धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के बदलते आयाम (2026): भारत में भरण-पोषण कानून का समग्र और समकालीन विश्लेषण
लेखक: एडवोकेट पी.के. निगम
दिनांक: 12 जनवरी, 2026
प्रस्तावना: भरण-पोषण कानून की आत्मा
भारतीय न्याय प्रणाली में धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC), जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अंतर्गत नई संरचना प्राप्त हो चुकी है, केवल एक प्रक्रियात्मक प्रावधान नहीं है। यह प्रावधान भारतीय संविधान के मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का जीवंत प्रतिबिंब है।
इस धारा का मूल उद्देश्य समाज के उन वर्गों की रक्षा करना है, जो आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक कारणों से स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं—विशेषकर महिलाएँ, बच्चे और वृद्ध माता-पिता। न्यायालयों ने समय-समय पर यह दोहराया है कि धारा 125 का उद्देश्य सज़ा देना नहीं, बल्कि भुखमरी, दरिद्रता और परित्याग (Vagrancy) को रोकना है।
2026 तक आते-आते यह धारा एक साधारण “त्वरित राहत” के साधन से विकसित होकर संवैधानिक गरिमा की रक्षा करने वाला न्यायिक औज़ार बन चुकी है।
वैधानिक ढाँचा: भरण-पोषण का अधिकार किसे है?
धारा 125 CrPC (अब BNSS की समतुल्य धारा) एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है, जिसका लाभ सभी धर्मों और समुदायों के नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है। मजिस्ट्रेट निम्नलिखित व्यक्तियों को मासिक भरण-पोषण का आदेश दे सकता है:
1. पत्नी
इसमें वह महिला भी शामिल है—
- जो तलाकशुदा है,
- जिसने पुनर्विवाह नहीं किया है,
- और जो स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है।
2. नाबालिग बच्चे
- वैध या अवैध—दोनों प्रकार के बच्चे
- चाहे वे माता के साथ रह रहे हों या नहीं
3. विकलांग बालिग बच्चे
ऐसे वयस्क बच्चे जो—
- शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण
- स्वयं की आजीविका चलाने में असमर्थ हों
4. माता-पिता
- जैविक या दत्तक
- यदि वे स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हों
यह प्रावधान यह स्पष्ट करता है कि पारिवारिक दायित्व केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व भी हैं।
‘पत्नी’ की अवधारणा में परिवर्तन: न्यायिक दृष्टिकोण का विस्तार
1. लिव-इन रिलेशनशिप और शून्य विवाह (Void Marriage)
आधुनिक समाज में रिश्तों की संरचना बदल रही है, और न्यायपालिका ने इस सामाजिक यथार्थ को नज़रअंदाज़ नहीं किया है।
यदि कोई पुरुष और महिला—
- लंबे समय तक साथ रहते हैं,
- समाज में पति-पत्नी की तरह पहचाने जाते हैं,
- और महिला आर्थिक रूप से आश्रित है,
तो केवल विवाह की तकनीकी कमी के आधार पर उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि—
कोई व्यक्ति अपनी ही अवैधता या धोखे का लाभ नहीं उठा सकता।
यदि महिला को यह जानकारी नहीं थी कि पुरुष पहले से विवाहित है, तो पुरुष अपनी पहली शादी को “ढाल” बनाकर भरण-पोषण से नहीं बच सकता।
2. दांपत्य अधिकारों की बहाली (RCR) बनाम भरण-पोषण
पहले यह धारणा प्रचलित थी कि यदि पति के पक्ष में दांपत्य अधिकारों की बहाली (RCR) की डिक्री है, तो पत्नी को भरण-पोषण नहीं मिलेगा।
लेकिन नवीनतम न्यायिक व्याख्याओं ने इस सोच को बदल दिया है।
यदि पत्नी—
- क्रूरता,
- घरेलू हिंसा,
- दहेज की मांग,
- या मानसिक उत्पीड़न के कारण
अलग रह रही है,
तो RCR की डिक्री होते हुए भी उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय का स्पष्ट मत है कि—
कानून पत्नी को असुरक्षित वातावरण में लौटने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
Rajnesh बनाम Neha निर्णय: पारदर्शिता का युग
भरण-पोषण कानून में सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव Rajnesh v. Neha के निर्णय से आया, जिसने वर्षों से चली आ रही अव्यवस्था को समाप्त किया।
मुख्य सिद्धांत:
1. आवेदन की तिथि से भरण-पोषण
अब भरण-पोषण—
- आदेश की तिथि से नहीं,
- बल्कि आवेदन की तिथि से देय होता है।
यह उन महिलाओं के लिए अत्यंत राहतकारी है, जो वर्षों तक मुकदमेबाज़ी के दौरान आर्थिक संकट झेलती थीं।
2. आय और संपत्ति का अनिवार्य हलफनामा
दोनों पक्षों को—
- आय,
- संपत्ति,
- बैंक खाते,
- देनदारियाँ
का विस्तृत खुलासा करना अनिवार्य है।
इससे आय छुपाने की प्रवृत्ति पर प्रभावी अंकुश लगा है।
3. भरण-पोषण की राशि तय करने के मानदंड
अब अदालत केवल पति की आय नहीं देखती, बल्कि—
- जीवन-स्तर,
- बच्चों की शिक्षा,
- स्वास्थ्य व्यय,
- सामाजिक स्थिति
को भी ध्यान में रखती है।
बच्चों और माता-पिता का भरण-पोषण: पूर्ण और अनिवार्य दायित्व
1. बच्चे की वैधता अप्रासंगिक
न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि—
बच्चे की वैधता उसके भरण-पोषण के अधिकार को प्रभावित नहीं करती।
पिता का दायित्व पूर्ण (Absolute) है।
2. बालिग बेटियाँ
एक अविवाहित बालिग बेटी—
- सामान्यतः धारा 125 के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं होती,
- जब तक कि वह किसी शारीरिक या मानसिक अक्षमता से ग्रस्त न हो।
हालाँकि, अन्य व्यक्तिगत कानूनों में यह अधिकार अधिक व्यापक हो सकता है।
3. वृद्ध माता-पिता और सौतेली माँ
यदि—
- माता-पिता या सौतेली माँ विधवा है,
- और स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है,
तो संतान पर भरण-पोषण का दायित्व है।
केवल जीवित रहना नहीं, गरिमा के साथ जीना
पहले “स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ” का अर्थ केवल अत्यधिक गरीबी माना जाता था।
अब न्यायालयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि—
भरण-पोषण का अर्थ है वही जीवन-स्तर, जो विवाह के दौरान उपलब्ध था।
यदि पत्नी के पास—
- अस्थायी नौकरी,
- अल्प आय,
- या सीमित साधन हैं,
तो भी यह अपने-आप में भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं है।
आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक जीवन जीना है।
व्यावहारिक चुनौतियाँ (2026 तक)
1. बहु-न्यायिक मंच
एक ही पक्ष—
- मजिस्ट्रेट कोर्ट,
- फैमिली कोर्ट,
- घरेलू हिंसा अधिनियम
के अंतर्गत अलग-अलग मुकदमे लड़ता है, जिससे विरोधाभासी आदेशों की आशंका रहती है।
2. आदेश का क्रियान्वयन
भरण-पोषण आदेश मिलना आसान हो गया है,
लेकिन बकाया वसूली (Execution) आज भी सबसे बड़ी चुनौती है।
3. आय खुलासे में अपारदर्शिता
Rajnesh v. Neha के दिशानिर्देशों के बावजूद, कई मामलों में—
- अपूर्ण,
- भ्रामक
हलफनामे दाखिल किए जाते हैं।
निष्कर्ष: एकीकृत भरण-पोषण संहिता की आवश्यकता
धारा 125 (अब BNSS) भारतीय कानून की एक जीवंत धारा है, जो समाज के साथ-साथ विकसित हो रही है।
आज न्यायपालिका—
- तकनीकी खामियों से अधिक,
- मानवीय पीड़ा को महत्व देती है।
भविष्य में भारत को एक Unified Maintenance Code की आवश्यकता है, जो—
- सभी व्यक्तिगत कानूनों,
- आपराधिक प्रक्रियाओं
को एक मंच पर लाए, ताकि न्याय केवल आदेशों तक सीमित न रहे, बल्कि समय पर ज़रूरतमंद तक पहुँचे।
प्रैक्टिशनर्स के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- हमेशा आवेदन की तिथि से भरण-पोषण की मांग करें
- आय और संपत्ति के हलफनामे को गहराई से जाँचें
- क्रूरता के साक्ष्य RCR डिक्री को निष्प्रभावी कर सकते हैं
- परिस्थितियों में बदलाव होने पर भरण-पोषण पुनः निर्धारित कराया जा सकता है