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बांग्लादेशी नागरिकों के अवैध प्रवेश मामले में समानता के आधार पर BJP कार्यकर्ता को इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत

“Allahabad High Court (राजेश सिंह चौहान व अबधेश कुमार चौधरी बी.) ने बिक्रम रॉय नाम के BJP Youth Wing के कार्यकर्ता को बांग्लादेश से अवैध प्रवेश कराने के आरोप में समानता के आधार पर जमानत दी”


प्रस्तावना

उत्तर-प्रदेश की न्यायप्रणाली में आज एक ऐसा निर्णय सामने आया है, जिसने प्रवास, सीमा सुरक्षा, अभियोजन, जमानत और समानता (parity) के मूल्यों को बीच में रखकर चर्चा छेड़ दी है। आज (5 नवम्बर 2025) को इलाहाबाद हाई-कोर्ट ने एक प्रमुख मामला सुना जिसमें एक भाजपा के युवा-कर्मी पर बांग्लादेश से अवैध रूप से लोगों को भारत में लाने, पहचान पत्र बनाने तथा सीमा पार कराने का आरोप था। कोर्ट ने उसे जमानत देने का आदेश दिया है। इस निर्णय से न सिर्फ न्यायिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक आयामों से भी कई प्रश्न उठ रहे हैं।


मामले का विवरण

  • अभियुक्त का नाम बिक्रम रॉय है। उस पर आरोप है कि वर्ष 2023 में Uttar Pradesh Police की Anti‑Terrorist Squad (ATS) द्वारा दर्ज एक केस में, वह बांग्लादेशी नागरिकों को अवैध तरीके से भारत ले आने तथा उनकी पहचान दस्तावेजों का जालसाजी करने में संलिप्त था।
  • केस में आरोपों के तहत आईपीसी की धारा 120-B (साजिश), 419, 420, 467, 468, 471 तथा 370 (मानव तस्करी) और Foreigners Act, 1946 की धारा 14-C लगाई गई थी।
  • अभियुक्त ने हाई-कोर्ट में जमानत की अपील दायर की थी, जिसमें उसने अपने विरुद्ध पहले हुई खारिज-आदेशों (जुलाई 2024 एवं फरवरी 2025 में) को चुनौती दी थी।
  • कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए उसे जमानत दी। निर्णय का प्रमुख आधार था “समानता” (parity) — यानी पहले ही अन्य सह-आरोпियों को जमानत मिल चुकी थी, इसलिए इस मामले में उसके साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

निर्णय के तर्क एवं न्याय‐विश्लेषण

  1. समानता का तर्क (Parity Argument):
    हाई-कोर्ट ने यह ध्यान दिया कि इस मामले में कई सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी। उदाहरण के लिए सह-आरोपी आदिल-उर-रहमान को जमानत मिली थी, साथ ही अबू सालेह मंडल, अब्दुल अवल, अब्दुल्ला गाजी और कफीलुद्दीन को जून 2025 में जमानत दी गई थी।
    इसलिए, यदि बिक्रम रॉय को जमानत न दी जाए तो न्यायिक दृष्टि से “समान परिस्थिति में भेदभाव” का प्रश्न उत्पन्न हो जाता था। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार किया।
  2. मुकदमे की स्थिति तथा कारावास अवधि:
    • अभियुक्त लगभग दो साल से हिरासत में था।
    • अभियोजन पक्ष द्वारा दर्ज गवाहों की संख्या “100 से अधिक” बताई गई थी, जिस कारण मुकदमे को पूरी तरह चलने-समाप्त होने में समय लगेगा।
    • पहले के आदेश में कहा गया था कि Foreigners Act के तहत सबसे अधिक सज़ा पाँच वर्ष तक है, और अभियोजन पक्ष ने यह नहीं दिखाया कि जमानत की स्थिति में अभियुक्त द्वारा मुकदमे में बाधा डाली जाएगी।
  3. अभियुक्त की पार्श्वभूमि:
    विक्रम रॉय को पेश किया गया था कि वह मूलतः एक रिक्शा चालक था, पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, तथा उसके विरुद्ध तस्करी-साजिश जैसी जटिल घटनाओं में बड़े आर्थिक लेन-देने का प्रमाण नहीं था।
  4. आपराधिक प्रकृति एवं जमानत योग्यताएँ:
    • ध्यान देने योग्य है कि आरोपों में मानव तस्करी से जुड़ी धारा 370 भी शामिल थी, जो गंभीर अपराध की श्रेणी में आती है।
    • लेकिन अदालत ने पाया कि इस मामले में “NIA अधिनियम” के तहत निर्धारित कोई अपराध प्रमाणित नहीं हुआ था — अर्थात् अभियोजन द्वारा धारा 370 को NIA अधिनियम की सूचीबद्ध अपराधों में शामिल नहीं किया गया था।
    • इस आधार पर, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त को जमानत देने में ऐसा कोई जोखिम नहीं दिख रहा है कि वह जांच-प्रक्रिया को प्रभावित करेगा या भाग जाएगा।

प्रभाव एवं समाज-राजनीतिक आयाम

  1. न्यायिक दृष्टि से:
    इस निर्णय ने जमानत के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला — खासकर “समानता” (parity) और “निरंतर हिरासत” (prolonged custody) के बीच संतुलन। जब अभियुक्त लंबे समय तक हिरासत में हो तथा मुकदमा धीमी गति से चलता हो, और जब अन्य समान अभियुक्तों को जमानत मिल चुकी हो, तब हिरासत में रखे जाने वाला अभियुक्त जमानत का पात्र हो सकता है। यह दृष्टिकोण न्यायप्रणाली में एक सकारात्मक संकेत है।
  2. सीमा-सुरक्षा एवं प्रवास-नीति के संदर्भ में:
    इस मामले में बांग्लादेश से अवैध प्रवेश कराने का आरोप था — जो राष्ट्रीय सुरक्षा, मानव तस्करी व सीमा नियंत्रण की चुनौतियों को दर्शाता है। ऐसे मामलों में जमानत प्रदान करना सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील होता है। न्यायालय ने इस संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए भी निर्णय लिया, जो यह संकेत देता है कि जमानत-प्रदान की पद्धति सिर्फ “सामान्य अस्मिताओं” पर आधारित नहीं हो सकती, बल्कि प्रत्यक्ष साक्ष्यों, अभियोजन की मजबूती, आरोपी के पलायन/प्रभाव की स्थिति आदि पर आधारित होनी चाहिए।
  3. राजनीतिक आयाम:
    चूंकि अभियुक्त भाजपा-युवा-मंच का कार्यकर्ता था, इसलिए यह मामला राजनीतिक रूप से भी चर्चा में आएगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जमानत निर्णय केवल विधि-विधान, साक्ष्य-स्थिति तथा न्याय-सिद्धांतों पर आधारित है, न कि किसी राजनीतिक विचारधारा पर।
  4. मुकदमे की आगे की प्रक्रिया:
    जमानत मिलने के बाद भी अभियुक्त को कई शर्तें पूरी करनी होंगी — जैसे कि जांच-प्रक्रिया में सहयोग करना, अदालत द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करना, निश्चित पते पर रहना, अदालत द्वारा बताई गई हाजिरी देना आदि। इसके अतिरिक्त, मुकदमा अब भी पटरी पर आगे बढ़ेगा जहाँ अभियोजन पक्ष को गवाह-विवेचन, साक्ष्य-तयारी आदि कार्य करना है।

चर्चा-विषय बिंदु

  • क्या न्यायालय ने “मानव-तस्करी” जैसे गंभीर आरोप में जमानत देने में ठीक संतुलन बनाए रखा है?
  • जमानत-पर्याय में “समानता” का तर्क कितना निर्णायक होना चाहिए, विशेषकर जब सुरक्षा-सम्बन्धी मामलों का प्रश्न हो?
  • प्रवास व सीमा-सुरक्षा के मामलों में अभियुक्तों को लंबे समय तक हिरासत में रखने का क्या न्यायसंगत आधार होना चाहिए?
  • राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में न्यायिक निष्पक्षता के लिए क्या अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए?
  • इस निर्णय से आगे अन्य अभियुक्तों के जमानत-दावों पर क्या असर पड़ सकता है?

निष्कर्ष

इस प्रकार, इलाहाबाद हाई-कोर्ट के इस जमानत निर्णय ने न्याय, समानता और प्रक्रिया-न्याय के बीच संतुलन स्थापित किया है। यह स्पष्ट है कि जमानत-प्रदान केवल अभियुक्त की ओर से वकालत योग्य होता नहीं, बल्कि न्यायालय को यह देखना होता है कि जमानत देने से न्यायिक प्रक्रिया में बाधा नहीं होगी, आरोपी भाग नहीं जाएगा और अन्य समान मामलों के साथ असमान व्यवहार नहीं हो रहा है।

यह निर्णय एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे विधि-प्रक्रिया के भीतर सुरक्षा-संबंधी, प्रवासी-संबंधी और राजनीतिक संवेदनशीलता के बीच न्याय-सिद्धांतों को लागू किया जाता है। इस मामले का आगे-का विकास (जैसे मुकदमे की गति, अभियोजन पक्ष की तैयारी, गवाह-साक्ष्य की गुणवत्ता) यह बताएगा कि जमानत-प्रक्रिया में कितना न्याय हुआ और क्या इस तरह के मामलों में भविष्य में भी समान दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।