मानवाधिकार संतुलन
✘ प्रभावी क्रियान्वयन हेतु प्रशिक्षित एजेंसियों की आवश्यकता


निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय न्याय संहिता, 2023 में संगठित अपराध और आतंकवाद से संबंधित प्रावधान भारतीय आपराधिक कानून में एक ऐतिहासिक और निर्णायक परिवर्तन का प्रतीक हैं।

जहाँ IPC इन अपराधों को समझने और नियंत्रित करने में अपर्याप्त थी, वहीं BNS—

  • अपराध के संगठनात्मक, आर्थिक और वैचारिक पहलुओं को समझती है,
  • राज्य और समाज दोनों की सुरक्षा को केंद्र में रखती है,
  • और कानून के शासन को सुदृढ़ करने का प्रयास करती है।

निष्कर्षतः, BNS में संगठित अपराध और आतंकवाद से जुड़े प्रावधान न केवल दंडात्मक हैं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का एक समग्र कानूनी ढांचा प्रस्तुत करते हैं।

5.भीड़ द्वारा हत्या (Mob Lynching) को BNS में कैसे संबोधित किया गया है? इसकी कानूनी स्थिति स्पष्ट कीजिए।


भूमिका (Introduction)

भीड़ द्वारा हत्या (Mob Lynching) आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के लिए एक गंभीर सामाजिक और संवैधानिक संकट है। यह न केवल किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन करती है, बल्कि कानून के शासन (Rule of Law), न्यायिक व्यवस्था और राज्य की वैधानिक शक्ति को भी चुनौती देती है।

भारत में बीते वर्षों में धर्म, जाति, अफवाह, चोरी, गो-रक्षा, या नैतिक निगरानी (moral policing) जैसे आधारों पर हुई भीड़ हिंसा की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि पारंपरिक आपराधिक कानून ऐसे अपराधों से निपटने में अपर्याप्त हैं।
भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) में Mob Lynching के लिए कोई स्वतंत्र और विशिष्ट प्रावधान नहीं था। ऐसे मामलों में हत्या, दंगा, गैरकानूनी जमाव, आपराधिक षड्यंत्र जैसी धाराओं का सहारा लिया जाता था, जो इस अपराध की सामूहिक, योजनाबद्ध और प्रतीकात्मक प्रकृति को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर पाता था।

इसी पृष्ठभूमि में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) ने पहली बार भीड़ द्वारा हत्या और गंभीर भीड़ हिंसा को एक स्वतंत्र, विशिष्ट और दंडनीय अपराध के रूप में संबोधित किया है। यह भारतीय आपराधिक कानून में एक ऐतिहासिक और वैचारिक परिवर्तन है।


भाग–I : IPC के अंतर्गत Mob Lynching की स्थिति

1. IPC में प्रत्यक्ष प्रावधान का अभाव

IPC में:

  • Mob Lynching शब्द का कहीं उल्लेख नहीं
  • अपराधों को व्यक्तिगत कृत्य के रूप में देखा गया
  • सामूहिक हिंसा की विशिष्टता को मान्यता नहीं

आम तौर पर निम्न धाराओं का प्रयोग होता था:

  • हत्या (धारा 302)
  • गैरकानूनी जमाव (धारा 141–149)
  • दंगा (धारा 147–148)
  • आपराधिक षड्यंत्र (धारा 120B)

2. IPC मॉडल की सीमाएँ

  • सामूहिक अपराध की पहचान अस्पष्ट
  • भीड़ की सामूहिक मानसिकता (Collective Mens Rea) पर स्पष्ट कानून नहीं
  • पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण का अभाव
  • निवारक और प्रतीकात्मक प्रभाव कमजोर

 परिणामस्वरूप, Mob Lynching को “साधारण हत्या” के रूप में देखा गया, जबकि यह वास्तव में लोकतंत्र के विरुद्ध सामूहिक हिंसा है।


भाग–II : BNS में Mob Lynching की अवधारणा


1. Mob Lynching को स्वतंत्र अपराध के रूप में मान्यता

BNS ने पहली बार:

  • भीड़ द्वारा की गई हत्या या गंभीर हिंसा को
  • एक विशिष्ट और स्वतंत्र अपराध के रूप में पहचाना

 इसका अर्थ यह है कि अब Mob Lynching:

  • केवल हत्या नहीं,
  • बल्कि भीड़ की सामूहिक हिंसक कार्रवाई के रूप में दंडनीय है।

यह मान्यता अपने आप में यह स्वीकार करती है कि:

  • भीड़ की हिंसा अलग प्रकृति का अपराध है
  • इसका सामाजिक प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता है

2. Mob Lynching की कानूनी अवधारणा (Legal Concept)

BNS के अनुसार, Mob Lynching में निम्न तत्व निहित होते हैं—

  1. एक से अधिक व्यक्तियों की भीड़
  2. कानून को अपने हाथ में लेना
  3. अफवाह, पूर्वाग्रह या सामूहिक उत्तेजना
  4. किसी व्यक्ति पर हिंसक हमला
  5. जिससे मृत्यु या गंभीर क्षति हो

 यहाँ अपराध का केंद्र:

  • व्यक्तिगत शत्रुता नहीं,
  • बल्कि सामूहिक आक्रोश और अवैधानिक सामाजिक दंड है।

3. सामूहिक मंशा (Collective Mens Rea)

BNS की एक महत्वपूर्ण विशेषता है— 👉 सामूहिक मंशा की अवधारणा

  • भीड़ में हर व्यक्ति हथियार उठाए, यह आवश्यक नहीं
  • यदि व्यक्ति:
    • भीड़ का हिस्सा है
    • हिंसा को बढ़ावा देता है
    • रोकने का प्रयास नहीं करता
      तो वह भी उत्तरदायी होगा

यह सिद्धांत Mob Lynching की वास्तविकता को दर्शाता है।


भाग–III : Mob Lynching के लिए दंडात्मक प्रावधान


1. मृत्यु होने पर दंड

यदि Mob Lynching के परिणामस्वरूप:

  • पीड़ित की मृत्यु हो जाती है, तो—

आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक का प्रावधान

यह दर्शाता है कि:

  • राज्य Mob Lynching को हत्या से भी अधिक गंभीर सामाजिक अपराध मानता है

2. गंभीर चोट या अपंगता की स्थिति में

यदि:

  • मृत्यु नहीं, परंतु
  • गंभीर शारीरिक क्षति, स्थायी विकलांगता या मानसिक आघात हुआ हो—

दीर्घकालीन कठोर कारावास + जुर्माना


3. भीड़ को उकसाने वालों की जिम्मेदारी

BNS केवल प्रत्यक्ष हमलावरों तक सीमित नहीं है।

उत्तरदायी माने जाएंगे:

  • अफवाह फैलाने वाले
  • सोशल मीडिया के माध्यम से उकसाने वाले
  • भीड़ को संगठित करने वाले
  • हिंसा का समर्थन करने वाले

 यह प्रावधान डिजिटल युग की वास्तविकताओं के अनुरूप है।


भाग–IV : पीड़ित-केंद्रित और निवारक दृष्टिकोण


1. पीड़ित की गरिमा और अधिकार

BNS में Mob Lynching को:

  • पीड़ित की मानवीय गरिमा के घोर उल्लंघन
  • समाज में भय और असुरक्षा फैलाने वाला अपराध
    माना गया है।

इसलिए:

  • पीड़ित परिवार को मुआवजा
  • राज्य द्वारा संरक्षण और सहायता
  • त्वरित न्याय की अपेक्षा

2. निवारक (Deterrent) प्रभाव

Mob Lynching के लिए कठोर दंड का उद्देश्य:

  • केवल सजा देना नहीं
  • बल्कि समाज को स्पष्ट संदेश देना कि—

    “कानून अपने हाथ में लेना अपराध है।”

यह कानून:

  • Vigilante Justice को अस्वीकार करता है
  • राज्य की वैधानिक शक्ति को पुनः स्थापित करता है

भाग–V : संवैधानिक परिप्रेक्ष्य


1. अनुच्छेद 21 का संरक्षण

Mob Lynching:

  • जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन
  • न्यायिक प्रक्रिया के बिना मृत्यु

BNS के प्रावधान:

  • Due Process of Law को मजबूत करते हैं
  • भीड़ न्याय की अवधारणा को अस्वीकार करते हैं

2. कानून के शासन की पुनर्स्थापना

BNS यह स्पष्ट करती है कि:

  • अपराध का निर्णय केवल न्यायालय करेगा
  • समाज या भीड़ को दंड देने का अधिकार नहीं

भाग–VI : आलोचनात्मक विश्लेषण (Critical Analysis)

सकारात्मक पक्ष

✔ पहली बार स्वतंत्र अपराध की मान्यता
✔ सामूहिक मंशा का स्पष्ट सिद्धांत
✔ अफवाह और उकसावे पर कठोर दृष्टिकोण
✔ पीड़ित-केंद्रित न्याय

संभावित चुनौतियाँ

✘ “भीड़” की परिभाषा पर व्याख्यात्मक विवाद
✘ निर्दोष दर्शकों की उत्तरदायित्व सीमा
✘ प्रभावी जांच और अभियोजन की आवश्यकता


निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय न्याय संहिता, 2023 में Mob Lynching से संबंधित प्रावधान भारतीय आपराधिक कानून में एक मील का पत्थर हैं।

जहाँ IPC में:

  • भीड़ हत्या को सामान्य अपराध माना गया

वहीं BNS में:

  • इसे लोकतंत्र, संविधान और मानवाधिकारों के विरुद्ध संगठित सामाजिक हिंसा के रूप में पहचाना गया है।

BNS का स्पष्ट संदेश है—

“न्याय का अधिकार केवल राज्य और न्यायालयों के पास है, भीड़ के पास नहीं।”

इस प्रकार, Mob Lynching से संबंधित प्रावधान न केवल दंडात्मक हैं, बल्कि:

  • सामाजिक चेतना
  • संवैधानिक मूल्यों
  • और कानून के शासन
    को सुदृढ़ करने का एक सशक्त प्रयास हैं।

6.महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के संबंध में BNS के नए प्रावधानों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) को भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) के स्थान पर लाकर दंड-विधान को “अद्यतन, पीड़ित-केंद्रित और समकालीन अपराध-परिदृश्य के अनुरूप” बनाने का प्रयास किया गया है। महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध भारत में न केवल सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या हैं, बल्कि न्याय-प्रणाली की संवेदनशीलता, त्वरितता और प्रभावशीलता की वास्तविक परीक्षा भी हैं। इस संदर्भ में BNS में कई प्रावधानों का पुनर्गठन, कुछ का विस्तार और कुछ के दंडात्मक ढांचे में परिवर्तन किया गया है। किंतु किसी भी नई संहिता का मूल्यांकन केवल “कठोर दंड” या “नई भाषा” से नहीं, बल्कि (i) परिभाषात्मक स्पष्टता, (ii) पीड़ित-सुरक्षा, (iii) जांच–अभियोजन की व्यवहारिकता, (iv) न्यायिक विवेक का संतुलन, तथा (v) संवैधानिक मानकों से संगति के आधार पर होना चाहिए।


1) BNS का समग्र दृष्टिकोण: “सुरक्षा” बनाम “सशक्तिकरण”

BNS की एक प्रमुख विशेषता यह है कि उसने महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के ढांचे को अधिक व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया है—कुछ अपराधों की संरचना स्पष्ट की गई, कुछ में दंड बढ़ाए गए, और कुछ में सामाजिक-नैतिक चोट (moral wrong) के साथ-साथ सार्वजनिक सुरक्षा (public safety) के तत्वों को जोड़ा गया।

आलोचनात्मक दृष्टि से, यह “राज्य-सुरक्षा” की भाषा को कुछ स्थानों पर “व्यक्ति-सुरक्षा” के समानांतर रखता है, परंतु यह भी सत्य है कि महिलाओं व बच्चों से जुड़े अपराधों में प्रभावी संरक्षण केवल दंड बढ़ाने से नहीं आता। यदि रिपोर्टिंग से लेकर साक्ष्य-संग्रह, मेडिकल-एग्ज़ामिनेशन, गवाह सुरक्षा और ट्रायल की गति में सुधार नहीं होगा, तो कठोर दंड भी “डिटरेंस” (deterrence) के बजाय “न्याय-घाटा” (justice deficit) में परिवर्तित हो सकता है।


2) यौन अपराधों के संबंध में संरचनात्मक निरंतरता और व्यावहारिक बदलाव

BNS ने यौन अपराधों की मूल अवधारणाओं—सहमति (consent), बल/दबाव, धोखे से सहमति, असहमति, नाबालिग की विशेष सुरक्षा—को बड़े स्तर पर उसी न्यायिक विकसित मानक के साथ बनाए रखा है जो पिछले दशक में अदालतों के निर्णयों और आपराधिक संशोधनों के बाद स्थापित हुआ।

(क) “सहमति” और “विवेचना”

सहमति की अवधारणा में आधुनिक कानून का लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह एक ओर पीड़िता के अनुभव की संवेदनशीलता को पहचाने, दूसरी ओर झूठे/अतिरंजित आरोपों के जोखिम को भी संतुलित रखे—विशेषकर संबंध-टूटने, सामाजिक दबाव, या पारिवारिक हस्तक्षेप की स्थितियों में।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • कानून की भाषा में सहमति की परिभाषा/संकेतक जितने स्पष्ट होंगे, जांच का मानकीकरण उतना बेहतर होगा।
  • फिर भी व्यवहार में पुलिस-स्टेशन स्तर पर “सहमति” का मूल्यांकन अक्सर नैतिक दृष्टिकोण से होता है, विधिक मानकों से नहीं। BNS में यदि प्रशिक्षण, SOPs और उत्तरदायित्व तंत्र नहीं जुड़े, तो कानूनी सुधार सीमित रहेगा।

(ख) “कठोर दंड” का सामाजिक प्रभाव

BNS में कुछ गंभीर यौन अपराधों के लिए दंड-व्यवस्था को कठोर बनाया गया/कड़ा संदेश देने का प्रयास किया गया है।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • कठोर दंड का तत्काल आकर्षण यह है कि वह समाज को “कड़ा संदेश” देता है।
  • परंतु क्रिमिनोलॉजी की दृष्टि से डिटरेंस का वास्तविक कारक अक्सर दंड की निश्चितता (certainty of punishment) होती है, न कि केवल दंड की कठोरता (severity)।
  • यदि जांच कमजोर, साक्ष्य-संग्रह त्रुटिपूर्ण और ट्रायल लंबा है, तो कठोरता “घोषणात्मक नीति” (symbolic law) बन जाती है।

3) बच्चों के विरुद्ध अपराध: विशेष संरक्षण की दिशा और सीमाएँ

बच्चों के विरुद्ध अपराधों में BNS का दृष्टिकोण सामान्यतः “विशेष संरक्षण” पर आधारित है। नाबालिग की सहमति को कई संदर्भों में अप्रासंगिक मानने की नीति का उद्देश्य यह है कि बच्चे की उम्रजन्य भेद्यता का दुरुपयोग न हो।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • यह नीति बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है, किंतु व्यवहार में यह समस्या तब बनती है जब किशोर-किशोरी के सहमति-आधारित संबंध को भी उसी कठोरता से देखा जाए जैसे शोषण को।
  • न्यायालयों ने समय-समय पर “रोमांटिक रिलेशनशिप” और “एक्सप्लॉइटेशन” में फर्क करने की आवश्यकता पर बल दिया है। BNS में यदि ऐसे मामलों के लिए विवेकाधीन राहत/डायवर्जन (diversion) के स्पष्ट मानदंड नहीं होंगे, तो किशोरों पर आपराधिक ठप्पा लगने का खतरा बढ़ सकता है।

4) अपहरण/उत्प्रेरण/विवाह के लिए दबाव: महिलाओं की स्वायत्तता का प्रश्न

महिलाओं के अपहरण, बहला-फुसला कर ले जाने, जबरन विवाह, या यौन शोषण के उद्देश्य से तस्करी/ले जाने जैसी स्थितियाँ भारत में लगातार चुनौती रही हैं। BNS ने ऐसी परिस्थितियों में संरक्षणवादी दृष्टि बनाए रखी है।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • एक ओर ये प्रावधान वास्तविक पीड़िताओं की रक्षा करते हैं।
  • दूसरी ओर, सामाजिक संदर्भ में जब वयस्क महिला अपनी पसंद से संबंध/विवाह करती है, तो परिवार “अपहरण/बहला-फुसलाना” जैसे आरोपों का उपयोग दबाव के लिए कर सकता है।
  • अतः BNS का वास्तविक परीक्षण पुलिस व मजिस्ट्रेट स्तर पर होगा कि वे वयस्क महिला की स्वायत्तता (autonomy) को प्राथमिकता देते हैं या सामाजिक दबाव को।

5) घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और क्रूरता: “कानून” बनाम “प्रवर्तन”

महिलाओं के विरुद्ध अपराध केवल “घटना-आधारित” (incident-based) नहीं, बल्कि अक्सर “पैटर्न-आधारित” (pattern-based) होते हैं—जैसे मानसिक उत्पीड़न, नियंत्रण, आर्थिक शोषण, दहेज-उत्पीड़न इत्यादि।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • दंड संहिता का कार्य गंभीर आपराधिक कृत्यों को परिभाषित और दंडित करना है, जबकि घरेलू हिंसा जैसी समस्या में सिविल संरक्षण, त्वरित राहत, आश्रय, संरक्षण आदेश भी समान रूप से आवश्यक हैं।
  • यदि BNS के साथ समानांतर तंत्र (जैसे सुरक्षा अधिकारी, संरक्षण अधिकारी, पीड़िता सहायता इकाइयाँ) मजबूत नहीं होंगे, तो दंडात्मक प्रावधान “बाद में सजा” तो देंगे, “तुरंत सुरक्षा” नहीं।

6) तस्करी/यौन शोषण/बाल श्रम-प्रवृत्त अपराध: संगठित अपराध का आयाम

महिलाओं और बच्चों के शोषण में तस्करी और संगठित नेटवर्क बड़ी भूमिका निभाते हैं। BNS का रुझान ऐसे नेटवर्कों को अधिक गंभीरता से संबोधित करने की दिशा में है, विशेषकर जब अपराध संगठित रूप में, लाभ के लिए, या बहु-पीड़ितों के साथ किया जाता है।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • यह सकारात्मक है कि कानून “एकल अपराध” से आगे जाकर “नेटवर्क/सिंडिकेट” को लक्ष्य करता है।
  • किंतु संगठित अपराध की जांच के लिए डिजिटल साक्ष्य, वित्तीय ट्रेल, अंतर-राज्यीय समन्वय आवश्यक है। यदि जांच एजेंसियों की क्षमता नहीं बढ़ी, तो कठोर धाराएँ केवल कागज़ी रहेंगी।

7) पीड़ित-केंद्रित न्याय: क्या BNS पर्याप्त है?

आज “पीड़ित-केंद्रित न्याय” का अर्थ केवल आरोपी को सजा दिलाना नहीं, बल्कि पीड़िता की गरिमा, गोपनीयता, सुरक्षा, पुनर्वास, मुआवज़ा और न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करना है।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • BNS मुख्यतः substantive criminal law है; यह प्रक्रिया (procedure) या पीड़िता सहायता तंत्र को सीमित रूप से प्रभावित करता है।
  • महिलाओं और बच्चों के मामलों में वास्तविक बदलाव तब आएगा जब BNS के साथ Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) और साक्ष्य कानून के प्रावधानों का प्रभावी, संवेदनशील और समयबद्ध अनुप्रयोग होगा।
  • फास्ट-ट्रैक अदालतें, वन-स्टॉप सेंटर, मेडिकल प्रोटोकॉल, गवाह संरक्षण—इनकी कमजोरी BNS की कठोरता को निष्फल कर सकती है।

8) दुरुपयोग की आशंका बनाम संरक्षण की आवश्यकता: संतुलन की चुनौती

महिलाओं और बच्चों के संरक्षण संबंधी कानूनों पर एक सामान्य आलोचना यह रहती है कि कुछ प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • दुरुपयोग की संभावना को बहाना बनाकर संरक्षण को कमजोर करना उचित नहीं।
  • साथ ही, निष्पक्षता की दृष्टि से यह भी आवश्यक है कि कानून के अनुप्रयोग में फिल्टरिंग, प्रारंभिक जांच की गुणवत्ता, और न्यायिक निगरानी हो।
  • यदि पुलिस “रूटीन” में कठोर धाराएँ लगा दे, तो न्यायालयों पर बोझ बढ़ता है, वास्तविक पीड़िताओं के मामलों में देरी होती है, और कानून की विश्वसनीयता घटती है।

9) दंड-विधान की भाषा और सामाजिक संदेश: क्या बदलाव पर्याप्त है?

BNS ने कुछ स्थानों पर भाषा को आधुनिक करने, अपराधों को पुनर्संयोजित करने और “नए भारत” के अनुरूप संदेश देने का प्रयास किया है।

आलोचनात्मक बिंदु:

  • भाषा का आधुनिकीकरण तब सार्थक है जब वह स्पष्टता बढ़ाए; यदि नई शब्दावली व्याख्या में भ्रम उत्पन्न करती है, तो मुकदमेबाजी बढ़ सकती है।
  • महिलाओं व बच्चों के अपराधों में “स्पष्ट परिभाषा” और “कम विवेकाधीन अस्पष्टता” अधिक उपयोगी होती है।

10) निष्कर्ष: BNS की उपलब्धि और आगे की शर्तें

महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के संदर्भ में BNS का समग्र संदेश यह है कि राज्य ऐसे अपराधों के प्रति “शून्य सहिष्णुता” (zero tolerance) की नीति अपनाना चाहता है। कई प्रावधानों में गंभीरता, दंडात्मक कठोरता और संगठित अपराध के पहलू का उभार सकारात्मक कदम हैं। परंतु आलोचनात्मक दृष्टि से यह भी स्पष्ट है कि:

  1. कठोर दंड अकेला समाधान नहीं—दंड की निश्चितता, त्वरित जांच और संवेदनशील ट्रायल अधिक महत्वपूर्ण हैं।
  2. पीड़िता सहायता तंत्र (मेडिकल, काउंसलिंग, आश्रय, संरक्षण) के बिना “पीड़ित-केंद्रित न्याय” अधूरा रहेगा।
  3. किशोरों के सहमति-आधारित संबंध जैसे सीमांत मामलों में न्यायिक/प्रक्रियात्मक विवेक के स्पष्ट मानक न होने पर अनावश्यक अपराधीकरण हो सकता है।
  4. स्वायत्तता बनाम सामाजिक नियंत्रण की टकराहट में कानून का सही अनुप्रयोग अत्यंत निर्णायक है—विशेषकर वयस्क महिलाओं के “अपहरण/बहला-फुसलाना” आरोपों में।
  5. अंततः BNS की सफलता का पैमाना यह होगा कि क्या यह वास्तविक पीड़िताओं को सुरक्षित, सम्मानित और न्याय-प्राप्त कराता है, और क्या यह जांच-प्रणाली को वैज्ञानिक, जवाबदेह और समयबद्ध बनाता है।

इस प्रकार, BNS महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण विधायी हस्तक्षेप है, किंतु इसकी प्रभावशीलता केवल धाराओं की कठोरता पर नहीं, बल्कि संस्थागत क्षमता, संवेदनशील प्रवर्तन और प्रक्रियात्मक सुधारों के समन्वय पर निर्भर करेगी।

7.BNS में साइबर अपराधों को किस प्रकार शामिल किया गया है? इसके कानूनी प्रभावों पर चर्चा कीजिए।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में साइबर अपराधों का समावेश: स्वरूप, नवीनता और कानूनी प्रभावों का समालोचनात्मक अध्ययन


1. भूमिका: डिजिटल युग और आपराधिक कानून की चुनौती

इक्कीसवीं सदी का समाज अब केवल भौतिक (physical) दुनिया तक सीमित नहीं रहा। इंटरनेट, सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल भुगतान, क्लाउड स्टोरेज और वर्चुअल पहचान ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधा दी है, किंतु इसी के साथ अपराधों के नए रूप भी जन्मे हैं। आज अपराधी को हथियार उठाने की आवश्यकता नहीं; एक लैपटॉप, मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन पर्याप्त है।

भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) का निर्माण ऐसे समय में हुआ था जब “साइबर स्पेस” की कल्पना भी नहीं की गई थी। परिणामस्वरूप, साइबर अपराधों को या तो पारंपरिक अपराधों की धाराओं में जबरन समाहित किया गया, या फिर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) पर अत्यधिक निर्भरता रही।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में सामने आती है—एक ऐसा प्रयास जो आपराधिक कानून को डिजिटल युग के अनुरूप ढालने का दावा करता है। इस संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि BNS ने साइबर अपराधों को किस प्रकार शामिल किया है, और इसके कानूनी, सामाजिक तथा न्यायिक प्रभाव क्या होंगे।


2. BNS में साइबर अपराधों की अवधारणात्मक मान्यता

BNS की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने पहली बार डिजिटल माध्यम (electronic means) को अपराध के स्वतंत्र साधन (independent mode of commission of offence) के रूप में स्वीकार किया है।

जहाँ IPC में अपराधों की कल्पना मुख्यतः भौतिक कृत्यों (physical acts) पर आधारित थी, वहीं BNS में यह स्पष्ट किया गया है कि:

  • अपराध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड,
  • डिजिटल पहचान,
  • ऑनलाइन संचार,
  • कंप्यूटर संसाधन,
    के माध्यम से भी उतनी ही गंभीरता से घटित हो सकता है जितना भौतिक जगत में।

कानूनी महत्व

यह परिवर्तन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टिकोण (legal mindset) का परिवर्तन है। अब “स्थान”, “उपस्थिति”, और “हथियार” जैसी पारंपरिक अवधारणाओं का पुनर्व्याख्यान डिजिटल संदर्भ में किया जा रहा है।


3. साइबर अपराधों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समावेश

BNS में साइबर अपराधों को दो स्तरों पर शामिल किया गया है:

(A) प्रत्यक्ष (Direct) समावेश

कुछ अपराधों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कृत्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया गया है, तो वह भी उसी अपराध के अंतर्गत आएगा। उदाहरणस्वरूप:

  • ऑनलाइन धोखाधड़ी
  • डिजिटल प्रतिरूपण (digital impersonation)
  • इलेक्ट्रॉनिक ब्लैकमेलिंग
  • साइबर स्टॉकिंग
  • ऑनलाइन धमकी और भयादोहन

(B) अप्रत्यक्ष (Indirect) समावेश

कई पारंपरिक अपराधों—जैसे धोखा, जालसाजी, मानहानि, आपराधिक धमकी, गोपनीयता का उल्लंघन—को इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि वे डिजिटल रूप में भी लागू हो सकें।

आलोचनात्मक दृष्टि से, यह एक व्यावहारिक तरीका है क्योंकि इससे कानून को बार-बार संशोधित करने की आवश्यकता कम हो जाती है, किंतु साथ ही व्याख्या का बोझ न्यायालयों पर बढ़ता है।


4. साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय अपराध

डिजिटल भुगतान, UPI, ऑनलाइन बैंकिंग और ई-कॉमर्स के बढ़ते प्रयोग के साथ साइबर धोखाधड़ी सबसे तेजी से बढ़ने वाला अपराध बन चुका है।

BNS का दृष्टिकोण

BNS में धोखाधड़ी की अवधारणा को इस प्रकार विस्तारित किया गया है कि:

  • फर्जी लिंक भेजकर धन हड़पना
  • फेक वेबसाइट या ऐप बनाकर उपयोगकर्ताओं को भ्रमित करना
  • डिजिटल पहचान का दुरुपयोग
    स्पष्ट रूप से आपराधिक कृत्य माने जाएँ।

कानूनी प्रभाव

  1. अब अभियोजन को यह सिद्ध करने में सुविधा होगी कि “धोखा” केवल आमने-सामने की बातचीत से ही नहीं, बल्कि एल्गोरिदम, कोड और डिजिटल छल से भी संभव है।
  2. डिजिटल साक्ष्य (logs, IP address, transaction trails) का महत्व बढ़ेगा।
  3. न्यायालयों को तकनीकी विशेषज्ञता पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा।

आलोचना:
यदि जांच एजेंसियों के पास तकनीकी संसाधन और प्रशिक्षण नहीं होगा, तो विस्तृत कानूनी परिभाषाएँ भी निष्प्रभावी हो सकती हैं।


5. महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध साइबर अपराध

BNS का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने साइबर अपराधों को लैंगिक संवेदनशीलता के दृष्टिकोण से भी देखा है।

प्रमुख स्वरूप

  • साइबर स्टॉकिंग
  • ऑनलाइन यौन उत्पीड़न
  • डिजिटल ब्लैकमेलिंग
  • डीपफेक और मॉर्फ्ड इमेज का प्रयोग
  • सोशल मीडिया पर धमकी और अपमान

कानूनी प्रभाव

  • अपराध की निरंतरता (continuing offence) की अवधारणा को डिजिटल संदर्भ में स्वीकार किया गया है।
  • पीड़िता की गोपनीयता और गरिमा को केंद्र में रखने का प्रयास।

आलोचनात्मक विश्लेषण:
यद्यपि कानून में अपराध परिभाषित हैं, परंतु:

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही
  • कंटेंट हटाने की त्वरित प्रक्रिया
  • पीड़िता की तत्काल सुरक्षा
    अब भी प्रक्रिया कानून और नीतिगत उपायों पर निर्भर है, न कि केवल BNS पर।

6. साइबर आतंकवाद और राज्य सुरक्षा

डिजिटल युग में साइबर अपराध केवल व्यक्तिगत क्षति तक सीमित नहीं हैं; वे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बन चुके हैं।

BNS की भूमिका

BNS में ऐसे कृत्यों को गंभीर अपराध के रूप में देखा गया है जहाँ:

  • डिजिटल माध्यम से राज्य की संप्रभुता को खतरा
  • महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना पर हमला
  • ऑनलाइन माध्यम से आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा
    शामिल हो।

कानूनी प्रभाव

  • साइबर अपराध अब “साधारण अपराध” नहीं, बल्कि राज्य-विरोधी कृत्य भी हो सकते हैं।
  • जांच एजेंसियों को व्यापक शक्तियाँ मिलती हैं।

आलोचना:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अत्यधिक निगरानी (surveillance) की आशंका
  • निजता के मौलिक अधिकार पर संभावित प्रभाव
    यह संतुलन न्यायिक समीक्षा के माध्यम से ही सुनिश्चित हो सकेगा।

7. डिजिटल साक्ष्य और अभियोजन की चुनौतियाँ

BNS का वास्तविक परीक्षण डिजिटल साक्ष्य के स्तर पर होगा।

प्रमुख प्रश्न

  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रामाणिकता कैसे सिद्ध होगी?
  • छेड़छाड़ (tampering) की संभावना को कैसे रोका जाएगा?
  • अंतरराष्ट्रीय सर्वर और डेटा संरक्षण कानूनों का क्या प्रभाव होगा?

कानूनी प्रभाव

  • फॉरेंसिक साइंस और साइबर विशेषज्ञों की भूमिका बढ़ेगी।
  • अभियोजन और बचाव—दोनों को तकनीकी दक्षता विकसित करनी होगी।

आलोचनात्मक दृष्टि:
यदि डिजिटल साक्ष्य के मानकीकरण और संरक्षण की स्पष्ट प्रणाली नहीं होगी, तो अभियोजन कमजोर पड़ सकता है और दोषसिद्धि की दर कम रह सकती है।


8. अंतरराष्ट्रीय आयाम और क्षेत्राधिकार (Jurisdiction)

साइबर अपराध अक्सर सीमाहीन (borderless) होते हैं। अपराधी एक देश में बैठकर दूसरे देश में अपराध कर सकता है।

BNS का दृष्टिकोण

  • डिजिटल अपराधों में क्षेत्राधिकार की अवधारणा को लचीला बनाया गया है।
  • भारत में प्रभाव पड़ने मात्र से भी अपराध को भारतीय न्यायालयों के अधीन लाया जा सकता है।

कानूनी प्रभाव

  • प्रत्यर्पण (extradition)
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग
  • डेटा साझा करने की संधियाँ
    अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाएँगी।

9. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और BNS का संबंध

BNS साइबर अपराधों को शामिल करते हुए भी IT Act को पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं बनाता। दोनों के बीच पूरक (complementary) संबंध है।

आलोचनात्मक प्रश्न:

  • दो कानूनों के समानांतर अस्तित्व से ओवरलैप और कन्फ्यूजन की संभावना
  • किस कानून के अंतर्गत अभियोजन होगा—यह अभियोजन विवेक पर निर्भर रहेगा

10. निष्कर्ष: क्या BNS साइबर अपराधों से निपटने में सक्षम है?

BNS में साइबर अपराधों का समावेश भारतीय आपराधिक कानून के विकास में एक महत्वपूर्ण और आवश्यक कदम है। यह स्वीकार करता है कि अपराध का स्वरूप बदल चुका है और कानून को भी बदलना होगा।

फिर भी आलोचनात्मक निष्कर्ष यह है कि:

  1. BNS ने सैद्धांतिक ढांचा मजबूत किया है, परंतु व्यावहारिक सफलता जांच एजेंसियों की क्षमता पर निर्भर करेगी।
  2. साइबर अपराधों में दंड से अधिक महत्वपूर्ण है त्वरित पहचान, डिजिटल साक्ष्य संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
  3. निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा—इन तीनों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

अतः कहा जा सकता है कि BNS ने साइबर अपराधों को विधिक मान्यता देकर एक मजबूत आधार तैयार किया है, किंतु इस आधार पर प्रभावी न्याय-व्यवस्था खड़ी करने के लिए संस्थागत सुधार, तकनीकी निवेश और संवेदनशील प्रवर्तन अनिवार्य होंगे।

8.BNS में देशद्रोह के स्थान पर लाए गए नए प्रावधानों की विवेचना कीजिए।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में देशद्रोह के स्थान पर लाए गए नए प्रावधानों की विवेचना


1. भूमिका: देशद्रोह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत की आपराधिक विधि में देशद्रोह (Sedition) एक अत्यंत विवादास्पद अवधारणा रही है। औपनिवेशिक काल में लागू की गई भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 124A का उद्देश्य अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ों को दबाना था। इस धारा के अंतर्गत “सरकार के प्रति घृणा, अवमानना या असंतोष” उत्पन्न करना अपराध माना गया, भले ही वह शांतिपूर्ण आलोचना या वैचारिक असहमति के रूप में ही क्यों न हो।

स्वतंत्र भारत में भी यह धारा बनी रही, जबकि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया। समय-समय पर न्यायालयों ने देशद्रोह की संकीर्ण व्याख्या की, किंतु व्यवहार में इसके दुरुपयोग के आरोप लगातार सामने आते रहे। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय न्याय संहिता, 2023 लाई गई, जिसमें “देशद्रोह” शब्द को हटाकर उसके स्थान पर नए प्रावधानों को शामिल किया गया।


2. देशद्रोह को हटाने का औचित्य

BNS में देशद्रोह को हटाने का निर्णय केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसके पीछे मुख्य तर्क यह रहे हैं—

  1. औपनिवेशिक विरासत का अंत: देशद्रोह की अवधारणा ब्रिटिश शासन की देन थी, जिसका उद्देश्य शासन-विरोधी आंदोलनों को कुचलना था।
  2. लोकतांत्रिक मूल्य: आधुनिक लोकतंत्र में सरकार की आलोचना को अपराध नहीं माना जा सकता।
  3. दुरुपयोग की संभावना: व्यवहार में देशद्रोह का प्रयोग अक्सर असहमति, विरोध प्रदर्शन, पत्रकारिता और अकादमिक आलोचना के विरुद्ध किया गया।
  4. संवैधानिक संतुलन: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन की आवश्यकता।

3. BNS में देशद्रोह के स्थान पर नए प्रावधानों का स्वरूप

BNS ने देशद्रोह को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसकी जगह “राज्य की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध कृत्य” जैसी व्यापक और समकालीन अवधारणा को अपनाया है।

(क) मुख्य तत्व

नए प्रावधानों के अंतर्गत ऐसे कृत्य दंडनीय माने गए हैं—

  • जो भारत की संप्रभुता, एकता या अखंडता को खतरे में डालें
  • जो सशस्त्र विद्रोह, अलगाववाद या हिंसक गतिविधियों को प्रोत्साहित करें
  • जो विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर राज्य-विरोधी कार्य करें

इस प्रकार, ध्यान “सरकार के प्रति असंतोष” से हटाकर “राज्य के अस्तित्व और सुरक्षा” पर केंद्रित किया गया है।


4. देशद्रोह बनाम नए प्रावधान: मूलभूत अंतर

पहलू IPC में देशद्रोह BNS के नए प्रावधान
दृष्टिकोण सरकार-केंद्रित राज्य-केंद्रित
भाषा अस्पष्ट, व्यापक अपेक्षाकृत विशिष्ट
आलोचना संभावित अपराध वैध लोकतांत्रिक अधिकार
हिंसा अनिवार्य नहीं हिंसा/उकसावे पर जोर

आलोचनात्मक दृष्टि से, यह परिवर्तन स्वागतयोग्य है क्योंकि इससे शांतिपूर्ण आलोचना और असहमति को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने का प्रयास किया गया है।


5. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव

देशद्रोह की सबसे बड़ी आलोचना यह थी कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर “ठंडा प्रभाव” (chilling effect) डालती थी। लोग डर के कारण सरकार की आलोचना से बचते थे।

BNS का प्रभाव

  • सरकार की नीतियों की आलोचना, व्यंग्य, विरोध प्रदर्शन—सिद्धांततः अपराध नहीं
  • केवल वही अभिव्यक्ति दंडनीय होगी जो हिंसा, विद्रोह या राज्य-विघटन को उकसाए

आलोचना:
हालाँकि भाषा बदली गई है, परंतु यदि प्रवर्तन एजेंसियाँ “राज्य की एकता” की व्याख्या अत्यधिक व्यापक कर दें, तो वही समस्या नए रूप में लौट सकती है।


6. राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक असहमति का संतुलन

BNS के नए प्रावधान यह संकेत देते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीरता से लिया गया है। आज के समय में:

  • आतंकवाद
  • साइबर युद्ध
  • विदेशी हस्तक्षेप
  • डिजिटल प्रोपेगैंडा
    जैसे खतरे वास्तविक हैं।

नए प्रावधानों का उद्देश्य ऐसे खतरों से निपटना है, न कि वैचारिक असहमति को दबाना।

आलोचनात्मक प्रश्न:

  • क्या हर तीखी आलोचना को “राज्य-विरोधी” कहा जा सकता है?
  • क्या सोशल मीडिया पोस्ट को “अखंडता के लिए खतरा” मान लिया जाएगा?

इन प्रश्नों का उत्तर कानून की भाषा से अधिक उसके अनुप्रयोग पर निर्भर करेगा।


7. न्यायिक व्याख्या की भूमिका

IPC की धारा 124A को न्यायालयों ने समय-समय पर सीमित किया था, विशेषतः यह कहते हुए कि हिंसा या हिंसा के उकसावे के बिना देशद्रोह नहीं बनता

BNS के नए प्रावधानों में भी न्यायालयों की भूमिका निर्णायक होगी—

  • “संप्रभुता” और “अखंडता” की सीमा क्या होगी?
  • क्या प्रतीकात्मक विरोध या वैचारिक बहस को अपराध माना जा सकता है?

यदि न्यायालय संवैधानिक मूल्यों को केंद्र में रखेंगे, तो नए प्रावधान लोकतंत्र के अनुकूल सिद्ध हो सकते हैं।


8. दुरुपयोग की आशंका: बदला हुआ नाम, वही समस्या?

एक आलोचनात्मक मत यह भी है कि—

“देशद्रोह हटाया गया है, पर उसकी आत्मा कहीं और जीवित है।”

यदि पुलिस और प्रशासन पुराने मानसिक ढांचे के साथ नए प्रावधानों का प्रयोग करेंगे, तो:

  • गिरफ्तारियाँ बढ़ सकती हैं
  • लंबी जांच और ट्रायल से व्यक्ति को दंड भुगतना पड़ सकता है, भले ही अंततः दोषमुक्ति हो

इसलिए केवल कानून बदलना पर्याप्त नहीं; प्रशिक्षण, दिशा-निर्देश और जवाबदेही भी आवश्यक है।


9. अंतरराष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में

अनेक लोकतांत्रिक देशों ने देशद्रोह जैसे अपराधों को या तो समाप्त कर दिया है या अत्यंत सीमित कर दिया है। BNS का यह कदम भारत को उन लोकतांत्रिक मानकों के निकट लाने का प्रयास माना जा सकता है, जहाँ—

  • राज्य की सुरक्षा और
  • नागरिक की स्वतंत्रता
    दोनों को समान महत्व दिया जाता है।

10. निष्कर्ष: प्रतीकात्मक सुधार या वास्तविक परिवर्तन?

BNS में देशद्रोह के स्थान पर लाए गए नए प्रावधान भारतीय आपराधिक कानून के लोकतांत्रिक पुनर्गठन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। यह स्वीकार किया गया है कि सरकार और राज्य एक नहीं हैं, और सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं हो सकती।

फिर भी अंतिम मूल्यांकन यह है कि:

  1. कानून की भाषा अपेक्षाकृत बेहतर और आधुनिक है।
  2. वास्तविक परीक्षा उसके प्रवर्तन और न्यायिक व्याख्या में होगी।
  3. यदि नए प्रावधानों का उपयोग केवल वास्तविक राज्य-विरोधी, हिंसक और विघटनकारी गतिविधियों तक सीमित रहा, तो यह सुधार ऐतिहासिक सिद्ध होगा।
  4. यदि इनका प्रयोग असहमति दबाने के लिए हुआ, तो यह केवल “नाम परिवर्तन” भर रह जाएगा।

अतः कहा जा सकता है कि BNS में देशद्रोह के स्थान पर लाए गए नए प्रावधानों ने एक संवैधानिक रूप से अधिक संतुलित ढांचा प्रस्तुत किया है, किंतु उसे जीवंत लोकतांत्रिक मूल्य तभी मिलेंगे जब राज्य की शक्ति पर न्यायिक विवेक और संवैधानिक चेतना का प्रभावी नियंत्रण बना रहेगा।

9.BNS में सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में शामिल करने का औचित्य बताइए।


1. भूमिका : दंड-दर्शन में परिवर्तन की आवश्यकता

दंड-विधान (Penal Law) किसी भी समाज की नैतिक चेतना, सामाजिक संरचना और न्याय की अवधारणा का प्रतिबिंब होता है। परंपरागत रूप से भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में दंड का अर्थ मुख्यतः कारावास (Imprisonment) या अर्थदंड (Fine) तक सीमित रहा है। यह व्यवस्था औपनिवेशिक काल की देन थी, जहाँ दंड का प्रमुख उद्देश्य प्रतिशोध और भय के माध्यम से नियंत्रण स्थापित करना था।

किन्तु आधुनिक लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में यह दृष्टिकोण अपर्याप्त माना जाने लगा है। आज यह स्वीकार किया जाता है कि—

  • हर अपराध समान प्रकृति का नहीं होता,
  • हर अपराधी पेशेवर या असुधार्य नहीं होता,
  • और हर अपराध का समाधान जेल नहीं हो सकता।

इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने दंड की परंपरागत अवधारणा से आगे बढ़ते हुए “सामुदायिक सेवा (Community Service)” को एक वैधानिक दंड के रूप में सम्मिलित किया। यह भारतीय दंड-दर्शन में एक ऐतिहासिक और प्रगतिशील परिवर्तन माना जा रहा है।


2. सामुदायिक सेवा की अवधारणा और स्वरूप

सामुदायिक सेवा ऐसा दंड है जिसमें अपराधी को कारावास में भेजने के बजाय समाज के हित में उपयोगी कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है। इसका उद्देश्य अपराधी को समाज से अलग करना नहीं, बल्कि समाज के साथ उत्तरदायित्वपूर्ण संबंध स्थापित करना है।

सामुदायिक सेवा के अंतर्गत निम्नलिखित कार्य आ सकते हैं—

  • सार्वजनिक स्थलों की सफाई
  • वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण
  • सरकारी/सामुदायिक संस्थानों में सेवा
  • सामाजिक जागरूकता अभियानों में भागीदारी
  • वृद्ध, दिव्यांग या वंचित वर्ग की सहायता

इस प्रकार, यह दंड श्रम, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित है।


3. BNS में सामुदायिक सेवा को शामिल करने की पृष्ठभूमि

(क) जेलों की भीड़ और प्रणालीगत संकट

भारत की जेल व्यवस्था लंबे समय से अत्यधिक भीड़ (Overcrowding) की समस्या से जूझ रही है। बड़ी संख्या में ऐसे व्यक्ति जेलों में बंद हैं जिन्होंने—

  • छोटे या हल्के अपराध किए हैं,
  • पहली बार अपराध किया है,
  • जिनसे समाज को गंभीर खतरा नहीं है।

कारावास ऐसे मामलों में न केवल अनुपयोगी, बल्कि प्रतिउत्पादक (Counter-productive) सिद्ध होता है। सामुदायिक सेवा जेलों पर बोझ कम करने का एक व्यवहारिक विकल्प प्रदान करती है।

(ख) अपराधीकरण का दुष्चक्र

जेल में भेजे गए छोटे अपराधी—

  • पेशेवर अपराधियों के संपर्क में आते हैं,
  • समाज में “अपराधी” की स्थायी पहचान पा लेते हैं,
  • और पुनः अपराध की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं।

सामुदायिक सेवा इस अपराधीकरण के दुष्चक्र को तोड़ने में सहायक है।


4. दंड-दर्शन (Penology) के दृष्टिकोण से औचित्य

(A) सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice)

आधुनिक दंड-दर्शन का मूल सिद्धांत यह है कि—

“दंड का उद्देश्य अपराधी को सुधारना होना चाहिए, न कि केवल उसे पीड़ा देना।”

सामुदायिक सेवा अपराधी को—

  • अपने कृत्य के सामाजिक दुष्परिणामों का बोध कराती है,
  • सकारात्मक श्रम के माध्यम से आत्म-सुधार का अवसर देती है।

(B) पुनर्स्थापनात्मक न्याय (Restorative Justice)

यह दंड अपराधी, समाज और कभी-कभी पीड़ित के बीच संतुलन स्थापित करता है।

  • समाज को प्रत्यक्ष लाभ मिलता है,
  • अपराधी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है।

इस प्रकार सामुदायिक सेवा न्याय को मानवीय और सहभागी प्रक्रिया बनाती है।


5. सामाजिक और नैतिक औचित्य

(क) सामाजिक चेतना का विकास

कारावास अपराधी को समाज से काट देता है, जबकि सामुदायिक सेवा—

  • उसे समाज की समस्याओं से जोड़ती है,
  • सहानुभूति, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व विकसित करती है।

(ख) “दृश्य न्याय” (Visible Justice)

जब समाज देखता है कि अपराधी सार्वजनिक रूप से समाज की सेवा कर रहा है, तो—

  • दंड का नैतिक प्रभाव बढ़ता है,
  • कानून के प्रति विश्वास मजबूत होता है।

6. आर्थिक औचित्य

कारावास राज्य के लिए अत्यंत महँगा दंड है—

  • भोजन, सुरक्षा, प्रशासन, स्वास्थ्य सेवाएँ
  • जेल अवसंरचना का रख-रखाव

इसके विपरीत, सामुदायिक सेवा—

  • राज्य पर आर्थिक बोझ कम करती है,
  • समाज को प्रत्यक्ष श्रम-लाभ देती है।

इस दृष्टि से यह किफायती और संसाधन-संरक्षक दंड है।


7. छोटे, पहली बार किए गए और युवा अपराधों के लिए उपयुक्तता

BNS में सामुदायिक सेवा विशेष रूप से—

  • हल्के अपराधों,
  • पहली बार अपराध करने वालों,
  • युवा और किशोर अपराधियों
    के लिए उपयुक्त मानी गई है।

यह न्यायालयों को दंड निर्धारण में लचीलापन प्रदान करती है और “एक ही दंड सबके लिए” की कठोरता को समाप्त करती है।


8. न्यायिक विवेक और व्यक्तिगत न्याय

सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में मान्यता मिलने से—

  • न्यायाधीश अपराध की प्रकृति,
  • अपराधी की सामाजिक पृष्ठभूमि,
  • अपराध के प्रभाव
    को ध्यान में रखकर व्यक्तिगत और अनुपातिक दंड निर्धारित कर सकते हैं।

यह Substantive Justice को सुदृढ़ करता है।


9. अंतरराष्ट्रीय अनुभव और तुलनात्मक औचित्य

विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों—जैसे यूके, यूएसए, कनाडा—में सामुदायिक सेवा लंबे समय से दंड के रूप में लागू है।

इन देशों के अनुभव दर्शाते हैं कि—

  • पुनरावृत्ति दर (Recidivism) कम होती है,
  • अपराधी का सामाजिक पुनर्वास बेहतर होता है।

BNS का यह कदम भारत को आधुनिक वैश्विक दंड-दर्शन के अनुरूप लाता है।


10. संवैधानिक मूल्यों से सामंजस्य

सामुदायिक सेवा—

  • मानवीय गरिमा के अधिकार का सम्मान करती है,
  • अनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांत को सुदृढ़ करती है,
  • सामाजिक न्याय और सुधार की संवैधानिक भावना के अनुकूल है।

11. आलोचनात्मक दृष्टि : चुनौतियाँ और सीमाएँ

(क) प्रभावी क्रियान्वयन

  • निगरानी कौन करेगा?
  • सेवा की गुणवत्ता और अवधि कैसे सुनिश्चित होगी?

(ख) प्रतीकात्मक दंड बनने का खतरा

यदि सामुदायिक सेवा केवल औपचारिकता बन गई, तो इसका सुधारात्मक उद्देश्य विफल हो सकता है।

(ग) समानता का प्रश्न

यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि—

  • प्रभावशाली और साधनहीन अभियुक्तों के बीच असमानता न हो,
  • सामुदायिक सेवा “हल्का दंड” बनकर न रह जाए।

12. निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 में सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में शामिल करना भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक वैचारिक, सामाजिक और व्यावहारिक परिवर्तन का प्रतीक है। यह स्वीकार करता है कि—

  • हर अपराध जेल योग्य नहीं है,
  • और हर अपराधी असुधार्य नहीं होता।

औचित्य के आधार पर निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि:

  1. सामुदायिक सेवा सुधारात्मक और पुनर्स्थापनात्मक न्याय को बढ़ावा देती है।
  2. यह जेलों पर बोझ कम करती है और समाज को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाती है।
  3. यह अपराधी को समाज का जिम्मेदार सदस्य बनने का अवसर देती है।
  4. इसकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन, निगरानी और न्यायिक विवेक पर निर्भर करेगी।

अतः सामुदायिक सेवा का समावेश केवल दंड-विधान में एक नया विकल्प नहीं, बल्कि न्याय की मानवीय, आधुनिक और संवैधानिक अवधारणा की ओर एक सशक्त कदम है, जो भारतीय आपराधिक कानून को अधिक संतुलित, संवेदनशील और प्रभावी बनाने की क्षमता रखता है।

10.BNS में आजीवन कारावास और मृत्युदंड के प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए।


1. भूमिका : दंड की अंतिम सीमा और आपराधिक न्याय

किसी भी आपराधिक न्याय प्रणाली में आजीवन कारावास और मृत्युदंड सबसे कठोर दंड माने जाते हैं। ये दंड केवल अपराधी को दंडित करने के साधन नहीं, बल्कि राज्य की नैतिक शक्ति, सामाजिक सुरक्षा और न्याय-दर्शन का भी प्रतीक होते हैं।

भारत में परंपरागत रूप से ये दोनों दंड भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत मौजूद रहे हैं। किंतु बदलते संवैधानिक मूल्यों, मानवाधिकार विमर्श और न्यायिक व्याख्याओं के चलते इन दंडों की प्रकृति और उपयोग पर निरंतर बहस होती रही है। इसी संदर्भ में भारतीय न्याय संहिता, 2023 का महत्व बढ़ जाता है, क्योंकि यह न केवल पुराने प्रावधानों को पुनर्संयोजित करता है, बल्कि दंड-दर्शन को भी अधिक स्पष्ट और संरचित रूप देता है।

इस प्रश्न के अंतर्गत BNS में आजीवन कारावास और मृत्युदंड के प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है—उनके स्वरूप, उद्देश्य, संवैधानिक सीमाएँ और सामाजिक प्रभाव के संदर्भ में।


2. आजीवन कारावास : अवधारणा और विकास

(क) अर्थ और स्वरूप

आजीवन कारावास का अर्थ है—

दोषी व्यक्ति को उसके प्राकृतिक जीवन के अंत तक कारावास में रखना, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधि के अनुसार उसे रिहा न किया जाए।

BNS में आजीवन कारावास को केवल एक वैकल्पिक दंड के रूप में नहीं, बल्कि कई गंभीर अपराधों के लिए प्राथमिक कठोर दंड के रूप में व्यवस्थित किया गया है।

(ख) न्यायिक स्पष्टता

समय-समय पर न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि आजीवन कारावास का अर्थ स्वतः 14 वर्ष की सजा नहीं है, बल्कि यह पूरे जीवन के लिए हो सकता है। BNS इस न्यायिक स्थिति को विधायी स्तर पर अधिक स्पष्ट रूप में स्वीकार करता है।


3. मृत्युदंड : अवधारणा और सीमाएँ

(क) मृत्युदंड का स्वरूप

मृत्युदंड राज्य द्वारा दिया जाने वाला अत्यंत अंतिम और अपरिवर्तनीय दंड है। इसका उद्देश्य—

  • अत्यंत जघन्य अपराधों में प्रतिशोधात्मक न्याय
  • समाज में तीव्र निवारक प्रभाव (deterrence)
  • सामूहिक नैतिक आक्रोश की संतुष्टि

BNS में मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है, बल्कि इसे अत्यधिक सीमित और असाधारण परिस्थितियों तक प्रतिबंधित रखने का प्रयास किया गया है।

(ख) “दुर्लभतम से दुर्लभ” सिद्धांत

यद्यपि यह सिद्धांत न्यायिक उत्पत्ति का है, BNS की संरचना इसे अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करती है—अर्थात मृत्युदंड केवल उन्हीं मामलों में, जहाँ आजीवन कारावास पूरी तरह अपर्याप्त हो।


4. BNS में आजीवन कारावास के प्रावधान

BNS के अंतर्गत आजीवन कारावास को—

  • हत्या के गंभीर रूपों
  • संगठित अपराध
  • आतंकवादी गतिविधियों
  • महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध जघन्य अपराधों
    में प्रमुख दंड के रूप में रखा गया है।

विशेष विशेषताएँ

  • कुछ मामलों में आजीवन कारावास + अर्थदंड
  • कुछ में आजीवन कारावास बिना रियायत (no remission) का संकेत
  • न्यायालय को दंड निर्धारण में विवेकाधीन शक्ति

यह दर्शाता है कि BNS, मृत्युदंड के स्थान पर आजीवन कारावास को अधिक व्यवहारिक विकल्प के रूप में देखती है।


5. BNS में मृत्युदंड के प्रावधान

BNS में मृत्युदंड को—

  • सीमित अपराधों तक
  • अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में
  • वैकल्पिक दंड (death or life imprisonment) के रूप में
    रखा गया है।

विधायी रुझान

यह स्पष्ट संकेत देता है कि—

  • मृत्युदंड सामान्य नियम नहीं, बल्कि अंतिम अपवाद है।
  • विधायिका आजीवन कारावास को प्राथमिक कठोर दंड के रूप में बढ़ावा दे रही है।

6. तुलनात्मक अध्ययन : आजीवन कारावास बनाम मृत्युदंड

आधार आजीवन कारावास मृत्युदंड
प्रकृति सुधारात्मक + दंडात्मक पूर्णतः दंडात्मक
अपरिवर्तनीयता परिवर्तनीय (रिहाई संभव) अपरिवर्तनीय
न्यायिक विवेक अधिक अत्यंत सीमित
मानवाधिकार संगति अधिक विवादास्पद
त्रुटि की गुंजाइश सुधारी जा सकती है नहीं
सामाजिक स्वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक विभाजित

7. संवैधानिक दृष्टिकोण से तुलना

(क) अनुच्छेद 21 और मानवीय गरिमा

  • आजीवन कारावास, यदि मानवीय परिस्थितियों में हो, तो अनुच्छेद 21 के अधिक अनुकूल माना जाता है।
  • मृत्युदंड को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अपवादस्वरूप स्वीकार किया गया है, न कि सामान्य नियम के रूप में।

(ख) अनुपातिकता (Proportionality)

BNS में दंड का ढांचा इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि—

दंड अपराध की गंभीरता के अनुपात में होना चाहिए।

इस दृष्टि से आजीवन कारावास अधिक लचीला और संतुलित दंड है।


8. सुधारात्मक और पुनर्वासात्मक दृष्टिकोण

आजीवन कारावास

  • अपराधी को आत्मचिंतन और सुधार का अवसर
  • सामाजिक पुनर्वास की संभावित संभावना
  • पीड़ित न्याय के साथ मानवीय संतुलन

मृत्युदंड

  • सुधार की कोई संभावना नहीं
  • प्रतिशोधात्मक न्याय पर अधिक बल

BNS का रुझान स्पष्ट रूप से सुधारात्मक न्याय की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है।


9. सामाजिक और नैतिक प्रभाव

आजीवन कारावास

  • समाज को सुरक्षा
  • न्यायिक त्रुटि की स्थिति में सुधार की गुंजाइश
  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श के अधिक अनुरूप

मृत्युदंड

  • तीव्र भावनात्मक संतोष
  • नैतिक और दार्शनिक विवाद
  • गलत सजा का अपूरणीय जोखिम

10. अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

विश्व के अनेक देशों ने मृत्युदंड समाप्त कर दिया है या अत्यंत सीमित कर दिया है, जबकि आजीवन कारावास को प्रमुख कठोर दंड के रूप में अपनाया गया है।

BNS का ढांचा भारत को मृत्युदंड उन्मूलन की दिशा में क्रमिक संक्रमण (gradual move) की ओर ले जाता हुआ प्रतीत होता है, यद्यपि पूर्ण उन्मूलन नहीं किया गया है।


11. आलोचनात्मक दृष्टि

सकारात्मक पहलू

  • मृत्युदंड का दायरा सीमित
  • आजीवन कारावास की भूमिका सुदृढ़
  • न्यायिक विवेक और अनुपातिकता पर बल

चिंताएँ

  • “आजीवन कारावास बिना रियायत” की अस्पष्टता
  • जेल सुधार और मानवीय परिस्थितियों की चुनौती
  • दंड के वास्तविक सुधारात्मक प्रभाव पर प्रश्न

12. निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 में आजीवन कारावास और मृत्युदंड के प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि—

  1. BNS मृत्युदंड को अंतिम और असाधारण विकल्प मानती है।
  2. आजीवन कारावास को मुख्य कठोर दंड के रूप में स्थापित किया गया है।
  3. विधायी रुझान प्रतिशोधात्मक न्याय से हटकर सुधारात्मक और संतुलित न्याय की ओर है।
  4. मानवाधिकार, न्यायिक त्रुटि और संवैधानिक मूल्यों के संदर्भ में आजीवन कारावास अधिक सुरक्षित और व्यवहारिक विकल्प है।

अतः कहा जा सकता है कि BNS में आजीवन कारावास और मृत्युदंड का ढांचा भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक मानवीय, विवेकपूर्ण और संवैधानिक रूप से संतुलित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जहाँ न्याय केवल दंड नहीं, बल्कि समाज और व्यक्ति—दोनों के हितों का संतुलन बन जाता है।