“जनवरी तक टोल नहीं?” — दिल्ली बॉर्डर टोल प्लाज़ाओं पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी, प्रदूषण, ट्रैफिक और नागरिक अधिकारों का बड़ा सवाल
दिल्ली–एनसीआर आज भारत का सबसे बड़ा शहरी समूह है। यहाँ हर दिन करोड़ों लोग काम, व्यापार, शिक्षा और चिकित्सा के लिए आवागमन करते हैं। लेकिन इसी महानगर क्षेत्र की सीमाओं पर बने टोल प्लाज़ा वर्षों से आम नागरिकों के लिए परेशानी, प्रदूषण और ट्रैफिक अव्यवस्था का पर्याय बन चुके हैं।
इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली बॉर्डर टोल प्लाज़ाओं को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया—
“क्या हालात इतने गंभीर होने के बावजूद जनवरी तक टोल वसूली रोकी नहीं जा सकती?”
यह सवाल केवल टोल शुल्क से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से सीधे तौर पर जुड़ता है। यह लेख इस पूरे मुद्दे का कानूनी, सामाजिक, पर्यावरणीय और नीतिगत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
दिल्ली बॉर्डर टोल प्लाज़ा: समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दिल्ली की सीमाओं पर स्थित कई टोल प्लाज़ा—जैसे गाजीपुर, सिंघु, टिकरी, बदरपुर और झुंडपुर—मूल रूप से राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के लिए बनाए गए थे। इनका उद्देश्य था—
- सड़क निर्माण लागत की वसूली
- रखरखाव के लिए धन जुटाना
लेकिन समय के साथ दिल्ली–एनसीआर का स्वरूप बदल गया।
आज ये टोल प्लाज़ा—
- शहर की सीमा के बीचों-बीच आ गए हैं
- शहरी यातायात का हिस्सा बन चुके हैं
- और अपनी मूल उपयोगिता खो चुके हैं
टोल प्लाज़ा और ट्रैफिक जाम: रोज़मर्रा की सच्चाई
दिल्ली बॉर्डर टोल प्लाज़ाओं पर रोज़ाना—
- हजारों वाहन रुकते हैं
- लंबी कतारें लगती हैं
- घंटों जाम की स्थिति बनती है
इसका सीधा असर पड़ता है—
- ऑफिस जाने वाले कर्मचारियों पर
- छात्रों पर
- मरीजों और एंबुलेंस सेवाओं पर
- आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पर
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को “प्रशासनिक विफलता का जीवंत उदाहरण” बताया।
प्रदूषण संकट और टोल प्लाज़ा का संबंध
दिल्ली की वायु गुणवत्ता लंबे समय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रही है।
सर्दियों में हालात और भी भयावह हो जाते हैं।
टोल प्लाज़ा प्रदूषण कैसे बढ़ाते हैं?
- वाहनों का लंबे समय तक खड़ा रहना
- इंजन चालू रहना
- भारी वाहनों से अधिक उत्सर्जन
- बार-बार ब्रेक और एक्सेलरेशन
इन सबका परिणाम—
- PM2.5 और PM10 का खतरनाक स्तर
- सांस संबंधी बीमारियाँ
- बच्चों और बुजुर्गों पर गंभीर प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि—
“स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।”
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामला: अदालत की नाराज़गी
दिल्ली–एनसीआर में प्रदूषण और ट्रैफिक से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अदालत ने टोल प्लाज़ाओं पर सीधा सवाल उठाया।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियाँ
- टोल प्लाज़ा बॉटलनेक बन चुके हैं
- ये प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं
- प्रशासन के पास स्पष्ट और प्रभावी योजना का अभाव है
इसी क्रम में अदालत ने पूछा—
“क्या जनवरी तक टोल वसूली रोकने पर विचार नहीं किया जा सकता?”
यह सवाल सरकार और संबंधित एजेंसियों के लिए एक कड़ा संदेश था।
टोल वसूली का कानूनी आधार और विवाद
भारत में टोल वसूली—
- राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल
के तहत की जाती है।
लेकिन विवाद क्यों?
- कई सड़कों की लागत पहले ही वसूल हो चुकी है
- फिर भी टोल जारी है
- शहरी सीमा पर टोल का औचित्य संदिग्ध है
यही कारण है कि टोल को लेकर जनता में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है।
FASTag और तकनीकी समाधान: अधूरी उम्मीद
सरकार ने FASTag लागू कर यह दावा किया कि—
- टोल पर रुकावट कम होगी
- ट्रैफिक सुचारु होगा
लेकिन वास्तविकता यह है कि—
- सभी लेन पूरी तरह स्वचालित नहीं
- तकनीकी खराबियाँ आम हैं
- नियमों का समान पालन नहीं होता
इसलिए FASTag के बावजूद जाम और प्रदूषण की समस्या बनी हुई है।
न्यायालय का दृष्टिकोण: राजस्व बनाम जीवन
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि—
- राजस्व संग्रह महत्वपूर्ण हो सकता है
- लेकिन वह जनस्वास्थ्य और जीवन से ऊपर नहीं हो सकता
अदालत का यह रुख दर्शाता है कि—
“नीतियों की कसौटी नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा होनी चाहिए।”
संभावित समाधान: अदालत के संकेत
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कोई अंतिम आदेश नहीं दिया, लेकिन उसकी टिप्पणियों से समाधान की दिशा स्पष्ट होती है—
1. टोल प्लाज़ाओं का स्थानांतरण
दिल्ली सीमा से बाहर, शहरी यातायात से दूर।
2. अस्थायी रूप से टोल वसूली पर रोक
विशेषकर प्रदूषण के गंभीर महीनों में।
3. बैरियर-फ्री इलेक्ट्रॉनिक टोलिंग
पूरी तरह बिना रुकावट वाली प्रणाली।
4. स्थानीय एनसीआर यातायात को छूट
रोज़मर्रा के यात्रियों के लिए राहत।
केंद्र, राज्य और एजेंसियों की साझा जिम्मेदारी
दिल्ली बॉर्डर टोल का मुद्दा—
- केंद्र सरकार
- दिल्ली सरकार
- हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार
- NHAI और निजी ठेकेदारों
सभी से जुड़ा है।
लेकिन अक्सर—
- जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल दी जाती है
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर असंतोष जताया और समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता बताई।
मौलिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न
यह मामला सीधे तौर पर—
- अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता)
- स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार
- सुगम आवागमन के अधिकार
से जुड़ता है।
यदि टोल प्लाज़ा—
- जीवन को जोखिम में डालें
- स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालें
तो वे संवैधानिक मूल्यों के विपरीत माने जा सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव और शहरी नीति
दुनिया के कई महानगरों—
- लंदन
- पेरिस
- सिंगापुर
में शहरी सीमाओं पर टोल की बजाय—
- कंजेशन चार्ज
- पब्लिक ट्रांसपोर्ट
- पर्यावरण-आधारित नीति
अपनाई गई है।
भारत को भी अब पुराने टोल मॉडल से आगे बढ़ने की जरूरत है।
निष्कर्ष: टोल से पहले जीवन और स्वास्थ्य
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक प्रशासनिक सवाल नहीं, बल्कि एक संवैधानिक चेतावनी है।
यह स्पष्ट संदेश देती है कि—
- राजस्व से ऊपर नागरिकों का जीवन है
- पर्यावरण और स्वास्थ्य प्राथमिकता हैं
- शहरी नीति को नए सिरे से सोचना होगा
यदि दिल्ली–एनसीआर में टोल प्लाज़ाओं को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो—
ये प्लाज़ा केवल सड़क पर जाम नहीं, बल्कि नीति की विफलता का प्रतीक बन जाएंगे।
अब यह सरकारों और नीति-निर्माताओं पर निर्भर है कि वे—
- सुप्रीम कोर्ट की भावना को समझें
- और नागरिकों को वास्तविक राहत दें।