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भारतीय न्याय व्यवस्था में सिविल प्रक्रिया संहिता एवं परिसीमा अधिनियम की प्रासंगिकता

भारतीय न्याय व्यवस्था में सिविल प्रक्रिया संहिता एवं परिसीमा अधिनियम की प्रासंगिकता

प्रस्तावना

भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को “न्याय का मंदिर” कहा जाता है। किसी भी नागरिक के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि जब उसके अधिकारों का हनन हो तो वह न्यायालय की शरण में जाकर राहत प्राप्त कर सके। किंतु न्याय केवल तब ही प्रभावी हो सकता है जब वह समय पर और एक समान प्रक्रिया के माध्यम से दिया जाए। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of Civil Procedure – CPC) और परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act) अस्तित्व में आए। दोनों अधिनियम मिलकर भारतीय सिविल न्याय प्रणाली को गति, स्थिरता और निष्पक्षता प्रदान करते हैं।


सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का परिचय

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 एक संपूर्ण संहिताबद्ध कानून है जो न्यायालयों में सिविल मामलों की कार्यवाही से संबंधित है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि सभी सिविल न्यायालय एक समान प्रक्रिया अपनाएँ और न्यायिक निर्णय निष्पक्ष, पारदर्शी तथा समयबद्ध हों।

प्रमुख उद्देश्य

  1. सिविल वादों की सुनवाई में एकरूपता बनाए रखना।
  2. न्यायालयों के कार्य को सरल और संगठित करना।
  3. पक्षकारों को उनके अधिकारों की रक्षा हेतु समान अवसर उपलब्ध कराना।
  4. मुकदमों में अनावश्यक विलंब और जटिलताओं को रोकना।

CPC की संरचना

सिविल प्रक्रिया संहिता दो भागों में विभाजित है –

  1. धाराएँ (Sections): कुल 158 धाराएँ हैं जिनमें न्यायालय की शक्तियाँ और सामान्य प्रावधान दिए गए हैं।
  2. आदेश एवं नियम (Orders & Rules): कुल 51 आदेश हैं जिनमें मुकदमों की विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान

  • धारा 9: सिविल न्यायालय सभी प्रकार के सिविल मामलों की सुनवाई कर सकते हैं।
  • आदेश 7: वाद-पत्र (Plaint) की आवश्यकताएँ।
  • आदेश 8: प्रतिवादी का लिखित उत्तर।
  • आदेश 39: अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction)।
  • धारा 96-100: अपील की प्रक्रिया।
  • आदेश 21: डिक्री का निष्पादन।

परिसीमा अधिनियम (Limitation Act), 1963 का परिचय

परिसीमा अधिनियम मुकदमों, अपीलों और आवेदनों की समयसीमा निर्धारित करता है। न्यायालय केवल उन्हीं मामलों को सुनता है जो समयसीमा के भीतर प्रस्तुत किए गए हों। इसका मूल उद्देश्य यह है कि नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा समय पर करें और न्यायालय पुराने विवादों से मुक्त रहकर त्वरित न्याय दे सके।

उद्देश्य

  1. मुकदमों की संख्या को नियंत्रित करना।
  2. अनावश्यक देरी से होने वाले अन्याय को रोकना।
  3. पक्षकारों को सक्रिय बनाना।
  4. न्यायालय को पुराने, अप्रासंगिक विवादों से मुक्त रखना।

परिसीमा अधिनियम की विशेषताएँ

  • धारा 3: समयसीमा से परे दायर वाद स्वतः निरस्त हो जाएगा।
  • धारा 5: उचित कारण होने पर विलंब क्षम्य हो सकता है।
  • संपत्ति संबंधी वाद: सामान्यतः 12 वर्ष की सीमा।
  • अनुबंध, ऋण संबंधी दावे: सामान्यतः 3 वर्ष की सीमा।
  • अपीलें: 30 से 90 दिन तक की समयसीमा।

CPC और Limitation Act का आपसी संबंध

दोनों अधिनियम एक-दूसरे के पूरक हैं।

  • CPC यह बताता है कि मुकदमा किस प्रकार चलेगा।
  • Limitation Act यह तय करता है कि मुकदमा कब तक दायर किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी ने 2018 में ऋण दिया और पैसा वापस नहीं मिला, तो Limitation Act के अनुसार 3 वर्ष के भीतर दावा करना आवश्यक है। यदि 2022 में मुकदमा दायर किया जाता है तो वह समयबद्धता के कारण अस्वीकार कर दिया जाएगा, चाहे CPC की प्रक्रिया सही ही क्यों न हो।


न्यायालय के निर्णय

  • Rajendra Singh v. Santa Singh (1973): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परिसीमा अधिनियम न्यायालयों पर बाध्यकारी है और न्यायालय इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
  • Satyadhyan Ghosal v. Deorajin Debi (1960): धारा 11 (Res Judicata) की व्याख्या करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक बार निपटा हुआ मामला दोबारा नहीं उठाया जा सकता।
  • Khatri Hotels Pvt. Ltd. v. Union of India (2011): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि समयसीमा के बाद दायर याचिका स्वतः निरस्त हो जाएगी।

आधुनिक चुनौतियाँ

  1. वादों का अत्यधिक बोझ: लाखों मामले लंबित हैं।
  2. तकनीकी जटिलता: CPC की प्रक्रियाएँ अक्सर लंबी और कठिन हो जाती हैं।
  3. विलंब क्षमा प्रावधान का दुरुपयोग: कई बार पक्षकार जानबूझकर देरी करते हैं।
  4. तकनीकी विकास की कमी: अब भी कई न्यायालय ई-प्रणाली से पूरी तरह नहीं जुड़े हैं।

सुधार और प्रयास

  1. CPC संशोधन, 2002: त्वरित निपटान के लिए लिखित बयान 90 दिन में दायर करने का प्रावधान।
  2. ई-कोर्ट प्रोजेक्ट: डिजिटल माध्यम से वाद दायर करने की सुविधा।
  3. ADR का प्रोत्साहन: मध्यस्थता, पंचाट और सुलह के माध्यम से वादों का समाधान।
  4. COVID-19 के दौरान विस्तार: सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः परिसीमा अवधि बढ़ा दी, जिससे लचीलापन दिखा।

व्यावहारिक महत्व

  • नागरिकों के लिए: उन्हें समय पर न्याय पाने और अपने अधिकार सुरक्षित रखने का साधन मिलता है।
  • वकीलों के लिए: इन दोनों अधिनियमों का गहन ज्ञान आवश्यक है ताकि वे सही समय पर सही मुकदमा दायर कर सकें।
  • न्यायालयों के लिए: यह प्रक्रिया और समयसीमा तय कर न्यायालय के काम को व्यवस्थित बनाते हैं।

निष्कर्ष

सिविल प्रक्रिया संहिता और परिसीमा अधिनियम भारतीय सिविल न्याय प्रणाली की नींव हैं। CPC यह सुनिश्चित करती है कि न्यायालय मुकदमों को एक निर्धारित प्रक्रिया से चलाएँ, वहीं Limitation Act यह गारंटी देता है कि मुकदमे समय पर दायर हों। यदि ये दोनों अधिनियम न हों तो न्यायालयों में अनिश्चितता और अराजकता फैल सकती है। आज की आवश्यकता है कि इन कानूनों को तकनीकी विकास और सामाजिक परिवर्तन के अनुरूप अद्यतन किया जाए ताकि न्याय केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और समयबद्ध हो।


सिविल प्रक्रिया संहिता एवं परिसीमा अधिनियम (CPC & Limitation Act) – 10 शॉर्ट आंसर


प्रश्न 1. सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: सिविल प्रक्रिया संहिता का मुख्य उद्देश्य सिविल मामलों में न्यायालयों की कार्यवाही को एक समान ढांचा प्रदान करना है। यह अधिनियम दावों की दाखिला, वाद पत्र, नोटिस, वादी और प्रतिवादी की भूमिका, निर्णय, अपील और निष्पादन की प्रक्रिया को विनियमित करता है।


प्रश्न 2. परिसीमा अधिनियम, 1963 का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: परिसीमा अधिनियम का उद्देश्य समय सीमा तय करना है जिसके भीतर व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा हेतु वाद दायर कर सकता है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि अनावश्यक विलंब से न्यायालयों पर भार न बढ़े और विवाद समय रहते निपटाए जा सकें।


प्रश्न 3. सिविल प्रक्रिया संहिता में ‘वाद पत्र’ (Plaint) का क्या महत्व है?
उत्तर: वाद पत्र वह दस्तावेज़ है जिसके माध्यम से वादी अपने अधिकारों और प्रतिवादी के विरुद्ध दावे को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करता है। इसमें विवाद की पूरी जानकारी, आधार और राहत की मांग स्पष्ट रूप से लिखी जाती है।


प्रश्न 4. परिसीमा अधिनियम में “Limitation Period” से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: लिमिटेशन पीरियड वह निर्धारित समय सीमा है जिसके भीतर वादी को वाद दाखिल करना अनिवार्य होता है। यदि वाद समय सीमा के बाद दायर किया जाता है तो सामान्यत: न्यायालय उसे स्वीकार नहीं करता, सिवाय विशेष परिस्थितियों में।


प्रश्न 5. CPC में ‘अपील’ (Appeal) का क्या अर्थ है?
उत्तर: अपील का अर्थ है कि निचली अदालत के निर्णय से असंतुष्ट पक्ष उच्च न्यायालय में निर्णय को चुनौती दे सकता है। यह न्यायिक त्रुटि सुधारने और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण साधन है।


प्रश्न 6. परिसीमा अधिनियम के तहत ‘Delay Condonation’ क्या है?
उत्तर: यदि कोई व्यक्ति वैध कारणों से समय पर वाद दायर नहीं कर पाता तो न्यायालय उसकी देरी को क्षमा कर सकता है। इसे “Delay Condonation” कहते हैं और यह न्यायालय के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है।


प्रश्न 7. CPC में ‘Res Judicata’ सिद्धांत क्या है?
उत्तर: Res Judicata सिद्धांत के अनुसार यदि किसी विवाद का निपटारा न्यायालय द्वारा एक बार हो चुका है तो उसी विषय पर पुनः वाद दायर नहीं किया जा सकता। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में दोहराव और अनावश्यक मुकदमेबाजी रोकना है।


प्रश्न 8. परिसीमा अधिनियम में ‘Acknowledgment of Debt’ का क्या प्रभाव है?
उत्तर: यदि देनदार अपनी देनदारी को लिखित रूप से स्वीकार करता है तो परिसीमा की अवधि पुनः आरंभ हो जाती है। इसका मतलब है कि लेनदार को नया समय सीमा मिल जाती है वसूली के लिए।


प्रश्न 9. CPC में ‘Temporary Injunction’ का क्या महत्व है?
उत्तर: अस्थायी निषेधाज्ञा न्यायालय द्वारा दी जाती है ताकि वाद लंबित रहने तक किसी पक्ष को हानि न हो। यह अंतिम निर्णय आने तक वर्तमान स्थिति बनाए रखने में सहायक होती है।


प्रश्न 10. परिसीमा अधिनियम के अभाव में क्या समस्याएँ उत्पन्न होतीं?
उत्तर: यदि परिसीमा अधिनियम न होता तो लोग वर्षों बाद भी वाद दायर करते रहते, जिससे न्यायालयों पर अत्यधिक भार बढ़ता। समय पर विवाद का समाधान न होने से साक्ष्य नष्ट हो जाते और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती।