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“न्याय में देरी नहीं चलेगी”: पटना हाईकोर्ट का ऐतिहासिक कदम — ट्रायल की गति बढ़ाने हेतु सख्त दिशा-निर्देश, CBI बनाम मीर उस्मान के अनुरूप परिपत्र जारी

“न्याय में देरी नहीं चलेगी”: पटना हाईकोर्ट का ऐतिहासिक कदम — ट्रायल की गति बढ़ाने हेतु सख्त दिशा-निर्देश, CBI बनाम मीर उस्मान के अनुरूप परिपत्र जारी


प्रस्तावना

       भारतीय न्याय प्रणाली लंबे समय से एक गंभीर समस्या से जूझ रही है— मामलों की अत्यधिक लंबितता और ट्रायल में अनावश्यक देरी। यह स्थिति न केवल न्याय पाने वाले नागरिकों के धैर्य की परीक्षा लेती है, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त त्वरित न्याय के मौलिक अधिकार को भी कमजोर करती है।
इसी गंभीर चुनौती को ध्यान में रखते हुए पटना उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सख्त परिपत्र (Circular) जारी किया है, जिसका उद्देश्य निचली अदालतों में मुकदमों की अनावश्यक देरी को रोकना और ट्रायल की गति को सुनिश्चित करना है।

        यह परिपत्र सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय CBI बनाम मीर उस्मान की भावना और निर्देशों पर आधारित है, जिसमें शीर्ष अदालत ने न्यायालयों को ट्रायल में अनुशासन, समयबद्धता और सक्रियता अपनाने का स्पष्ट संदेश दिया था।


ट्रायल में देरी: एक पुरानी लेकिन गंभीर समस्या

पटना हाईकोर्ट ने अपने परिपत्र में यह स्वीकार किया कि—

  • बार-बार तारीख पर तारीख देना,
  • बिना ठोस कारण के स्थगन (Adjournment),
  • गवाहों की लगातार अनुपस्थिति,
  • और पक्षकारों व अधिवक्ताओं द्वारा प्रक्रिया का दुरुपयोग

न्याय में देरी के प्रमुख कारण बन चुके हैं।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह स्थिति—

  • पीड़ितों के लिए मानसिक उत्पीड़न,
  • अभियुक्तों के लिए लंबे समय तक अनिश्चितता,
  • और समाज के लिए न्याय प्रणाली में अविश्वास को जन्म देती है।

सुप्रीम कोर्ट का मार्गदर्शक निर्णय: CBI बनाम मीर उस्मान

पटना हाईकोर्ट ने अपने परिपत्र का आधार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय CBI बनाम मीर उस्मान को बनाया है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि—

“न्यायालयों का यह कर्तव्य है कि वे मुकदमों को अनावश्यक रूप से लंबा न खिंचने दें। प्रक्रिया न्याय के लिए है, न कि देरी के लिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि—

  • स्थगन अपवाद होना चाहिए, नियम नहीं,
  • ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की प्रगति पर सक्रिय नियंत्रण रखना चाहिए,
  • और न्यायिक उदासीनता से बचना चाहिए।

पटना हाईकोर्ट के नए परिपत्र के प्रमुख बिंदु

पटना हाईकोर्ट द्वारा जारी इस परिपत्र में निचली अदालतों के लिए कई सख्त और बाध्यकारी दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं—


1. अनावश्यक स्थगन पर पूर्ण नियंत्रण

परिपत्र में कहा गया है कि—

  • “वकील उपस्थित नहीं है”
  • “मामले की तैयारी नहीं है”
  • या “समय की कमी है”

जैसे सामान्य बहानों पर अब स्थगन नहीं दिया जाएगा
यदि किसी असाधारण परिस्थिति में स्थगन आवश्यक हो, तो—

  • अदालत को स्पष्ट और ठोस कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे

2. गवाहों की समय पर पेशी सुनिश्चित करना

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे
    अपने गवाहों को समय पर अदालत में प्रस्तुत करें।
  • गवाहों की अनुपस्थिति को
    मुकदमे में देरी का वैध कारण नहीं माना जाएगा

3. दिन-प्रतिदिन सुनवाई (Day-to-Day Trial) पर जोर

परिपत्र में निर्देश दिया गया है कि—

  • जहां संभव हो,
    ट्रायल को दिन-प्रतिदिन सुनवाई के आधार पर चलाया जाए,
  • विशेषकर पुराने, संवेदनशील और गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में।

4. न्यायाधीशों की सक्रिय और नियंत्रक भूमिका

पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को यह संदेश दिया है कि—

  • ट्रायल जज केवल तारीख तय करने वाले न बनें,
  • बल्कि वे मुकदमे की गति,
    गवाहों की पेशी और
    साक्ष्य रिकॉर्डिंग पर सक्रिय निगरानी रखें।

5. अधिवक्ताओं की पेशेवर जवाबदेही

परिपत्र में यह भी कहा गया है कि—

  • वकीलों द्वारा बार-बार देरी करना
    पेशेवर आचरण के विपरीत माना जाएगा।
  • आवश्यक होने पर अदालत
    कठोर आदेश या लागत (Cost) भी लगा सकती है।

अनुच्छेद 21 और त्वरित न्याय का अधिकार

पटना हाईकोर्ट ने अपने परिपत्र में संविधान के अनुच्छेद 21 का विशेष उल्लेख किया है, जिसके अंतर्गत—

  • त्वरित और निष्पक्ष न्याय
    प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है।

अदालत ने कहा कि—

“लंबे समय तक लंबित मुकदमे न केवल पीड़ित को पीड़ा देते हैं, बल्कि अभियुक्त के मौलिक अधिकारों का भी हनन करते हैं।”


पीड़ित और अभियुक्त—दोनों के हितों की रक्षा

यह परिपत्र यह स्पष्ट करता है कि—

  • त्वरित ट्रायल केवल राज्य या अभियोजन के हित में नहीं है,
  • बल्कि यह अभियुक्त की गरिमा और स्वतंत्रता से भी जुड़ा है।

देरी से—

  • पीड़ित को न्याय का भरोसा टूटता है,
  • अभियुक्त सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दबाव झेलता है।

न्यायिक प्रशासन पर व्यापक प्रभाव

इस परिपत्र के लागू होने के बाद—

  • बिहार की जिला और सत्र अदालतों में
    कार्य-संस्कृति में बदलाव अपेक्षित है।
  • न्यायिक समय-प्रबंधन और अनुशासन को
    सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

हाईकोर्ट ने संकेत दिया है कि—

“इन निर्देशों की अवहेलना को गंभीरता से लिया जाएगा।”


चुनौतियाँ और व्यावहारिक कठिनाइयाँ

हालाँकि यह कदम अत्यंत सराहनीय है,
लेकिन इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं—

  • न्यायाधीशों की कमी,
  • अदालतों पर अत्यधिक मुकदमे का बोझ,
  • बुनियादी ढांचे की सीमाएँ।

इसके बावजूद, हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट है कि—

“संरचनात्मक कठिनाइयाँ न्याय में देरी का बहाना नहीं बन सकतीं।”


न्यायिक सुधार की दिशा में मजबूत पहल

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार—

  • यह परिपत्र न्यायिक सुधारों की दिशा में एक ठोस और साहसिक कदम है।
  • यदि इसका प्रभावी पालन हुआ,
    तो बिहार में वर्षों से लंबित मुकदमों की संख्या में
    उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

निष्कर्ष

       पटना हाईकोर्ट का यह सख्त और दूरदर्शी परिपत्र भारतीय न्याय व्यवस्था में समयबद्धता, अनुशासन और उत्तरदायित्व को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
CBI बनाम मीर उस्मान के सिद्धांतों के अनुरूप यह स्पष्ट संदेश देता है कि—

  • अब न्याय में अनावश्यक देरी स्वीकार्य नहीं होगी,
  • ट्रायल की गति बढ़ाना न्यायालयों का संवैधानिक दायित्व है।

यदि इन दिशा-निर्देशों को ईमानदारी और कठोरता से लागू किया गया,
तो यह न केवल बिहार बल्कि पूरे देश के लिए
त्वरित, प्रभावी और भरोसेमंद न्याय प्रणाली की एक मिसाल बन सकता है।