IndianLawNotes.com

नस्लीय पहचान, संवैधानिक समानता और गरिमा का प्रश्न: देहरादून में उत्तर–पूर्वी छात्र की मृत्यु के बाद सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका

नस्लीय पहचान, संवैधानिक समानता और गरिमा का प्रश्न: देहरादून में उत्तर–पूर्वी छात्र की मृत्यु के बाद सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका

भूमिका

       भारत विविधताओं का देश है—भाषा, संस्कृति, धर्म, पहनावा और शारीरिक बनावट, सब कुछ भिन्न–भिन्न। यही विविधता भारत की शक्ति मानी जाती है। किंतु विडंबना यह है कि इसी विविधता के कारण कई बार नागरिकों को भेदभाव, अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ता है। हाल ही में देहरादून में 24 वर्षीय एक छात्र की नस्लीय हमले में हुई दर्दनाक मृत्यु ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में उत्तर–पूर्वी राज्यों और सीमावर्ती क्षेत्रों से आने वाले नागरिक वास्तव में समानता और सुरक्षा का अनुभव कर पा रहे हैं?

       इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) दायर की गई है, जिसका उद्देश्य केवल एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह याचिका उत्तर–पूर्वी राज्यों और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की व्यापक समस्या को संवैधानिक स्तर पर उठाती है।


घटना की पृष्ठभूमि: देहरादून में नस्लीय हमला

       मीडिया रिपोर्टों और याचिका में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, देहरादून में अध्ययन कर रहे 24 वर्षीय छात्र को उसके उत्तर–पूर्वी शारीरिक स्वरूप के कारण नस्लीय टिप्पणियों, उत्पीड़न और अंततः शारीरिक हमले का शिकार होना पड़ा। बताया गया कि—

  • छात्र को उसकी आंखों की बनावट, चेहरे के फीचर्स और भाषा को लेकर अपमानित किया गया,
  • उसे “बाहरी”, “चाइनीज़” जैसे नस्लीय शब्दों से संबोधित किया गया,
  • और अंततः हुए हमले के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

       यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक नस्लवाद (Structural Racism) और सामाजिक असंवेदनशीलता का प्रतीक बन गई है।


जनहित याचिका: उद्देश्य और दायरा

       इस दुखद घटना के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। याचिका का मुख्य उद्देश्य है—

  1. उत्तर–पूर्वी राज्यों और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव को संवैधानिक मुद्दा घोषित करना,
  2. नस्लीय हिंसा को रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ठोस नीतियां और दिशानिर्देश बनाना,
  3. कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही तय करना,
  4. और पीड़ितों को प्रभावी संरक्षण व न्याय सुनिश्चित करना।

       याचिका में यह तर्क दिया गया है कि नस्लीय हिंसा की घटनाएं अलग–थलग नहीं हैं, बल्कि यह एक लगातार चल रही सामाजिक समस्या है, जिसे अब सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता है।


उत्तर–पूर्वी नागरिक और नस्लीय भेदभाव की वास्तविकता

      भारत के उत्तर–पूर्वी राज्य—असम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम—भौगोलिक, सांस्कृतिक और नस्लीय दृष्टि से विशिष्ट हैं। यहां के नागरिकों की शारीरिक बनावट अक्सर मुख्य भूमि (Mainland India) से भिन्न होती है।

याचिका में यह रेखांकित किया गया है कि—

  • उत्तर–पूर्वी नागरिकों को अक्सर “विदेशी” समझ लिया जाता है,
  • उन्हें नस्लीय गालियों और रूढ़िवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है,
  • कार्यस्थलों, शैक्षणिक संस्थानों और किराए के मकानों में भेदभाव होता है,
  • और कई मामलों में यह भेदभाव हिंसा और हत्या तक पहुंच जाता है।

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: समानता और गरिमा का अधिकार

याचिका में भारतीय संविधान के कई मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का उल्लेख किया गया है—

अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता

हर नागरिक को समान संरक्षण का अधिकार है। नस्लीय भेदभाव इस मूल सिद्धांत के प्रत्यक्ष विपरीत है।

अनुच्छेद 15 – भेदभाव का निषेध

राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नस्लीय पहचान भी इसी दायरे में आती है।

अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है। नस्लीय हिंसा इस अधिकार को पूरी तरह नकार देती है।


पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया गया है, जिनमें न्यायालय ने गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर बल दिया है। विशेष रूप से—

  • नलसार यूनिवर्सिटी निर्णय और
  • मनु शर्मा बनाम राज्य जैसे मामलों में
    न्यायालय ने कहा है कि राज्य का दायित्व केवल अपराध के बाद दंड देना नहीं, बल्कि अपराध को रोकने के लिए सामाजिक वातावरण बनाना भी है।

कानून की कमी और संस्थागत विफलता

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि—

  • भारत में नस्लीय अपराधों को विशेष रूप से संबोधित करने वाला कोई समर्पित कानून नहीं है,
  • पुलिस अक्सर ऐसी घटनाओं को “साधारण झगड़ा” मानकर गंभीरता से नहीं लेती,
  • पीड़ितों को FIR दर्ज कराने में कठिनाई होती है,
  • और जांच में नस्लीय प्रेरणा (Racial Motivation) को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

याचिका में मांगी गई प्रमुख राहतें

जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट से कई महत्वपूर्ण निर्देशों की मांग की गई है—

  1. राष्ट्रीय स्तर पर एंटी–रेसियल डिस्क्रिमिनेशन गाइडलाइंस जारी की जाएं,
  2. पुलिस और प्रशासन के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम अनिवार्य किए जाएं,
  3. नस्लीय अपराधों के लिए फास्ट–ट्रैक अदालतों की स्थापना,
  4. शैक्षणिक संस्थानों और कार्यस्थलों में संवेदनशीलता प्रशिक्षण (Sensitization Programs),
  5. पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए मुआवजा और पुनर्वास योजना,
  6. और उत्तर–पूर्वी नागरिकों के लिए हेल्पलाइन और शिकायत तंत्र की स्थापना।

समाज पर प्रभाव और व्यापक संदेश

देहरादून की यह घटना केवल एक छात्र की मौत नहीं है; यह भारतीय समाज के उस पक्ष को उजागर करती है, जहां—

  • अज्ञानता नस्लवाद को जन्म देती है,
  • और नस्लवाद हिंसा में परिवर्तित हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर यह PIL समाज को यह संदेश देती है कि नस्लीय भेदभाव कोई व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक संवैधानिक संकट है


राज्य की सकारात्मक जिम्मेदारी (Positive Obligation of State)

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि राज्य की जिम्मेदारी केवल “कानून बनाना” नहीं है, बल्कि—

  • नागरिकों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना,
  • अल्पसंख्यक और हाशिए पर मौजूद समुदायों की रक्षा करना,
  • और सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) को बढ़ावा देना

भी राज्य का संवैधानिक दायित्व है।


उत्तर–पूर्व और ‘राष्ट्रीय मुख्यधारा’ का प्रश्न

यह मामला एक बार फिर यह प्रश्न उठाता है कि क्या उत्तर–पूर्वी भारत वास्तव में राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा है या केवल भौगोलिक सीमा तक सीमित है। याचिका का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि—

“उत्तर–पूर्वी नागरिक भारत के ‘मेहमान’ नहीं, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित समान अधिकारों वाले नागरिक हैं।”


निष्कर्ष

       देहरादून में 24 वर्षीय छात्र की नस्लीय हमले में मृत्यु ने भारतीय समाज और न्याय व्यवस्था को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर यह जनहित याचिका केवल न्याय की मांग नहीं है, बल्कि यह संविधान की आत्मा—समानता, गरिमा और बंधुत्व—की पुनः पुष्टि है।

यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में व्यापक दिशा–निर्देश और नीतिगत हस्तक्षेप करता है, तो यह निर्णय—

  • नस्लीय भेदभाव के खिलाफ एक मील का पत्थर साबित हो सकता है,
  • उत्तर–पूर्वी और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों में सुरक्षा और विश्वास का भाव पैदा कर सकता है,
  • और भारत को उसकी संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के और करीब ले जा सकता है।

अंततः, यह मामला हमें यह याद दिलाता है कि—

संविधान केवल कानून की पुस्तक नहीं, बल्कि हर नागरिक की पहचान, गरिमा और जीवन की ढाल है।