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दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर की दिशा में ऐतिहासिक कदम –Mission Accessibility बनाम Union of India में सुप्रीम कोर्ट का संवेदनशील और प्रगतिशील निर्णय

दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर की दिशा में ऐतिहासिक कदम –Mission Accessibility बनाम Union of India में सुप्रीम कोर्ट का संवेदनशील और प्रगतिशील निर्णय

भूमिका

       भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, गरिमा और अवसर की समान उपलब्धता का आश्वासन देता है। विशेष रूप से दिव्यांग व्यक्तियों (Persons with Disabilities – PwDs) के लिए यह दायित्व और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि शारीरिक या संवेदी अक्षमताएँ उनके जीवन की राह को अतिरिक्त रूप से कठिन बना देती हैं।

        प्रतियोगी परीक्षाएँ, विशेषकर Union Public Service Commission (UPSC) द्वारा आयोजित परीक्षाएँ, देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षाओं में गिनी जाती हैं। इन परीक्षाओं में दिव्यांग अभ्यर्थियों को समान अवसर प्रदान करना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि संवैधानिक और मानवाधिकार का प्रश्न है।

     इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने Mission Accessibility बनाम Union of India & Another मामले में एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया, जिसमें—

  • दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए स्क्राइब (Scribe) के नाम में बदलाव को सरल बनाने, तथा
  • दृष्टिबाधित (Visually Impaired) अभ्यर्थियों के लिए स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर के प्रभावी क्रियान्वयन

के स्पष्ट निर्देश दिए गए।


मामले की पृष्ठभूमि

Mission Accessibility एक ऐसा संगठन है जो—

  • दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों
  • सुलभता (Accessibility)
  • और समावेशी समाज (Inclusive Society)

के लिए कार्य करता है।

इस याचिका में यह आरोप लगाया गया कि—

  1. UPSC परीक्षाओं में दिव्यांग अभ्यर्थियों को स्क्राइब बदलने में अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है
  2. अंतिम समय में स्क्राइब उपलब्ध न होने पर अभ्यर्थी परीक्षा से वंचित हो जाते हैं
  3. दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए तकनीकी सहायता, जैसे स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर, का समुचित और समान क्रियान्वयन नहीं हो रहा है

इन समस्याओं के कारण कई योग्य दिव्यांग अभ्यर्थी प्रतियोगिता से बाहर हो जाते हैं।


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दे

न्यायालय के समक्ष प्रमुख प्रश्न थे—

  1. क्या UPSC द्वारा स्क्राइब के नाम में बदलाव की प्रक्रिया अत्यधिक कठोर और अव्यावहारिक है?
  2. क्या दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है?
  3. क्या मौजूदा व्यवस्था दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 और संविधान के अनुच्छेद 14, 21 व 16 के अनुरूप है?

सुप्रीम कोर्ट का संवेदनशील दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अत्यंत मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—

“सुलभता कोई दया या रियायत नहीं, बल्कि एक अधिकार है।”

कोर्ट ने माना कि दिव्यांग अभ्यर्थियों को समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा का अवसर देना ही वास्तविक समानता (Substantive Equality) है।


स्क्राइब बदलने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

1. स्क्राइब पर अत्यधिक निर्भरता

कोर्ट ने माना कि—

  • दिव्यांग अभ्यर्थी स्क्राइब पर अत्यधिक निर्भर होते हैं
  • अंतिम समय में स्क्राइब के बीमार होने, अनुपस्थित रहने या अन्य कारणों से उपलब्ध न होने की स्थिति आम है

ऐसे में—

स्क्राइब बदलने की अनुमति न देना अभ्यर्थी को परीक्षा से वंचित करने के समान है।


2. स्क्राइब बदलने की प्रक्रिया को सरल बनाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने UPSC को निर्देश दिया कि—

  • स्क्राइब के नाम में बदलाव की प्रक्रिया लचीली (Flexible) हो
  • अंतिम समय में भी, उचित सत्यापन के साथ, बदलाव की अनुमति दी जाए
  • अनावश्यक तकनीकी बाधाएँ न लगाई जाएँ

यह निर्देश दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत राहतकारी है।


दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर

1. तकनीक और समान अवसर

न्यायालय ने कहा कि—

“तकनीक, यदि सही ढंग से प्रयोग की जाए, तो दिव्यांगता को बाधा नहीं रहने देती।”

दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए—

  • स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर
  • डिजिटल प्रश्नपत्रों की सुलभता
  • तकनीकी अनुकूलता

समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य हैं।


2. UPSC को स्पष्ट निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने UPSC को निर्देश दिया कि—

  • स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर का समुचित, समान और प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए
  • यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी परीक्षा केंद्रों पर यह सुविधा उपलब्ध हो
  • तकनीकी खामियों के कारण किसी भी अभ्यर्थी को नुकसान न हो

दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के संदर्भ में निर्णय

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016
    केवल कागजी कानून नहीं है
  • यह अधिनियम राज्य पर सकारात्मक दायित्व डालता है

सुलभता, उचित समायोजन (Reasonable Accommodation) और समान अवसर
इस अधिनियम की आत्मा हैं।


संवैधानिक दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को—

  • अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
  • अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार)
  • अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर)

के साथ जोड़ते हुए कहा कि—

दिव्यांग व्यक्तियों को मुख्यधारा से अलग रखना असंवैधानिक है।


प्रशासनिक तर्कों को खारिज किया गया

UPSC द्वारा प्रस्तुत प्रशासनिक कठिनाइयों के तर्क पर कोर्ट ने कहा—

“प्रशासनिक सुविधा, मौलिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकती।”

यदि व्यवस्था में कमी है, तो—

  • उसे सुधारना प्रशासन का कर्तव्य है
  • न कि अभ्यर्थियों को उससे वंचित करना

इस निर्णय का दूरगामी प्रभाव

यह निर्णय—

  • UPSC
  • अन्य लोक सेवा आयोगों
  • विश्वविद्यालयों और परीक्षा एजेंसियों

सभी पर समान रूप से लागू होने वाले सिद्धांत स्थापित करता है।

अब—

  • दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए सुलभता एक अनिवार्य मानक होगी
  • केवल औपचारिक अनुपालन पर्याप्त नहीं माना जाएगा

दिव्यांग समुदाय के लिए ऐतिहासिक महत्व

यह फैसला दिव्यांग समुदाय को यह संदेश देता है कि—

  • न्यायपालिका उनकी आवाज सुनती है
  • उनके अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है
  • वे दया के पात्र नहीं, अधिकारों के धारक हैं

कानून छात्रों और परीक्षाओं के लिए महत्व

यह केस विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—

  • Disability Law
  • Constitutional Law
  • Administrative Law
  • Human Rights Jurisprudence

Judiciary, UPSC, Law Exams में यह निर्णय अत्यंत उपयोगी है।


समाज के लिए संदेश

इस निर्णय से समाज को यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि—

  • समावेशी समाज केवल नारा नहीं
  • बल्कि व्यवहारिक और कानूनी दायित्व है
  • दिव्यांगता अक्षमता नहीं, बल्कि विविधता है

निष्कर्ष

Mission Accessibility बनाम Union of India & Another में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
मानव गरिमा, समान अवसर और समावेशिता का सशक्त उदाहरण है।

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि—

  • सुलभता अधिकार है, रियायत नहीं
  • तकनीक समानता की सहायक हो सकती है
  • प्रशासन को दिव्यांग-अनुकूल बनना ही होगा

यह निर्णय न केवल दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र की आत्मा के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।