पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 : उत्पत्ति, प्रावधान और महत्व
भूमिका
पर्यावरण (Environment) मनुष्य के अस्तित्व और विकास की आधारशिला है। स्वच्छ वायु, शुद्ध जल, उपजाऊ भूमि और प्राकृतिक संसाधन न केवल जीवन का आधार हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक हैं। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और तकनीकी प्रगति के कारण प्रदूषण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता में कमी जैसे गंभीर खतरे उत्पन्न हुए। इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के उपाय सुझाए गए। भारत ने भी इस दिशा में कदम उठाते हुए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986) लागू किया, जो हमारे देश का सबसे व्यापक और समग्र पर्यावरणीय कानून माना जाता है।
स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972 और भारतीय परिप्रेक्ष्य
वर्ष 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र ने मानव पर्यावरण पर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में लगभग 113 देशों ने भाग लिया और पहली बार यह स्वीकार किया गया कि पर्यावरण संरक्षण और विकास एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रक्रियाएँ हैं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस सम्मेलन में हिस्सा लिया और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद भारत में संविधान संशोधन कर अनुच्छेद 48-ए और अनुच्छेद 51-ए (g) जोड़े गए।
- अनुच्छेद 48-ए: राज्य का कर्तव्य होगा कि वह पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव की रक्षा और संवर्धन करे।
- अनुच्छेद 51-ए (g): प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य होगा कि वह पर्यावरण की रक्षा करे और प्राकृतिक संपदा को सुरक्षित रखे।
यही संवैधानिक आधार आगे चलकर 1986 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बनाने का कारण बना।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की पृष्ठभूमि
1984 में भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) ने पूरे विश्व को हिला दिया। हजारों लोगों की मृत्यु और लाखों लोगों पर स्वास्थ्य प्रभाव ने यह साबित कर दिया कि औद्योगिक गतिविधियों के लिए कठोर और समग्र पर्यावरणीय कानून की आवश्यकता है। इसी पृष्ठभूमि में संसद ने 23 मई 1986 को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 लागू किया।
अधिनियम का उद्देश्य
इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा करना और औद्योगिक विकास तथा पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य स्थापित करना है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं –
- पर्यावरण की गुणवत्ता को सुधारना और सुरक्षित रखना।
- प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने और कम करने के लिए ठोस कदम उठाना।
- पर्यावरणीय खतरों से मानव, पशु और पौधों के जीवन की रक्षा करना।
- केंद्रीय सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक अधिकार देना।
- अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों और संधियों को लागू करना।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की प्रमुख परिभाषाएँ
अधिनियम में कई महत्त्वपूर्ण शब्दों की परिभाषा दी गई है:
- पर्यावरण: इसमें जल, वायु, भूमि और इनसे संबंधित सभी जीवित तथा निर्जीव तत्व शामिल हैं।
- पर्यावरण प्रदूषक: कोई भी ठोस, तरल या गैसीय पदार्थ जो पर्यावरण की गुणवत्ता को हानि पहुँचाता है।
- पर्यावरण प्रदूषण: किसी भी प्रदूषक के पर्यावरण में उपस्थित होने से उत्पन्न हानिकारक प्रभाव।
अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ और प्रावधान
- केंद्रीय सरकार के अधिकार –
- पर्यावरण की रक्षा हेतु नीतियाँ और कार्यक्रम बनाना।
- प्रदूषण रोकने के मानक तय करना।
- किसी भी औद्योगिक इकाई पर प्रतिबंध लगाना।
- पर्यावरणीय आपदाओं से निपटने के लिए विशेष कदम उठाना।
- पर्यावरण गुणवत्ता के मानक –
अधिनियम के अंतर्गत वायु, जल, मृदा और ध्वनि प्रदूषण के मानक निर्धारित किए गए हैं। - नए औद्योगिक प्रोजेक्ट्स पर नियंत्रण –
कोई भी नया उद्योग या प्रोजेक्ट तभी शुरू हो सकता है जब उसे पर्यावरणीय अनुमति (Environmental Clearance) प्राप्त हो। - खतरनाक पदार्थों का प्रबंधन –
रसायन, जहरीले कचरे और रेडियोधर्मी पदार्थों के सुरक्षित उपयोग एवं निपटान के लिए कठोर नियम बनाए गए हैं। - दंडात्मक प्रावधान –
- अधिनियम के उल्लंघन पर 5 वर्ष तक की सज़ा या जुर्माना (1 लाख रुपये तक) या दोनों हो सकते हैं।
- लगातार उल्लंघन होने पर अधिक कठोर दंड दिए जा सकते हैं।
अधिनियम से बने महत्वपूर्ण नियम और अधिसूचनाएँ
इस अधिनियम के तहत अनेक नियम बनाए गए, जैसे –
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), 2006
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
- प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
- बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन नियम, 1998 एवं संशोधित नियम 2016
- ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण नियम, 2000
ये सभी नियम विभिन्न प्रकार के प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन के लिए बनाए गए हैं।
न्यायपालिका की भूमिका
भारतीय न्यायपालिका ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम को व्यापक रूप से लागू किया और कई ऐतिहासिक निर्णय दिए।
- M.C. Mehta बनाम भारत संघ (1987) – ओलेम गैस रिसाव मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘Absolute Liability’ का सिद्धांत लागू किया।
- Subhash Kumar बनाम बिहार राज्य (1991) – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ जल और स्वच्छ पर्यावरण अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का हिस्सा है।
- Vellore Citizens Welfare Forum बनाम भारत संघ (1996) – न्यायालय ने ‘Polluter Pays Principle’ और ‘Sustainable Development’ को भारतीय कानून का हिस्सा बनाया।
अधिनियम की विशेषताएँ
- यह अधिनियम पर्यावरण से जुड़े सभी पहलुओं को एक ही छतरी के अंतर्गत लाता है।
- सरकार को व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है।
- उद्योगों और नागरिकों दोनों पर पर्यावरणीय दायित्व तय करता है।
- संविधान के अनुच्छेद 21, 48-ए और 51-ए(g) की व्याख्या को और प्रभावी बनाता है।
अधिनियम की चुनौतियाँ
- पर्यावरणीय मानकों के प्रभावी अनुपालन में कमी।
- भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढिलाई।
- आम जनता में जागरूकता की कमी।
- औद्योगिक हितों और पर्यावरण संरक्षण के बीच टकराव।
- न्यायिक प्रक्रिया का लंबा होना।
वर्तमान संदर्भ और महत्व
आज के समय में ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, नदी प्रदूषण और प्लास्टिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ गंभीर रूप ले चुकी हैं। इनसे निपटने में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 महत्वपूर्ण उपकरण है। भारत ने इस अधिनियम के आधार पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), 2010 की स्थापना की, जो पर्यावरणीय विवादों के त्वरित निपटान के लिए काम करता है।
निष्कर्ष
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 भारतीय पर्यावरण कानून का आधार स्तंभ है। यह अधिनियम न केवल प्रदूषण रोकने में मदद करता है, बल्कि सतत विकास (Sustainable Development) को भी प्रोत्साहित करता है। हालांकि, इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार, न्यायपालिका, उद्योगों और आम नागरिकों सभी की संयुक्त जिम्मेदारी आवश्यक है। यदि हम आज पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता नहीं देंगे तो आने वाली पीढ़ियों का जीवन संकट में पड़ सकता है।
अतः यह कहा जा सकता है कि –
“पर्यावरण की सुरक्षा, मानव जीवन की सुरक्षा है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 इसी सुरक्षा का कानूनी आधार है।”
प्रश्न 1. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 किस पृष्ठभूमि में लाया गया?
उत्तर: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की पृष्ठभूमि दो प्रमुख घटनाओं से जुड़ी है। पहली घटना थी स्टॉकहोम सम्मेलन, 1972, जिसमें भारत ने यह वचन दिया कि वह पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएगा। दूसरी घटना थी भोपाल गैस त्रासदी (1984), जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि औद्योगिक गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। हजारों लोगों की जान जाने और लाखों लोगों के स्वास्थ्य प्रभावित होने के बाद सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए समग्र कानून की आवश्यकता महसूस की। इसलिए 23 मई 1986 को यह अधिनियम लागू किया गया। इसका उद्देश्य पर्यावरणीय गुणवत्ता बनाए रखना, प्रदूषण रोकना और मानव जीवन तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना था। यह अधिनियम भारत का सबसे व्यापक पर्यावरणीय कानून माना जाता है।
प्रश्न 2. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार करना है। इसमें प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने और कम करने की व्यवस्था की गई है। अधिनियम के अनुसार, केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई है कि वह प्रदूषण के मानक निर्धारित कर सके, उद्योगों को दिशा-निर्देश दे सके और पर्यावरणीय खतरों से निपटने के उपाय कर सके। अधिनियम का एक बड़ा उद्देश्य सतत विकास (Sustainable Development) को सुनिश्चित करना भी है, ताकि औद्योगिक प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन में सामंजस्य बना रहे। इसके साथ ही यह अधिनियम पर्यावरणीय आपदाओं से मानव, पशु और पौधों की रक्षा करने तथा अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय दायित्वों को पूरा करने में भी सहायक है।
प्रश्न 3. इस अधिनियम के अंतर्गत “पर्यावरण” शब्द की परिभाषा क्या है?
उत्तर: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(ए) के अनुसार, “पर्यावरण” में जल, वायु, भूमि और इनके बीच मौजूद आपसी संबंधों के साथ-साथ मानव, पशु, पौधे और सूक्ष्म जीव शामिल हैं। इस परिभाषा का महत्व यह है कि यह पर्यावरण को केवल भौतिक तत्वों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि प्राकृतिक तंत्र (Ecosystem) के सभी घटकों को समाहित करता है। उदाहरण के लिए, यदि वायु प्रदूषित होती है तो वह केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि पौधों और जानवरों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इसी प्रकार, जल प्रदूषण से जलीय जीव प्रभावित होते हैं और अंततः यह मानव जीवन पर असर डालता है। इसलिए इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि पर्यावरण संरक्षण एक समग्र प्रक्रिया है।
प्रश्न 4. इस अधिनियम के तहत केंद्रीय सरकार को कौन-कौन से अधिकार दिए गए हैं?
उत्तर: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत केंद्रीय सरकार को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं –
- प्रदूषण रोकने और पर्यावरण की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नीतियाँ और नियम बनाना।
- वायु, जल, मृदा और ध्वनि प्रदूषण के मानक तय करना।
- किसी उद्योग, परियोजना या प्रक्रिया पर रोक लगाना, यदि उससे पर्यावरण को गंभीर खतरा हो।
- खतरनाक पदार्थों और अपशिष्टों के सुरक्षित प्रबंधन के नियम बनाना।
- पर्यावरणीय आपदाओं से निपटने हेतु विशेष कदम उठाना।
- वैज्ञानिक अनुसंधान और जनजागरूकता को बढ़ावा देना।
इन शक्तियों से यह अधिनियम अत्यंत प्रभावी बन जाता है, क्योंकि सरकार सीधे हस्तक्षेप कर सकती है।
प्रश्न 5. पर्यावरण प्रदूषण रोकने के लिए इस अधिनियम में क्या-क्या प्रावधान किए गए हैं?
उत्तर: इस अधिनियम में पर्यावरण प्रदूषण रोकने हेतु कई प्रावधान किए गए हैं। सबसे पहले, इसमें यह व्यवस्था है कि कोई भी उद्योग या प्रोजेक्ट तभी शुरू हो सकता है जब उसे पर्यावरणीय अनुमति (Environmental Clearance) मिल जाए। इसके अतिरिक्त, वायु, जल, ध्वनि और मृदा प्रदूषण के मानक निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है। खतरनाक रसायनों और अपशिष्टों के सुरक्षित भंडारण और निपटान की व्यवस्था भी इस कानून के तहत की गई है। अधिनियम उल्लंघन करने वालों पर कठोर दंड का प्रावधान करता है, जिसमें 5 वर्ष तक की सजा या 1 लाख रुपये तक का जुर्माना शामिल है। इन प्रावधानों का उद्देश्य यह है कि औद्योगिक विकास पर्यावरणीय संतुलन को नुकसान न पहुँचाए।
प्रश्न 6. इस अधिनियम के अंतर्गत कौन-कौन से दंडात्मक प्रावधान हैं?
उत्तर: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 में उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो उसे 5 वर्ष तक की कैद या 1 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यदि अपराध लगातार जारी रहता है तो प्रतिदिन अतिरिक्त जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अलावा, यदि उल्लंघन के कारण किसी की मृत्यु या गंभीर क्षति होती है तो सजा को और बढ़ाया जा सकता है। दंडात्मक प्रावधानों का उद्देश्य उद्योगों और व्यक्तियों को पर्यावरणीय नियमों के पालन के लिए बाध्य करना है। यह कठोरता पर्यावरणीय अपराधों को रोकने में सहायक है।
प्रश्न 7. अधिनियम से जुड़े प्रमुख नियम और अधिसूचनाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत कई महत्त्वपूर्ण नियम और अधिसूचनाएँ बनाई गई हैं, जिनमें प्रमुख हैं –
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), 2006 – नए प्रोजेक्ट्स की पर्यावरणीय अनुमति हेतु।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 – कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए।
- प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 – प्लास्टिक प्रदूषण रोकने के लिए।
- बायो-मेडिकल वेस्ट प्रबंधन नियम, 1998 एवं 2016 – अस्पतालों से उत्पन्न कचरे के प्रबंधन हेतु।
- ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण नियम, 2000 – ध्वनि प्रदूषण के मानक निर्धारित करने हेतु।
ये सभी नियम अधिनियम को व्यवहारिक और प्रभावी बनाते हैं।
प्रश्न 8. भारतीय न्यायपालिका ने इस अधिनियम की व्याख्या किस प्रकार की है?
उत्तर: भारतीय न्यायपालिका ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 को व्यापक रूप से लागू किया और कई ऐतिहासिक निर्णय दिए। M.C. Mehta बनाम भारत संघ (1987) में सुप्रीम कोर्ट ने ‘Absolute Liability’ का सिद्धांत लागू किया। Subhash Kumar बनाम बिहार राज्य (1991) में कहा गया कि स्वच्छ जल और स्वच्छ पर्यावरण अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का हिस्सा है। Vellore Citizens Welfare Forum बनाम भारत संघ (1996) में ‘Polluter Pays Principle’ और ‘Sustainable Development’ को कानून का हिस्सा बनाया गया। इन निर्णयों ने अधिनियम की शक्ति को और बढ़ाया तथा इसे संविधान के मूल अधिकारों से जोड़ दिया।
प्रश्न 9. इस अधिनियम की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
उत्तर: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के लागू होने के बावजूद कई चुनौतियाँ सामने आती हैं। सबसे बड़ी समस्या है प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन। कई बार उद्योग नियमों का उल्लंघन करते हैं और प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार या लापरवाही के कारण उन्हें दंड नहीं मिलता। दूसरी चुनौती है जन-जागरूकता की कमी। आम जनता को पर्यावरण संरक्षण के महत्व की पूरी जानकारी नहीं होती। तीसरी चुनौती है औद्योगिक हित और पर्यावरणीय हितों का टकराव, जहाँ विकास परियोजनाएँ पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं। इसके अलावा, न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने से पर्यावरणीय मामलों का निपटान देर से होता है।
प्रश्न 10. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का वर्तमान महत्व क्या है?
उत्तर: आज के दौर में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का महत्व और बढ़ गया है। ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, नदियों का प्रदूषण और प्लास्टिक कचरे जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। यह अधिनियम सरकार को व्यापक अधिकार देता है कि वह इन समस्याओं से निपट सके। इसके आधार पर ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), 2010 की स्थापना हुई, जो पर्यावरणीय विवादों का त्वरित निपटान करता है। इसके नियमों ने अपशिष्ट प्रबंधन, प्लास्टिक प्रतिबंध और औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण में अहम भूमिका निभाई है। यदि इस अधिनियम का कड़ाई से पालन हो तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ पर्यावरण सुनिश्चित कर सकता है।