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भर्ती प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादा: चयन के बीच ‘योग्यता के नियम’ बदलना क्यों है असंवैधानिक

भर्ती प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादा: चयन के बीच ‘योग्यता के नियम’ बदलना क्यों है असंवैधानिक

प्रस्तावना: नौकरी नहीं, बल्कि अधिकार का सवाल

      सरकारी नौकरी केवल रोज़गार का साधन नहीं होती, बल्कि यह संविधान द्वारा संरक्षित समान अवसर के अधिकार का व्यावहारिक रूप है। जब राज्य किसी पद के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू करता है, तो वह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं कर रहा होता—वह नागरिकों के साथ एक संवैधानिक वचन (constitutional promise) कर रहा होता है। यह वचन है निष्पक्षता, पारदर्शिता और समानता का।

इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह सिद्धांत दोहराया है कि “खेल शुरू होने के बाद उसके नियम नहीं बदले जा सकते”। भर्ती प्रक्रिया भी एक प्रकार का ‘प्रतिस्पर्धात्मक खेल’ है, जहाँ उम्मीदवार अपनी योग्यता, समय और संसाधन लगाकर भाग लेते हैं। यदि चयन के बीच में सरकार योग्यता मानक या चयन पद्धति बदल देती है, तो यह केवल प्रक्रिया में बदलाव नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर आघात होता है।


भर्ती प्रक्रिया: प्रशासनिक कार्य नहीं, संवैधानिक दायित्व

राज्य द्वारा की जाने वाली प्रत्येक नियुक्ति अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सरकारी रोजगार में समान अवसर) के अधीन होती है। इसका अर्थ है:

  • चयन प्रक्रिया मनमानी नहीं हो सकती
  • नियम पूर्व निर्धारित होने चाहिए
  • सभी अभ्यर्थियों को समान शर्तों पर प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलना चाहिए

जब विज्ञापन जारी होता है, तभी “नियमों का ढाँचा” तय हो जाता है—पात्रता, परीक्षा पद्धति, अंक विभाजन, कट-ऑफ, मेरिट सूची का तरीका आदि। यही ढाँचा उम्मीदवारों के लिए भरोसे का आधार बनता है।


‘Rules of the Game’ सिद्धांत क्या है?

न्यायालयों ने समय-समय पर यह सिद्धांत स्थापित किया है कि:

एक बार चयन प्रक्रिया प्रारंभ हो जाने के बाद, चयन मानदंडों में बदलाव करना न्यायसंगत नहीं है।

यह सिद्धांत केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक आधार पर खड़ा है।

इस सिद्धांत का सार:

तत्व अर्थ
पूर्वानुमेयता (Predictability) उम्मीदवार पहले से जानते हों कि उनका मूल्यांकन कैसे होगा
निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सभी एक ही नियमों के तहत भाग लें
मनमानी पर रोक सरकार बाद में नियम बदलकर किसी को लाभ/हानि न पहुँचा सके

बीच में नियम बदलना: समस्या कहाँ है?

सरकारें अक्सर यह तर्क देती हैं कि प्रशासनिक आवश्यकता या “बेहतर चयन” के लिए मानक बदलना जरूरी था। परंतु न्यायालयों ने इसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि:

1. समान अवसर का हनन (Violation of Article 16)

जब कोई उम्मीदवार परीक्षा देता है, तो वह उस समय लागू नियमों के आधार पर तैयारी करता है। यदि बाद में मानक बदल दिए जाएँ, तो उसका प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन बिगड़ जाता है।

2. मनमानी (Arbitrariness)

अनुच्छेद 14 मनमाने राज्य कार्रवाई पर रोक लगाता है। बीच में नियम बदलना “fair play” के सिद्धांत के विपरीत है।

3. पारदर्शिता का अभाव

नियमों में बदलाव अक्सर अस्पष्ट कारणों से होता है, जिससे प्रक्रिया पर अविश्वास बढ़ता है।


न्यायसंगत अपेक्षा (Legitimate Expectation) का सिद्धांत

यह प्रशासनिक कानून का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका आशय है कि:

जब सरकार कोई नीति, नियम या विज्ञापन जारी करती है, तो नागरिकों को यह वैध अपेक्षा होती है कि सरकार उसी के अनुसार कार्य करेगी।

भर्ती विज्ञापन भी एक प्रकार की सरकारी घोषणा है। अभ्यर्थी:

  • फॉर्म भरते हैं
  • फीस जमा करते हैं
  • समय और संसाधन लगाते हैं

यह सब उस भरोसे पर कि नियम स्थिर रहेंगे। यदि बाद में उन्हें बदल दिया जाए, तो यह उनकी न्यायसंगत अपेक्षा का उल्लंघन है।


योग्यता मानक बदलने का वास्तविक प्रभाव

मान लीजिए:

  • प्रारंभ में लिखित परीक्षा 100 अंकों की थी
  • चयन केवल मेरिट के आधार पर होना था

बाद में सरकार कहे कि:

  • इंटरव्यू के अंक जोड़े जाएँगे
  • न्यूनतम योग्यता अंक बढ़ा दिए जाएँगे

तो क्या होगा?

  • कुछ उम्मीदवार, जो पहले मेरिट में थे, बाहर हो जाएँगे
  • कुछ नए उम्मीदवार लाभ में आ जाएँगे
  • पूरी प्रतिस्पर्धा का संतुलन बदल जाएगा

यह स्थिति निष्पक्षता के मूल सिद्धांत को नष्ट कर देती है।


प्रशासनिक विवेकाधिकार बनाम संवैधानिक सीमा

सरकार के पास प्रशासनिक विवेकाधिकार होता है, परंतु यह असीमित नहीं है। यह विवेकाधिकार:

  • संविधान के अधीन है
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन है

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि विवेकाधिकार का प्रयोग नियमों को मनमाने ढंग से बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।


भर्ती प्रक्रिया = अनुबंध जैसा संबंध

यद्यपि यह औपचारिक अनुबंध नहीं होता, फिर भी विज्ञापन और उम्मीदवार के बीच एक क्वासी-कॉन्ट्रैक्चुअल रिलेशन बन जाता है।

सरकार का वचन उम्मीदवार की अपेक्षा
तय मानक उन्हीं के आधार पर मूल्यांकन
पारदर्शिता निष्पक्ष अवसर
स्थिर नियम सुरक्षित प्रतिस्पर्धा

नियम बदलना इस “विश्वास संबंध” को तोड़ देता है।


न्यायालयों का रुख: क्यों कठोर है?

न्यायपालिका का दृष्टिकोण केवल तकनीकी वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह यह देखती है कि:

  • क्या प्रक्रिया न्यायसंगत थी?
  • क्या उम्मीदवारों को धोखे में रखा गया?
  • क्या बदलाव से किसी वर्ग को अनुचित लाभ मिला?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो न्यायालय हस्तक्षेप करता है।


लोक प्रशासन पर व्यापक प्रभाव

इस सिद्धांत के कारण प्रशासन पर तीन महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ते हैं:

1. जवाबदेही बढ़ती है

भर्ती एजेंसियाँ पहले से स्पष्ट नियम बनाने को बाध्य होती हैं।

2. पारदर्शिता सुनिश्चित होती है

नियमों को सार्वजनिक रूप से घोषित करना पड़ता है।

3. भ्रष्टाचार की संभावना घटती है

बाद में नियम बदलकर किसी को लाभ पहुँचाने का रास्ता बंद होता है।


नैतिक आयाम: केवल कानून नहीं, विश्वास का प्रश्न

यह मुद्दा केवल संवैधानिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है। जब राज्य नियम बदलता है, तो यह संदेश जाता है कि:

“नियम स्थिर नहीं हैं, परिणाम पहले तय हो सकते हैं।”

ऐसी धारणा लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। भर्ती प्रक्रिया में निष्पक्षता ही जनता के विश्वास का आधार है।


व्यावसायिक जीवन के लिए सीख

यह सिद्धांत केवल सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं है। निजी क्षेत्र में भी:

  • अनुबंध की शर्तें
  • सेवा की गुणवत्ता
  • मूल्य निर्धारण

यदि बीच में बिना सहमति बदले जाएँ, तो वही स्थिति उत्पन्न होती है—विश्वास टूटता है।


संवैधानिक दर्शन: ‘Rule of Law’ का व्यावहारिक रूप

“Rule of Law” का अर्थ है:

  • कानून सर्वोच्च है
  • सरकार भी कानून से बंधी है
  • निर्णय पूर्व निर्धारित नियमों के अनुसार होंगे

भर्ती प्रक्रिया में नियम बदलना इस सिद्धांत के विपरीत है।


निष्कर्ष: भर्ती प्रक्रिया में स्थिरता ही न्याय है

सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख स्पष्ट करता है कि:

  • प्रशासनिक सुविधा संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती
  • चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता अनिवार्य है
  • नियमों की स्थिरता ही समान अवसर की गारंटी है

चयन के बीच में योग्यता मानक बदलना केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद 14 और 16 दोनों की आत्मा के विरुद्ध है। न्यायपालिका का यह हस्तक्षेप लोकतंत्र की उस बुनियाद को मजबूत करता है जहाँ राज्य की शक्ति नागरिकों के अधिकारों के अधीन होती है।

अंततः यह सिद्धांत एक गहरा संदेश देता है —
सरकार खेल की संचालक हो सकती है, लेकिन नियमों से ऊपर नहीं।