न्यायपालिका में बड़ा प्रशासनिक कदम: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पाँच हाईकोर्ट जजों को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की
भारतीय न्यायपालिका में न्यायिक नेतृत्व और संस्थागत निरंतरता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। 18 दिसंबर 2025, गुरुवार को Supreme Court Collegium ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में उत्पन्न रिक्तियों को भरने के लिए पाँच कार्यरत हाईकोर्ट न्यायाधीशों को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की है।
यह सिफारिश उन रिक्तियों के परिप्रेक्ष्य में की गई है जो सेवानिवृत्ति (Retirement) और स्थानांतरण (Transfer) के कारण उत्पन्न हुई थीं। यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि न्यायिक दक्षता, न्याय तक पहुंच और न्यायालयों के सुचारु संचालन से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
कॉलेजियम प्रणाली: पृष्ठभूमि और संवैधानिक आधार
भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया कॉलेजियम प्रणाली के अंतर्गत होती है, जिसे न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से विकसित किया गया है। इस प्रणाली में—
- Supreme Court of India के
- मुख्य न्यायाधीश (CJI)
- और वरिष्ठतम न्यायाधीश
मिलकर उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों और पदोन्नतियों पर निर्णय लेते हैं।
कॉलेजियम प्रणाली का उद्देश्य है—
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना
- राजनीतिक या कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाव
- योग्य, अनुभवी और निष्पक्ष न्यायाधीशों की नियुक्ति सुनिश्चित करना
पाँच मुख्य न्यायाधीशों की सिफारिश: क्यों है यह फैसला अहम?
1. रिक्तियों से प्रभावित न्यायिक कार्य
भारत के कई उच्च न्यायालय लंबे समय से—
- मुख्य न्यायाधीश के पद पर
- कार्यवाहक व्यवस्था (Acting Chief Justice)
के सहारे चल रहे थे। इससे—
- प्रशासनिक निर्णयों में देरी
- न्यायिक नीति निर्धारण में अस्पष्टता
- और केस मैनेजमेंट पर नकारात्मक असर
देखने को मिल रहा था।
कॉलेजियम की यह सिफारिश इन समस्याओं के समाधान की दिशा में एक ठोस कदम है।
2. सेवानिवृत्ति और स्थानांतरण का प्रभाव
उच्च न्यायालयों में—
- वरिष्ठ मुख्य न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति
- या
- एक उच्च न्यायालय से दूसरे में स्थानांतरण
के कारण नेतृत्व का रिक्त होना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन जब यह रिक्ति लंबे समय तक बनी रहती है, तो—
- न्यायिक प्रशासन कमजोर होता है
- न्यायाधीशों और वकीलों के बीच समन्वय प्रभावित होता है
कॉलेजियम ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समयबद्ध सिफारिश की है।
मुख्य न्यायाधीश की भूमिका: केवल न्यायिक नहीं, प्रशासनिक भी
अक्सर यह समझा जाता है कि मुख्य न्यायाधीश केवल—
- फैसले सुनाने
- और पीठों में बैठने
तक सीमित होते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका कहीं अधिक व्यापक होती है।
मुख्य न्यायाधीश की प्रमुख जिम्मेदारियाँ:
- रोस्टर निर्धारण (Roster Allocation)
- विभिन्न पीठों का गठन
- न्यायालय के प्रशासनिक फैसले
- अधीनस्थ न्यायालयों की निगरानी
- न्यायिक सुधारों को लागू करना
- न्यायिक अधिकारियों का मार्गदर्शन
इसलिए, योग्य और अनुभवी व्यक्ति का इस पद पर होना अत्यंत आवश्यक है।
कॉलेजियम द्वारा चयन के संभावित मानदंड
हालांकि कॉलेजियम की बैठकों का विवरण सार्वजनिक नहीं किया जाता, लेकिन परंपरागत रूप से निम्नलिखित मानदंडों पर विचार किया जाता है—
- न्यायाधीश की वरिष्ठता (Seniority)
- न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता
- प्रशासनिक अनुभव
- ईमानदारी और निष्पक्षता की छवि
- संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता
इन पाँच न्यायाधीशों की सिफारिश यह संकेत देती है कि वे इन सभी कसौटियों पर खरे उतरे हैं।
कार्यपालिका की भूमिका: आगे क्या होगा?
कॉलेजियम की सिफारिश के बाद—
- फाइल केंद्र सरकार (कानून मंत्रालय) के पास भेजी जाती है
- सरकार औपचारिक प्रक्रिया पूरी करती है
- अंततः राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की अधिसूचना जारी होती है
सैद्धांतिक रूप से सरकार कॉलेजियम की सिफारिश पर पुनर्विचार का अनुरोध कर सकती है, लेकिन—
- यदि कॉलेजियम दोबारा वही नाम दोहराता है
- तो सरकार बाध्य होती है कि वह नियुक्ति को मंजूरी दे
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कॉलेजियम प्रणाली
कॉलेजियम प्रणाली को लेकर समय-समय पर—
- पारदर्शिता की कमी
- और जवाबदेही
को लेकर आलोचना होती रही है। फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि—
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता
- लोकतंत्र का मूल स्तंभ है
और कॉलेजियम प्रणाली उसी स्वतंत्रता की रक्षा का माध्यम है।
इन पाँच मुख्य न्यायाधीशों की सिफारिश को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
वकीलों और न्यायिक समुदाय की प्रतिक्रिया
न्यायिक और विधिक हलकों में इस निर्णय का—
- सकारात्मक स्वागत
किया जा रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि—
- लंबे समय से लंबित प्रशासनिक मुद्दों का समाधान होगा
- केस बैकलॉग कम करने में मदद मिलेगी
- न्यायालयों की कार्यकुशलता बढ़ेगी
आम जनता के लिए इसका क्या अर्थ है?
हालांकि यह निर्णय तकनीकी और प्रशासनिक प्रतीत होता है, लेकिन इसका सीधा प्रभाव—
- आम नागरिकों
- मुकदमेबाजों
- और न्याय चाहने वालों
पर पड़ता है।
संभावित लाभ:
- मामलों की सुनवाई में तेजी
- बेहतर प्रशासनिक निर्णय
- न्यायिक अनुशासन में सुधार
- न्याय तक बेहतर और समयबद्ध पहुंच
उच्च न्यायालयों की भूमिका संघीय ढांचे में
भारत का संघीय ढांचा—
- केंद्र
- और राज्यों
के बीच शक्तियों का संतुलन स्थापित करता है।
उच्च न्यायालय—
- संविधान के संरक्षक
- और मौलिक अधिकारों के रक्षक
के रूप में कार्य करते हैं।
ऐसे में, उनके नेतृत्व में स्थिरता और मजबूती होना संवैधानिक शासन के लिए अनिवार्य है।
भविष्य की चुनौतियाँ
नए मुख्य न्यायाधीशों के सामने कई चुनौतियाँ होंगी—
- लंबित मामलों का अंबार
- डिजिटल न्याय प्रणाली का विस्तार
- अधीनस्थ न्यायालयों की क्षमता बढ़ाना
- न्यायिक सुधारों को जमीन पर उतारना
कॉलेजियम द्वारा चयनित न्यायाधीशों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे—
- अनुभव
- दृष्टि
- और नेतृत्व
के माध्यम से इन चुनौतियों का सामना करेंगे।
निष्कर्ष
18 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा पाँच उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम है।
यह निर्णय—
- न्यायिक प्रशासन को सुदृढ़ करेगा
- उच्च न्यायालयों में नेतृत्व की रिक्तता को समाप्त करेगा
- और न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को और मजबूत करेगा
एक ऐसे समय में जब न्यायपालिका—
- बढ़ते मामलों
- और बदलती सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों
का सामना कर रही है, यह सिफारिश स्थिरता, निरंतरता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है।
निस्संदेह, आने वाले समय में इन नए मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका यह तय करेगी कि भारतीय न्यायपालिका किस प्रकार न्याय, स्वतंत्रता और लोकतंत्र के आदर्शों को आगे बढ़ाती है।