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ब्लू कॉलर और गिग इकोनॉमी कानून (Blue Collar & Gig Economy Law): उबर, ज़ोमैटो, स्विगी जैसे प्लेटफ़ॉर्मों में श्रमिक अधिकार, न्यूनतम वेतन और रोजगार सुरक्षा

ब्लू कॉलर और गिग इकोनॉमी कानून (Blue Collar & Gig Economy Law): उबर, ज़ोमैटो, स्विगी जैसे प्लेटफ़ॉर्मों में श्रमिक अधिकार, न्यूनतम वेतन और रोजगार सुरक्षा का विस्तृत कानूनी विश्लेषण 


 प्रस्तावना

       इक्कीसवीं सदी में तकनीक ने रोजगार की पारंपरिक अवधारणा को पूरी तरह बदल दिया है। स्थायी नौकरी, निश्चित वेतन और तय कार्य-घंटों की जगह अब गिग इकोनॉमी (Gig Economy) ने ले ली है, जहाँ उबर, ओला, ज़ोमैटो, स्विगी, अमेज़न फ्लेक्स जैसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म लाखों लोगों को “काम के अवसर” उपलब्ध कराते हैं।
इन प्लेटफ़ॉर्मों से जुड़े अधिकांश श्रमिक ब्लू कॉलर वर्कर्स हैं—जैसे ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर, वेयरहाउस वर्कर, कूरियर बॉय आदि।

लेकिन प्रश्न यह है कि—
क्या ये श्रमिक “कर्मचारी” हैं या सिर्फ़ “स्वतंत्र ठेकेदार”?
क्या इन्हें न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार संरक्षण प्राप्त है?
भारतीय कानून गिग वर्कर्स और फ्रीलांसर्स को किस हद तक सुरक्षा देता है?

यह लेख इन्हीं प्रश्नों का संवैधानिक, वैधानिक और न्यायिक दृष्टि से विस्तृत उत्तर प्रस्तुत करता है।


 1. ब्लू कॉलर वर्कर्स और गिग इकोनॉमी: अवधारणात्मक अंतर

(क) ब्लू कॉलर वर्कर्स

ब्लू कॉलर श्रमिक वे होते हैं जो शारीरिक श्रम या तकनीकी कार्य करते हैं, जैसे—

  • ड्राइवर
  • डिलीवरी बॉय
  • फैक्ट्री वर्कर
  • कंस्ट्रक्शन वर्कर

परंपरागत रूप से ये श्रमिक औद्योगिक कानूनों के अंतर्गत आते रहे हैं।

(ख) गिग वर्कर्स और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स

गिग वर्कर्स वे हैं जो—

  • अल्पकालिक, कार्य-आधारित काम करते हैं
  • किसी एक नियोक्ता से स्थायी रूप से जुड़े नहीं होते
  • डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से काम प्राप्त करते हैं

उदाहरण: उबर ड्राइवर, ज़ोमैटो/स्विगी डिलीवरी पार्टनर।


 2. उबर, ज़ोमैटो, स्विगी मॉडल: “नियोक्ता” से बचने की रणनीति

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म कंपनियाँ अपने श्रमिकों को—

  • Employee नहीं
  • बल्कि Independent Contractor या Delivery Partner
    बताती हैं।

इसका उद्देश्य:

  • न्यूनतम वेतन कानून से बचना
  • पीएफ, ईएसआई, ग्रेच्युटी जैसी जिम्मेदारियों से बचना
  • बर्खास्तगी और सेवा शर्तों पर पूर्ण नियंत्रण रखना

लेकिन व्यवहार में—

  • कंपनी किराया/कमिशन तय करती है
  • एल्गोरिदम से कार्य नियंत्रित होता है
  • रेटिंग सिस्टम से काम मिलता या छिनता है

 यह स्थिति “नियंत्रण और पर्यवेक्षण” (Control & Supervision Test) को जन्म देती है।


 3. श्रमिक या ठेकेदार? — कानूनी विवाद का केंद्र

भारतीय श्रम कानूनों में अधिकार तभी मिलते हैं जब व्यक्ति को “कर्मचारी” माना जाए।
न्यायालयों ने समय-समय पर विभिन्न परीक्षण विकसित किए हैं:

 (क) नियंत्रण परीक्षण (Control Test)

यदि नियोक्ता कार्य की प्रकृति, समय, तरीका तय करता है—तो श्रमिक कर्मचारी माना जाएगा।

 (ख) एकीकरण परीक्षण (Integration Test)

यदि श्रमिक कंपनी के व्यवसाय का अभिन्न अंग है, तो वह कर्मचारी है।

👉 उबर/स्विगी के मामले में ये दोनों परीक्षण आंशिक रूप से लागू होते हैं।


 4. न्यूनतम वेतन का अधिकार: क्या गिग वर्कर्स को मिलता है?

 न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948

यह अधिनियम “कर्मचारी” शब्द पर आधारित है।
गिग वर्कर्स को इससे बाहर रखा गया था।

 व्यवहारिक समस्या

  • प्लेटफ़ॉर्म “प्रति डिलीवरी” भुगतान करते हैं
  • कार्य-घंटे अनिश्चित होते हैं
  • ईंधन, मोबाइल, बीमा का खर्च श्रमिक उठाता है

 परिणाम: वास्तविक आय न्यूनतम वेतन से भी कम।


 5. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: गिग वर्कर्स के लिए नया युग?

भारत में पहली बार Code on Social Security, 2020 ने—

  • “Gig Worker”
  • “Platform Worker”
    की विधिक परिभाषा दी।

 धारा 2(35) और 2(60)

गिग वर्कर्स को औपचारिक रूप से श्रम कानून की भाषा में स्थान मिला।

 प्रस्तावित लाभ:

  • जीवन एवं दुर्घटना बीमा
  • स्वास्थ्य सुरक्षा
  • वृद्धावस्था संरक्षण
  • मातृत्व लाभ

लेकिन समस्या यह है कि—  अधिकांश प्रावधान अभी अधिसूचित नहीं हुए हैं
लाभ “योजना आधारित” हैं, अधिकार आधारित नहीं


 6. रोजगार सुरक्षा और मनमानी बर्खास्तगी

गिग वर्कर्स को—

  • बिना कारण “डीलिस्ट” किया जा सकता है
  • ऐप एक्सेस बंद कर दी जाती है
  • कोई अपील या सुनवाई नहीं

यह स्थिति प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है।

 अनुच्छेद 21 (जीवन और आजीविका का अधिकार)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि—

“रोजगार भी जीवन का हिस्सा है।”

गिग वर्कर्स की आजीविका एल्गोरिदम के रहमोकरम पर होना संवैधानिक चिंता का विषय है।


 7. यूनियन बनाने का अधिकार: व्यावहारिक चुनौती

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) संघ बनाने का अधिकार देता है।
लेकिन—

  • गिग वर्कर्स को कर्मचारी नहीं माना जाता
  • ट्रेड यूनियन अधिनियम का लाभ सीमित

हालाँकि हाल के वर्षों में—

  • उबर ड्राइवर्स यूनियन
  • ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर संघ
    उभरकर सामने आए हैं।

 8. न्यायिक दृष्टिकोण: भारत और विदेश

भारत

भारतीय न्यायालय अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं।
कुछ हाई कोर्ट मामलों में—

  • श्रमिक अधिकारों के पक्ष में टिप्पणियाँ
  • सरकार को नीति बनाने का निर्देश

 अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य

  • यूके: Uber ड्राइवर्स को “Workers” का दर्जा
  • स्पेन: Rider’s Law — डिलीवरी बॉय कर्मचारी
  • कैलिफ़ोर्निया: AB5 कानून

 भारत के लिए ये मॉडल प्रेरणास्रोत हो सकते हैं।


 9. फ्रीलांसर्स और गिग वर्कर्स: समानताएँ और अंतर

आधार फ्रीलांसर गिग वर्कर
कार्य कौशल आधारित सेवा आधारित
प्लेटफ़ॉर्म सीमित पूर्ण निर्भरता
नियंत्रण कम अधिक
जोखिम स्वयं स्वयं

 दोनों को अलग-अलग लेकिन पर्याप्त कानूनी सुरक्षा आवश्यक है।


 10. भविष्य की दिशा और सुधार की आवश्यकता

 आवश्यक सुधार:

  1. न्यूनतम आय की गारंटी
  2. एल्गोरिदमिक पारदर्शिता
  3. बर्खास्तगी से पूर्व सुनवाई
  4. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का क्रियान्वयन
  5. न्यायिक निगरानी

 नीति का लक्ष्य:

“फ्लेक्सिबिलिटी के साथ सुरक्षा” (Flexibility with Security)


 निष्कर्ष

गिग इकोनॉमी भारत की अर्थव्यवस्था का भविष्य है, लेकिन यह भविष्य तभी टिकाऊ होगा जब इसके केंद्र में मानव गरिमा और श्रमिक अधिकार होंगे।
उबर, ज़ोमैटो, स्विगी जैसे प्लेटफ़ॉर्म तकनीकी नवाचार हैं, लेकिन वे कानून से ऊपर नहीं हो सकते।

ब्लू कॉलर और गिग वर्कर्स को न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार संरक्षण देना केवल नीति विकल्प नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।

यदि भारत को न्यायपूर्ण और समावेशी विकास की ओर बढ़ना है, तो गिग वर्कर्स को “अदृश्य श्रमिक” नहीं, बल्कि कानूनी अधिकारों वाले नागरिक के रूप में स्वीकार करना होगा।