डिजिटल युग में निजता और गरिमा Shilpa Shetty Kundra बनाम Getoutlive.in और अन्य : एक संवैधानिक और तकनीकी कानूनी विश्लेषण
प्रस्तावना: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और निजता का नया संकट
डिजिटल युग ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधा, गति और वैश्विक संपर्क प्रदान किया है। किंतु इसी तकनीकी क्रांति के साथ-साथ निजता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर नए और गहरे संकट भी उत्पन्न हुए हैं। विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) और डीपफेक (Deepfake) जैसी उन्नत तकनीकों ने कानून, नैतिकता और मानवाधिकारों के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
हाल ही में Bombay High Court में दायर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा की याचिका ने इन प्रश्नों को केंद्र में ला दिया—क्या डिजिटल दुनिया में भी निजता और गरिमा उतनी ही संरक्षित है जितनी वास्तविक जीवन में? क्या तकनीक के नाम पर किसी महिला की छवि, पहचान और प्रतिष्ठा को कुचला जा सकता है? और क्या भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 साइबर स्पेस में भी प्रभावी है?
यह लेख इन्हीं प्रश्नों का संवैधानिक, तकनीकी और सामाजिक दृष्टि से समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
1. मामले की पृष्ठभूमि: विवाद की जड़ क्या है?
याचिकाकर्ता शिल्पा शेट्टी कुंद्रा को यह ज्ञात हुआ कि कुछ वेबसाइटों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स—विशेष रूप से Getoutlive.in—पर उनकी तस्वीरों और वीडियो का उपयोग बिना सहमति के किया जा रहा है। इन सामग्रियों में AI-आधारित फेस-स्वैपिंग और डीपफेक तकनीक का प्रयोग कर उन्हें आपत्तिजनक, भ्रामक और अशोभनीय रूप में प्रस्तुत किया गया।
यह सामग्री न केवल अश्लील थी, बल्कि इतनी वास्तविक प्रतीत होती थी कि एक सामान्य दर्शक के लिए यह समझना असंभव था कि वह कृत्रिम रूप से निर्मित है। परिणामस्वरूप—
- अभिनेत्री की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची
- उनकी व्यक्तिगत गरिमा का हनन हुआ
- जनता को जानबूझकर गुमराह किया गया
याचिका का मूल तर्क यह था कि यह कृत्य निजता के अधिकार, व्यक्तित्व अधिकार और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित गरिमा के साथ जीने के अधिकार का घोर उल्लंघन है।
2. डीपफेक तकनीक: एक नया लेकिन खतरनाक हथियार
डीपफेक तकनीक मशीन लर्निंग और न्यूरल नेटवर्क पर आधारित होती है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या हाव-भाव को किसी अन्य वीडियो या छवि पर इस प्रकार आरोपित किया जाता है कि वह वास्तविक लगे।
डीपफेक के दुष्परिणाम
- सहमति का पूर्ण अभाव
- महिलाओं के विरुद्ध डिजिटल हिंसा
- मानहानि और चरित्र हनन
- लोकतांत्रिक संस्थाओं और न्याय प्रणाली पर अविश्वास
शिल्पा शेट्टी का मामला दर्शाता है कि डीपफेक अब केवल तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन का माध्यम बन चुका है।
3. न्यायालय का अवलोकन और ऐतिहासिक आदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस याचिका को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“किसी भी महिला को, चाहे वह सार्वजनिक व्यक्तित्व हो या सामान्य नागरिक, इस प्रकार चित्रित नहीं किया जा सकता जो उसके सम्मान, निजता और गरिमा को ठेस पहुँचाए। यह अनुच्छेद 21 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।”
न्यायालय के प्रमुख निर्देश
- Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY) को आदेश कि सभी आपत्तिजनक वेबसाइटों और URLs को तुरंत ब्लॉक किया जाए।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (Meta, Google, X आदि) को तत्काल सामग्री हटाने (Takedown) के निर्देश।
- मध्यवर्तियों (Intermediaries) को यह स्पष्ट संदेश कि वे केवल “निष्क्रिय कैरियर” बनकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।
- भविष्य में ऐसी सामग्री के पुनः अपलोड पर कठोर कार्रवाई की चेतावनी।
यह आदेश डिजिटल युग में न्यायपालिका की संवेदनशील और सक्रिय भूमिका को रेखांकित करता है।
4. संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: अनुच्छेद 21 का विस्तार
(क) निजता का अधिकार
K.S. Puttaswamy v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग घोषित किया था। इस निर्णय ने यह स्पष्ट किया कि—
- निजता केवल शारीरिक नहीं, बल्कि सूचनात्मक और डिजिटल भी है
- व्यक्ति को अपनी छवि, पहचान और डेटा पर नियंत्रण का अधिकार है
शिल्पा शेट्टी के मामले में यही सिद्धांत AI-जनित सामग्री पर लागू किया गया।
(ख) गरिमा के साथ जीने का अधिकार
भारतीय संविधान में गरिमा को जीवन के केंद्र में रखा गया है। जब किसी महिला को डिजिटल माध्यम से अपमानित किया जाता है, तो यह केवल निजता का नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व का अपमान है।
5. सूचना प्रौद्योगिकी कानून और कानूनी रिक्तियाँ
(क) सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000
- धारा 66E – निजता का उल्लंघन
- धारा 67 / 67A – अश्लील सामग्री का प्रकाशन
हालाँकि ये प्रावधान सहायक हैं, परंतु AI और डीपफेक की जटिलता को पूरी तरह संबोधित नहीं करते।
(ख) IT नियम, 2021
इन नियमों के अनुसार—
- शिकायत मिलने पर 24 घंटे में सामग्री हटाना अनिवार्य
- महिलाओं से संबंधित मामलों में विशेष प्राथमिकता
यह मामला इन नियमों के प्रभावी प्रयोग का उदाहरण है।
6. व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) का विकास
व्यक्तित्व अधिकार में व्यक्ति का—
- नाम
- आवाज
- हस्ताक्षर
- छवि
- पहचान
शामिल होती है। बिना अनुमति इनका उपयोग Passing Off और अनुचित व्यापारिक लाभ की श्रेणी में आता है।
पूर्व में—
- Amitabh Bachchan
- Anil Kapoor
को न्यायालय से In Rem Injunction प्राप्त हो चुकी है। शिल्पा शेट्टी का मामला इस न्यायिक परंपरा को आगे बढ़ाता है।
7. सामाजिक प्रभाव और व्यापक संदेश
यह मामला केवल एक अभिनेत्री तक सीमित नहीं है। यह—
- आम महिलाओं
- छात्रों
- सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं
सभी की डिजिटल सुरक्षा से जुड़ा है।
प्रमुख संदेश
- डिजिटल साक्षरता अब वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य है
- प्लेटफॉर्म्स को एल्गोरिदमिक जवाबदेही स्वीकार करनी होगी
- सरकार को विशिष्ट एंटी-डीपफेक कानून लाना होगा
8. भविष्य की राह: कानून, तकनीक और नैतिकता का संतुलन
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय एक स्पष्ट संदेश देता है—
“तकनीक कानून से ऊपर नहीं है, और न ही वह मानवीय गरिमा को कुचलने का लाइसेंस है।”
डिजिटल इंडिया का सपना तभी साकार होगा जब—
- कानून तकनीक से आगे चले
- न्यायालय संवेदनशील रहे
- और नागरिक जागरूक हों
निष्कर्ष
शिल्पा शेट्टी कुंद्रा बनाम Getoutlive.in का मामला भारतीय साइबर कानून और संवैधानिक न्यायशास्त्र में एक मील का पत्थर है। इसने यह स्थापित किया कि—
- अनुच्छेद 21 डिजिटल दुनिया में भी उतना ही शक्तिशाली है
- महिला गरिमा से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं
- AI का दुरुपयोग कानून के कठघरे में लाया जाएगा
यह निर्णय भविष्य के लिए एक संवैधानिक ढाल है—हर उस नागरिक के लिए जो इंटरनेट पर अपनी पहचान के साथ मौजूद है।