“न्याय दिलाने गई वकील, खुद न्याय की गुहार लगाने को मजबूर” — नोएडा पुलिस पर 14 घंटे की अवैध हिरासत और यौन उत्पीड़न का गंभीर आरोप, सुप्रीम कोर्ट पहुंची अधिवक्ता
उत्तर प्रदेश के नोएडा से सामने आया एक अत्यंत गंभीर और विचलित करने वाला मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष पहुंच गया है। एक महिला अधिवक्ता ने Supreme Court of India में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि जब वह एक घायल मुवक्किल की ओर से एफआईआर दर्ज कराने के लिए नोएडा पुलिस की सहायता कर रही थीं, तब उन्हें लगभग 14 घंटे तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, उनके साथ यौन उत्पीड़न, मारपीट, कपड़े उतारने की कोशिश, अश्लील टिप्पणियां, और मानव गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला व्यवहार किया गया।
याचिका में कहा गया है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन (Rule of Law), महिला सुरक्षा, और न्याय प्रणाली की साख पर सीधा हमला है। खास बात यह है कि पीड़िता स्वयं एक अधिवक्ता हैं, जो कानून की जानकारी रखने के बावजूद कथित रूप से पुलिसिया अत्याचार का शिकार हुईं।
मामला क्या है? — पूरी पृष्ठभूमि
याचिका के अनुसार, महिला अधिवक्ता अपने एक घायल क्लाइंट के साथ नोएडा के एक पुलिस थाने पहुंची थीं, जहां वह क्लाइंट के खिलाफ हुए अपराध की रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराने में सहायता कर रही थीं। आरोप है कि इसी दौरान पुलिसकर्मियों ने:
- बिना किसी गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo) के
- बिना किसी न्यायिक आदेश या मजिस्ट्रेट की अनुमति के
- उन्हें थाने में रोके रखा
याचिकाकर्ता का दावा है कि यह हिरासत कानूनन पूरी तरह अवैध थी और इसका कोई रिकॉर्ड तक नहीं बनाया गया।
14 घंटे की कथित अवैध हिरासत
याचिका में विस्तार से बताया गया है कि अधिवक्ता को:
- लगभग 14 घंटे तक पुलिस थाने में बंद रखा गया
- उन्हें यह तक नहीं बताया गया कि उन्हें किस आधार पर रोका गया है
- न तो उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया और न ही रिहा
यह स्थिति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी के समय अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन बताई गई है।
यौन उत्पीड़न और अमानवीय व्यवहार के आरोप
अधिवक्ता ने अपनी याचिका में बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनमें कहा गया है कि हिरासत के दौरान:
- उनके साथ धक्का-मुक्की और शारीरिक बल प्रयोग किया गया
- कपड़े उतारने की कोशिश की गई
- पुलिसकर्मियों द्वारा यौन प्रकृति की टिप्पणियां (sexually coloured remarks) की गईं
- उन्हें मानसिक रूप से डराने और अपमानित करने का प्रयास किया गया
याचिका में यह भी कहा गया है कि यह व्यवहार केवल व्यक्तिगत दुर्व्यवहार नहीं था, बल्कि यह सत्ता के दुरुपयोग का एक उदाहरण है।
बुनियादी मानवीय अधिकारों से वंचित
अधिवक्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि हिरासत के दौरान उन्हें:
- भोजन और पानी तक नहीं दिया गया
- वकील से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी गई
- परिवार के सदस्यों को सूचना देने से रोका गया
- किसी भी प्रकार की कानूनी सहायता (legal aid) से वंचित रखा गया
यह सब उस स्थिति में हुआ, जब वह स्वयं एक अधिवक्ता थीं और अपने पेशेगत कर्तव्य का निर्वहन कर रही थीं।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने दिशानिर्देशों का उल्लंघन
याचिका में विशेष रूप से यह कहा गया है कि पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से जारी दिशानिर्देशों का भी खुला उल्लंघन किया, जिनमें शामिल हैं:
- थाने में CCTV कैमरों की अनिवार्य उपलब्धता और संरक्षण
- हिरासत के दौरान महिला के साथ संवेदनशील व्यवहार
- किसी भी व्यक्ति को अवैध रूप से रोके जाने पर सख्त मनाही
अधिवक्ता का आरोप है कि या तो CCTV कैमरे काम नहीं कर रहे थे, या फिर जानबूझकर उन्हें निष्क्रिय किया गया, ताकि घटना का कोई दृश्य प्रमाण न रहे।
“यह केवल मेरी नहीं, पूरी वकालत की सुरक्षा का प्रश्न है”
अपनी याचिका में अधिवक्ता ने कहा है कि यह मामला केवल उनके व्यक्तिगत अधिकारों तक सीमित नहीं है। यदि एक वकील, जो न्याय प्रणाली का हिस्सा है, पुलिस थाने में सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की स्थिति की कल्पना करना भी भयावह है।
उन्होंने कहा कि:
“मैं कानून का पालन कराने गई थी, अपराध नहीं करने। यदि मुझे ही इस तरह प्रताड़ित किया गया, तो यह पूरी न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।”
सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई है?
अधिवक्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से कई महत्वपूर्ण राहतें मांगी हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- स्वतंत्र जांच — घटना की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या SIT से कराए जाने का आदेश
- दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई — निलंबन और आपराधिक मुकदमा
- मुआवजा — अवैध हिरासत और यौन उत्पीड़न के लिए प्रतिकर
- सुरक्षा — याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश
- दिशानिर्देशों का पालन — पूरे देश में पुलिस थानों में महिला सुरक्षा संबंधी नियमों के कड़ाई से अनुपालन के आदेश
संवैधानिक और कानूनी महत्व
यह मामला कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है:
- पुलिस जवाबदेही: क्या पुलिस कानून से ऊपर है?
- महिला अधिकार: हिरासत में महिलाओं की सुरक्षा कितनी वास्तविक है?
- वकीलों की स्वतंत्रता: क्या अधिवक्ता बिना भय के अपना पेशेगत कर्तव्य निभा सकते हैं?
यह याचिका न्यायपालिका को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां खुद कानून तोड़ें, तो संरक्षण किसे मिलेगा?
कानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला custodial violence और sexual misconduct by police की श्रेणी में आएगा, जिसमें सुप्रीम कोर्ट पहले भी कड़ा रुख अपनाता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकरण में दिया गया कोई भी आदेश भविष्य में पुलिस सुधार और महिला सुरक्षा से जुड़े मामलों में नज़ीर (precedent) बन सकता है।
आगे की राह
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। अदालत के समक्ष यह तय करना होगा कि:
- प्रथम दृष्टया आरोप कितने गंभीर हैं
- जांच किस एजेंसी से कराई जाए
- पीड़िता को तत्काल क्या संरक्षण और राहत दी जाए
देश की निगाहें अब सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या रुख अपनाता है।
निष्कर्ष
नोएडा पुलिस पर लगे ये आरोप केवल एक घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की परीक्षा हैं। यदि न्याय दिलाने वाली वकील ही थाने में सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की स्थिति कितनी असुरक्षित होगी, यह सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है।
यह मामला न्यायपालिका के लिए एक अवसर भी है — यह दिखाने का कि कानून का राज केवल किताबों में नहीं, बल्कि थानों की चारदीवारी के भीतर भी लागू होता है।
सुप्रीम कोर्ट का आने वाला निर्णय न केवल इस अधिवक्ता के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि देश में पुलिस जवाबदेही और महिला गरिमा की दिशा भी तय करेगा।