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तलाक के बिना दूसरा संबंध और गुजारा भत्ता नहीं: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय

तलाक के बिना दूसरा संबंध और गुजारा भत्ता नहीं: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय (विस्तृत विधिक विश्लेषण)

       भारतीय पारिवारिक कानून में गुजारा भत्ता (Maintenance) से जुड़े मामलों में न्यायालयों का दृष्टिकोण समय–समय पर विकसित हुआ है, लेकिन इसके साथ-साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि कानूनी विवाह (Valid Marriage) के बिना केवल साथ रहने या लंबे समय के संबंध के आधार पर हर स्थिति में भरण-पोषण का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं होता।

        इसी संदर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय दिया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि —

यदि किसी महिला ने अपने पहले पति से विधिवत तलाक नहीं लिया है, तो वह किसी अन्य पुरुष के साथ कितने भी लंबे समय तक क्यों न रही हो, वह उससे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत गुजारा भत्ता (Maintenance) का दावा नहीं कर सकती।

        यह निर्णय न केवल व्यक्तिगत मामलों तक सीमित है, बल्कि लिव-इन रिलेशनशिप, द्विविवाह (Bigamy), और धारा 125 CrPC की व्याख्या को लेकर एक मजबूत न्यायिक दृष्टांत भी प्रस्तुत करता है।


मामले की पृष्ठभूमि (Facts of the Case)

इस मामले में:

  • याचिकाकर्ता महिला का पहला विवाह पहले से अस्तित्व में था
  • महिला ने अपने पहले पति से कानूनी रूप से तलाक नहीं लिया था
  • इसके बावजूद, उसने दूसरे व्यक्ति के साथ लंबे समय तक साथ रहने का दावा किया
  • महिला का यह भी कहना था कि दूसरे व्यक्ति के साथ विवाह की रस्में भी हुई थीं
  • बाद में महिला ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता की मांग की

निचली अदालत द्वारा भरण-पोषण दिए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए मामला उच्च न्यायालय पहुंचा।


धारा 125 CrPC का उद्देश्य और दायरा

धारा 125 का उद्देश्य है:

  • पत्नी
  • बच्चे
  • माता-पिता

को दरिद्रता और भुखमरी से बचाना।

यह धारा एक सामाजिक न्याय (Social Justice) का प्रावधान है, न कि विवाह वैधता का मंच।
लेकिन इसके बावजूद न्यायालयों ने बार-बार यह कहा है कि —

धारा 125 का लाभ केवल “कानूनन पत्नी” (Legally Wedded Wife) को ही प्राप्त हो सकता है।


इलाहाबाद उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट किए:

1. पहले विवाह के रहते दूसरा विवाह अमान्य

अदालत ने कहा कि —

  • यदि महिला का पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ है,
  • तो दूसरे पुरुष के साथ किया गया विवाह शून्य (Void Marriage) होगा,
  • भले ही विवाह की सभी रस्में क्यों न निभाई गई हों।

यह स्थिति हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 और 11 के अनुरूप है।


2. लंबे समय तक साथ रहने से वैध पत्नी का दर्जा नहीं मिलता

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि —

  • केवल लंबे समय तक साथ रहने (Long Relationship)
  • या सामाजिक रूप से पति-पत्नी की तरह रहने
    से महिला को “पत्नी” का कानूनी दर्जा नहीं मिल जाता,
    यदि उसका पूर्व विवाह अभी भी वैध रूप से कायम है।

3. धारा 125 CrPC के तहत गुजारा भत्ता का अधिकार नहीं

न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि —

“ऐसी महिला, जिसका पहला विवाह अभी भी जीवित है, वह दूसरे पुरुष से धारा 125 CrPC के अंतर्गत गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार नहीं है, चाहे वह उसके साथ वर्षों तक रही हो।”


4. कथित विवाह भी संरक्षण नहीं देता

महिला ने यह तर्क दिया कि —

  • दूसरे व्यक्ति के साथ विवाह की रस्में हुई थीं

इस पर अदालत ने कहा:

  • जब पहला विवाह अस्तित्व में है,
  • तो दूसरा विवाह कानूनन शून्य है,
  • और शून्य विवाह से धारा 125 का अधिकार उत्पन्न नहीं होता

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों से सामंजस्य

यह निर्णय कई पूर्व न्यायिक दृष्टांतों के अनुरूप है, जिनमें यह कहा गया है कि —

  • यदि महिला को पूर्व विवाह की जानकारी थी,
  • और उसने बिना तलाक लिए दूसरा संबंध बनाया,
    तो वह धारा 125 CrPC की “पत्नी” की श्रेणी में नहीं आती

हालाँकि कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने धोखा खाई महिला को संरक्षण दिया है, लेकिन वर्तमान मामले में:

  • महिला स्वयं विवाहित थी
  • और उसे अपने पहले विवाह की पूर्ण जानकारी थी

इसलिए वह कानून की सहानुभूति (Equitable Relief) की पात्र नहीं मानी गई।


लिव-इन रिलेशनशिप और यह निर्णय

यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि:

  • लिव-इन रिलेशनशिप तभी संरक्षण पा सकती है
  • जब दोनों पक्ष कानूनी रूप से विवाह योग्य (Legally Competent) हों

यदि:

  • महिला या पुरुष पहले से विवाहित है,
  • और विवाह समाप्त नहीं हुआ है,
    तो ऐसा लिव-इन संबंध कानूनी सुरक्षा से बाहर रहेगा।

महिलाओं के अधिकार बनाम कानून की सीमाएं

अदालत ने यह भी माना कि:

  • धारा 125 एक कल्याणकारी प्रावधान है
  • लेकिन इसे कानून के स्पष्ट निषेध (Statutory Prohibition) के विरुद्ध नहीं पढ़ा जा सकता

अर्थात:

“सहानुभूति कानून का स्थान नहीं ले सकती।”


समाज के लिए इस निर्णय का महत्व

इस फैसले का व्यापक प्रभाव है:

✔️ यह द्विविवाह को हतोत्साहित करता है
✔️ विवाह संस्था की कानूनी पवित्रता को बनाए रखता है
✔️ धारा 125 के दुरुपयोग को रोकता है
✔️ यह स्पष्ट संदेश देता है कि

“लंबा संबंध ≠ वैध पत्नी”


व्यावहारिक सीख (Practical Takeaways)

🔹 बिना तलाक लिए दूसरा संबंध कानूनी अधिकार नहीं देता
🔹 गुजारा भत्ता के लिए वैध विवाह आवश्यक
🔹 केवल साथ रहने से पत्नी का दर्जा नहीं
🔹 विवाह से पहले पूर्व वैवाहिक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी


निष्कर्ष (Conclusion)

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय पारिवारिक कानून में एक स्पष्ट और मजबूत सिद्धांत स्थापित करता है कि —

यदि महिला का पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ है, तो वह किसी अन्य पुरुष से, चाहे वह उसके साथ वर्षों तक रही हो, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता का दावा नहीं कर सकती।

यह फैसला कानून, नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था — तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए यह स्पष्ट करता है कि कानूनी अधिकार भावनाओं या लंबे सहवास से नहीं, बल्कि विधिक वैधता से उत्पन्न होते हैं।