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दो एफ.आई.आर., एक ही घटनाक्रम और न्याय का समेकित मार्ग: वीरेंद्र कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2025) — धारा 407 सीआरपीसी के अंतर्गत स्थानांतरण एवं समेकन पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय

दो एफ.आई.आर., एक ही घटनाक्रम और न्याय का समेकित मार्ग: वीरेंद्र कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2025) — धारा 407 सीआरपीसी के अंतर्गत स्थानांतरण एवं समेकन पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय


भूमिका

     आपराधिक न्याय प्रणाली में क्षेत्राधिकार (Jurisdiction), एफ.आई.आर. की वैधता, और एक ही घटनाक्रम से जुड़े अपराधों की सुनवाई से जुड़े प्रश्न अक्सर जटिल कानूनी स्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। जब किसी अपराध की घटनाएँ अलग-अलग जिलों में घटित होती हैं, तब यह तय करना चुनौतीपूर्ण हो  जाता है कि किस न्यायालय को मामले की सुनवाई करनी चाहिए और क्या एक से अधिक एफ.आई.आर. दर्ज की जा सकती हैं।

वीरेंद्र कुमार बनाम हरियाणा राज्य, सीआरएम-एम-63849-2024, वर्ष 2025 में दिया गया पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का निर्णय, इन्हीं प्रश्नों पर एक महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक फैसला है। यह निर्णय धारा 407 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) के अंतर्गत मामलों के स्थानांतरण एवं समेकन (Transfer and Consolidation) से संबंधित है और यह स्पष्ट करता है कि जब दो एफ.आई.आर. एक ही घटनाक्रम से उत्पन्न हों, तब न्याय के हित में उन्हें एक ही न्यायालय में एक साथ सुना जाना चाहिए।


मामले की पृष्ठभूमि और तथ्य

इस मामले के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं—

  1. अपहरण की घटना
    • एक व्यक्ति का अपहरण सोनीपत जिले के अधिकार क्षेत्र में हुआ।
    • इस अपहरण की घटना के संबंध में पुलिस स्टेशन सिविल लाइंस, सोनीपत में एक एफ.आई.आर. दर्ज की गई।
  2. शव की बरामदगी और हत्या का आरोप
    • अपहृत व्यक्ति का शव बाद में झज्जर जिले के अधिकार क्षेत्र में बरामद हुआ।
    • इस आधार पर पुलिस स्टेशन बादली, जिला झज्जर में हत्या से संबंधित एक अलग एफ.आई.आर. दर्ज की गई।
  3. आरोपी एक ही
    • दोनों एफ.आई.आर. में आरोपी एक ही व्यक्ति/व्यक्ति समूह थे।
    • अभियोजन की कहानी के अनुसार, अपहरण और हत्या दोनों एक ही आपराधिक घटनाक्रम (Same Transaction) का हिस्सा थे।

इन परिस्थितियों में अभियुक्त की ओर से यह तर्क दिया गया कि दो अलग-अलग एफ.आई.आर. दर्ज करना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे अभियुक्तों को दो अलग मुकदमों का सामना करना पड़ेगा, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से जटिल हो जाएगी।


याचिका और कानूनी प्रावधान

अभियुक्त की ओर से धारा 407 सीआरपीसी के अंतर्गत पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई।

धारा 407 सीआरपीसी उच्च न्यायालय को यह शक्ति प्रदान करती है कि—

  • किसी आपराधिक मामले या अपील को
  • एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में
  • न्याय के हित में स्थानांतरित किया जा सके।

याचिका में यह प्रार्थना की गई कि—

  • झज्जर जिले में दर्ज एफ.आई.आर. से संबंधित मुकदमे को
  • सोनीपत सत्र मंडल में स्थानांतरित किया जाए, और
  • दोनों मामलों की एक साथ (Consolidated) सुनवाई कराई जाए।

याचिकाकर्ता के तर्क

याचिकाकर्ता ने निम्नलिखित प्रमुख तर्क प्रस्तुत किए—

  1. एक ही घटनाक्रम (Same Transaction)
    अपहरण और हत्या दो अलग-अलग अपराध अवश्य हैं, परंतु वे एक ही आपराधिक घटनाक्रम की कड़ियाँ हैं। अपहरण के बाद हत्या होना उसी घटना की निरंतरता है।
  2. दूसरी एफ.आई.आर. की अनावश्यकता
    कानून का स्थापित सिद्धांत है कि एक ही घटनाक्रम से संबंधित अपराधों के लिए सामान्यतः दूसरी एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की जानी चाहिए। दूसरी एफ.आई.आर. से जांच और मुकदमा दोनों जटिल हो जाते हैं।
  3. दोहरा उत्पीड़न (Double Jeopardy का व्यावहारिक प्रभाव)
    यद्यपि तकनीकी रूप से यह अनुच्छेद 20(2) का सीधा उल्लंघन नहीं है, फिर भी एक ही अभियुक्त को एक ही घटनाक्रम के लिए दो अलग मुकदमों का सामना करना पड़ता है, जो अन्यायपूर्ण है।
  4. सबूतों की पुनरावृत्ति और विरोधाभास
    अलग-अलग न्यायालयों में सुनवाई होने से

    • वही गवाह,
    • वही दस्तावेज़,
    • और वही परिस्थितिजन्य साक्ष्य
      दो बार प्रस्तुत करने पड़ेंगे, जिससे परस्पर विरोधाभासी निष्कर्ष निकलने की आशंका रहेगी।

राज्य (हरियाणा सरकार) का पक्ष

राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि—

  • अपहरण और हत्या दो स्वतंत्र अपराध हैं।
  • शव की बरामदगी झज्जर जिले में हुई, इसलिए झज्जर पुलिस को हत्या की एफ.आई.आर. दर्ज करने का अधिकार था।
  • दोनों जिलों के क्षेत्राधिकार अलग-अलग हैं।

हालाँकि, राज्य यह भी स्पष्ट रूप से नकार नहीं सका कि दोनों अपराध एक ही घटनाक्रम से जुड़े हुए हैं।


न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न

उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था—

  1. क्या एक ही घटनाक्रम से उत्पन्न अपहरण और हत्या के लिए दो अलग-अलग एफ.आई.आर. दर्ज करना उचित है?
  2. क्या न्याय के हित में दोनों मामलों को एक ही न्यायालय में स्थानांतरित कर समेकित रूप से सुना जाना चाहिए?

न्यायालय का विश्लेषण और विचार

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने विस्तृत विचार करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बल दिया—

1. एक ही घटनाक्रम का सिद्धांत

न्यायालय ने कहा कि यदि घटनाएँ—

  • समय,
  • स्थान,
  • उद्देश्य, और
  • अभियुक्तों की पहचान

के संदर्भ में आपस में गहराई से जुड़ी हों, तो उन्हें एक ही Transaction माना जाता है।

इस मामले में अपहरण और हत्या स्पष्ट रूप से एक ही श्रृंखला की घटनाएँ थीं।


2. दूसरी एफ.आई.आर. की वैधता

न्यायालय ने माना कि यद्यपि विभिन्न परिस्थितियों में एक से अधिक एफ.आई.आर. संभव हो सकती हैं, परंतु—

  • जब अपराध एक ही घटनाक्रम से संबंधित हों,
  • और आरोपी भी एक ही हों,

तो दूसरी एफ.आई.आर. दर्ज करना उचित नहीं माना जा सकता।


3. न्यायिक जटिलता से बचाव

न्यायालय ने कहा कि यदि दोनों मुकदमे अलग-अलग सत्र न्यायालयों में चलेंगे, तो—

  • अभियुक्तों पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा,
  • न्यायालयों का समय व्यर्थ होगा, और
  • विरोधाभासी निर्णयों की संभावना बढ़ेगी।

4. धारा 407 सीआरपीसी की व्यापक शक्ति

उच्च न्यायालय ने यह दोहराया कि धारा 407 सीआरपीसी का उद्देश्य केवल सुविधा नहीं, बल्कि न्याय की निष्पक्षता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना है।


न्यायालय का अंतिम निर्णय

इन सभी कारणों के आधार पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने—

  • याचिका स्वीकार कर ली।
  • झज्जर जिले में दर्ज एफ.आई.आर. से संबंधित मुकदमे को सोनीपत सत्र मंडल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया।
  • यह निर्देश दिया कि दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ (समेकित रूप से) की जाए।

निर्णय का महत्व और प्रभाव

यह निर्णय कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है—

  1. एफ.आई.आर. के दुरुपयोग पर रोक
    पुलिस द्वारा एक ही घटनाक्रम के लिए कई एफ.आई.आर. दर्ज करने की प्रवृत्ति पर यह फैसला नियंत्रण स्थापित करता है।
  2. अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा
    एक ही घटनाक्रम के लिए दोहरे मुकदमों से अभियुक्त को बचाया गया।
  3. न्यायिक दक्षता
    समेकित सुनवाई से समय, संसाधन और न्यायालयों की ऊर्जा की बचत होगी।
  4. भविष्य के मामलों के लिए मार्गदर्शन
    यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में एक प्रेरक मिसाल (Precedent) के रूप में कार्य करेगा।

निष्कर्ष

वीरेंद्र कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2025) का यह निर्णय इस सिद्धांत को दृढ़ता से स्थापित करता है कि न्याय का उद्देश्य केवल प्रक्रिया का पालन नहीं, बल्कि निष्पक्ष, तर्कसंगत और व्यावहारिक समाधान सुनिश्चित करना है। जब अपराध एक ही घटनाक्रम से जुड़े हों, तो कानून को इस प्रकार लागू किया जाना चाहिए कि न अभियुक्त के अधिकारों का हनन हो और न ही न्यायिक व्यवस्था अनावश्यक बोझ से ग्रस्त हो।

धारा 407 सीआरपीसी के अंतर्गत स्थानांतरण और समेकन की शक्ति का यह विवेकपूर्ण प्रयोग भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में संतुलन और न्यायप्रियता का एक सशक्त उदाहरण है।