“जेल ही सजा न बन जाए” — अंडरट्रायल कस्टडी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर एक गहन न्यायिक विश्लेषण
प्रस्तावना
“न्याय में देरी, न्याय से इनकार के समान है।” यह कथन भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था की उस सच्चाई को उजागर करता है, जिसे अक्सर आंकड़ों के पीछे छिपा दिया जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, भारत की जेलों में बंद कुल कैदियों में लगभग तीन-चौथाई से अधिक वे लोग हैं, जिनका अपराध अभी सिद्ध ही नहीं हुआ है। इन्हें हम अंडरट्रायल कैदी कहते हैं।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि “अंडरट्रायल कस्टडी कभी भी सजा का विकल्प नहीं बननी चाहिए।” उनका यह कथन केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 की आत्मा की पुनः पुष्टि है।
यह लेख अंडरट्रायल कस्टडी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शीघ्र ट्रायल, जमानत के सिद्धांत और न्यायिक सुधारों के संदर्भ में भारतीय न्याय व्यवस्था की गहराई से समीक्षा करता है।
अंडरट्रायल कस्टडी: अर्थ और वास्तविकता
अंडरट्रायल वह व्यक्ति होता है, जिसके विरुद्ध आरोप लगे होते हैं, किंतु अदालत ने उसे अभी दोषी घोषित नहीं किया होता। कानून की दृष्टि में वह व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। फिर भी, व्यवहार में वह व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहता है।
यही वह बिंदु है, जहाँ कानून और वास्तविकता के बीच गहरी खाई दिखाई देती है।
कई मामलों में देखा गया है कि ट्रायल पूरा होने तक व्यक्ति उतना समय जेल में बिता देता है, जितनी सजा उस अपराध के लिए अधिकतम निर्धारित होती है। अंततः जब वह बरी होता है, तो न्याय उसके लिए अर्थहीन हो जाता है।
कस्टडी बनाम सजा: संवैधानिक विरोधाभास
संविधान का मूल सिद्धांत है —
“दोष सिद्ध होने तक कोई भी व्यक्ति अपराधी नहीं है।”
लेकिन जब कोई व्यक्ति 8–10 वर्षों तक जेल में रहता है, तो वह कस्टडी स्वयं एक अनौपचारिक सजा में बदल जाती है। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है, जिसमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित किया गया है।
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने स्पष्ट किया कि अदालतों को यह देखना चाहिए कि—
- क्या ट्रायल यथोचित समय में पूरा हो पाएगा?
- क्या आरोपी के जेल में रहने का उद्देश्य न्याय की रक्षा है या केवल प्रक्रिया की औपचारिकता?
यदि ट्रायल की गति इतनी धीमी है कि व्यक्ति अनिश्चितकाल तक बंद रहता है, तो वह हिरासत असंवैधानिक हो जाती है।
शीघ्र ट्रायल: मौलिक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने हुस्नआरा खातून बनाम बिहार राज्य मामले में पहली बार यह घोषित किया कि शीघ्र ट्रायल अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।
इसके बाद अनेक मामलों में न्यायालय ने दोहराया कि—
- न्याय केवल अंतिम फैसले में नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में निहित है।
- विलंबित न्याय, न्याय नहीं बल्कि अन्याय है।
शीघ्र ट्रायल का अर्थ केवल तारीखों की संख्या कम करना नहीं, बल्कि प्रभावी और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है।
जमानत का सिद्धांत: नियम बनाम अपवाद
भारतीय न्याय व्यवस्था में एक प्रसिद्ध सिद्धांत है—
“जमानत नियम है, जेल अपवाद।”
इसके बावजूद, व्यवहार में स्थिति उलट है।
विशेष कानून जैसे—
- यूएपीए (UAPA)
- पीएमएलए (PMLA)
- एनडीपीएस एक्ट
में जमानत की शर्तें इतनी कठोर हैं कि आरोपी वर्षों तक जेल में रहते हैं, चाहे उनके विरुद्ध साक्ष्य कमजोर ही क्यों न हों।
पूर्व सीजेआई ने कहा कि अदालतों को यह देखना चाहिए कि—
- क्या आरोपी के भागने की वास्तविक संभावना है?
- क्या वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है?
- क्या वह समाज के लिए तत्काल खतरा है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, तो जमानत से इनकार न्यायिक विवेक का दुरुपयोग माना जाएगा।
अंडरट्रायल कैदियों की स्थिति: एक दृष्टिपात
| श्रेणी | स्थिति | समाधान |
|---|---|---|
| अंडरट्रायल कैदी | ट्रायल लंबित | धारा 436A के तहत रिहाई |
| देरी का कारण | जजों की कमी, स्थगन | फास्ट ट्रैक कोर्ट |
| जमानत बाधा | कठोर कानून | संविधानिक संतुलन |
| सामाजिक प्रभाव | परिवार का विनाश | वैकल्पिक दंड प्रणाली |
धारा 436A CrPC/BNSS के अनुसार, यदि कोई अंडरट्रायल व्यक्ति अधिकतम सजा की आधी अवधि जेल में काट चुका है, तो उसे रिहा किया जाना चाहिए। किंतु व्यवहार में इस प्रावधान का उपयोग बहुत सीमित है।
सामाजिक और मानवीय परिणाम
अंडरट्रायल कस्टडी केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, यह पूरे समाज पर असर डालती है।
1. पारिवारिक विनाश
घर का कमाऊ सदस्य जेल में होने से परिवार आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से टूट जाता है।
2. बच्चों का भविष्य
अपराधी का टैग पूरे परिवार को जीवनभर झेलना पड़ता है।
3. अपराध का प्रशिक्षण
जेल में छोटे अपराधी, बड़े अपराधियों के संपर्क में आकर और अधिक अपराधी बन जाते हैं।
4. राज्य पर आर्थिक बोझ
अंडरट्रायल कैदियों पर खर्च होने वाला धन न्यायिक सुधारों में लगाया जा सकता था।
न्यायिक व्यवस्था की संरचनात्मक समस्याएँ
अंडरट्रायल संकट के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं—
- जजों की भारी कमी
- पुलिस जांच में देरी
- चार्जशीट में विलंब
- गवाहों का मुकरना
- वकीलों की अनुपस्थिति
- बार-बार स्थगन
जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक अंडरट्रायल संकट समाप्त नहीं हो सकता।
न्यायिक सुधार: समय की मांग
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के विचारों के आलोक में कुछ ठोस सुधार आवश्यक हैं—
1. जमानत मामलों को प्राथमिकता
जमानत याचिकाओं का शीघ्र निस्तारण अनिवार्य किया जाए।
2. स्वचालित जमानत प्रणाली
यदि चार्जशीट समय पर दाखिल न हो या ट्रायल 3–5 वर्षों से अधिक खिंचे, तो स्वतः जमानत मिले।
3. न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना
जनसंख्या के अनुपात में जजों की संख्या अत्यंत कम है।
4. तकनीक का उपयोग
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, ई-फाइलिंग को अनिवार्य किया जाए।
5. वैकल्पिक दंड प्रणाली
छोटे अपराधों में सामुदायिक सेवा, जुर्माना, परामर्श जैसी व्यवस्थाएँ अपनाई जाएँ।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणा और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून भी यह मानते हैं कि—
- किसी व्यक्ति को बिना दोष सिद्ध हुए अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखना मानवाधिकार उल्लंघन है।
- ट्रायल में देरी राज्य की विफलता मानी जाती है।
भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, उसे इन मानकों पर खरा उतरना होगा।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता: लोकतंत्र की आत्मा
व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल कानून की किताबों में लिखी अवधारणा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब राज्य किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनता है, तो उसे यह साबित करना होता है कि वह पूरी तरह न्यायोचित है।
अंडरट्रायल कस्टडी में यह न्यायोचितता अक्सर अनुपस्थित रहती है।
निष्कर्ष
पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ का कथन केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक चेतावनी है। यदि हम अंडरट्रायल कस्टडी को सजा बनने देते हैं, तो हम अपने संविधान की आत्मा को कमजोर करते हैं।
न्याय का उद्देश्य बदला नहीं, बल्कि संतुलन, सुधार और सत्य की स्थापना है।
एक व्यक्ति को दोष सिद्ध हुए बिना वर्षों जेल में रखना, न्याय नहीं बल्कि लोकतंत्र की हार है।
कस्टडी को सजा न बनने देना ही भारत की न्यायिक परिपक्वता की असली परीक्षा है।
पाठक के लिए विशेष संदेश
यदि आप कानूनी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, तो यह जानना आवश्यक है कि—
- शीघ्र ट्रायल आपका अधिकार है।
- जमानत आपका संवैधानिक संरक्षण है।
- और व्यक्तिगत स्वतंत्रता कोई दया नहीं, बल्कि आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।
न्याय केवल अदालतों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता से भी जीवित रहता है।