“भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 : पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण के अधिकार की संवैधानिक सुरक्षा”
प्रस्तावना :
भारतीय समाज में परिवार को सबसे मजबूत सामाजिक संस्था माना जाता है। लेकिन जब किसी परिवार में आर्थिक या वैवाहिक विवाद उत्पन्न होते हैं, तो सबसे अधिक प्रभावित वे सदस्य होते हैं जो दूसरों पर निर्भर होते हैं — जैसे पत्नी, बच्चे और वृद्ध माता-पिता। ऐसे लोगों की सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के लिए कानून ने उन्हें भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार दिया है। पहले यह प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 में था, लेकिन अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita – BNSS), 2023 के तहत यह प्रावधान धारा 144 के रूप में सम्मिलित किया गया है। यह धारा समाज के कमजोर वर्गों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
धारा 144 (BNSS) का उद्देश्य
BNSS की धारा 144 का मूल उद्देश्य यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी, नाबालिग बच्चों या वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करने में असफल रहता है, तो अदालत उसके विरुद्ध आदेश जारी कर सकती है जिससे उन्हें हर महीने आवश्यक आर्थिक सहायता मिल सके। इस प्रावधान का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि परिवार के ऐसे सदस्य, जो स्वयं के भरण-पोषण के साधन नहीं रखते, उन्हें दर-दर की ठोकरें न खानी पड़े और वे सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें।
कौन दावा कर सकता है भरण-पोषण का?
धारा 144 के तहत निम्नलिखित व्यक्ति भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं:
- पत्नी (Wife):
अगर पति अपनी पत्नी को बिना किसी उचित कारण के छोड़ देता है, या उसके साथ नहीं रहता, तो पत्नी अदालत में भरण-पोषण का दावा कर सकती है। यह अधिकार विवाहित और तलाकशुदा दोनों महिलाओं को दिया गया है, बशर्ते वे पुनर्विवाह न की हों। - बच्चे (Children):
नाबालिग बच्चे, चाहे वैध हों या अवैध, दोनों ही भरण-पोषण के हकदार हैं। यदि कोई बच्चा शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग है और स्वयं का पालन नहीं कर सकता, तो उसे भी यह अधिकार प्राप्त है। - माता-पिता (Parents):
वृद्ध माता-पिता, जो अपने जीवनयापन के लिए संतान पर निर्भर हैं, इस धारा के तहत भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति में माता-पिता का सम्मान सर्वोपरि माना गया है, इसलिए यह कानूनी सुरक्षा उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कानूनी प्रक्रिया और न्यायालय का अधिकार
धारा 144 के तहत आवेदन Magistrate of First Class के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। न्यायालय, तथ्यों की जांच कर यह तय करता है कि क्या संबंधित व्यक्ति वास्तव में अपने आश्रितों का भरण-पोषण करने में असफल रहा है। यदि यह साबित हो जाता है कि आश्रित व्यक्ति वास्तव में भरण-पोषण के लिए पात्र है, तो न्यायालय मासिक भत्ता (maintenance allowance) का आदेश देता है।
अदालत यह भी देखती है कि भरण-पोषण की राशि इतनी हो कि उससे आवेदक का बुनियादी जीवन-यापन, जैसे भोजन, वस्त्र, शिक्षा और स्वास्थ्य की आवश्यकताएँ पूरी हो सकें। अदालत, पति या संतान की आय, जीवन स्तर और पारिवारिक स्थिति को ध्यान में रखकर राशि निर्धारित करती है।
भरण-पोषण की राशि और भुगतान का तरीका
भरण-पोषण की राशि का निर्धारण मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कोई निश्चित दर निर्धारित नहीं की गई है, बल्कि अदालत प्रत्येक मामले में अलग-अलग तथ्यों को देखकर निर्णय देती है। अदालत इस राशि का भुगतान हर महीने या किसी अन्य समयावधि में करने का आदेश दे सकती है।
यदि कोई व्यक्ति आदेश के बावजूद भरण-पोषण का भुगतान नहीं करता, तो अदालत उसके खिलाफ वारंट जारी कर सकती है और उसे जुर्माना या कारावास की सजा भी दी जा सकती है। यह व्यवस्था कानून की गंभीरता को दर्शाती है।
धारा 144 का सामाजिक महत्व
BNSS की धारा 144 केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का उपकरण है। यह धारा समाज के उन वर्गों को सुरक्षा प्रदान करती है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिनके पास अपनी जीविका के साधन नहीं हैं।
यह प्रावधान निम्नलिखित सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है:
- आर्थिक रूप से निर्भर व्यक्तियों की गरिमा की रक्षा
- परिवार में जिम्मेदारी और नैतिकता की भावना का विकास
- समाज में भिक्षावृत्ति, गरीबी और निर्भरता को कम करना
- महिलाओं और वृद्धजनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
न्यायालयों के कुछ महत्वपूर्ण निर्णय
- भंडारी बनाम भंडारी (Bhandari v. Bhandari)
इस मामले में न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि मानवाधिकार का हिस्सा है। हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है, और भरण-पोषण उसी का विस्तार है। - चंपा देवी बनाम रामस्वरूप (Champa Devi v. Ramswaroop)
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की जिम्मेदारी पति या संतान की आय और क्षमता के अनुसार तय की जाएगी, और इसे टाला नहीं जा सकता। - शबाना बी बनाम इमरान खान (Shabana Bibi v. Imran Khan)
इस निर्णय में कहा गया कि तलाकशुदा महिला भी भरण-पोषण का दावा कर सकती है, जब तक वह पुनर्विवाह न करे।
BNSS में CrPC से क्या बदलाव हुए हैं
BNSS की धारा 144 ने CrPC की धारा 125 की जगह ली है। यद्यपि दोनों का उद्देश्य समान है, लेकिन BNSS ने इसे और अधिक स्पष्ट और व्यापक बनाया है।
मुख्य अंतर इस प्रकार हैं:
- BNSS ने भाषा को सरल और समझने योग्य बनाया है।
- आवेदन की प्रक्रिया को डिजिटल और अधिक पारदर्शी बनाया गया है।
- समयबद्ध सुनवाई और आदेश की बाध्यता को जोड़ा गया है ताकि न्याय में देरी न हो।
- न्यायालय को आदेश के पालन की निगरानी के अधिकार भी दिए गए हैं।
महिलाओं और बच्चों के सशक्तिकरण में भूमिका
धारा 144 महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह महिलाओं को यह संदेश देती है कि वे अपने अधिकारों से वंचित नहीं रहें। इससे घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और परित्याग जैसी स्थितियों में महिलाएँ कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकती हैं।
बच्चों के मामले में भी यह धारा सुनिश्चित करती है कि उन्हें शिक्षा, भोजन और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ निरंतर मिलती रहें।
माता-पिता के अधिकारों की सुरक्षा
आज के बदलते समाज में वृद्ध माता-पिता की स्थिति चिंता का विषय बन चुकी है। कई बार संतान उन्हें छोड़ देती है या आर्थिक रूप से सहयोग नहीं करती। ऐसे में धारा 144 उन्हें यह अधिकार देती है कि वे अदालत से न्याय की मांग कर सकें। यह न केवल कानूनी संरक्षण है बल्कि सामाजिक संवेदना का भी प्रतीक है।
आलोचना और चुनौतियाँ
हालाँकि धारा 144 एक प्रगतिशील प्रावधान है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ भी हैं, जैसे:
- न्यायालयों में मामलों का लंबा समय लगना
- आदेशों का पालन न होना
- आय के निर्धारण में पारदर्शिता की कमी
- ग्रामीण क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता का अभाव
इन चुनौतियों से निपटने के लिए कानूनी सहायता केंद्रों और सामाजिक संगठनों की भूमिका अहम है।
निष्कर्ष
BNSS की धारा 144 भारतीय न्याय व्यवस्था में एक मानवीय और संवेदनशील प्रावधान है, जो “कानून का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि समाज में न्याय की स्थापना करना” को सिद्ध करती है। यह धारा न केवल निर्भर व्यक्तियों की आर्थिक सहायता सुनिश्चित करती है, बल्कि समाज में पारिवारिक उत्तरदायित्व की भावना को भी प्रबल करती है।
आज जब समाज आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार के प्रति कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी को समझे। भरण-पोषण का अधिकार केवल एक आर्थिक सहारा नहीं, बल्कि मानव गरिमा और समानता का प्रतीक है। इसीलिए BNSS की धारा 144 को सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम कहा जा सकता है।