झूठी एफ.आई.आर. और पुलिस की वैधानिक जिम्मेदारी: बी.एन.एस.एस. के तहत विवेचना अधिकारी का कर्तव्य, मजिस्ट्रेट की भूमिका और पीड़ित के अधिकार
प्रस्तावना
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना ही नहीं, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों को झूठे मुकदमों से संरक्षण देना भी है। व्यवहार में यह देखने में आता है कि अनेक मामलों में एफ.आई.आर. या एन.सी.आर. व्यक्तिगत द्वेष, राजनीतिक दबाव, पारिवारिक विवाद, संपत्ति झगड़े या प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई जाती हैं।
ऐसे मामलों में जब विवेचना (Investigation) के दौरान यह सिद्ध हो जाता है कि आरोप पूर्णतः झूठे हैं और जैसी घटना का उल्लेख किया गया था वैसी कोई घटना घटित ही नहीं हुई, तब विवेचना अधिकारी का दायित्व केवल अंतिम रिपोर्ट या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करना भर नहीं रह जाता, बल्कि उस झूठी सूचना देने वाले के विरुद्ध विधि अनुसार कार्यवाही कराना भी उसका वैधानिक कर्तव्य बन जाता है।
बी.एन.एस.एस. (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) और बी.एन.एस. (भारतीय न्याय संहिता, 2023) ने इस विषय को और अधिक स्पष्ट, कठोर तथा बाध्यकारी बना दिया है।
झूठी एफ.आई.आर. क्या होती है?
झूठी एफ.आई.आर. वह होती है जिसमें—
- घटना वास्तविक रूप से हुई ही नहीं,
- तथ्य जानबूझकर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किए गए हों,
- निर्दोष व्यक्ति को फँसाने की मंशा हो,
- या आपराधिक कानून का दुरुपयोग किया गया हो।
ऐसी एफ.आई.आर. न केवल आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था का भी दुरुपयोग है।
विवेचना अधिकारी का वैधानिक कर्तव्य
1. केवल क्लोजर रिपोर्ट पर्याप्त नहीं
यदि विवेचना में यह पाया जाए कि मामला झूठा है, तो विवेचना अधिकारी को—
- अंतिम रिपोर्ट / क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी होगी,
- और साथ ही झूठी सूचना देने वाले तथा झूठे गवाहों के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष लिखित शिकायत दाखिल करनी होगी।
2. धारा 215(1)(a) बी.एन.एस.एस.
धारा 215(1)(a) बी.एन.एस.एस. (पूर्व धारा 195(1)(a) दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अनुसार—
न्यायालय केवल उसी स्थिति में झूठी सूचना या झूठे बयान से संबंधित अपराधों पर संज्ञान ले सकता है, जब संबंधित अधिकारी द्वारा लिखित शिकायत प्रस्तुत की जाए।
अर्थात पुलिस अधिकारी की लिखित शिकायत के बिना मजिस्ट्रेट धारा 212 और 217 बी.एन.एस. के अंतर्गत कार्यवाही नहीं कर सकता।
झूठी सूचना पर दंडात्मक प्रावधान
धारा 212 बी.एन.एस.
झूठी जानकारी देकर लोक सेवक को गुमराह करना।
धारा 217 बी.एन.एस.
लोक सेवक को झूठी सूचना देकर उसे गलत कार्य करने हेतु प्रेरित करना।
इन दोनों धाराओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति कानून को हथियार बनाकर निर्दोष को परेशान न कर सके।
मजिस्ट्रेट की भूमिका
यदि पुलिस द्वारा केवल क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाती है और झूठी सूचना पर कोई लिखित शिकायत नहीं दी जाती, तो—
- मजिस्ट्रेट उस अंतिम रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है,
- वह आगे की विवेचना (Further Investigation) का आदेश दे सकता है,
- या पुलिस से स्पष्टीकरण मांग सकता है।
मजिस्ट्रेट न्यायिक प्रहरी (Judicial Sentinel) के रूप में कार्य करता है और उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि पुलिस ने अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन किया है या नहीं।
90 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य
बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत यह अनिवार्य किया गया है कि—
- सूचना-दाता को 90 दिनों के भीतर विवेचना की प्रगति,
- तथा पुलिस रिपोर्ट दाखिल किए जाने की जानकारी दी जाए।
इसका उद्देश्य यह है कि—
- सूचना-दाता समय रहते विरोध-प्रार्थना पत्र (Protest Petition) दाखिल कर सके,
- और मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना पक्ष रख सके।
यह प्रावधान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।
Protest Petition का महत्व
Protest Petition वह कानूनी साधन है जिसके माध्यम से सूचना-दाता—
- क्लोजर रिपोर्ट का विरोध कर सकता है,
- पुनः विवेचना की मांग कर सकता है,
- या मजिस्ट्रेट से संज्ञान लेने का अनुरोध कर सकता है।
यदि यह अवसर नहीं दिया गया, तो पूरी न्यायिक प्रक्रिया एकपक्षीय और त्रुटिपूर्ण मानी जाएगी।
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही
यदि विवेचना अधिकारी, SHO, CO या अभियोजन अधिकारी—
- झूठी एफ.आई.आर. पर शिकायत दाखिल नहीं करते,
- मजिस्ट्रेट को गुमराह करते हैं,
- या जानबूझकर कानून की अवहेलना करते हैं,
तो यह—
- कर्तव्यों की घोर उपेक्षा (Dereliction of Duty),
- विभागीय दंड का आधार,
- अवमानना (Contempt of Court),
- तथा धारा 199(b) बी.एन.एस. के अंतर्गत अपराध बन सकता है।
धारा 199(b) बी.एन.एस.
यह धारा लोक सेवक द्वारा कानून का जानबूझकर उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान करती है। यदि कोई पुलिस अधिकारी न्यायिक आदेशों या विधिक प्रावधानों की अनदेखी करता है, तो वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय है।
अवमानना की कार्यवाही
न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन न करना—
- न्यायिक अधिकार की अवहेलना,
- न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करना,
- तथा न्याय के प्रति अविश्वास उत्पन्न करना
माना जाता है, जो प्रत्यक्ष रूप से अवमानना के दायरे में आता है।
पीड़ित व्यक्ति के अधिकार
यदि पुलिस और न्यायिक अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं करते, तो पीड़ित व्यक्ति—
- उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर सकता है,
- अवमानना की कार्यवाही की मांग कर सकता है,
- विभागीय जांच की प्रार्थना कर सकता है,
- और क्षतिपूर्ति (Compensation) की मांग भी कर सकता है।
न्यायिक दृष्टिकोण
भारतीय न्यायपालिका समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुकी है कि—
- झूठी एफ.आई.आर. न्याय व्यवस्था के लिए कैंसर समान है,
- यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आघात करती है,
- और समाज में कानून के प्रति अविश्वास उत्पन्न करती है।
इसीलिए अब कानून ने यह सुनिश्चित किया है कि झूठी सूचना देने वाला भी आरोपी की भांति कानून के कटघरे में खड़ा हो।
सामाजिक प्रभाव
झूठी एफ.आई.आर. के कारण—
- निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक मुकदमे झेलता है,
- सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट होती है,
- आर्थिक क्षति होती है,
- और मानसिक उत्पीड़न होता है।
इसलिए झूठी सूचना पर कठोर कार्यवाही केवल कानूनी आवश्यकता ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।
बी.एन.एस.एस. का सुधारात्मक उद्देश्य
नई संहिता का उद्देश्य—
- पुलिस की जवाबदेही बढ़ाना,
- न्यायिक निगरानी को सशक्त बनाना,
- पीड़ित और आरोपी दोनों के अधिकारों का संतुलन स्थापित करना,
- तथा आपराधिक न्याय प्रणाली को पारदर्शी बनाना है।
निष्कर्ष
यह अब विधिक रूप से स्थापित हो चुका है कि—
- झूठी एफ.आई.आर. पाए जाने पर केवल क्लोजर रिपोर्ट पर्याप्त नहीं है,
- विवेचना अधिकारी को अनिवार्य रूप से झूठी सूचना देने वालों के विरुद्ध लिखित शिकायत दाखिल करनी होगी,
- मजिस्ट्रेट को दोषपूर्ण विवेचना पर आगे की जांच का आदेश देने का अधिकार है,
- सूचना-दाता को 90 दिनों के भीतर सूचना देना अनिवार्य है,
- और इन सभी निर्देशों की अवहेलना अवमानना एवं दंडनीय अपराध है।
यदि इन निर्देशों का अक्षरशः पालन नहीं किया जाता, तो पीड़ित व्यक्ति को यह पूर्ण अधिकार है कि वह न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर न्यायिक संरक्षण और उत्तरदायित्व सुनिश्चित कराए।
अंतिम शब्द
झूठी एफ.आई.आर. पर कठोर कार्यवाही केवल कानूनी व्यवस्था की मजबूती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज में नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा का आधार है। बी.एन.एस.एस. और बी.एन.एस. ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब कानून का दुरुपयोग करने वालों के लिए न्यायिक सहानुभूति नहीं, बल्कि न्यायिक उत्तरदायित्व होगा।