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धारा 482 BNSS के अंतर्गत “ब्लैंकेट संरक्षण” की सीमा – Mankaran Walia v/s State of Punjab & Others (PbHr 2025) का विस्तृत विधिक विश्लेषण

धारा 482 BNSS के अंतर्गत “ब्लैंकेट संरक्षण” की सीमा – Mankaran Walia v/s State of Punjab & Others (PbHr 2025) का विस्तृत विधिक विश्लेषण

प्रस्तावना

       पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का निर्णय Mankaran Walia v/s State of Punjab & Others [CRM-M-50560-2025 (O&M), PbHr 2025] भारतीय आपराधिक प्रक्रिया के विकसित हो रहे ढांचे—विशेषकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS)—के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस निर्णय में न्यायालय ने धारा 482 BNSS को धारा 528 BNSS के साथ पढ़ते हुए यह स्पष्ट किया कि कानून “ओम्निबस” या “ब्लैंकेट” प्रकार का संरक्षण देने की कल्पना नहीं करता, खासकर तब जब किसी विशिष्ट और विद्यमान आपराधिक मामले में गिरफ्तारी का ठोस भय प्रदर्शित ही न किया गया हो।

       यह फैसला न केवल अभियुक्तों के अधिकारों और राज्य की वैधानिक शक्तियों के बीच संतुलन रेखांकित करता है, बल्कि अग्रिम जमानत (anticipatory bail) की अवधारणा की सीमाओं को भी पुनः परिभाषित करता है—कि वह किसी भविष्यगत, अनिश्चित या काल्पनिक अपराध के लिए “अनिश्चितकालीन गिरफ्तारी-प्रतिषेध” का साधन नहीं बन सकती।


1. प्रकरण की पृष्ठभूमि

       याचिकाकर्ता मंकरण वालिया ने उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 482 BNSS के तहत याचिका दायर की, जिसे धारा 528 BNSS के साथ पढ़ा गया। याचिका का सार यह था कि राज्य/प्राधिकरणों को याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी से रोका जाए—बिना किसी विशिष्ट एफआईआर, शिकायत, या विद्यमान आपराधिक कार्यवाही का स्पष्ट उल्लेख किए।

     याचिकाकर्ता का आग्रह मूलतः एक सामान्य (blanket) संरक्षण का था, जिससे भविष्य में किसी भी संभावित मामले में उसकी गिरफ्तारी न हो सके। यह प्रार्थना अपने स्वरूप में ओम्निबस राहत थी—जो कि न्यायालय की दृष्टि में कानून के ढांचे के अनुरूप नहीं पाई गई।


2. धारा 482 BNSS : अंतर्निहित शक्तियों का दायरा

      धारा 482 BNSS (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 482 के समतुल्य) उच्च न्यायालय को अंतर्निहित शक्तियाँ प्रदान करती है, जिनका उद्देश्य है—

  1. न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति,
  2. न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग की रोकथाम, तथा
  3. विधि के शासन को प्रभावी बनाना।

        किन्तु यह शक्ति असीमित या मनमानी नहीं है। यह स्थापित सिद्धांत है कि अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग वैकल्पिक वैधानिक उपचारों को दरकिनार करने या कानून द्वारा निषिद्ध राहत प्रदान करने के लिए नहीं किया जा सकता।

       उच्च न्यायालय ने इस प्रकरण में दो-टूक कहा कि धारा 482 BNSS के अंतर्गत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो न्यायालय को बिना किसी विशिष्ट आपराधिक मामले के, किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी से सामान्यतः संरक्षित करने की अनुमति देता हो।


3. धारा 528 BNSS और अग्रिम जमानत की अवधारणा

      धारा 528 BNSS अग्रिम जमानत की व्यवस्था से संबंधित है। अग्रिम जमानत का उद्देश्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट अपराध के संबंध में गिरफ्तारी का युक्तियुक्त और तात्कालिक भय हो, तो उसे न्यायालय से संरक्षण मिल सके।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:

  • अग्रिम जमानत किसी विशेष अपराध/घटना से जुड़ी होती है;
  • यह भविष्य में संभावित, अनिश्चित या काल्पनिक अपराधों के लिए नहीं दी जा सकती;
  • यह अभियुक्त को नए अपराध करने का लाइसेंस नहीं दे सकती।

इस प्रकार, अग्रिम जमानत को “ब्लैंकेट” सुरक्षा के रूप में परिवर्तित करना कानून की मूल भावना के विरुद्ध होगा।


4. “ब्लैंकेट” या “ओम्निबस” राहत : न्यायालय की अस्वीकृति

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा:

“कानून धारा 482 BNSS के अंतर्गत इस प्रकार की ओम्निबस राहत प्रदान करने की कल्पना नहीं करता, न ही किसी विशिष्ट और विद्यमान आपराधिक मामले के अभाव में गिरफ्तारी पर रोक लगाने हेतु कोई ब्लैंकेट आदेश पारित किया जा सकता है।”

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि यदि ऐसे आदेश पारित किए जाएँ, तो—

  • पुलिस और जांच एजेंसियों की वैधानिक शक्तियाँ निष्प्रभावी हो जाएँगी;
  • अपराध की रोकथाम और जांच में बाधा उत्पन्न होगी;
  • अभियुक्त भविष्य में अपराध कर भी अनिश्चितकालीन संरक्षण का दावा कर सकेगा।

यह स्थिति न तो विधि-सम्मत है और न ही सार्वजनिक हित में।


5. पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों से सामंजस्य

यद्यपि निर्णय में विस्तृत रूप से पूर्ववर्ती मामलों का उल्लेख नहीं किया गया, परंतु न्यायालय की reasoning भारतीय न्यायशास्त्र में स्थापित सिद्धांतों से पूर्णतः सामंजस्य रखती है, जैसे—

  • अग्रिम जमानत विशिष्ट अपराध तक सीमित होती है;
  • न्यायालय “भविष्य के अपराधों” के लिए संरक्षण नहीं दे सकता;
  • अंतर्निहित शक्तियाँ अपवादस्वरूप हैं, सामान्य नियम नहीं।

इस निर्णय ने इन सिद्धांतों को BNSS के नए ढांचे में पुनः पुष्ट किया है।


6. अभियुक्त के अधिकार बनाम राज्य की शक्तियाँ : संतुलन का प्रश्न

भारतीय संविधान और आपराधिक कानून अभियुक्त के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को अत्यंत महत्व देते हैं। किंतु यह स्वतंत्रता पूर्ण या निरंकुश नहीं है।

न्यायालय ने संतुलन स्थापित करते हुए कहा कि—

  • जहां वास्तविक और विशिष्ट गिरफ्तारी का भय हो, वहां अग्रिम जमानत उपलब्ध है;
  • परंतु जहां ऐसा कोई ठोस आधार न हो, वहां सामान्य गिरफ्तारी-निषेध का आदेश देना अनुचित है।

इस प्रकार, निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा—दोनों के बीच एक व्यावहारिक संतुलन प्रस्तुत करता है।


7. व्यावहारिक प्रभाव और भविष्यगत महत्व

यह निर्णय निम्नलिखित दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  1. वकीलों और याचिकाकर्ताओं के लिए मार्गदर्शन – अब यह स्पष्ट है कि बिना विशिष्ट एफआईआर या घटना के, धारा 482 BNSS के तहत गिरफ्तारी से संरक्षण की मांग निरर्थक होगी।
  2. निचली अदालतों और जांच एजेंसियों के लिए स्पष्टता – “ब्लैंकेट” आदेशों पर रोक से जांच प्रक्रिया की प्रभावशीलता बनी रहेगी।
  3. BNSS के व्याख्यात्मक विकास में योगदान – यह निर्णय नए कानून की न्यायिक व्याख्या का एक ठोस उदाहरण है।

8. निष्कर्ष

      Mankaran Walia v/s State of Punjab & Others का निर्णय इस सिद्धांत को दृढ़ता से स्थापित करता है कि—

  • धारा 482 BNSS के अंतर्गत अंतर्निहित शक्तियाँ सीमित और उद्देश्यपरक हैं;
  • अग्रिम जमानत किसी विशिष्ट अपराध या घटना तक सीमित होती है;
  • ब्लैंकेट या ओम्निबस संरक्षण न तो कानून द्वारा कल्पित है और न ही न्यायोचित।

इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने याचिका को अस्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की प्रार्थना कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में न्यायिक संयम, विधिक स्पष्टता और सार्वजनिक हित की रक्षा का एक सशक्त उदाहरण है, जो आने वाले समय में BNSS के अंतर्गत दायर याचिकाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा।