धर्मांतरण कानून का विवेकपूर्ण प्रयोग अनिवार्य: यांत्रिक एफआईआर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) की दो-टूक चेतावनी उत्तर प्रदेश धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के दुरुपयोग पर न्यायिक अंकुश — व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सहमति और संवैधानिक संतुलन की पुनर्स्थापना
धर्म और आस्था व्यक्ति के अंतःकरण से जुड़े विषय हैं। इन्हें नियंत्रित करने वाले कानून यदि यांत्रिक, रूढ़ और बिना विवेक के लागू किए जाएँ, तो वे समाज में भय, अविश्वास और अन्याय को जन्म दे सकते हैं। इसी संवेदनशील पृष्ठभूमि में Allahabad High Court की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश के राज्य प्राधिकारियों को कड़ी चेतावनी दी है कि वे Uttar Pradesh Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2021 के तहत यांत्रिक और रूटीन तरीके से मुकदमे दर्ज न करें।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए है, न कि स्वैच्छिक, सहमति-आधारित और बालिग व्यक्तियों के निजी निर्णयों को अपराधीकरण करने के लिए। अदालत की यह टिप्पणी संविधान के मूल्यों—स्वतंत्रता, गरिमा और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया—की दृढ़ पुनःस्थापना करती है।
📜 विवाद की पृष्ठभूमि: शिकायत से एफआईआर तक की यांत्रिकता
लखनऊ पीठ के समक्ष आए मामलों में एक सामान्य पैटर्न उभरकर सामने आया—
- शिकायत मिलते ही प्रारंभिक जांच के बिना
- तथ्यों की वास्तविक पड़ताल किए बिना
- और सहमति/बालिगता जैसे निर्णायक पहलुओं पर विचार किए बिना
- कठोर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी गई।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे बालिग हैं, उन्होंने स्वेच्छा से निर्णय लिया, और कहीं भी बल, धोखा, प्रलोभन या दबाव का तत्व मौजूद नहीं था। इसके बावजूद, पुलिस ने अधिनियम के तहत कार्रवाई कर दी—जिससे निजी जीवन, प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता पर गंभीर आघात पहुँचा।
🧑⚖️ न्यायालय की टिप्पणी: कानून का ‘ऑटो-पायलट’ स्वीकार्य नहीं
हाईकोर्ट ने तीखी भाषा में कहा कि:
“धर्मांतरण जैसे संवेदनशील विषय पर बने कानून का स्वचालित (mechanical) प्रयोग नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए घातक हो सकता है। कानून विवेक मांगता है, ऑटो-पायलट नहीं।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर अंतरधार्मिक विवाह या हर धर्म परिवर्तन अपने-आप में अपराध नहीं है। अपराध तभी बनता है जब अधिनियम में वर्णित अवैध तत्व—जैसे बल, छल, प्रलोभन—प्रथम दृष्टया स्थापित हों।
⚖️ अधिनियम का उद्देश्य और उसकी सीमाएँ
उत्तर प्रदेश धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 का उद्देश्य है:
- जबरन,
- धोखे से,
- प्रलोभन देकर, या
- दबाव बनाकर
कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकना।
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि यह उद्देश्य वैध है, पर इसका विस्तार इतना नहीं कि वह स्वैच्छिक आस्था-परिवर्तन या बालिगों की सहमति को कुचल दे। कानून की व्याख्या ऐसी नहीं होनी चाहिए जो मौलिक अधिकारों को निष्प्रभावी बना दे।
🧠 सहमति और बालिगता: निर्णायक कसौटी
अदालत ने जोर दिया कि:
- बालिग व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है;
- सहमति (Consent) का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ तथ्यों से किया जाना चाहिए;
- महज़ पारिवारिक असहमति या सामाजिक दबाव अपराध का प्रमाण नहीं बन सकते।
यह दृष्टिकोण सीधे-सीधे अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) की आत्मा से जुड़ा है।
🚨 यांत्रिक एफआईआर के दुष्परिणाम
हाईकोर्ट ने आगाह किया कि यांत्रिक एफआईआर से—
- निर्दोष लोग आपराधिक प्रक्रिया में फँस जाते हैं;
- पुलिस विवेक निष्प्रभावी हो जाता है;
- कानून उत्पीड़न का औजार बन सकता है;
- और न्यायालयों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया संतुष्टि (prima facie satisfaction) के बिना कठोर धाराएँ लगाना कानून की मंशा के विपरीत है।
🏛️ राज्य प्राधिकारियों के लिए मार्गदर्शन
हाईकोर्ट की चेतावनी केवल आलोचना नहीं, बल्कि स्पष्ट मार्गदर्शन भी है:
- प्रारंभिक जांच—तथ्यों का तटस्थ आकलन;
- सहमति/बालिगता—दस्तावेज़ी व परिस्थितिजन्य परीक्षण;
- अवैध तत्व—बल/छल/प्रलोभन का ठोस संकेत;
- विवेकपूर्ण विवेचना—रूटीन नहीं, कारण-आधारित कार्रवाई।
📌 पुलिस विवेक और न्यायिक समीक्षा
अदालत ने दोहराया कि पुलिस केवल एफआईआर दर्ज करने की मशीन नहीं है। उसे—
- संविधान,
- कानून, और
- मानवीय विवेक
तीनों का संतुलन साधना होता है।
यदि विवेक का परित्याग होगा, तो न्यायिक समीक्षा अनिवार्य रूप से कठोर होगी।
🌍 सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक संतुलन
धर्मांतरण के मुद्दे सामाजिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं। असंतुलित कार्रवाई—
- सामाजिक तनाव बढ़ा सकती है;
- अंतर-सामुदायिक विश्वास को चोट पहुँचा सकती है;
- और लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर कर सकती है।
हाईकोर्ट का हस्तक्षेप सामाजिक सौहार्द के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
🔍 निचली अदालतों और प्रशासन पर प्रभाव
यह आदेश—
- निचली अदालतों के लिए न्यायिक दिशासूचक बनेगा;
- पुलिस व प्रशासन को कारण-आधारित निर्णय के लिए बाध्य करेगा;
- और अधिनियम के दुरुपयोग पर अंकुश लगाएगा।
🔮 भविष्य की राह: अनुपालन और संतुलन
हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि—
- यदि चेतावनी के बावजूद यांत्रिक मुकदमे दर्ज होते रहे,
- तो अदालतें कठोर हस्तक्षेप से नहीं हिचकेंगी।
सही रास्ता वही है जहाँ—
- कानून का उद्देश्य पूरा हो,
- और मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें।
📝 निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) की यह विस्तृत चेतावनी कानून के विवेकपूर्ण प्रयोग का घोष है। अदालत ने साफ कहा है कि:
“अधिकारों की कीमत पर कानून लागू करना न्याय नहीं; और विवेक के बिना कानून लागू करना शासन नहीं।”
यह निर्णय याद दिलाता है कि संविधान हर कानून से ऊपर है, और उसका पालन तभी सार्थक है जब स्वतंत्रता, गरिमा और न्याय—तीनों साथ-साथ सुरक्षित रहें।