IndianLawNotes.com

“धारा 139 की धारणा अंतिम सत्य नहीं” — चेक के दुरुपयोग पर आरोपी का संभावित बचाव स्वीकार्य केरल हाईकोर्ट का चेक बाउंस मामलों पर विस्तृत और मार्गदर्शक फैसला

“धारा 139 की धारणा अंतिम सत्य नहीं” — चेक के दुरुपयोग पर आरोपी का संभावित बचाव स्वीकार्य केरल हाईकोर्ट का चेक बाउंस मामलों पर विस्तृत और मार्गदर्शक फैसला

(परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 | धारा 138 एवं 139 की न्यायिक व्याख्या)

      भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में चेक अनादरण (Cheque Dishonour) से जुड़े मुकदमे सबसे अधिक संख्या में दर्ज होने वाले मामलों में शामिल हैं। इन मामलों में अक्सर यह देखा जाता है कि केवल चेक और हस्ताक्षर के आधार पर आरोपी को दोषी मान लिया जाता है। इसी पृष्ठभूमि में Kerala High Court का यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला है, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 139 के अंतर्गत उत्पन्न धारणा (Presumption) कोई अंतिम या अटल सत्य नहीं है। यदि आरोपी यह दिखाने में सफल हो जाए कि चेक का दुरुपयोग हुआ है या वह किसी वैध एवं प्रवर्तनीय ऋण के लिए जारी नहीं किया गया था, तो अभियोजन का मामला टिक नहीं सकता।

        यह फैसला न केवल कानून की सही व्याख्या करता है, बल्कि चेक बाउंस कानून के संभावित दुरुपयोग पर भी एक आवश्यक अंकुश लगाता है।


मामले की पृष्ठभूमि

        विवाद की शुरुआत एक निजी शिकायत से हुई। शिकायतकर्ता का दावा था कि आरोपी ने उससे एक निश्चित राशि उधार ली थी और उस ऋण की वापसी के लिए एक चेक जारी किया। जब चेक बैंक में प्रस्तुत किया गया, तो वह “पर्याप्त धनराशि के अभाव” के कारण अनादरित हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के अंतर्गत आपराधिक शिकायत दायर की।

निचली अदालत ने यह मानते हुए कि—

  • चेक आरोपी का है
  • उस पर आरोपी के हस्ताक्षर हैं

       धारा 139 के तहत धारणा को लागू किया और आरोपी को दोषी ठहरा दिया। इस निर्णय को आरोपी ने केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी।


आरोपी का बचाव: चेक का दुरुपयोग

       हाईकोर्ट के समक्ष आरोपी ने एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक बचाव प्रस्तुत किया। आरोपी ने यह स्वीकार किया कि—

  • चेक उसी का है
  • हस्ताक्षर भी उसी के हैं

लेकिन उसने यह जोर देकर कहा कि—

  1. चेक किसी ऋण के भुगतान के लिए जारी नहीं किया गया था
  2. चेक को सुरक्षा (Security Cheque) के रूप में दिया गया था
  3. शिकायतकर्ता ने परिस्थितियों का दुरुपयोग कर चेक को प्रस्तुत किया

       आरोपी ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता यह साबित करने में असफल रहा कि वास्तव में कोई ऋण दिया गया था या वह ऋण कानूनी रूप से प्रवर्तनीय (Legally Enforceable Debt) था।


धारा 139 का वास्तविक कानूनी अर्थ

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में विस्तार से समझाया कि—

  • धारा 139 के तहत यह माना जाता है कि चेक किसी ऋण या देयता के निर्वहन के लिए जारी हुआ
  • लेकिन यह धारणा Rebuttable Presumption है
  • अर्थात, आरोपी इसे साक्ष्यों या संभावनाओं के आधार पर खंडित कर सकता है

अदालत ने कहा कि कानून आरोपी से यह अपेक्षा नहीं करता कि वह अभियोजन के मामले को पूर्णतः झूठा सिद्ध करे। यदि आरोपी केवल इतना दिखा दे कि उसका बचाव संभाव्य और तर्कसंगत है, तो अभियोजन पर पुनः यह भार आ जाता है कि वह ऋण और लेन-देन को ठोस साक्ष्यों से सिद्ध करे।


“संभावित बचाव” (Probable Defence) की अवधारणा

केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • आरोपी को अपने बचाव के लिए वही स्तर का प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है, जो अभियोजन पर लागू होता है
  • आरोपी परिस्थितिजन्य साक्ष्य, दस्तावेज़ या शिकायतकर्ता की गवाही में विरोधाभास के आधार पर भी अपनी बात रख सकता है

यदि इन तथ्यों से यह प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता का मामला संदेह से परे सिद्ध नहीं है, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।


शिकायतकर्ता की कमजोरियां

हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के मामले में कई गंभीर कमजोरियां पाईं, जैसे—

  • ऋण दिए जाने का कोई स्वतंत्र दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं
  • धन के स्रोत (Source of Funds) के बारे में अस्पष्टता
  • यह स्पष्ट न कर पाना कि ऋण कब, कहां और किन शर्तों पर दिया गया

इन कमियों के कारण अदालत ने माना कि शिकायतकर्ता धारा 138 के आवश्यक तत्वों को सिद्ध करने में असफल रहा।


निचली अदालत की त्रुटि

केरल हाईकोर्ट ने निचली अदालत के दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कहा कि—

  • निचली अदालत ने धारा 139 की धारणा को स्वतः निर्णायक मान लिया
  • आरोपी द्वारा उठाए गए बचाव और साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारणा अभियोजन की सहायता के लिए है, न कि आरोपी को स्वतः दोषी ठहराने के लिए।


हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष

इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर केरल हाईकोर्ट ने—

  • निचली अदालत की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया
  • आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन अपना मामला संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा

फैसले का व्यापक प्रभाव

1. चेक बाउंस कानून का संतुलित प्रयोग

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि चेक बाउंस कानून का उद्देश्य व्यापारिक लेन-देन में विश्वास बनाए रखना है, न कि इसे दबाव या उत्पीड़न का साधन बनाना।

2. सुरक्षा चेक के मामलों में राहत

सुरक्षा चेक के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में यह फैसला आरोपी के लिए एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान करता है।

3. न्यायिक विवेक का महत्व

यह फैसला निचली अदालतों को यह याद दिलाता है कि हर मामले में तथ्यों और साक्ष्यों का स्वतंत्र और निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है।


सामाजिक और व्यावहारिक महत्व

आज के समय में—

  • व्यापार
  • उधार
  • निजी लेन-देन

में चेक का व्यापक उपयोग होता है। ऐसे में यह फैसला आम नागरिकों को यह भरोसा देता है कि—

केवल एक चेक के आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।


निष्कर्ष

केरल हाईकोर्ट का यह विस्तृत और तर्कसंगत फैसला चेक अनादरण कानून की आत्मा को पुनः स्थापित करता है। यह स्पष्ट करता है कि—

  • धारा 139 की धारणा अंतिम नहीं है
  • संभावित बचाव आरोपी के लिए पर्याप्त हो सकता है
  • अभियोजन को हर आवश्यक तत्व ठोस साक्ष्यों से सिद्ध करना ही होगा

यह निर्णय आने वाले समय में धारा 138/139 से जुड़े हजारों मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल (Precedent) के रूप में कार्य करेगा और कानून के संतुलित, निष्पक्ष तथा संवैधानिक प्रयोग को सुनिश्चित करेगा।